नवम्‍बर 2009


नया अंक

नवम्‍बर 2009











एक युद्ध जनता के विरुद्ध : पूरे देश में सशस्त्र बल (विशेष अधिकार) कानून लागू करने की तैयारी 

दबे पाँव दहलीज़ तक आ पहुँचा है अघोषित आपातकाल! 

उसकी आहट पहचानो, ख़ूनी पंजों के निशानों की शिनाख्त करो! 

अभी 'बिगुल' के पिछले ही अंक में प्रकाशित अग्रलेख में हमने यह चेतावनी दी थी कि ''वामपन्थी'' उग्रवाद से निपटने के नाम पर भारतीय शासक वर्ग और उसकी राज्यसत्ता आम जनता के ख़िलाफ एक खूनी युद्ध की तैयारी में लग चुकी है। हाल की घटनाओं ने इस तथ्य की पूरी तरह से पुष्टि कर दी है। 

15 अक्टूबर 2009 के 'हिन्दू' अखबार में श्रीनगर से प्रकाशित शुजात बुखारी की रिपोर्ट के मुताबिक, सामाजिक और अवरचनागत मामलों पर वहाँ आयोजित अखिल भारतीय सम्पादक सम्मेलन में गृहमन्त्री चिदम्बरम ने कहा कि सशस्त्र बल (विशेष अधिकार) कानून में संशोधन का प्रस्ताव जल्दी ही मन्त्रिमण्डल के सामने रखा जायेगा। उन्होंने बताया कि ये संशोधन केवल जम्मू-कश्मीर में ही नहीं, बल्कि पूरे देश में लागू होंगे। 
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अक्टूबर क्रान्ति की 91 वीं वर्षगाँठ पर बिगुल मज़दूर दस्ता की ओर से ''मज़दूरों का समाजवाद क्या है'' विषय पर विचार गोष्ठी का आयोजन 

महान अक्टूबर समाजवादी क्रान्ति की 91वीं वर्षगाँठ के अवसर पर 25 अक्टूबर को बिगुल मज़दूर दस्ता की ओर से लुधियाना में ''मज़दूरों का समाजवाद क्या है'' विषय पर विचार संगोष्ठी का आयोजन किया गया। समराला चौक के पास स्थित इ.डब्ल्यू.एस. कालोनी के निष्काम विद्या मन्दिर स्कूल में आयोजित की गयी इस विचार संगोष्ठी में लगभग 50 मज़दूर शामिल हुए। उन्होंने अक्टूबर क्रान्ति के दौरान शहीद होने वाले हजारों मज़दूर शहीदों की याद में खड़े होकर दो मिनट का मौन रखा और मज़दूर वर्ग का अन्तरराष्ट्रीय गीत ''इण्टरनेशनल'' गाया।    आगे पढ़ें     


एक तो महँगाई का साया, उस पर बस किराया बढ़ाया - मेहनतकशों की जेब पर शीला दीक्षित सरकार का डाका! 
  •  बसों के किराये का सबसे ज्यादा असर मेहनतकश आबादी पर 
  •  ब्लू लाइन बसों को लगातार मुनाफा, लेकिन सरकार रोये डीटीसी के घाटे का दुखड़ा 
हर संकट की गाज मज़दूर-किसानों और निम्नमध्‍यवर्गीय परिवारों पर ज्यादा पड़ती है। यही हालत इस व्यवस्था के पैदा किये हुए आर्थिक संकट में हो रही है। नेताओं, नौकरशाहों, कंपनियों के सीईओ, मालिकों की सुख-सुविधाओं में कोई कमी नहीं आई है, लेकिन महँगाई की वजह से गरीबों का जीना मुहाल हो गया है। उस पर दिल्ली सरकार द्वारा डीटीसी बसों में किराये की बढ़ोतरी 'करेला वह भी नीम चढ़ा' वाले मुहावरे को चरितार्थ कर रही है। और इसका असर भी सबसे अधिक कामगार आबादी पर ही होगा।     आगे पढ़ें    


जानलेवा महँगाई ग़रीबों के जीने के अधिकार पर भी हमला है! 

केंद्र सरकार देश भर में आतंकवाद, नक्सलवाद और माओवाद आदि का हव्वा खड़ा कर रही है लेकिन उससे बड़े संकट या यानि बेरोजगारी और महँगाई से फैलने वाली भूख और कुपोषण पर सरकार ही नहीं, बल्कि पूँजीपतियों के रहमोकरम पर पलने वाला मीडिया भी चुप्पी साधे हुए है। जबकि सुरसा के मुँह की तरह बढ़ती महँगाई से बहुसंख्यक आबादी के सामने जीने का संकट उत्पन्न हो गया है। पिछले साल से अब तक खाद्य पदार्थ 70 प्रतिशत महंगे हो चुके है। छह महीने में ही खाने-पीने की चीज़ों के दामों में 15 फ़ीसदी की बढ़ोतरी हो चुकी है। और माना जा रहा है कि सूखे के चलते खाद्य-पदार्थों की की कीमतों में वृद्धि हो सकती है।     आगे पढ़ें    


गोरखपुर में मज़दूर आन्दोलन की शानदार जीत - मज़दूरों की जुझारू एकता और भारी जनदबाव के आगे प्रशासन झुकने के लिए बाध्‍य 

गोरखपुर में करीब तीन महीने से चल रहे आन्दोलन में पिछले दिनों मज़दूरों ने एक बड़ी जीत हासिल की जब मज़दूरों और नागरिकों के भारी दबाव के आगे अन्तत: प्रशासन को झुकना पड़ा और 22 अक्टूबर की रात सभी माँगों को मानने के लिए लिखित समझौता करना पड़ा। इससे पहले 21 अक्टूबर की रात को प्रशासन ने चारों गिरफ्तार मज़दूर नेताओं को बिना शर्त रिहा कर दिया था।     आगे पढ़ें    


फासीवाद क्या है और इससे कैसे लड़ें? (पाँचवीं किश्त) 

भारतीय समाज में फासीवाद की ज़मीन और उसके सामाजिक अवलम्ब - 
जर्मनी में फासीवाद के लिए उपजाऊ ज़मीन की चर्चा करते हुए हमने बताया था कि किसी पूँजीवादी क्रान्ति, किसी क्रान्तिकारी भूमि सुधार और एक क्रान्तिकारी बुर्जुआ वर्ग की अनुपस्थिति; दो दशकों के भीतर अचानक तेज़ी से हुए अभूतपूर्व पूँजीवादी विकास और औद्योगिकीकरण के कारण बड़े पैमाने पर मज़दूरों का उजड़ना, बेरोज़गारी का बढ़ना, ग़रीबी का बढ़ना, असुरक्षा का बढ़ना, निम्न-पूँजीपति वर्ग का उजड़ना; किसी क्रान्तिकारी विकल्प के मौजूद न होने और सामाजिक जनवादियों द्वारा मज़दूर आन्दोलन को सुधारवाद की गलियों में भटकाते रहना और इसके कारण समाज में प्रतिक्रिया का आधार पैदा होना; बड़े पूँजीपति वर्ग का संकट की स्थिति में किसी नग्न बुर्जुआ तानाशाही की ज़रूरत और इसके कारण नात्सी पार्टी का समर्थन करना; समाज में जनवादी मूल्यों और संस्कृति का अभाव; क्रान्तिकारी भूमि सुधार न होने के कारण बड़े भूस्वामियों (युंकरों) के एक धुर प्रतिक्रियावादी वर्ग की मौजूदगी; एक प्रतिक्रियावादी मँझोले किसान वर्ग की मौजूदगी आदि ही वे कारण थे जिन्होंने जर्मनी में नात्सी पार्टी को सत्ता में पहुँचाया।     आगे पढ़ें    


अक्टूबर क्रान्ति की वर्षगाँठ (7 नवम्बर) के अवसर पर - अक्टूबर क्रान्ति के नये संस्करण के निर्माण का रास्ता ही मुक्ति का रास्ता है

आज से नब्बे वर्ष पहले, 24 अक्टूबर 1917 (नये कैलेण्डर के अनुसार 7 नवम्बर 1917) को, जब रूस के मेहनतकश अवाम ने क्रान्तिकारी मज़दूर वर्ग और उसकी क्रान्तिकारी राजनीतिक पार्टी के नेतृत्व में शोषकों-पूँजीपतियों की सत्ता को धूल में मिलाकर अपना राज कायम किया था तो धरती पर एक नया विहान उतर आया था। सदियों के अंधेरे को चीरकर पूरब के आसमान में उगे इस सूरज की प्रखर रोशनी में दुनिया भर के सर्वहारा वर्ग और समस्त शोषित-उत्पीड़ित जनसमुदाय ने अपनी मुक्ति के रास्ते को साफ-साफ पहचाना था।     आगे पढ़ें    


अदम्य बोल्शेविक – नताशा : एक स्त्री मज़दूर संगठनकर्ता की संक्षिप्त जीवनी (समापन किश्त)     पढ़ें    


गुड़गाँव में हज़ारों-हज़ार मज़दूर सड़कों पर उतरे - यह सतह के नीचे धधकते ज्वालामुखी का संकेत भर है 

बीस अक्टूबर को राजधानी दिल्ली से सटे गुड़गाँव की सड़कों पर मज़दूरों का सैलाब उमड़ पड़ा। एक लाख से ज्यादा मज़दूर इस हड़ताल में शामिल हुए। पूरे गुड़गाँव मानेसर औद्योगिक क्षेत्र में उत्पादन लगभग ठप हो गया। पूरी गुड़गाँव-धारूहेड़ा पट्टी में बावल और रेवाड़ी तक के कारख़ानों पर हड़ताल का असर पड़ा।     आगे पढ़ें    


केन्द्रीय ट्रेड यूनियनों का संयुक्त तमाशा - शर्म इनको मगर नहीं आती! 

लाखों की सदस्य संख्या वाली तमाम केन्द्रीय ट्रेड यूनियनों ने मिलकर पिछले 28 अक्टूबर को न्यूनतम मज़दूरी सहित मज़दूरों की मांगों पर देशव्यापी प्रदर्शन के नाम पर जो फूहड़ नौटंकी पेश की उस पर हँसा भी नहीं जा सकता। एटक, सीटू, इण्टक, बीएमएस, एचएमएस आदि इन राष्ट्रीय यूनियनों ने कुल मिलाकर जितने लोग इकट्ठा किये उससे ज्यादा तो कोई टुटपूँजिया नेता विधायक का पर्चा भरने जाते समय जुटा लेता है। मगर मज़दूर हितों की लड़ाई को अपनी नपुंसकता के घिनौने प्रदर्शन में तब्दील कर देने में इन दल्लों को शर्म नहीं आयी।    आगे पढ़ें    


बुर्जुआ जनवाद : संकीर्ण, पाखण्डपूर्ण, जाली और झूठा; अमीरों के लिए जनवाद और गरीबों के लिए झाँसा 

''...केवल संसदीय-सांविधानिक राजतंत्रों में ही नहीं, बल्कि अधिक से अधिक जनवादी जनतंत्रों में भी बुर्जुआ संसदीय व्यवस्था का सच्चा सार कुछ वर्षों में एक बार यह फैसला करना ही है कि शासक वर्ग का कौन सदस्य संसद में जनता का दमन और उत्पीड़न करेगा।'' (मार्क्‍स) लेकिन अगर हमें राज्य के प्रश्न को लेना है, अगर इस क्षेत्र में सर्वहारा वर्ग के कार्यभारों की दृष्टि से संसदीय व्यवस्था पर राज्य की एक संस्था के रूप में विचार करना है, तो संसदीय व्यवस्था से निस्तार का रास्ता क्या है? किस तरह उसके बिना काम चलाया जा सकता है?     आगे पढ़ें