मई 2009


नया अंक

मई दिवस अनुष्ठान नहीं, संकल्पों को फौलादी बनाने का दिन है! - एक बार फिर मुक्ति का परचम उठाओ! पूँजी की बर्बर सत्ता के ख़िलाफ फैसलाकुन लड़ाई की तैयारी में जुट जाओ!! - इक्कीसवीं सदी को मज़दूर क्रान्ति की मुकम्मल जीत की सदी बनाओ!!!

चुनावी नौटंकी का पटाक्षेप: अब सत्ता की कुत्ताघसीटी शुरू - जनता को सिर्फ यह तय करना है कि वह इसे कितना और बर्दाश्त करेगी!

दमन-उत्पीड़न से नहीं कुचला जा सकता मेट्रो कर्मचारियों का आन्दोलन

बच्चों के खून-पसीने से बन रही है बेंगलोर मेट्रो

बोलते आँकड़े चीखती सच्चाइयाँ

मई दिवस पर याद किया मज़दूरों की शहादत को

चेन्नई के सफाई कामगारों की हालत देशभर के सफाईकर्मियों का आईना है

प्रवासी मज़दूर : चिकित्सा सेवाओं के शरणार्थी - बुनियादी चिकित्सा सुविधाओं से भी वंचित रहते हैं

कार्ल मार्क्‍स के जन्मदिन (5 मई) के अवसर पर (फ्रेडरिक एंगेल्स का कार्ल मार्क्‍स पर लेख)

चीनी विशेषता वाले ''समाजवाद'' में मज़दूरों के स्वास्थ्य की दुर्गति

नताशा - एक महिला बोल्शेविक संगठनकर्ता (पाँचवीं किश्त)

मई 1886 का वह रक्तरंजित दिन जब मज़दूरों के बहते ख़ून से जन्मा लाल झण्डा

पाँच क्रान्तिकारी जनसंगठनों का साझा चुनावी भण्डाफोड़ अभियान - चुनावी राजनीति के मायाजाल से बाहर आओ! नये मज़दूर इन्कलाब की अलख जगाओ!!

देहाती मज़दूर यूनियन द्वारा 8 दिन की क्रमिक भूख हड़ताल सफल : बी डी ओ ने मांगी मांगें

मई दिवस अनुष्ठान नहीं, संकल्पों को फौलादी बनाने का दिन है!

एक बार फिर मुक्ति का परचम उठाओ! पूँजी की बर्बर सत्ता के ख़िलाफ फैसलाकुन लड़ाई की तैयारी में जुट जाओ!!

इक्कीसवीं सदी को मज़दूर क्रान्ति की मुकम्मल जीत की सदी बनाओ!!!

मई 1886 के ऐतिहासिक संघर्ष के लगभग सवा सौ साल बाद आज मज़दूर वर्ग एक अभूतपूर्व परिस्थिति में खड़ा है। एक ओर दशकों के संघर्षों और अनगिनत मज़दूर योद्धाओं की कुर्बानी से हासिल उसके ज़्यादातर राजनीतिक अधिकार छीन लिये गये हैं और व्यापक मज़दूर आबादी पूँजी की बर्बर निरंकुश सत्ता के क्रूर शोषण के आगे मानो निहत्थी छोड़ दी गयी है। मज़दूर आन्दोलन के बिखराव ने पूँजीपतियों को यह खुली छूट दे दी है कि वे मनमानी शर्तों पर मज़दूरों को लूट-खसोट सकते हैं। अपने अस्तित्व के लिए जूझते मज़दूरों की भारी आबादी से तो मज़दूरों का अपना राज कायम करने का सपना ही छीन लिया गया है।
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चुनावी नौटंकी का पटाक्षेप : अब सत्ता की कुत्ताघसीटी शुरू
करीब डेढ़ महीने तक चली देशव्यापी चुनावी नौटंकी अब आख़िरी दौर में है। ‘बिगुल’ का यह अंक जब तक अधिकांश पाठकों के हाथों में पहुँचेगा तब तक चुनाव परिणाम घोषित हो चुके होंगे और दिल्ली की गद्दी तक पहुँचने के लिए पार्टियों के बीच जोड़-तोड़, सांसदों की खरीद-फरोख्त और हर तरह के सिद्धान्तों को ताक पर रखकर निकृष्टतम कोटि की सौदेबाज़ी शुरू हो चुकी होगी। पूँजीवादी राजनीति की पतनशीलता के जो दृश्य हम चुनावों के दौरान देख चुके हैं, उन्हें भी पीछे छोड़ते हुए तीन-तिकड़म, पाखण्ड, झूठ-फरेब का घिनौना नज़ारा पेश किया जा रहा होगा। जिस तरह इस चुनाव के दौरान न तो कोई मुद्दा था, न नीति - उसी तरह सरकार बनाने के सवाल पर भी किसी भी पार्टी का न तो कोई उसूल है, न नैतिकता! सिर्फ और सिर्फ सत्ता हासिल करने की कुत्ताघसीटी जारी है।
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दमन-उत्पीड़न से नहीं कुचला जा सकता मेट्रो कर्मचारियों का आन्दोलन
दिल्ली मेट्रो की ट्रेनें, मॉल और दफ्तर जितने आलीशान हैं उसके कर्मचारियों की स्थिति उतनी ही बुरी है और मेट्रो प्रशासन का रवैया उतना ही तानाशाहीभरा। लेकिन दिल्ली मेट्रो रेल प्रशासन द्वारा कर्मचारियों के दमन-उत्पीड़न की हर कार्रवाई के साथ ही मेट्रो कर्मचारियों का आन्दोलन और ज़ोर पकड़ रहा है। सफाईकर्मियों से शुरू हुए इस आन्दोलन में अब मेट्रो फीडर सेवा के ड्राइवर-कण्डक्टर भी शामिल हो गये हैं। मेट्रो प्रशासन के तानाशाही रवैये और डीएमआरसी-ठेका कम्पनी गँठजोड़ ने अपनी हरकतों से ठेके पर काम करने वाले कर्मचारियों की एकजुटता को और मज़बूत कर दिया है।
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बच्चों के खून-पसीने से बन रही है बेंगलोर मेट्रो
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बोलते आँकड़े चीखती सच्चाइयाँ
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मई दिवस पर याद किया मज़दूरों की शहादत को
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चेन्नई के सफाई कामगारों की हालत देशभर के सफाईकर्मियों का आईना है
मशहूर भारतीय फिल्मकार सत्यजित रे ने अपनी एक फिल्म अमेरिका में प्रदर्शित की तो पहले शो में ही बहुत से अमेरिकी फिल्म बीच में ही छोड़कर आ गये क्योंकि सत्यजीत रे ने फिल्म के एक सीन में भारतीय लोगों को हाथों से खाना खाते हुए दिखाया था जिसे देखकर उन्हें वितृष्णा होने लगी थी। लेकिन अगर उन्हें इंसान के हाथों से सीवरेज की सफाई होती दिखला दी जाती तो शायद वे बेहोश हो जाते। सिर्फ अमेरिकी ही क्यों, इस नर्क के दर्शन से तो बहुत से भारतीय भी बेहोश हो जायेंगे। लोग अपने घरों में साफ-सुथरा टायलट इस्तेमाल करते हैं लेकिन वे शायद ही कभी सोचते हों कि उनके इस टायलट को साफ रखने के लिए इस दुनिया में ऐसे भी लोग हैं जो अपनी जान दे देते हैं। सिर्फ इसलिए कि दूसरे लोग एक साफ-सुथरी, ‘‘हाइजेनिक’’ ज़िन्दगी जी सकें।
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प्रवासी मज़दूर : चिकित्सा सेवाओं के शरणार्थी - बुनियादी चिकित्सा सुविधाओं से भी वंचित रहते हैं
हर साल करोड़ों स्त्री-पुरुष गाँवों में फसल का काम ख़त्म होते ही रोज़गार की तलाश में देश के महानगरों की ओर चल पड़ते हैं। निर्माणस्थलों, ईंटभट्ठों और पत्थर की खदानों में कमरतोड़ काम करने हुए ये रेल की पटरियों के नीचे या सड़कों के किनारे, या गन्दे नालों के किनारे बोरी या पालिथीन की झुग्गियों में रहते हैं, और अक्सर आधा पेट खाकर ही गुज़ारा कर लेते हैं। ऐसे नारकीय हालात में शरीर का तमाम तरह की बीमारियों से ग्रस्त होना लाज़िमी ही है, फिर भी ये दर्द-तकलीफ की परवाह न करके काम में लगे रहते हैं। सरकारी अस्पतालों की सुविधाएँ उन्हें अक्सर मिल नहीं पातीं - ठेकेदार छुट्टी नहीं देता, अनजान शहर में अस्पताल दूर होते हैं और उनके पास राशन कार्ड आदि भी नहीं होते। निजी डाक्टर गली के ठगों की तरह उनकी जेब से आखि़री कौड़ी भी हड़प लेने की फिराफ में रहते हैं।
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कार्ल मार्क्‍स के जन्मदिन (5 मई) के अवसर पर
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(फ्रेडरिक एंगेल्स का कार्ल मार्क्‍स पर लेख)

चीनी विशेषता वाले ''समाजवाद'' में मज़दूरों के स्वास्थ्य की दुर्गति

माओ त्से-तुङ और कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में हुई चीनी क्रान्ति के बाद जिस मेहनतकश वर्ग ने अपना ख़ून-पसीना एक करके समाजवाद का निर्माण किया था, कल-कारख़ाने, सामूहिक खेती, स्कूल, अस्पतालों को बनाया था, वह 1976 में माओ के देहान्त के बाद 1980 में शुरू हुए देङपन्थी 'सुधारों' के चलते अब बुनियादी स्वास्थ्य सेवाओं तक से महरूम है। जिस चीन में समाजवाद के दौर में सुदूर पहाड़ी इलाकों से लेकर शहरी मज़दूरों तक, सबको मुफ्त चिकित्सा उपलब्ध थी, वहाँ अब दवाओं के साथ-साथ परीक्षणों की कीमत और डाक्टरों की फीस आसमान छू रही है। आम मेहनतकश जनता अब दिन-रात खटने के बाद, पोषक आहार न मिल पाने से या पेशागत कारणों से बीमार पड़ती है तो उसका इलाज तक नहीं हो पाता और वह तिलतिलकर मरने को मजबूर होती है।
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नताशा - एक महिला बोल्शेविक संगठनकर्ता (पाँचवीं किश्त)
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मई 1886 का वह रक्तरंजित दिन जब मज़दूरों के बहते ख़ून से जन्मा लाल झण्डा

मज़दूरों का त्योहार मई दिवस आठ घण्टे काम के दिन के लिए मज़दूरों के शानदार आन्दोलन से पैदा हुआ। उसके पहले मज़दूर चौदह से लेकर सोलह-सोलह घण्टे तक खटते थे। सारी दुनिया में अलग-अलग इस माँग को लेकर आन्दोलन होते रहे थे। अपने देश में भी 1862 में ही मज़दूरों ने इस माँग को लेकर कामबन्दी की थी। लेकिन पहली बार बड़े पैमाने पर 1886 में अमेरिका के विभिन्न मज़दूर संगठनों ने मिलकर आठ घण्टे काम के दिन की माँग पर एक विशाल आन्दोलन खड़ा करने का फैसला किया। एक मई 1886 को पूरे अमेरिका के लाखों मज़दूरों ने एक साथ हड़ताल शुरू की। इसमें 11,000 फैक्टरियों के कम से कम तीन लाख अस्सी हज़ार मज़दूर शामिल थे। शिकागो महानगर के आसपास सारा रेल यातायात ठप्प हो गया और शिकागो के ज़्यादातर कारख़ाने और वर्कशाप बन्द हो गये। शहर के मुख्य मार्ग मिशिगन एवेन्यू पर अल्बर्ट पार्सन्स के नेतृत्व में मज़दूरों ने एक शानदार जुलूस निकला।
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पाँच क्रान्तिकारी जनसंगठनों का साझा चुनावी भण्डाफोड़ अभियान
चुनावी राजनीति के मायाजाल से बाहर आओ! नये मज़दूर इन्कलाब की अलख जगाओ!!

देशभर में लोकसभा चुनाव के लिए जारी धमाचौकड़ी के बीच बिगुल मज़दूर दस्ता, देहाती मज़दूर यूनियन, दिशा छात्र संगठन, नौजवान भारत सभा, और स्त्री मुक्ति लीग ने दिल्ली, उत्तर प्रदेश और पंजाब के अलग-अलग इलाकों में चुनावी भण्डाफोड़ अभियान चलाकर लोगों को यह बताया कि वर्तमान संसदीय ढाँचे के भीतर देश की समस्याओं का हल तलाशना एक मृगमरीचिका है। ऊपर से नीचे तक सड़ चुकी इस आर्थिक-राजनीतिक-सामाजिक व्यवस्था को ध्वस्त कर बराबरी और न्याय पर टिका नया हिन्दुस्तान बनाने के लिए आम अवाम को संगठित करके एक नया इन्कलाब लाना होगा।
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देहाती मज़दूर यूनियन द्वारा 8 दिन की क्रमिक भूख हड़ताल : बी डी ओ ने मांगी मांगें

मधुबन, मऊ। प्रशासन की उपेक्षा और संवेदनहीनता से तंग आकर मधुबन तहसील के अन्तर्गत फतेहपुर मण्डाव ब्लाक के कई गाँवों के नरेगा मज़दूर अपनी 7 माँगों और मर्यादपुर ग्राम सभा की 5 माँगों को लेकर 22 अप्रैल से क्रमिक अनशन पर बैठे थे। इन गाँवों में मर्यादपुर, डुमरी, लखनौर, भिडवरा, जवाहिरपुर, गोबबाडी, रामपुर, अलीपुर-शेखपुर, ताजपुर, बेमडाड, गुरम्हा, छतहरा, लघुआई, लऊआसात शामिल थे। अनशन पर जाने से पूर्व उन्होंने ज़िला और तहसील स्तर पर हर जगह बार-बार पत्र लिखकर, ज्ञापन देकर अपनी आवाज़ पहुँचाने की कोशिश की, लेकिन मज़दूरों की आवाज़ कहीं नहीं सुनी गयी। जगह-जगह पोस्टर लगाकर और सभाओं द्वारा इस अनशन की सूचना लोगों तक पहुँचायी गयी। देहाती मज़दूर यूनियन की टोली ने घर-घर जाकर लोगों से सहयोग और समर्थन माँगा। सहयोग और समर्थन के अलावा कई घरों से कार्यकर्ताओं को आटा, चावल, ईन्धन, आलू आदि सामान भी मिला। ........आगे पढ़ें


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