मई 2010


मई दिवस का सन्देश 


स्मृति से प्रेरणा लो! संकल्प को फौलाद बनाओ!
संघर्ष को सही दिशा दो! 

मजदूर साथियो! नयी सदी में पूँजी के खिलाफ वर्ग युध्द में फैसलाकुन और मुकम्मल जीत के लिए आगे बढ़ो!! 


जब तक लोग कुछ सपनों और आदर्शों को लेकर लड़ते रहते हैं, किसी ठोस, न्यायपूर्ण मकसद को लेकर लड़ते रहते हैं, तब तक अपनी शहादत की चमक से राह रोशन करने वाले पूर्वजों को याद करना उनके लिए रस्म या रुटीन नहीं होता। यह एक जरूरी आपसी, साझा, याददिहानी का दिन होता है, इतिहास के पन्नों पर लिखी कुछ धुँधली इबारतों को पढ़कर उनमें से जरूरी बातों की नये पन्नों पर फिर से चटख रोशनाई से इन्दराजी का दिन होता है, अपने संकल्पों से फिर नया फौलाद ढालने का दिन होता है।    आगे पढ़ें   


पुलिस हिरासत में बढ़ती मौतें 

देश की सेवक, जनता की रक्षा करने वाली, अपराधियों को सजा दिलाने वाली, कानून व्यवस्था को बनाये रखने वाली पुलिस, ये कुछ उपमाएँ हैं जो अक्सर पुलिसकर्मियों के लिए इस्तेमाल होते हैं। लेकिन क्या वाकई ऐसा ही है या बिल्कुल इसके उलट। रोज-रोज की घटनाओं में आज एक आम आदमी भी अपने अनुभव से जानता है कि ये जनता के रक्षक नहीं बल्कि भक्षक हैं, वर्दीधारी गुण्डे हैं। जेलों में कैदियों के साथ अमानवीय बर्ताव, झूठे मामलों में लोगों को फँसा देना, हिरासत में उत्पीड़न की इन्तहा से लोगों की जान ले लेना, ये आम बातें हैं। तभी तो हाईकोर्ट के एक प्रसिध्द वकील ने कहा था कि 'इस देश की पुलिस एक संगठित सरकारी गुण्डा गिरोह है।'     आगे पढ़ें   


इस ठण्डी हत्या का जिम्मेदार कौन? 

आज देशभर में करोड़ों मेहनतकश सुबह से रात तक, 12 से लेकर 16 घण्टे तक काम करते हैं। आप सोच रहे होंगे कि 16 घण्टे काम करने वाला तो बहुत अमीर हो जाता होगा! लेकिन साथियो, ऐसा नहीं होता। अधिक मेहनत करने वाला पारिवारिक जिम्मेदारियाँ निभाने के लिए सारी शारीरिक ऊर्जा खत्म करके 40 का होते-होते दर्जनों बीमारियों से पीड़ित हो जाता है और अक्सर असमय ही मर जाता है। ऐसा ही हुआ पप्पू के साथ। हाँ, पप्पू जो उत्तर प्रदेश के फैजाबाद जिले का रहने वाला था, 8 वर्षों पहले लुधियाना आया था, ताकि वह और उसका परिवार अच्छी जिन्दगी जी पाये। पप्पू की उम्र मुश्किल से 26 वर्ष की थी। दो छोटे-छोटे बच्चे हैं। पप्पू के कमरे वाले साथियों के मुताबिक पप्पू बहुत मेहनती था, अकसर ही मालिक के कहने पर दिन-रात एक करके काम करता था। मालिक का बहुत चहेता था पप्पू।     आगे पढ़ें   


कार्ल मार्क्‍स के जन्मदिन (5 मई, 1818) के अवसर पर 

मजदूर वर्ग के महान शिक्षक और क्रान्तिकारी नेता कार्ल मार्क्‍स 


14 मार्च (1883) को तीसरे पहर, पौने तीन बजे, संसार के सबसे महान विचारक की चिन्तन-क्रिया बन्द हो गयी। उन्हें मुश्किल से दो मिनट के लिए अकेला छोड़ा गया होगा, लेकिन जब हम लोग लौटकर आये, हमने देखा कि वह आरामकुर्सी पर शान्ति से सो गये हैं - परन्तु सदा के लिए। इस मनुष्य की मृत्यु से यूरोप और अमेरिका के जुझारू सर्वहारा वर्ग की और ऐतिहासिक विज्ञान की अपार क्षति हुई है। इस ओजस्वी आत्मा के महाप्रयाण से जो अभाव पैदा हो गया है, लोग शीघ्र ही उसे अनुभव करेंगे।    आगे पढ़ें   


लुधियाना के होजरी मजदूर संघर्ष की राह पर 

लुधियाना में हौजरी उद्योग में पैसा लगाने वाले उद्योगपति तेजी से तरक्की करके बेहिसाब मुनाफा कमा रहे हैं। इसलिए अब छोटे कारखानों के अलावा होजरी उद्योग में बड़े-बड़े कारखाने आये और आ रहे हैं जिनमें मजदूरों की संख्या कुछ सौ से लेकर हजारों तक भी है। इन होजरियों में एक के मालिक पी.के. का नाम आता है जिसके तीन कारखानों में 1000 से ऊपर कारीगर काम करते हैं। सभी कारखानों में ठेके (पीस रेट) पर काम होता है। कारखाने में किसी वर्कर का पहचान पत्र, पक्का हाजिरी रजिस्टर, हाजिरी कार्ड, पीएफ, बोनस, छुट्टियाँ, डबल ओवर टाइम आदि कोई भी श्रम कानून लागू नहीं। आदर्श नगर वाली यूनिट में 500 से अधिक मजदूर होने पर भी फैक्ट्री लिमिटेड नहीं है। गैरकानूनी तरीके से चल रही है। यही हाल लुधियाना की अधिकतर होजरियों का है।    आगे पढ़ें   


कैसा है यह लोकतन्त्र और यह संविधान किनकी सेवा करता है? (तीसरी किस्त) 

ब्रिटिश उपनिवेशवादियों और कांग्रेस के बीच युध्दोत्तरकालीन समझौतों-सौदेबाजियों की पृष्ठभूमि विश्वयुध्द के अन्तिम वर्ष के दौरान ही तैयार हो चुकी थी। मई, 1944 में गाँधी की रिहाई के बाद नये वायसराय वेवेल की मध्‍यस्थता में, पाकिस्तान के प्रश्न पर गाँधी और जिन्ना के बीच कई असफल वार्ताएँ हुईं। ब्रिटिश सत्ता ने दोनों पक्षों के बीच के मतभेदों को उग्र बनाने में अहम भूमिका निभायी। वेवेल केन्द्र में कांग्रेस और लीग की जो मिली-जुली अस्थायी सरकार का प्रस्ताव रख रहा था, उसका स्वरूप सारत: क्रिप्स मिशन के प्रस्ताव जैसा ही था। कांग्रेस ने इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया।    आगे पढ़ें   


अन्तरराष्ट्रीय मजदूर दिवस पर पूँजी की सत्ता के ख़िलाफ लड़ने का संकल्प लिया मजदूरों ने 

पूर्वी प्रदेश में मजदूर आन्दोलन की नयी लहर का संकेत था गोरखपुर का मई दिवस 

गोरखपुर में पिछले वर्ष महीनों चला मजदूर आन्दोलन कोई एकाकी घटना नहीं थी, बल्कि पूर्वी उत्तर प्रदेश में उठती मजदूर आन्दोलन की नयी लहर की शुरुआत थी। आन्दोलन के खत्म होने के बाद बहुत से मजदूर अलग-अलग कारख़ानों या इलाकों में भले ही बिखर गये हों, मजदूरों के संगठित होने की प्रक्रिया बिखरी नहीं बल्कि दिन-ब-दिन मजबूत होकर आगे बढ़ रही है। इस बार गोरखपुर में अन्तरराष्ट्रीय मजदूर दिवस के आयोजन में भारी पैमाने पर मजदूरों की भागीदारी ने यह संकेत दे दिया कि पूर्वी उत्तर प्रदेश का मजदूर अब अपने जानलेवा शोषण और बर्बर उत्पीड़न के ख़िलाफ जाग रहा है। 

दिल्ली में शहरी रोजगार गारण्टी की माँग को लेकर मजदूरों ने संसद पर दस्तक दी 

गोरखपुर में पिछले वर्ष महीनों चला मजदूर आन्दोलन कोई एकाकी घटना नहीं थी, बल्कि पूर्वी उत्तर प्रदेश में उठती मजदूर आन्दोलन की नयी लहर की शुरुआत थी। आन्दोलन के खत्म होने के बाद बहुत से मजदूर अलग-अलग कारख़ानों या इलाकों में भले ही बिखर गये हों, मजदूरों के संगठित होने की प्रक्रिया बिखरी नहीं बल्कि दिन-ब-दिन मजबूत होकर आगे बढ़ रही है। इस बार गोरखपुर में अन्तरराष्ट्रीय मजदूर दिवस के आयोजन में भारी पैमाने पर मजदूरों की भागीदारी ने यह संकेत दे दिया कि पूर्वी उत्तर प्रदेश का मजदूर अब अपने जानलेवा शोषण और बर्बर उत्पीड़न के ख़िलाफ जाग रहा है। 

कारखाना मजदूर यूनियन, लुधियाना ने चलाया मई दिवस अभियान 

लुधियाना में कारखाना मजदूर यूनियन द्वारा अन्तरराष्ट्रीय मजदूर दिवस के अवसर पर मजदूरों की क्रान्तिकारी विरासत को मजदूरों तक पहुँचाने के लिए 20 अप्रैल से लेकर पहली मई तक नुक्कड़ सभाओं, झण्डा मार्चों, लॉजों में मीटिंगों का अभियान चलाया गया। मई दिवस अभियान मुख्य तौर पर गयासपुरा, किशोर नगर, ई.डब्ल्यू.एस. कालोनी, किरती नगर आदि इलाकों में चला।       पूरी रिपोर्ट पढ़ें   


मन्दी की मार झेलते मध्‍य और पूर्वी यूरोप के मजदूर 

आज के पूर्वी यूरोप के देशों की औद्योगिक-वैज्ञानिक प्रगति जिस हद तक भी है वह मुख्यत: समाजवादी अतीत की देन है, जबकि इसके जो भी संकट हैं वे पूंँजीवादी ढाँचे की देन हैं, यह इतिहास की सच्चाई है। स्तालिन की मृत्यु के बाद ही रूस और पूर्वी यूरोप में पूँजीवाद की पुनर्स्थापना हो गयी थी लेकिन मार्क्‍सवाद का मुखौटा लगाये नये पूँजीवादी शासकों ने जनता को छल-कपट से ख़ूब निचोड़ा। 1989 में ये संशोधनवादी कुलीन सत्ताएँ बालू की भीत की तरह ढह गयीं और इनकी जगह बुर्जुआ शासकों ने सम्हाल ली। अब वैश्विक आर्थिक संकट के दुश्चक्र में ये देश भी फँस चुके हैं।    आगे पढ़ें   


शिकागो के शहीद मजदूर नेताओं की अमर कहानी 

शहीद मजदूर नेताओं को अन्तिम सलामी देने के लिए देश भर के मजदूर उमड़ पड़े 

उन्हें शुक्रवार को फाँसी दी गयी। अगले दिन अखबारों में फाँसी के विस्तृत ब्योरे और ढेरों सम्पादकीय छपे थे - मरने वाले व्यक्तियों पर, कानून और व्यवस्था पर, जनतन्त्र पर, संविधान और इसके ढेरों संशोधनों पर - जिनमें से कुछ को 'बिल ऑफ राइट्स' कहा जाता है - क्रान्ति, गणतन्त्र के संस्थापकों और गृहयुध्द के बारे में। इसी के साथ छपी थीं अन्त्येष्टि की सूचनाएँ। शहर के अधिकारियों ने पाँचों मृत व्यक्तियों - लिंग्ग, जो अपनी कोठरी में मर गया था, पार्सन्स, स्पाइस, फिशर और एंजिल के सम्बन्धियों और मित्रों को उनके शरीर प्राप्त कर लेने की अनुमति दे दी थी। ये मित्र और सम्बन्धी यदि चाहें तो उन्हें सार्वजनिक अन्त्येष्टि करने की भी इजाजत थी।    आगे पढ़ें   


लुधियाना के मजदूर आन्दोलन में माकपा-सीटू के मजदूर विरोधी कारनामे 

संघर्षशील मजदूर साथियों को समझौतापरस्त, भ्रष्ट और दलाल नेतृत्व से पीछा छुड़ाकर मजदूर आन्दोलन में आये गतिरोध को तोड़ना होगा 

भारत के मजदूर आन्दोलन पर जरा सी भी ईमानदार नजर रखने वाले लोगों के लिए आज यह बात दिन के उजाले की तरह साफ है कि सी.पी.आई.एम. (माकपा) और उसका मजदूर विंग सी.आई.टी.यू. (सीटू) किस कदर खुलकर पूँजीपतियों की सेवा में लगे हुए हैं। ज्यादा दूर जाने की जरूरत नहीं है, बस पिछले 8-10 वर्षों की इनकी कारगुजारियों पर नजर डाल ली जाये तो कोई शक नहीं रह जाता कि माकपा-सीटू के झण्डे का लाल रंग नकली है और ये मजदूरों की पीठ में छुरा घोंपने का ही काम कर रहे हैं। देश में जहाँ-जहाँ भी इनका जोर चला, इन्होंने बड़ी चालाकी के साथ मजदूर आन्दोलन का बेड़ा गर्क करने में किसी तरह की कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी।    आगे पढ़ें