बजट 2010-11 : इजारेदार पूँजी के संकट और मुनाफे का बोझ आम गरीब मेहनतकश जनता के सिर पर 

कारपोरेट घरानों, धनी किसानों, खुशहाल मध्‍यवर्ग पर तोहफों की बारिश! 
मजदूरों, गरीब किसानों और निम्न मध्‍यवर्ग की जेब से आखिरी चवन्नी भी चोरी! 


हाल ही में मनमोहन सिंह की अगुवाई वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबन्धन सरकार ने अपने दूसरे कार्यकाल का दूसरा बजट पेश किया। वित्त मन्त्री प्रणब मुखर्जी ने इस बजट को आम आदमी का बजट करार दिया। इस बार के आर्थिक सर्वेक्षण (2009-2010) में मनमोहन सरकार ने जिस प्रकार की शब्दावली का इस्तेमाल किया वह कई मायनों में नयी थी और इससे इस सरकार के आर्थिक दर्शन के बारे में काफी कुछ पता चलता है। आर्थिक सर्वेक्षण में कहा गया है कि राज्य को लोगों को सक्षम बनाने वाला होना चाहिए जिससे कि वे अपनी जरूरतें खुद पूरी कर सकें। उसका यह काम नहीं है कि वह खुद ही जनता की जरूरतों को पूरा करे। यह लोगों के जीवन में हस्तक्षेप जैसा होगा। शब्दों के इस मायाजाल के पीछे जो असलियत छिपी है, उसे समझना आसान है। आगे पढ़ें


कैसा है यह लोकतन्त्र और यह संविधान किनकी सेवा करता है? (दूसरी किस्त) 

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि (गतांक से जारी) 

भारतीय बुर्जुआ वर्ग की यह चारित्रिक विशेषता थी कि वह उपनिवेशवादी ब्रिटेन की मजबूरियों और साम्राज्यवादी विश्व के अन्तरविरोधों का लाभ उठाकर अपनी आर्थिक शक्ति बढ़ाता रहा था और 'समझौता-दबाव-समझौता' की रणनीति अपनाकर कदम-ब-कदम राजनीतिक सत्ता पर काबिज होने की दिशा में आगे बढ़ रहा था। व्यापक जनसमुदाय को साथ लेने के लिए भारतीय बुर्जुआ वर्ग की प्रतिनिधि कांग्रेस पार्टी प्राय: गाँधी के आध्‍यात्मिक चाशनी में पगे बुर्जुआ मानवतावादी यूटोपिया का सहारा लेती थी। किसानों के लिए उसके पास गाँधीवादी 'ग्राम-स्वराज' का नरोदवादी यूटोपिया था। जब-तब वह पूँजीवादी भूमि-सुधार की बातें भी करती थी, लेकिन सामन्तों-जमींदारों को पार्टी में जगह देकर उन्हें बार-बार आश्वस्त भी किया जाता था कि उनका बलात् सम्पत्तिहरण कदापि नहीं किया जायेगा। आगे पढ़ें


भूख से दम तोड़ते सपने और गोदामों में सड़ता अनाज 

हमारे इस ''शाइनिंग इण्डिया'' की एक वीभत्स तस्वीर यह भी है कि जिनकी ऑंखों में कल का सपना होना चाहिए, वे केवल भोजन की आस में ही दम तोड़ रहे हैं। इस देश के एक हिस्से में भूख के कारण वयस्क ही नहीं बच्चों की भी जानें जा रही हैं, तो दूसरे हिस्से में गोदामों में रखा अनाज सड़ रहा है और सरकारों के लिए समस्या यह है कि गेहूँ की नयी आमद का भण्डार कहाँ करे! उन्हें भूख से होती मौतों की इतनी चिन्ता नहीं है, जितना वे मालिकों के मुनाफे पर चोट पहुँचने से परेशान हैं। आगे पढ़ें


लोकतन्त्र की लूट में जनता के पैसे से अफसरों की ऐयाशी 

जनता को बुनियादी सुविधएँ मुहैया कराने का सवाल उठता है तो केन्द्र सरकार से लेकर राज्य सरकारें तक धन की कमी का विध्वा विलाप शुरू कर देती हैं, लेकिन जनता से उगाहे गये टैक्स के दम पर पलने वाले नेता और नौकरशाही अपनी हरामखोरी और ऐयाशी में कोई कमी नहीं आने देते। इसी का एक ताजातरीन नमूना है पंजाब सरकार द्वारा 2006 में कृषि विविधता के लिए शुरू की गयी परियोजना। पंजाब सरकार द्वारा कृषि में विभिन्नता लाने के लिए 2006 में एक प्रोजेक्ट की शुरुआत की गयी थी। इस प्रोजेक्ट को शुरू करते समय बड़े-बड़े दावे किये गये; जैसे, कि एक वर्ष के अन्दर यानी 2007 तक 20,000 एकड़ भूमि को बागवानी, और जैविक कृषि के तहत ला दिया जायेगा। आगे पढ़ें

शीला जी? आपको पता है, न्यूनतम मजदूरी कितने मजदूरों को मिलती है? 

दिल्ली सरकार ने पिछले दिनों बड़ी धूमधाम के साथ दिल्ली में न्यूनतम मजदूरी की दर 33 प्रतिशत बढ़ाने का ऐलान कर दिया। अब कुशल मजदूर को 248 रुपये प्रतिदिन, अर्द्धकुशल मजदूर को 225 रुपये और अकुशल मजदूर को 203 रुपये प्रतिदिन की न्यूनतम मजदूरी मिलेगी! मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने तो यहाँ तक कह डाला कि महँगाई से अब लोगों को कोई खास परेशानी नहीं होगी क्योंकि सरकार ने उनकी तनख्वाह भी बढ़ा दी है। आगे पढ़ें 


पंजाब में क्रान्तिकारियों की याद में कार्यक्रम -- 23 मार्च 1931 के शहीदों का 79वाँ शहादत दिवस 

नौजवान भारत सभा ने महान शहीदों - भगतसिंह, राजगुरु और सुखदेव के 79वें शहादत दिवस के अवसर पर पंजाब के विभिन्न क्षेत्रों - लुधियाना, मण्डी गोबिन्दगढ़, माछीवाड़ा, पख्खोवाल, रायकोट, जगराओं, नवाँ शहर, जोनेवाल, खन्ना, अलोड़ गाँव, जोनेवाल गाँव में जोरदार प्रचार अभियान चलाकर हजारों लोगों तक शहीदों के विचार पहुँचाये। इस अवसर पर बड़े पैमाने पर पंजाबी और हिन्दी में पर्चा भी बाँटा गया। शहीद भगतसिंह की तस्वीर वाला एक आकर्षक पोस्टर पंजाब के अनेक शहरों और गाँवों में दीवारों पर चिपकाया गया। लुधियाना, मण्डी गोबिन्दगढ़ और माछीवाड़ा में क्रान्तिकारी नाटकों और गीतों के जरिये शहीदों को श्रध्दांजलि की गयी। आगे पढ़ें 


पंजाब राज्य बिजली बोर्ड तोड़ने की तैयारी 

आखिर पंजाब सरकार ने पंजाब राज्य बिजली बोर्ड का निगमीकरण करने को हरी झण्डी दे दी है। इससे बिजली की पैदावार, सप्लाई और वितरण के काम के निजीकरण का रास्ता साफ हो गया है। वैसे बहुत लम्बे समय से पंजाब सरकार ऐसा करने की कोशिशें कर रही है, लेकिन बिजली बोर्ड के कर्मचारियों तथा किसान संगठनों के जबरदस्त विरोध् के कारण वह ऐसा करने से हाथ पीछे खींचती रही। अब तक एक दर्जन से भी अधिक बार पंजाब सरकार बिजली बोर्ड को भंग करने की तारीखें आगे खिसका चुकी है, लेकिन लगता है कि इस बार उसने हर तरह के विरोध् को बर्बरतापूर्वक कुचलकर इस काम को अंजाम देने की ठान ली है। आगे पढ़ें


मार्क्‍सवाद और सुधारवाद -- लेनिन 

अराजकतावादियों के विपरीत मार्क्‍सवादी सुधारों के लिए संघर्ष को, यानी मेहनतकशों की दशा में ऐसे सुधारों के लिए संघर्ष को स्वीकार करते हैं, जो सत्तारूढ़ वर्ग की सत्ता को नष्ट न करते हों। परन्तु इसके साथ ही मार्क्‍सवादी उन सुधारवादियों के विरुध्द सर्वाधिक संकल्पपूर्वक संघर्ष करते हैं, जो प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप में मजदूर वर्ग के प्रयासों तथा गतिविधियों को सुधारों तक सीमित करते हैं। सुधारवाद मजदूरों के साथ बुर्जुआ धोखाधड़ी है, जो पृथक-पृथक सुधारों के बावजूद तब तक सदैव उजरती दास बने रहेंगे, जब तक पूँजी का प्रभुत्व विद्यमान है। आगे पढ़ें 


8 मार्च के मौके पर 'स्त्री मजदूर संगठन' की शुरुआत -- गुलामी की बेड़ियाँ तोड़ दो! जमाने की हवा बदल दो!! 

अन्तरराष्ट्रीय स्त्री दिवस (8 मार्च) के मौके पर 7 मार्च को दिल्ली के राजा विहार मजदूर बस्ती में हुए कार्यक्रम के साथ स्त्री मजदूर संगठन की शुरुआत की गयी। इस मौके पर स्त्री मजदूर संगठन की कार्यकर्ताओं ने मजदूर औरतों का आह्वान करते हुए कहा कि गुलामी की नींद सोने और किस्मत का रोना रोने का समय बीत चुका है। जोरो-जुल्म के दम घोंटने वाले माहौल के खिलाफ़ एकजुट होकर आवाज उठाने का समय आ गया है। हमें मजदूरों के हक की सभी लड़ाइयों में कन्धे से कन्धा मिलाकर शामिल होना होगा। साथ ही औरत मजदूरों की कुछ अलग समस्याएँ और अलग माँगें भी हैं। इसलिए हमें अपना अलग संगठन भी बनाना होगा। इसीलिए स्त्री मजदूर संगठन बनाकर एक नयी शुरुआत की जा रही है। औरतों को समाज और घर के भीतर भी हक और बराबरी की लड़ाई लड़नी है। मर्द मजदूर साथियों से हमारा यही कहना है कि हमें गुलाम समझोगे तो तुम भी गुलाम बने रहोगे। मेहनतकश औरत-मर्द मिलकर लडेंग़े, तभी वे अपनी लड़ाई जीत पायेंगे। आगे पढ़ें


अन्तरराष्ट्रीय स्त्री दिवस के सौ वर्ष पूरे होने के अवसर पर -- स्त्री मुक्ति के संघर्ष को शहरी शिक्षित उच्च मध्‍यवर्गीय कुलीनतावादी दायरों के बाहर लाना होगा 

हर साल दुनिया भर में 8 मार्च का दिन अन्तरराष्ट्रीय स्त्री दिवस के रूप में मनाया जाता है। विश्व भर में स्त्रियाँ इस दिवस को अपनी मुक्ति को समर्पित दिवस के रूप में मनाती हैं। यह हमारी लड़ाई का प्रतीक दिवस है। इस बार भी पूरी दुनिया में आम मेहनतकश स्त्रियों ने अपने इस दिन को पूरे जज्बे और जोशो-खरोश के साथ मनाया। इसका एक कारण यह भी था कि यह अन्तरराष्ट्रीय स्त्री दिवस का शताब्दी वर्ष था। शोषण, उत्पीड़न, दमन, पुरुष वर्चस्ववाद के तमाम रूपों से मुक्ति और जीवन के हर पहलू में पूर्ण समानता के लिए स्त्रियों के संघर्ष को सौ वर्ष पूरे हो चुके हैं। आगे पढ़ें 


'क्रान्तिकारी जागृति अभियान' का आह्वान -- भगतसिंह की बात सुनो! नयी क्रान्ति की राह चुनो!! 

चन्द्रशेखर आजाद के शहादत दिवस (27 फरवरी) से भगतसिंह के शहादत दिवस (23 मार्च) तक उत्तर-पश्चिम दिल्ली के मजदूर इलाकों में नौजवान भारत सभा, बिगुल मजदूर दस्ता, स्त्री मजदूर संगठन और जागरूक नागरिक मंच की ओर से 'क्रान्तिकारी जागृति अभियान' चलाया गया। अभियान टोली ने इस एक महीने के दौरान हजारों मजदूरों से सीध्े सम्पर्क किया और उनका आह्वान करते हुए कहा कि चन्द्रशेखर आजाद, भगतसिंह, सुखदेव और राजगुरू की शहादतों को याद करने का सबसे अच्छा रास्ता यह है कि हम मेहनतकश इन महान इन्कलाबियों के जीवन और विचारों से प्रेरणा लेकर पस्तहिम्मती के ऍंध्ेरे से बाहर आयें और पूँजी की गुलामी की बेड़ियों को तोड़ने के लिए कमर कसकर उठ खड़े हों। आगे पढ़ें 
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