नया अंक

अक्‍टूबर 2009

















लोकतन्त्र का लबादा खूँटी पर, दमन का चाबुक हाथ में! 

''वामपन्थी'' उग्रवाद से निपटने के नाम पर आम जनता के खिलाफ ख़ूनी युद्ध की तैयारी! 

सबसे बड़ा आतंकवाद है राजकीय आतंकवाद और वही है हर किस्म के आतंकवाद का मूल कारण 

काले कानूनों, निरंकुश पुलिस त
न्त्र, सैन्य कार्रवाइयों, फर्जी मुठभेड़ों, टॉर्चर चैम्बरों और मीडिया ट्रॉयल के जरिये नहीं किया जा सकता आतंकवाद का खात्मा! 

समस्या की
 जड़ में है नंगी पूँजीवादी लूट, भ्रष्ट-अत्याचारी शासनतन्त्र, समृद्धि के तलघर में नर्क का अंधेरा! 

व्यवस्था के गम्भीर ढँचागत संकट के कारण सिकुड़ रहा है तेजी से पूँजीवादी जनवाद का रहा-सदा दायरा। 

नवउदारवादी आर्थिक नीतियों पर प्रभावी अमल के लिए चाहिए एक निरंकुश स्वेच्छाचारी शासनतन्त्र! 

सुरक्षा-विषयक मन्त्रिमण्डलीय कमेटी की एक ऐतिहासिक बैठक हुई जिसमें माओवादियों के विरुद्ध अब तक की सबसे बड़ी सशस्त्र आक्रमणात्मक कार्रवाई का निर्णय लिया गया। बैठक में गृहमन्त्री चिदम्बरम, प्रतिरक्षा मन्त्री ए.के. एण्टोनी और राष्ट्रीय प्रतिरक्षा सलाहकार एम.के. नारायणन भी मौजूद थे। बैठक ने गृह मन्त्रालय की रणनीतिक योजना को मंजूरी देते हुए यह निर्णय लिया कि इस मुहिम में प्रभावित राज्यों की सशस्त्र पुलिस, अर्द्धसैनिक बलों के विशेष प्रशिक्षित छापामार विरोधी दस्तों और आन्‍ध्रप्रदेश के नक्सल विरोधी कोबरा बटालियन के अतिरिक्त केन्द्रीय सुरक्षा बलों के 75 हजार जवान हिस्सा लेंगे।   आगे पढ़ें  


गोरखपुर में मजदूरों की एकजुटता के आगे झुके मिल मालिक - आन्दोलन की आंशिक जीत, लेकिन मालिकान के अड़ियल रवैये के खिलाफ संघर्ष जारी 

गोरखपुर में अगस्त के पहले सप्ताह से जारी मॉडर्न लेमिनेटर्स लि. और मॉडर्न पैकेजिंग लि. के मजदूरों के आन्दोलन में मजदूरों को एक आंशिक जीत हासिल हुई जब 24 सितम्बर को जिला प्रशासन द्वारा कराये गये समझौते में 15 दिनों के अन्दर अधिकांश माँगें लागू कराने की बात तय हुई। समझौते में यह भी तय हुआ कि इस दौरान 2 लेबर इंस्पेक्टर श्रम कानूनों के उल्लंघन पर नजर रखने के लिए दोनों कारखानों में तैनात रहेंगे। 15 दिन के बाद उपश्रमायुक्त और जिलाधिकारी की मौजूदगी में मजदूर प्रतिनिधियों के साथ समझौते के क्रियान्वयन की समीक्षा की जायेगी।    आगे पढ़ें  

देश के ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में अभूतपूर्व सैन्य आक्रमण शुरू करने की भारत सरकार की योजना के ख़िलाफ ज्ञापन    पढ़ें  

श्रद्धांजलि : नहीं रहे प्रो. के. बालगोपा    पढ़ें  



रामपुर-चंदौली के पाँच बोरा कारखानों के मजदूरों के आन्दोलन की आंशिक जीत : आतंक और असुरक्षा के साये में जीने को मजबूर हैं भयंकर शोषण के शिकार हजारों मजदूर 

प्रदेश के चन्दौली जिले के रामनगर औद्योगिक क्षेत्र में भी देश के दूसरे हिस्सों की तरह श्रम कानूनों का कोई मतलब नहीं है। मजदूर 12-14 घण्टे काम करके मुश्किल से जीने लायक कमा पाते हैं। मालिकों की गुण्डागर्दी और आतंकराज के सामने वे बिल्कुल निहत्थे हैं। पूरे इलाके में कोई यूनियन नहीं है। मजदूर नेताओं के नाम पर चुनावी पार्टियों से जुड़े कुछ दलाल नेता भर हैं। इलाके में करीब 70-75 छोटे और मध्‍यम दर्जे के कारखानों में हजारों मजदूर काम करते हैं। पहले यह क्षेत्र बनारस जिले में आता था लेकिन अब नये जिले चन्दौली का भाग है। दोनों शहरों से दूर बेहद पिछड़े इलाके में होने के कारण मजदूरों की कठिनाइयाँ और बढ़ जाती हैं।    आगे पढ़ें  


जब एक हारी हुई लड़ाई ने जगाई मजदूरों में उम्मीद और हौसले की लौ... 

दिल्ली के उत्तर-पश्चिम जिले के इलाके शाहाबाद डेयरी में एक छोटी-सी फैक्ट्री 'पायल एम्ब्रायडरी' के 14 मजदूरों ने पिछले दिनों अपने हक के लिए एक सप्ताह तक बेहद जुझारू आन्दोलन चलाया। इन मजदूरों को 2 अक्टूबर को अचानक फैक्टरी से निकाल दिया गया था और फैक्टरी मालिक इनका कोई भी कानूनी हक देने के लिए तैयार नहीं था। मजदूर 5 अक्टूबर से 10 अक्टूबर तक सुबह साढ़े सात से रात साढ़े आठ बजे तक रोज फैक्टरी गेट पर धरने पर बैठते रहे। उन्होंने पुलिस से लेकर श्रम विभाग के अधिकारियों तक अपनी बात पहुँचायी, लेकिन आखिरकार उन्हें हारकर अपने जायज हक से बहुत कम पर समझौता करना पड़ा।    आगे पढ़ें  



कोरबा के मजदूरों की मौत हादसा नहीं, हत्या है!! 

गत 23 सितम्बर, बुधवार के दिन छत्तीसगढ़ के कोरबा जिले में स्थित भारत एल्यूमीनियम कम्पनी लिमिटेड (बालको) के निर्माणाधीन विद्युत संयन्त्र की चिमनी ढह जाने के कारण कम से कम 41 मजदूरों की मौत हो गयी। जबकि कई अन्य मजदूरों के भी मलबे में दबे होने की आशंका जतायी जा रही थी। प्लाण्ट पर निर्माण कार्य के दौरान मजदूर जब चिमनी में काम कर रहे थे तभी चिमनी अचानक ढह गयी और मजदूर इसके नीचे दब गये। जिस वक्त यह दुर्घटना हुई, उस समय चिमनी के पास लगभग 300 मजदूर काम कर रहे थे, इसलिए कहना मुश्किल है कि कितने ही बेगुनाह मजदूरों की लाशें अभी मलबे के इस ढेर के नीचे दफ्न है। बालको के 1200 मेगावॉट के विद्युत संयन्त्र में ठेका कम्पनी सेफको चिमनी निर्माण का काम देख रही थी और सेफको ने यह काम एक अन्य ठेका कम्पनी जी.डी.सी.एल. को सौंप रखा था। दुर्घटना के समय इन दोनों ही कम्पनियों और बालको के अधिकारी घटना-स्थल पर मौजूद थे जो हादसा होते ही वहाँ से फरार हो गये। खानापूर्ति के लिए पुलिस ने बालको प्रबन्धन और ठेका कम्पनियों के ख़िलाफ ग़ैर-इरादतन हत्या का मामला तो दर्ज कर दिया है, हालाँकि अभी तक किसी भी अधिकारी की गिरफ्तारी नहीं हुई है। बताने की जरूरत नहीं कि इस मामले का भी वही हश्र होना है जो ऐसे सब मामलों का होता रहा है।    आगे पढ़ें  


जाँच समितियाँ नहीं बतायेंगी खजूरी स्कूल हादसे के असली कारण 

उत्तर-पूर्वी दिल्ली के खजूरी खास इलाके के राजकीय उच्चतर-माध्‍यमिक विद्यालय में पिछले 10 सितम्बर को हुए हादसे में छह छात्राओं की मौत हमें उस हादसे के वास्तविक कारणों पर सोचने को मजबूर करती है। सरकार और मीडिया भले ही इस हादसे को संयोग साबित करने की कोशिश करें, लेकिन हमें नहीं भूलना चाहिए कि ऐसे ''संयोग'' प्राइवेट या पब्लिक स्कूलों में नहीं होते। डीपीएस या मॉडर्न स्कूल में ऐसी भगदड़ नहीं होती, न ही उनमें पढ़ने वाले बच्चे इस तरह मरते हैं।    आगे पढ़ें  



दिल्ली मेट्रो फीडर के चालकों-परिचालकों की सफल हड़ताल 

बिगुल के पिछले अंकों में दिल्ली मेट्रो रेल तथा उसकी ठेका कम्पनियों द्वारा श्रम कानूनों के उल्लंघन और नंगे शोषण की रिपोर्ट छपती रही है। मजदूर- कर्मचारी भी अपने ऊपर हो रहे शोषण के खिलाफ आठ महीनों से 'मेट्रो कामगार संघर्ष समिति' के बैनर तले एकजुट होकर समय-समय पर अपने जायज कानूनी हकों को लेकर आन्दोलन करते आ रहे हैं। इसी कड़ी में पिछले दिनों मेट्रो फीडर बस के चालकों- परिचालकों ने राजस्थान बाम्बे ट्रांसपोर्ट (आर.बी.टी.) तथा डी.एम.आर.सी. के खिलाफ अनिश्चितकालीन हड़ताल करने का फैसला किया। हड़ताल की मुख्य माँगें थीं - 1. बुनियादी श्रम कानून लागू किए जायें जैसे आई कार्ड, ईएसआई, पीएफ आदि, 2. समय पर वेतन-वृद्धि की जाये, 3. ओवरटाइम डबल रेट से दिया जाये, 4. आर.बी.टी. द्वारा शोषण-उत्पीड़न बन्द किया जाये, 5. सभी ठेका मजदूरों को स्थायी किया जाये।   आगे पढ़ें  

नये संकल्पों और नयी शुरुआतों के साथ मना शहीदेआजम भगतसिंह का जन्मदिवस 
बादली में 'शहीद सप्ताह' का आयोजन तथा 'शहीद पुस्तकालय' का उद्धाटन
''शहीद भगतसिंह की विचारधारा और आज का समय'' पर विचार गोष्ठी का आयोजन 
नौजवान भारत सभा ने मनाया शहीदे आजम भगतसिंह का जन्मदिन    पढ़ें  


यूपीए सरकार का सादगी ड्रामा 

यूपीए सरकार ने इन दिनों जनता की नजरों में धूल झोंकने के लिए एक नया शगूफा छोड़ा है। यूपीए की चेयरमैन सोनिया गांधी, वित्ता मन्त्री प्रणव मुखर्जी और कांग्रेस के महासचिव राहुल गांधी इस बात का जोर-शोर से प्रचार कर रहे हैं कि यूपीए के पदाधिकारी, सरकार के मन्त्री तथा सांसद अपने खर्चों में कटौती करें, सादगी भरा जीवन बितायें ताकि इससे जो पैसा बचे उसका इस्तेमाल सूखाग्रस्त इलाकों की जनता की मदद करने में किया जा सके।    आगे पढ़ें  



नाना पाटेकर, सनी देओल और चिदम्बरम 

आतंकवाद बम्बइया फिल्मों के सबसे लोकप्रिय फार्मूलों में से एक है। इनमें से अधिकांश फिल्में इस बात की पुरजोर वकालत करती हैं कि कोर्ट-कचहरी के लम्बे चक्करों के बजाय, पुलिस को यह पूरा-पूरा अधिकार होना चाहिए कि वह आतंकवादियों को ख़ुद ही सजा सुनाकर आनन-फानन में उसकी तामील भी कर दे। यानी आतंकवादियों के सन्दर्भ में संविधान और कानून का कोई अस्तित्व नहीं (तर्क यह कि वे स्वयं भी तो उन्हें नहीं मानते!), उन्हें फर्जी मुठभेड़ में या टॉर्चर चैम्बर में ढेर कर देना सर्वथा न्यायोचित है! देखा जाये तो यह तर्क सर्वथा ग़ैरकानूनी और असंवैधानिक है। लेकिन इस देश का सेंसर बोर्ड इन फिल्मों को धड़ल्ले से पास करता है। एक चोर, डकैत और हत्यारे को भी न्याय का अधिकार प्राप्त है और एक आतंकवादी को भी। जो लोग सत्तातन्त्र द्वारा इस अधिकार के अपहरण को जायज ठहराते हैं, वे प्रकारान्तर से यह स्वीकार करते हैं कि स्वयं यह राज्यसत्ता ही आतंकवादी है।    आगे पढ़ें  


प्रधानमन्त्री जी, देश की सुरक्षा को खतरा आतंकवाद से नहीं, ग़रीबी-भुखमरी-बेरोजगारी से है! 

गुजरे 14-15 सितम्बर 2009 को नयी दिल्ली में विभिन्न राज्यों के पुलिस अध्‍यक्षों तथा अन्य पुलिस अफसरों का वार्षिक दो रोजा सम्मेलन हुआ। पहले दिन इस सम्मेलन को गृह मन्त्री चिदम्बरम और दूसरे दिन प्रधानमन्त्री मनमोहन सिंह ने मुख्य वक्ता के तौर पर सम्बोधित किया। दोनों ने इस देश को अन्दरूनी तथा बाहरी आतंकवाद से खतरे की चर्चा करते हुए, इससे निपटने के उपायों की चर्चा की। प्रधानमन्त्री ने अपने भाषण में कुछ दिलचस्प और आधी सच्ची बातें कहीं। उन्होंने नियन्त्रण रेखा के पार से और नेपाल, बांग्लादेश से देश में हो रही घुसपैठ की चर्चा की। उन्होंने कश्मीर और उत्तर पूर्वी राज्यों में सरकार के हथियारबन्द दस्तों की हथियारबन्द आतंकवादियों से टक्करों में हो रही बढ़ोतरी की चर्चा की। प्रधानमन्त्री मनमोहन सिंह पिछले कई वर्षों से नक्सलवाद को देश की अन्दरूनी सुरक्षा के लिए सबसे बड़े खतरे के तौर पर पेश करते आ रहे हैं। उपरोक्त सम्मेलन में दिये अपने भाषण् में उन्होंने फिर इस बात को दोहराया। उन्होंने माना कि, ''नागरिक समाज, बुद्धिजीवियों और नौजवानों के एक अच्छे-खासे हिस्से में इस आन्दोलन का प्रभाव है। उन्होंने यह भी माना कि उनके प्रयासों के बावजूद प्रभावित राज्यों में हिंसा में बढ़ोत्तारी जारी है।''    आगे पढ़ें  



चीनी क्रान्ति की 60वीं वर्षगाँठ पर : बीसवीं सदी की दूसरी महानतम क्रान्ति मेहनतकश जनता के लिए प्रेरणा का अक्षयस्रोत बनी रहेगी! - इस क्रान्ति की शिक्षाओं से सीखकर आज की क्रान्तिकारी राह पर आगे बढ़ना होगा! 

चीनी क्रान्ति की 60वीं वर्षगाँठ पर चीन के वर्तमान पूँजीवादी शासकों ने जिस तरह माओ की तस्वीर और पाँच सितारों वाले लाल झण्डे के साथ अपनी शक्ति का प्रदर्शन किया उसे 21वीं सदी का सबसे अश्लील मजाक कहा जाना चाहिए। माओ त्से-तुघ के निधन के बाद चीनी की सत्ता पर काबिज होने वाले पूँजीवादी पथगामियों के गिरोह ने आज चीन को वहाँ ला खड़ा किया है कि अपने देश के मजदूरों को बुरी तरह निचोड़ने और सस्ती श्रमशक्ति को लूटने के लिए दुनियाभर की कम्पनियों को मौका देने में वह सबसे आगे निकल गया है। इतना ही नहीं, अब चीन के नये शासक मुद्रा पूँजी का निर्यात करके अफ्रीका के कई देशों सहित दूसरे मुल्कों के मजदूरों का भी शोषण कर रहे हैं और साम्राज्यवादी लुटेरों की कतार में शामिल होने के लिए अपनी ताकत का अश्लील प्रदर्शन कर रहे हैं। समाजवाद के दौर की सारी उपलब्धियों को धूल में मिलाया जा चुका है और पूँजीवादी व्यवस्था को अपनी तमाम गलीज बीमारियों के साथ खुलकर पनपने का मौका दिया जा रहा है।    आगे पढ़ें  



दूसरे विश्वयुद्ध की शुरुआत के 70 वर्ष पूरे होने के मौके पर : इतिहास को तोड़ने-मरोड़ने की पूँजीवादी कोशिशों के बावजूद इस सच्चाई को नहीं झुठलाया जा सकता - हिटलर को हराकर दुनिया को फासीवाद के राक्षस से मजदूरों के राज ने ही बचाया था 

साम्राज्यवादी शक्तियों द्वारा आपस में दुनिया के बँटवारे के लिए छेड़े गये महाविनाशकारी द्वितीय विश्वयुद्ध की शुरुआत के 70 वर्ष पूरे होने के मौके पर पश्चिमी साम्राज्यवादियों ने एक बार फिर यह झूठा प्रचार शुरू कर दिया कि स्तालिन ने हिटलर के साथ समझौता करके उसे युद्ध छेड़ने का मौका दिया। इतिहास के तथ्यों को तोड़-मरोड़कर उनहोंने एक तरफ तो इस युद्ध में फासिस्टों के खिलाफ जीत का श्रेय खुद लेने की कोशिश की और दूसरी ओर तत्कालीन मजदूरों के राज्य सोवियत संघ की नीतियों को युद्ध के लिए जिम्मेदार ठहराने की धूर्ततापूर्ण कोशिश भी की। दरअसल ऐसा करके साम्राज्यवादी देश एक तीर से दो निशाने साधने की की फिराक में रहे हैं। एक तरफ तो वे अपने ख़ून से रंगे हाथों को विश्व की आम जनता से छिपाना चाहते हैं, दूसरी ओर वे पूँजीवाद और साम्राज्यवाद के कहर से त्रस्त जनता के मन में समाजवादी विचारों की बढ़ती हुई लोकप्रियता को कम करने के लिए इसे समाजवाद के खिलाफ कुत्सा-प्रचार का हथकण्डा बनाना चाहते हैं।    आगे पढ़ें  


अदम्य बोल्शेविक – नताशा : एक स्त्री मजदूर संगठनकर्ता की संक्षिप्त जीवनी (दसवीं किश्त)    पढ़ें 

Comments