नवम्‍बर 2010

साथियो!

'मज़दूर बिगुल' का पहला अंक आपके हाथों में है। किन्हीं अपरिहार्य कारणों से 'नई समाजवादी क्रान्ति का उद्धोषक बिगुल' के प्रकाशन को स्थगित करना पड़ा है। 'मज़दूर बिगुल' उन्हीं राजनीतिक विचारों का प्रतिनिधित्व करने के लिए प्रतिबद्ध है जिनका प्रतिनिधित्व 'नई समाजवादी क्रान्ति का उद्धोषक बिगुल' कर रहा था। हम उम्मीद करते हैं कि जिस प्रकार का सहयोग और साथ सुधी पाठक उसे दे रहे थे, वही वे 'मज़दूर बिगुल' को देना जारी रखेंगे। 'मज़दूर बिगुल' नई समाजवादी क्रान्ति की सोच को लेकर काम करता रहेगा। - सम्पादक मण्डल

नया अंक

नवम्‍बर 2010


पूँजीवादी लूट इससे ज्यादा नग्न नहीं हो सकती! 
मेहनतकशों की तबाही-बर्बादी इससे भयंकर नहीं हो सकती! 
हम अब और तमाशबीन नहीं बने रह सकते! 
एक ही रास्ता - मज़दूर इंक़लाब! मज़दूर सत्ता!  

सही फरमाया प्रधानमन्त्री महोदय! यह व्यवस्था अनाज सड़ा सकती है लेकिन भुख से मरते लोगों तक नहीं पहुँचा सकती है! 

इराकी जनता को तबाह करने के बाद अब इराक से वापसी का अमेरिकी ड्रामा   

कारख़ाना मज़दूर यूनियन के नेतृत्व में 100 से भी अधिक पावरलूम कारख़ानों के मज़दूरों ने कायम की जुझारू एकजुटता 

तीन-दिवसीय द्वितीय अरविन्द स्मृति संगोष्ठी गोरखपुर में सम्पन्न - 21वीं सदी का मज़दूर आन्दोलन : नयी चुनौतियाँ, नये रास्ते, नयी दिशा 

काम के उचित दिन की उचित मज़दूरी 

माँगपत्रक आन्दोलन-2011 शिक्षा माला : माँगपत्रक आन्दोलन-2011 के मुद्दों एवं माँगों के बारे में चर्चा 

देश के विभिन्न हिस्सों में माँगपत्रक आन्दोलन-2011 की शुरुआत - अब चलो नयी शुरुआत करो! मज़दूर मुक्ति की बात करो! 

बादाम उद्योग मशीनीकरण की राह पर 

अयोध्‍या फैसला : मज़दूर वर्ग का नज़रिया (पहली किश्त) 


पूँजीवादी लूट इससे ज्यादा नग्न नहीं हो सकती! 
मेहनतकशों की तबाही-बर्बादी इससे भयंकर नहीं हो सकती! 
हम अब और तमाशबीन नहीं बने रह सकते! 
एक ही रास्ता - मज़दूर इंक़लाब! मज़दूर सत्ता! 
 
वैसे तो पूँजीवादी समाज में हर रोज़ ही हम ऐसी घटनाओं के गवाह बनते हैं जो पूँजीवादी समाज की सच्चाई को हमारी ऑंखों के सामने उजागर करती हैं, लेकिन पिछले कुछ महीनों के दौरान देश के पैमाने पर पूँजीवादी व्यवस्था जिस कदर नंगी हुई है, उसे बताने के लिए अब रंग-छन्द की ज़रूरत नहीं रह गयी है। आज इस पूरी आदमख़ोर मुनाफाख़ोर व्यवस्था की क्रूर और अमानवीय सच्चाई सीधे हमारे सामने खड़ी है - एकदम निपट नंगी सच्चाई। और इसलिए इसे उतने ही सीधे शब्दों में आपके सामने रख देना ही मेहनतकशों के अख़बार के तौर पर 'मजदूर बिगुल' आज सबसे ज़रूरी समझता है। आगे पढ़ें...

सही फरमाया प्रधानमन्त्री महोदय! यह व्यवस्था अनाज सड़ा सकती है लेकिन भुख से मरते लोगों तक नहीं पहुँचा सकती है! 
पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज़ की जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए भारत के माननीय उच्चतम न्यायालय ने हज़ारों टन अनाज के सड़कर बरबाद हो जाने पर सरकार को ''फटकार'' लगायी और कहा कि सड़ रहे अनाज को ग़रीबों में बाँट दिया जाये। ज्ञात हो कि 19 अक्टूबर को भारत सरकार ने माना कि केन्द्रीय सरकार और राज्य सरकारों के गोदामों को मिला दिया जाये तो करीब 1 लाख टन अनाज सड़ गया है। उच्चतम न्यायालय की फटकार पर भारत के अर्थशास्त्री प्रधानमन्त्री मनमोहन सिंह ने अपनी अर्थविद्या का इस्तेमाल करते हुए यह स्पष्ट कर दिया कि सरकार इस बाबत कोई प्रतिबद्धता नहीं जता सकती है। आगे पढ़ें...

इराकी जनता को तबाह करने के बाद अब इराक से वापसी का अमेरिकी ड्रामा 
पिछले सात वर्षों तक इराकी जनता को अपने बमों और हथियारों का निशाना बनाने और उनकी सम्प्रभुता, स्वतन्त्रता और जीवन को बरबाद करने के बाद अमेरिका ने इराक में अपने ''मिशन'' के पूरा होने की घोषणा की। ज्ञात हो, कि अमेरिका ने सात वर्ष पहले जनसंहार के हथियारों के इराक के पास होने के नाम पर और इराकी शासक सद्दाम हुसैन की तानाशाही को ख़त्म कर ''लोकतन्त्र'' की स्थापना करने के नाम पर इराक पर हमला बोल दिया था। आज सारी दुनिया जानती है कि इराक में अमेरिका को जनसंहार के कोई हथियार नहीं मिले। अमेरिका स्वयं भी इस तथ्य को मान चुका है। हमले के पीछे बताये गये दूसरे कारण की पोल भी खुल चुकी है। आगे पढ़ें...  

कारख़ाना मज़दूर यूनियन के नेतृत्व में 100 से भी अधिक पावरलूम कारख़ानों के मज़दूरों ने कायम की जुझारू एकजुटता 
शक्तिनगर के मज़दूरों की आठ दिन और गौशाला, कश्मीर नगर व माधोपुरी के मज़दूरों की 15 दिन की हड़ताल से हासिल हुई शानदार जीत 

कारख़ाना मज़दूर यूनियन, लुधियाना के नेतृत्व में पहले न्यू शक्तिनगर के 42 कारख़ानों के मज़दूरों की 24 अगस्त से 31 अगस्त तक और फिर गौशाला, कश्मीर नगर और माधोपुरी के 59 कारख़ानों की 16 सितम्बर से 30 सितम्बर तक शानदार हड़तालें हुईं। दोनों ही हड़तालों में मज़दूरों ने अपनी फौलादी एकजुटता और जुझारू संघर्ष के बल पर मालिकों को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया। जहाँ दोनों ही हड़तालों में पीस रेट में बढ़ोत्तरी की प्रमुख माँग पर मालिक झुके वहीं शक्तिनगर के मज़दूरों ने तो मालिकों को टूटी दिहाड़ियों का मुआवज़ा तक देने के लिए मजबूर कर दिया। आगे पढ़ें...

तीन-दिवसीय द्वितीय अरविन्द स्मृति संगोष्ठी गोरखपुर में सम्पन्न 
21वीं सदी का मज़दूर आन्दोलन : नयी चुनौतियाँ, नये रास्ते, नयी दिशा
 
साथी अरविन्द की स्मृति में पिछले वर्ष प्रथम अरविन्द स्मृति संगोष्ठी का आयोजन दिल्ली में हुआ था, जिसमें देश-विदेश से क्रान्तिकारी संगठनों के प्रतिनिधियों, कार्यकर्ताओं, बुद्धिजीवियों और शोधकर्ताओं ने शिरकत की थी। इस वर्ष द्वितीय अरविन्द स्मृति संगोष्ठी को एक दिन की बजाय तीन दिन का रखा गया और इसे गोरखपुर में आयोजित किया गया। पिछली बार के विषय को ही विस्तार देते हुए इस बार '21वीं सदी में भारत का मज़दूर आन्दोलन : निरन्तरता और परिवर्तन, दिशा और सम्भावनाएँ, समस्याएँ और चुनौतियाँ' विषय पर विस्तृत चर्चा हुई। आगे पढ़ें... 

काम के उचित दिन की उचित मज़दूरी 
पिछले पचास वर्षों से यह नारा अंग्रेज़ मज़दूर वर्ग के आन्दोलन का आदर्श वाक्य बना हुआ है। इसने 1824 के कुख्यात कॉम्बिनेशन कानूनों के ख़त्म होने के बाद ट्रेडयूनियनों के पैदा होने के दौरान भी अच्छा काम किया। इसने गौरवशाली चार्टिस्ट आन्दोलन के दौरान भी बेहतरीन काम किया जब अंग्रेज़ मज़दूर यूरोपीय मज़दूर वर्ग के आगे चल रहे थे। लेकिन समय गुज़र रहा है, और बहुत-सी अच्छी चीज़ें जो कि पचाल साल, यहाँ तक कि तीस साल पहले तक वांछनीय और आवश्यक थीं, अब पुरानी और पूरी तरह से अप्रासंगिक हो चली हैं। क्या यह पुराना, सम्मानित नारा भी अब ऐसी चीज़ों की ही श्रेणी में शामिल हो चुका है? आगे पढ़ें...

माँगपत्रक आन्दोलन-2011 शिक्षा माला : माँगपत्रक आन्दोलन-2011 के मुद्दों एवं माँगों के बारे में चर्चा 
काम के दिन की उचित लम्बाई और उसके लिए उचित मज़दूरी मज़दूर वर्ग की न्यायसंगत और प्रमुख माँग है! 

दुनियाभर के मज़दूर आन्दोलन में काम के दिन की उचित लम्बाई और उसके लिए उचित मज़दूरी का भुगतान एक प्रमुख मुद्दा रहा है। 1886 में हुआ शिकागो का महान मज़दूर आन्दोलन इसी मुद्दे को केन्द्र में रखकर हुआ था। मई दिवस शिकागो के मज़दूरों के इसी आन्दोलन की याद में मनाया जाता है। 1886 की पहली मई को शिकागो की सड़कों पर लाखों की संख्या में उतरकर मज़दूरों ने यह माँग की थी कि वे इंसानों जैसे जीवन के हकदार हैं। वे कारख़ानों और वर्कशॉपों में जानवरों की तरह 14 से 16 घण्टे और कई बार तो 18 घण्टे तक खटने को अस्वीकार करते हैं। आगे पढ़ें... 

देश के विभिन्न हिस्सों में माँगपत्रक आन्दोलन-2011 की शुरुआत 
अब चलो नयी शुरुआत करो! मज़दूर मुक्ति की बात करो! 

सितम्बर 2010 में देश के विभिन्न हिस्सों में मज़दूर कार्यकर्ताओं, विभिन्न मज़दूर यूनियनों, और क्रान्तिकारी जनसंगठनों द्वारा माँगपत्रक आन्दोलन-2011 की शुरुआत की गयी है। यह एक महत्तवपूर्ण आन्दोलन है जिसमें भारत के मज़दूर वर्ग का एक व्यापक माँगपत्रक तैयार करते हुए भारत की सरकार से यह माँग की गयी है कि उसने मज़दूर वर्ग से जो-जो वायदे किये हैं उन्हें पूरा करे, श्रम कानूनों को लागू करे, नये श्रम कानून बनाये और पुराने पड़ चुके श्रम कानूनों को रद्द करे। आगे पढ़ें...

बादाम उद्योग मशीनीकरण की राह पर 
पिछले साल हुए बादाम मज़दूरों की सोलह दिनों की हड़ताल दिल्ली के असंगठित क्षेत्र के मज़दूरों की बड़ी हड़ताल थी, जिसकी चर्चा तमाम अख़बारों और बिगुल के पुराने अंकों में हुई भी। पूर्वी दिल्ली के करावलनगर इलाके में बादाम के प्रोसेसिंग (तोड़ना, साफ करना) का काम होता है। पूरी दिल्ली के बादाम उद्योग का लगभग 80 फीसदी यहाँ तैयार होता है। अमेरिका, आस्ट्रेलिया और कनाडा से बादाम प्रोसेसिंग के लिए भारत आता है। बादाम मज़दूर हाथों से तोड़कर बादाम की गिरी निकालने का काम करते हैं। आगे पढ़ें...

अयोध्‍या फैसला : मज़दूर वर्ग का नज़रिया (पहली किश्त) 
28 सितम्बर को अयोध्‍या विवाद को लेकर इलाहाबाद उच्च न्यायालय की तीन सदस्यों वाली लखनऊ बेंच ने अपना फैसला सुना दिया। इस फैसले के मुताबिक इस बेंच के न्यायाधीशों ने 2-1 के बहुमत से यह तय किया कि अयोध्‍या की 2.77 एकड़ की विवादित भूमि को तीन हिस्सों में बाँटकर तीनों पक्षों को दे दिया जायेगा। यानी, एक-तिहाई भूमि हिन्दू पक्ष को, एक-तिहाई भूमि निर्मोही अखाड़ा को और एक-तिहाई भूमि सुन्नी वक्फ़ बोर्ड को मिलेगी। व्यावहारिक तौर पर, दो-तिहाई भूमि हिन्दू पक्ष को और एक-तिहाई मुसलमान पक्ष को मिली है। लेकिन जिस स्थान पर बाबरी मस्जिद की प्रमुख गुम्बद थी, उसे हिन्दुओं को सौंपने का निर्णय किया गया है। आगे पढ़ें...