जून 2010



भोपाल हत्याकाण्ड : कटघरे में है पूरी पूँजीवादी व्यवस्था 

भोपाल पर अदालती फैसले ने नरभक्षी मुनाफाखोर व्यवस्था, पूँजीवादी राजनीति और पूँजीवादी न्याय को नंगा कर दिया है 

भोपाल गैस दुर्घटना पर पिछली 7 जून को आये अदालत के फैसले ने पूँजीवादी न्याय की कलई तो खोली ही है, इसके बाद मीडिया के जरिये शुरू हुए भण्डाफोड़ और आरोप-प्रत्यारोप के सिलसिले ने पूरी पूँजीवादी व्यवस्था के आदमख़ोर चरित्र को नंगा करके रख दिया है। कम से कम 20,000 लोगों को मौत के घाट उतारने और पौने छह लाख लोगों को विकलांग और घातक बीमारियों से ग्रस्त बना देने वाली इस भयानक दुर्घटना के लिए जिम्मेदार यूनियन कार्बाइड कम्पनी के 8 पूँजीपतियों को भोपाल की एक अदालत ने महज 2-2 साल की सजा सुनाकर छोड़ दिया। इतना ही नहीं, दो घण्टे के भीतर ही उन सबकी जमानत भी हो गयी और वे हँसते हुए घर चले गये।   आगे पढ़ें  


मालिकों के लिए हम सिर्फ मुनाफा पैदा करने की मशीन के पुर्जे हैं 

दिल्ली के बादली औद्योगिक क्षेत्र के दो मजदूरों की आपबीती 

दोस्तो एक दर्दभरी कहानी आपको सुनाता हूँ। एक मेहनतकश नौजवान की कहानी, जो अपना गाँव-देश छोड़कर दिल्ली में कुछ कमाने के लिए आया था, पर उसे क्या पता था कि पूँजीपतियों की इस बर्बर लूट में उसका हाल ऐसा हो जायेगा कि वह जिन्दगीभर के लिए किसी और के सहारे का मोहताज हो जायेगा। 

गाँव में दिल्ली के बारे में सुन रखा था कि राजधानी में हर हाथ के लिए काम है और वहाँ पैसा भी काफी मिलता है। इसीलिए मैं भी अपना गाँव कन्नौज छोड़कर रोजगार के लिए दिल्ली आ गया था। दिल्ली आकर शहर की चमक-दमक देखी, बड़ा अच्छा लगा। उसके बाद दिल्ली के बादली औद्योगिक क्षेत्र की एक फैक्ट्ररी में काम पर लग गया।   आगे पढ़ें  


टेक्सटाइल मजदूर प्रेमचन्द उर्फ पप्पू की मौत महज एक हादसा नहीं : कारख़ाना मालिकों की मुनाफे की हवस और लापरवाही का अगला शिकार कहीं आप तो नहीं? 

4 जून को शाम सात बजे ताना मास्टर प्रेमचन्द उर्फ पप्पू जिन्दगी की लड़ाई हार गया। मशीन में करण्ट आने के कारण पप्पू की मौत हो गयी। साथी मजदूरों ने बहुत कोशिश की उसे बचाने की। मालिश की, अस्पताल लेकर गये लेकिन पप्पू को बचा नहीं पाये। यह घटना टी. एस. टेक्सटाइल, शक्ति नगर, टिब्बा रोड की है। पप्पू की मौत के बाद मालिक आनन-फानन में बीस हजार देकर मामले को निपटाना चाहता था, लेकिन शक्ति नगर के मजदूरों और प्रेमचन्द के मुहल्ले वालों के कड़े रुख़ के कारण मालिक को दो लाख रुपये मुआवजे के रूप में देने पड़े। कारीगरों द्वारा कारख़ाने बन्द करके धरना लगाया जाना प्रशंसनीय कदम था, जिसकी बदौलत ही पप्पू के परिवार को मुआवजा मिला।   आगे पढ़ें  

भोपाल बनाम ग्रेजियानो - एक संक्षिप्त तुलना 

घटना 
भोपाल - 2-3 दिसम्बर, 1984 की रात को अमेरिकी कम्पनी की भारतीय सहायक कम्पनी (यू.सी.आई.एल.) के प्लाण्ट से जहरीली गैस के रिसाव से लगभग 20,000 लोगों की मौत और लाखों लोग प्रभावित। 
ग्रेजियानो - ग्रेटर नोएडा स्थित इटली की ग्रेजियानो कम्पनी के मजदूरों का आन्दोलन और इस दौरान सीईओ ललित किशोर चौधरी की मौत।   आगे पढ़ें  


कैसा है यह लोकतन्त्र और यह संविधान किनकी सेवा करता है? (चौथी किस्त) 

अन्तरिम सरकार और संविधान सभा 
कैबिनेट मिशन के प्रस्ताव तत्कालीन परिस्थितियों में मुस्लिम लीग को अनुकूल लगे। 6 जून 1946 को उसने ब्रिटिश योजना का अनुमोदन करने के साथ ही अन्तरिम सरकार में भाग लेने की बात भी मान ली, जिसके गठन की घोषणा वायसराय वेवेल ने 16 मई 1946 को की थी। कांग्रेस ने प्रान्तों के अनिवार्य समूहीकरण (तीन मण्डलों में प्रान्तों के साम्प्रदायिक आधार पर वर्गीकरण) का विरोध करते हुए कैबिनेट मिशन और वायसराय के साथ वार्ता का एक और दौर चलाया। लेकिन ब्रिटिश सत्ताधारी अपने प्रस्तावों पर अडिग रहे। अन्तत: सत्ता के लिए आतुर कांग्रेसी नेतृत्व ने घुटने टेक दिये और 24 जून को कैबिनेट मिशन प्रस्तावों को संविधान तैयार करने के आधार के रूप में स्वीकृति दे दी।   आगे पढ़ें  


कॉमरेड के ''कतिपय बुध्दिजीवी या संगठन'' और कॉमरेड का कतिपय ''मार्क्‍सवाद'' 

दिल्ली के बादाम मजदूरों का ऐतिहासिक आन्दोलन और मजदूर आन्दोलन की भावी दिशा 

(पृष्ठभूमि : यह टिप्पणी 'समयान्तर' जनवरी 2010 में प्रकाशित लेख 'गुड़गाँव का मजदूर आन्दोलन : भावी मजदूर आन्दोलन के दिशा संकेत' में प्रस्तुत कुछ स्थापनाओं का उत्तर देते हुए लिखी गयी थी। 'समयान्तर' ने वह लेख 'इन्कलाबी मजदूर' से साभार लिया था। 'समयान्तर' सम्पादक यूँ तो प्रासंगिक विषयों पर जनवादी तरीके से वाद-विवाद चलाने का पुरजोर समर्थन करते हैं, लेकिन किन्हीं कारणोंवश उन्होंने हमारी यह टिप्पणी प्रकाशित नहीं की। तब यह टिप्पणी 'बिगुल' को प्रकाशनार्थ भेजी गयी। ज्ञातव्य है कि विगत 24 जुलाई, 2009 को दिल्ली में हुई एक संगोष्ठी में भी 'इन्कलाबी मजदूर' के एक साथी ने ''भूमण्डलीकरण के दौर में मजदूर आन्दोलन के स्वरूप और दिशा पर यही बातें रखी थीं, जिनका हमने विस्तार से उत्तर दिया था। इस संगोष्ठी की विस्तृत रपट 'बिगुल' के अगस्त '09 अंक में प्रकाशित हुई थी, जिसे पाठक देख सकते हैं। इसके बावजूद, हमारे ''इन्कलाबी कामरेड'' जब ''कतिपय बुध्दिजीवियों'' का पुतला खड़ा करके शरसन्धान करते हुए अपने कठमुल्लावादी-अर्थवादी मार्क्‍सवाद का प्रदर्शन कर रहे हैं, तो हम अपनी पोजीशन एक बार फिर स्पष्ट करना जरूरी समझते हैं - अभिनव)   आगे पढ़ें  


यूनानी मजदूरों और नौजवानों के जुझारू आन्दोलन के सामने विश्व पूँजीवाद के मुखिया मजबूर 

यूरोपीय आर्थिक संघ के संकट ने खोली वित्तीय संकट से उबरने के दावों की पोल! 
जनता नहीं उठायेगी सट्टेबाजों, आर्थिक लुच्चों-लफंगों के जुए का बोझ 


अमेरिका, जर्मनी, इंग्लैण्ड, फ्रांस समेत विश्व पूँजीवाद के सभी छोटे-बड़े चौधरी अभी हकला-तुतलाकर विश्व पूँजीवाद के वित्तीय संकट से उबरने की बातें कर ही रहे थे कि उनके कर्मों का फल फिर से सामने आ गया। जगह बदल गयी, नाम बदल गये (लेकिन फिर से जाहिर हो गया कि 'अन्तिम विजय' और 'पूँजीवाद के अलावा कोई विकल्प नहीं' जैसे दावे करने वाला विश्व पूँजीवाद अन्दर से एकदम खोखला, कमजोर और क्षरित हो चुका है। आज यह सिर्फ इसलिए टिका हुआ है कि जनता की ताकतें बिखरी हुई हैं और विश्व मजदूर आन्दोलन वैचारिक, राजनीतिक और सांगठनिक रूप से कमजोर है। पूँजीवाद एक विश्व व्यवस्था के रूप में सिर्फ और सिर्फ जड़ता की ताकत से टिका हुआ है।   आगे पढ़ें  


छत्तीसगढ़ की औद्योगिक नीति 2009-2014 : पूँजीवादी लूट व शोषण और मेहनतकश ग़रीबों के विस्थापन के लिए रास्ता साफ करने का फरमान 

हाल ही में छत्तीसगढ़ की रमण सिंह की सरकार ने अगले पाँच वर्षों के लिए छत्तीसगढ़ की औद्योगिक नीति का एलान किया। इस नीति की मुख्य विशेषताओं को स्पष्ट करने वाला एक दस्तावेज भी साथ में जारी किया गया। इस नीति का उद्योग जगत (यानी, कारपोरेट घरानों के मुखियाओं और तमाम पूँजीपतियों) ने खुले दिल से स्वागत किया और छत्तीसगढ़ सरकार को एक निवेश-अनुकूल सरकार बताया। विभिन्न बुर्जुआ और संसदीय वामपन्थी दलों से जुड़े मजदूर संगठनों ने इस नीति की निन्दा की। लेकिन यह एक औपचारिकता मात्र थी, क्योंकि किसी भी मजदूर संगठन ने इस नीति का सांगोपांग विश्लेषण प्रस्तुत नहीं किया।   आगे पढ़ें  


चीन में मजदूर संघर्षों का नया उभार : मजदूर हड़तालों के अनवरत सिलसिले से चीनी शासकों और दुनियाभर के पूँजीपतियों की नींद उड़ी 

पिछले कुछ सप्ताहों के दौरान चीन में मजदूर हड़तालों की लहर ने चीन के कम्युनिस्ट नामधारी पूँजीवादी शासकों को हिलाकर रख दिया है। चीन के मजदूर वर्ग के संघर्ष के इस नये उभार ने दुनियाभर के पूँजीपतियों को भी चिन्ता में डाल दिया है। अब तक चीन के मजदूरों के सस्ते श्रम को निचोड़कर भारी मुनाफा पीटने वाली बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ मुनाफा घटने की चिन्ता से परेशान हो उठी हैं। 
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