जनवरी-फरवरी 2010


मनमोहन का बेशर्म झूठ : ''आर्थिक सुधारों से ग़रीबी घटी है!'' 

प्रधानमन्त्री महोदय! ऑंकड़ों की बाजीगरी से ग़रीबी नहीं घटती! 

देश को ग़रीबी और बेरोजगारी से निजात सिर्फ़ मजदूर क्रान्ति दिला सकती है, शासक वर्ग की लफ्फाजियाँ नहीं 


27 दिसम्बर को भुवनेश्वर (उड़ीसा) में भारतीय आर्थिक संघ के 92वें सम्मेलन को सम्बोधित करते हुए हमारे देश के अर्थशास्त्री प्रधानमन्त्री मनमोहन सिंह ने ऐसा दावा किया जिसे सुनकर देश का हर ग़रीब नागरिक दंग रह जाये। दुनिया के शीर्ष अर्थशास्त्रियों में गिने जाने वाले, लन्दन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में शिक्षण प्राप्त कर चुके और दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में शिक्षण दे चुके प्रधानमन्त्री मनमोहन सिंह ने घोषणा की कि 1991 में उनके द्वारा नयी आर्थिक नीतियों के श्रीगणेश के बाद देश में ग़रीबी रेखा के नीचे रहने वालों की तादाद में कमी आयी है! उन्होंने कहा कि अगर हम आर्थिक सुधारों की रफ्तार को घटायेंगे तो अर्थव्यवस्था उस गति से विकास नहीं कर पायेगी कि पर्याप्त रोजगार पैदा हो सकें। यानी साफ है कि आगे नवउदारवादी नीतियों को और जोर-शोर से लागू करने की पूरी योजना है। आगे पढ़ें 


कैसा है यह लोकतन्त्र और यह संविधान किनकी सेवा करता है?

औपनिवेशिक भारत में संविधान-निर्माण की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, इसकी निर्माण-प्रक्रिया, इसके चरित्र और भारतीय बुर्जुआ जनवादी गणराज्य की वर्ग-अन्तर्वस्तु, इसके अति सीमित बुर्जुआ जनवाद और निरंकुश तानाशाही के ख़तरों के बारे में  
''हम, भारत के लोग, भारत को एक संपूर्ण प्रभुत्व-सम्पन्न समाजवादी पन्थनिरपेक्ष लोकतन्त्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए, तथा उसके समस्त नागरिकों को : सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतन्त्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त कराने के लिए, तथा उन सब में व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखण्डता सुनिश्चित करने वाली बंधुता बढ़ाने के लिए दृढसंकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में आज तारीख 26 नवम्बर, 1949 ई. (मिति मार्गशीर्ष शुक्ल सप्तमी, संवत् दो हजार छह विक्रमी) को एतद्द्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।'' 

इन्हीं लच्छेदार शब्दों की प्रस्तावना के साथ दुनिया के सबसे बड़े जनतन्त्र के संविधान की शुरुआत होती है जो (90,000 शब्द) दुनिया का सबसे वृहद संविधान है। इस 26 जनवरी को भारतीय गणतन्त्र और भारतीय संविधान की साठवीं सालगिरह धूमधाम से मनायी गयी। जश्न और जलसे हुए। आगे पढ़ें 


दिल्ली के असंगठित मजदूरों का अभूतपूर्व संघर्ष 

बादाम मजदूर यूनियन के नेतृत्व में दिल्ली के बादाम मजदूरों की 16 दिन लम्बी हड़ताल 

वैश्विक बाजार में बादाम आपूर्ति लड़खड़ाई, मजदूरों की आंशिक विजय 


16 दिसम्बर से 31 दिसम्बर तक का समय दिल्ली के असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के लिए एक यादगार दौर था। इन 16 दिनों के दौरान उत्तर-पूर्वी दिल्ली के करावलनगर क्षेत्र के करीब 10 हजार मजदूर परिवारों ने एक ऐतिहासिक संघर्ष लड़ा। यह संघर्ष न सिर्फ़ करावलनगर क्षेत्र के लिए एक अभूतपूर्व घटना थी, बल्कि 1988 की 7 दिनों की हड़ताल की ही तरह पूरे दिल्ली के असंगठित क्षेत्र के लिए एक अभूतपूर्व घटना थी। कई मायनों में यह 1988 की असंगठित मजदूरों की 7 दिनों की हड़ताल से भी बड़ी हड़ताल थी। आगे पढ़ें 


लुधियाना के मेहनतकशों के एकजुट संघर्ष की बड़ी जीत - ढंडारी काण्ड : 42 निर्दोष मज़दूरों को बिना शर्त रिहा करवाया 

पिछले वर्ष दिसम्बर के पहले सप्ताह में घटित ढण्डारी काण्ड (देखें बिगुल के पिछले अंक में छपी रिपोर्ट) के पीड़ितों को इंसाफ दिलाने के लिए लुधियाना के अनेक मज़दूर, किसान, सरकारी कर्मचारी और नौजवान संगठनों के नेतृत्व में हुए एकजुट संघर्ष को बड़ी सफलता मिली है। 4-5 दिसम्बर को डी.सी. लुधियाना के कार्यालय के सामने धरना-प्रदर्शन से लेकर 17 जनवरी को लुधियाना के ढण्डारी खुर्द में 22 इंसाफपसंद संगठनों के नेतृत्व में हजारों मज़दूरों सहित किसानों, सरकारी कर्मचारियों और नौजवानों द्वारा एक जबरदस्त एकजुटता रैली और प्रदर्शन ने सरकार को मज़बूर कर दिया कि वह झूठे केसों में जेल में बंद किये गये ढण्डारी के 42 निर्दोष मज़दूरों को रिहा करे। इस प्रदर्शन के दो दिन बाद ही अधिकांश मजदूरों को बिना शर्त रिहा कर दिया गया। आगे पढ़ें 


इक्कीसवीं शताब्दी की पहली दशाब्दी के समापन के अवसर पर 

अतीत का निचोड़ सामने है और भविष्य की तस्वीर भी! 

मेहनतकश साथियो! निर्णायक बनो! 

अपना ऐतिहासिक मिशन पूरा करने के लिए आगे बढ़ो! 


वर्ष 2009 के बीतने के साथ ही इक्कीसवीं सदी का पहला दशक बीत चुका है। विगत दस वर्षों के दौरान पूरी दुनिया के पैमाने पर जो घटनाएँ घटी हैं, उन्होंने हमें बीसवीं शताब्दी के गुजरे हुए समय को समझने में तथा आने वाले दिनों की सम्भावनाओं को, भविष्य के दिशा संकेतों को पहचानने में काफी मदद की है। भविष्य की सूत्रधार ताकतें अभी इतिहास के रंगमंच पर सक्रिय नहीं हुई हैं, लेकिन उनके अवतरण की ज़मीन जितनी तेजी से तैयार हो रही है, उसे देखकर कहा जा सकता है कि गुजरी हुई दशाब्दी में इतिहास की गति काफी तेज रही है। आगे पढ़ें 


ज्योति बसु (1914-2010) के निधन के अवसर पर - ज्योति बसु और संसदीय वामपन्थी राजनीति की आधी सदी 

ज्योति बसु नहीं रहे। विगत 17 जनवरी 2010 को 96 वर्ष का लम्बा जीवन जीने के बाद कलकत्ता के एक अस्पताल में उन्होंने अन्तिम साँस ली। निधन के दिन से लेकर अन्तिम यात्रा (उन्होंने अपना शरीर मेडिकल रिसर्च के लिए दान कर दिया था) तक बुर्जुआ राजनीतिक हलकों में उन्हें उसी सम्मान के साथ याद किया गया और श्रध्दांजलि दी गयी, जितना सम्मान आजादी के बाद देश के शीर्षस्थ बुर्जुआ नेताओं को दिया जाता रहा है। आगे पढ़ें 


एकीकृत ने.क.पा. (माओवादी) के संशोधनवादी विपथगमन के ख़तरे और नेपाली क्रान्ति का भविष्य : संकटों-समस्याओं-चुनौतियों के बारे में कुछ जरूरी बातें 

नेपाल के बारे में 'बिगुल' में अन्तिम लेख हमने प्रचण्ड सरकार के इस्तीफे (4 मई '09) के एक माह बाद जून '2009 के अंक में लिखा था। उसके पहले फरवरी '2009 में प्रकाशित अपने लेख में नेकपा (माओवादी) के दक्षिणपंथी विपथगमन के लक्षणों-संकेतों की हमने विस्तार से चर्चा की थी। जून के लेख में भी हमने पार्टी के भटकावों का उल्लेख किया था और साथ ही नेपाली क्रान्ति के सामने उपस्थित बेहद प्रतिकूल वस्तुगत स्थितियों की भी चर्चा की थी। आगे पढ़ें