दिसम्‍बर 2009


नया अंक

दिसम्‍बर 2009


यह महँगाई ग़रीबों के जीने के अधिकार पर हमला है! 
पूँजीपतियों को अरबों डॉलर के बेलआउट पैकेज देने वाली सरकार 
ग़रीबों को भुखमरी से बचाने की ज़िम्मेदारी लेने को तैयार नहीं
 

यह महँगाई आने वाले भीषण संकट का पूर्व-संकेत है। हर संकट की तरह इसकी भी गाज अन्तत: ग़रीबों पर ही गिरनी है। लेकिन देश की ग़रीब जनता चुपचाप इस संकट को बर्दाश्त नहीं करती रहेगी। मेहनतकशों की भारी आबादी में सुलगता असन्तोष जगह-जगह फूट रहा है। देश के हुक्मरान महँगाई पर काबू पाने के लिए भले ही कुछ न कर रहे हों, ग़रीबों के सम्भावित विस्फोटों को रोकने के लिए वे अपने दमन तन्त्र को चाक-चौबन्द करने में जुट गये हैं।   आगे पढ़ें   


लिब्रहान रिपोर्ट : जिसके तवे पर सबकी रोटियाँ सिंक रही हैं 

संघ परिवार द्वारा जुटायी गयी उन्मादी भीड़ और हिन्दू फ़ासिस्ट संगठनों के प्रशिक्षित कार्यकर्ताओं द्वारा 6 दिसम्बर 1992 को अयोध्‍या में बाबरी मस्जिद गिराये जाने की जाँच के लिए गठित जस्टिस लिब्रहान आयोग की रिपोर्ट 17 वर्ष बाद जिस तरह से पेश की गयी, उससे सभी पार्टियों के हित सध रहे हैं। एक ऐहिासिक मस्जिद को गिराने और पूरे देश को विभाजन के बाद के सबसे भीषण दंगों की आग में धकेलने वाले संघ परिवार और उसके नेताओं के राजनीतिक करियर पर इस रिपोर्ट से कोई ऑंच नहीं आने वाली है। इस साज़िश में शामिल और इसे शह देने वाले कांग्रेसी प्रधानमंत्री नरसिंह राव और पूजा के लिए मस्जिद का ताला खुलवाने से लेकर शिलान्यास करवाने तक कदम-कदम पर भाजपा का रास्ता आसान बनाने वाली कांग्रेस को भी इससे कोई नुकसान नहीं होने वाला। सच तो यह है कि कांग्रेस और भाजपा से लेकर मुलायम सिंह यादव तक सभी इससे अपने-अपने हित साधने में लगे हुए हैं।    आगे पढ़ें   


गोरखपुर मज़दूर आन्दोलन को आम नागरिकों का समर्थन 

बरगदवां के कारख़ानों में पिछले दिनों चला मज़दूर आन्दोलन आसपास के मोहल्लों में अब भी चर्चा का विषय बना हुआ है। बरगदवां, भगवानपुर, बिचउआपुर, विस्तारनगर, मोहरीपुर, घोसीपुरवां, गिदहवां, राजेन्द्र नगर, शास्त्री नगर इन सभी मोहल्लों के लोग कभी डीएम कार्यालय पर धरने तो कभी योगी आदित्यनाथ के बयानों के बारे में बातें करते रहते हैं।    आगे पढ़ें   


कॉमनवेल्थ गेम्स के लिए सजती दिल्ली में उजड़ती ग़रीबों की बस्तियाँ 

पिछले एक दिसम्बर को बादली रेलवे स्टेशन से सटी बस्ती, सूरज पार्क की लगभग एक हज़ार झुग्गियों को दिल्ली नगर निगम ने ढहा दिया। सैकड़ों परिवार एक झटके में उजड़ गये और दर-दर की ठोकरें खाने के लिए सड़कों पर ढकेल दिये गये। दरअसल 2010 में होने वाले राष्ट्रमण्डल (कॉमनवेल्थ) खेलों की तैयारी के लिए दिल्ली के जिस बदनुमा चेहरे को चमकाने की मुहिम चलायी जा रही है उसकी असलियत खोलने का काम ये झुग्गियाँ कर रही थीं। दिल्ली का चेहरा चमकाने का यह काम भी इन्हीं और ऐसी ही दूसरी झुग्गियों में बसनेवालों के श्रम की बदौलत हो रहा है, लेकिन उनके लिए दिल्ली में जगह नहीं है।    आगे पढ़ें   


मालिकों के मुनाफे की हवस का शिकार - एक और मज़दूर! - रंजीत भी मालिकों के मुनाफे की भेंट चढ़ गया 

समस्तीपुर से काम की तलाश में दिल्ली आया रंजीत पिछले छह सालों से झिलमिल औद्योगिक क्षेत्र के बी-46 वी.के. कम्पनी में मशीन ऑपरेटर का काम कर रहा था। इस कम्पनी में कॉपर वायर बनाने का काम होता है। यहाँ 100 से ज्यादा मज़दूर काम करते हैं जिसमें स्थायी मज़दूरों की संख्या बहुत थोड़ी है। स्थायी मज़दूरों को छोड़ अन्य किसी भी मज़दूर को ई.एस.आई, पी.एफ, जॉबकार्ड से लेकर न्यूनतम मज़दूरी तक नहीं मिलती है जिसके लिए वे कानूनी रूप से अधिकृत हैं। अन्य कारख़ानों की तरह यहाँ भी श्रम-कानूनों की सरेआम धज्जियाँ उड़ती हैं।    आगे पढ़ें   


संसदीय ''वामपंथियों'' के राज में हज़ारों चाय बाग़ान मज़दूर भुखमरी की कगार पर 

पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी जिले में स्थित नावेड़ा नड्डी चाय बाग़ान के 1000 मज़दूरों और उनके परिवार के सदस्यों सहित करीब 6,500 लोग भुखमरी की कगार पर हैं। यह चाय बागान दुनिया की सबसे दूसरी बड़ी चाय कम्पनी टाटा टेटली का है। यह चाय बाग़ान उस राज्य, पश्चिम बंगाल, में है जहाँ खुद को मज़दूरों की हितैषी बताने वाली माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी का शासन है। मज़दूरों की यह हालत उन अमानवीय स्थितयों का विरोध करने के कारण हुई है जिनमें वे काम करने और जीने को मजबूर हैं।    आगे पढ़ें   


एम.आर. डाइंग (ताजपुर रोड, लुधियाना) हादसा - लुधियाना के कारख़ाना मालिकों का खूँखार चेहरा फिर उजागर 

16 नवम्बर को लुधियाना के ताजपुर रोड पर स्थित गीता नगर की गली नम्बर 5 में एम.आर. डाइंग में रंगाई मशीन के फटने के हादसे ने एक बार फिर लुधियाना के कारख़ाना मालिकों का खूँखार चेहरा सामने ला दिया है। इस हादसे ने एक बार फिर मज़दूरों के सामने मालिक-पुलिस-प्रशासन-श्रम विभाग की मिलीभगत का पर्दाफाश किया। कारख़ाना मालिक और पुलिस के बयानों के अनुसार इस हादसे में दो मज़दूर मारे गये और 4 घायल हुए।    आगे पढ़ें   


बोलते ऑंकड़े चीखती सच्चाइयाँ     पढ़ें   


शान्ति काल में पूँजी के हाथों हुए सबसे बड़े हत्याकाण्ड का नाम है भोपाल 

मुनाफे की हवस में भागती पूँजी की रक्तपिपासु राक्षसी की प्यास इंसानी ज़िन्दगियों को हड़पे बिना शान्त नहीं होती। पूँजीवाद का पूरा इतिहास बर्बर हत्याकाण्डों और नृशंस जनसंहारों से भरा हुआ है। मुनाफे के बँटवारे के लिए लड़े जाने वाले युध्दों के दौरान वह हिरोशिमा और नागासाकी जैसे हत्याकाण्ड रचता है और शान्ति के दिनों में भोपाल जैसे जनसंहारों को अंजाम देता है। कम से कम बीस हज़ार लोगों को मौत के घाट उतारने और करीब छह लाख लोगों को अन्धेपन से लेकर दमा जैसी बीमारियों का शिकार बनाने वाली इस घटना को दुनिया की सबसे बड़ी औद्योगिक दुर्घटना कहा जाता है, लेकिन वास्तव में यह दुर्घटना नहीं थी। इस हादसे ने एक बार फिर बस यही साबित किया कि पूँजीपतियों के लिए इंसानों की ज़िन्दगी मुनाफे से बढ़कर नहीं होती। एक ओर मुनाफे के लिए बेहद ज़हरीली गैसें तैयार की जाती हैं और दूसरी ओर पैसे बचाने के लिए सुरक्षा के सारे इंतज़ाम ताक पर धर दिये जाते हैं।    आगे पढ़ें   



फासीवाद क्या है और इससे कैसे लड़ें? (छठी किश्त) 

इटली, जर्मनी और भारत में फासीवाद के पैदा होने से लेकर उसके विकास तक का ऐतिहासिक विश्लेषण करने के बाद हमने फासीवादी उभार के प्रमुख सामान्य ऐतिहासिक, सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक कारणों को समझा। एक सामान्य निष्कर्ष के तौर पर यह बात हमारे विश्लेषण से सामने आयी कि पूँजीवादी व्यवस्था का संकट क्रान्तिकारी और प्रतिक्रियावादी, दोनों ही सम्भावनाओं को जन्म देता है। अगर किसी समाज में क्रान्तिकारी सम्भावना को मूर्त रूप देने के लिए एक अनुभवी और विवेक-सम्पन्न कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी पार्टी मौजूद नहीं है, और फासीवादी शक्तियों ने समाज के पोर-पोर में अपनी पैठ बना ली है, तो प्रतिक्रियावादी सम्भावना के हकीकत में बदल सकती है। जर्मनी और इटली में यही हुआ था और एक दूसरे किस्म से भारत में भी भगवा फासीवादी उभार के पीछे एक बड़ा कारण किसी क्रान्तिकारी नेतृत्व का ग़ैर-मौजूद होना भी था। इस बात को हम पहले ही विस्तार में समझ चुके हैं।    आगे पढ़ें   



गोरखपुर में अड़ियल मालिकों के ख़िलाफ मज़दूरों का संघर्ष जारी 

गोरखपुर के बरगदवा औद्योगिक क्षेत्र के मज़दूरों के लगातार जारी संघर्ष के बारे में बिगुल में हम लिखते रहे हैं। पिछले दिनों मज़दूरों ने मालिकों और प्रशासन के दमन के विरुद्ध अपने एकजुट संषर्घ से पूर्वी उत्तर प्रदेश के मज़दूरों के सामने एक मिसाल पेश की और प्रशासन को झुकने पर मजबूर कर दिया। प्रशासन ने माडर्न लेमिनेटर्स और पैकेजिंग के मालिक पवन बथवाल को मज़दूरों की माँगों पर समझौता करने का निर्देश दिया लेकिन उसके घनघोर मज़दूर विरोधी रवैये से क्षुब्ध मज़दूरों ने उसके कारखाने से सामूहिक इस्तीफा देने का फैसला कर लिया।    आगे पढ़ें   



क्रान्तिकारी चीन ने प्रदूषण की समस्या का मुकाबला कैसे किया और चीन के वर्तमान पूँजीवादी शासक किस तरह पर्यावरण को बरबाद कर रहे हैं! 

प्रस्तुत लेख इस बात पर रोशनी डालता है कि समाजवादी चीनी जनता ने किसी प्रकार प्रदूषण और औद्योगिक कचरे का सफलतापूर्वक मुकाबला किया। लेकिन इससे भी महत्वपूर्ण यह है कि इस लेख से पता चलता है कि यह काम ऐसे समाज के निर्माण के एक अंग के रूप में किया गया जिसका लक्ष्य हर प्रकार की वर्ग असमानताओं, उत्पीड़क सम्बन्धों और विचारों से छुटकारा पाना था। महत्वपूर्ण बात यह है कि जनसमुदाय इन समस्याओं को हल करने के क्रान्तिकारी मार्ग तक पहुँच और खाका बनाने लगा था। और यह सब वर्ग संघर्ष और समाजवाद के निर्माण के एक अंग के रूप में समाज में मौजूद उन ताकतों से जूझते हुए किया गया जो चीन को पूँजीवादी रास्ते पर धकेलना चाहती थीं। इसने दिखा दिया कि प्रदूषण और पर्यावरण के विनाश का कारण पूँजीवादी उद्योग है न कि अपने आप में उद्योग।    आगे पढ़ें   



जोसेफ स्तालिन : क्रान्ति और प्रतिक्रान्ति के बीच की विभाजक रेखा 

मज़दूर वर्ग के पहले राज्य सोवियत संघ की बुनियाद रखी थी महान लेनिन ने, और पूरी पूँजीवादी दुनिया के प्रत्यक्ष और खुफिया हमलों, साज़िशों, घेरेबन्दी और फासिस्टों के हमले को नाकाम करते हुए पहले समाजवादी राज्य का निर्माण करने वाले थे जोसेफ स्तालिन। स्तालिन शब्द का मतलब होता है इस्पात का इन्सान - और स्तालिन सचमुच एक फौलादी इन्सान थे। मेहनतकशों के पहले राज्य को नेस्तनाबूद कर देने की पूँजीवादी लुटेरों की हर कोशिश को धूल चटाते हुए स्तालिन ने एक फौलादी दीवार की तरह उसकी रक्षा की, उसे विकसित किया और उसे दुनिया के सबसे समृद्ध और ताकतवर समाजों की कतार में ला खड़ा किया। उन्होंने साबित कर दिखाया कि मेहनतकश जनता अपने बलबूते पर एक नया समाज बना सकती है और विकास के ऐसे कीर्तिमान रच सकती है जिन्हें देखकर पूरी दुनिया दाँतों तले उँगली दबा ले। उनके प्रेरक नेतृत्व और कुशल सेनापतित्व में सोवियत जनता ने हिटलर की फासिस्ट फौजों को मटियामेट करके दुनिया को फासीवाद के कहर से बचाया।    आगे पढ़ें   


कम्युनिस्ट जीवनशैली के बारे में माओ त्से-तुघ के कुछ उद्धरण     पढ़ें   


लुधियाना की सड़कों पर हज़ारों मज़दूरों के गुस्से का लावा फूटा - रोज़-रोज़ के शोषण, अपमान और उत्पीड़न के विरुद्ध लाखों प्रवासी मज़दूरों में बरसों से असन्तोष सुलग रहा है 

मज़दूरों का अपने साथ हुए अन्याय के ख़िलाफ गुस्सा पूरी तरह जायज़ था, लेकिन मज़दूरों का विरोध प्रदर्शन पूरी तरह स्वयंस्फूर्त था, जिसमें जनवादी और क्रान्तिकारी नेतृत्व का अभाव था, और क्षेत्रीय राजनीति करने वालों और आवारा तत्वों की घुसपैठ थी। इसलिए मज़दूरों का यह विरोध-प्रदर्शन कुचला जाना तय था। लेकिन मज़दूरों के इस विरोध-प्रदर्शन ने दिखा दिया कि जब मज़दूर एकजुट होकर शोषकों का सामना करते हैं तो किस तरह सत्ताधारियों के हथियारबन्द दस्तों को भी दाँतों तले उँगलियाँ दबानी पड़ती हैं।    आगे पढ़ें   

Subpages (15): एम आर डाइंग हादसा कम्‍युनिस्‍ट जीवनशैली के बारे में माओ कॉमनवेल्‍थ गेम्‍स के लिए सजती दिल्‍ली में - उजड़ती गरीबों की बस्तियां क्रांतिकारी चीन ने प्रदूषण की समस्‍या का मुकाबला कैसे किया गोरखपुर मजदूर आंदोलन को आम नागरिकों का समर्थन गोरखपुर में अडि़यल मालिकों के खिलाफ जोसेफ स्‍तालिन - क्रांति और प्रतिक्रांति के बीच की रेखा फासीवाद क्‍या है और इससे कैसे लड़ें (छठी किश्‍त) बोलते आंकड़े चीखती सच्‍चाइयां मालिकों के मुनाफे की हवस का शिकार - एक और मजदूर यह महंगाई गरीबों के जीने के अधिकार लिब्रहान रिपोर्ट - जिसके तवे पर सबकी रोटी सिंक रही हैं लुधियाना की सड़कों पर हजारों मजदूरों के गुस्‍से का लावा शांति काल में पूंजी के हाथों संसदीय वामपंथियों के राज में
Ċ
bigul akhbar,
20 Dec 2009, 08:49
Comments