अगस्‍त 2009


नया अंक

अगस्‍त 2009



बेहिसाब महँगाई से ग़रीबों की भारी आबादी के लिए जीने का संकट
इस महँगाई के कारण प्राकृतिक नहीं, यह मुनाफाखोरी की हवस और सरकारी नीतियों का नतीजा है!


''अतुलनीय भारत'' : जहाँ हर चौथा आदमी भूखा है!

मज़दूर वर्ग के हक में

एक मज़दूर की अन्तरात्मा की आवाज़

बोलते ऑंकड़े चीखती सच्चाइयाँ

नारकीय हालात में रहते और काम करते हैं दिल्ली मेट्रो के निर्माण कार्यों में लगे हज़ारों मज़दूर
'मेट्रो कामगार संघर्ष समिति' के सदस्य पर
मेट्रो प्रशासन-ठेका कम्पनी का जानलेवा हमला
मेट्रो कामगार संघर्ष समिति का जन्तर-मन्तर पर प्रदर्शन


अमानवीय शोषण-उत्‍पीड़न के शिकार तमिलनाडू के भट्ठा मज़दूर

बेहिसाब महँगाई से ग़रीबों की भारी आबादी के लिए जीने का संकट 
इस महँगाई के कारण प्राकृतिक नहीं, यह मुनाफाखोरी की हवस और सरकारी नीतियों का नतीजा है!

यूपीए सरकार के सौ दिन के एजेण्डे में कही गयी बड़ी-बड़ी बातें बेहिसाब महँगाई के बवण्डर में उड़ गयी हैं। दालों, सब्जियों, चीनी, तेल, मसाले, फल आदि की आसमान छूती कीमतों ने ग़रीबों ही नहीं, निम्न मध्‍यवर्ग तक के सामने पेट भरने का संकट पैदा कर दिया है। देश के सवा सौ जिलों में सूखे के कारण बहुत बड़ी आबादी के सामने तो भुखमरी के हालात पैदा हो गये हैं। यह हालत केवल बारिश न होने के कारण नहीं हुई है जैसा कि सरकार बार-बार बताने की कोशिश कर रही है। इसके लिए व्यापारियों की मुनाफाखोरी की हवस और उसे शह देने वाली सरकारी नीतियाँ ज़िम्मेदार हैं।  आगे पढ़ें    

''अतुलनीय भारत'' : जहाँ हर चौथा आदमी भूखा है!

पिछले विधानसभा चुनाव में बहुमत हासिल कर दोबारा सत्ता पर काबिज होने वाले मध्‍य प्रदेश के भाजपाई मुख्यमन्त्री शिवराज सिंह चौहान और उनके प्रदेश की झोली में कुछ और तमगे आ गिरे हैं। एक गैर सरकारी संगठन की रिपोर्ट के मुताबिक इस वर्ष मई के महीने के बाद से मध्‍य प्रदेश के कम से कम चार जिलों में छह वर्ष से कम उम्र के 450 बच्चों की कुपोषण से मौत हो गई है। राष्ट्रीय पारिवारिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण-तीन की रिपोर्ट के अनुसार म.प्र. में कुपोषण 54 प्रतिशत से बढ़कर 60 प्रतिशत हो गया है जिसका मतलर्ब यह है कि मप्र के बच्चे भारत के सबसे कुपोषित बच्चे बन गए हैं। लेकिन बात यहीं खत्म नहीं हो जाती। शिशु मृत्यु दर के मामले मे भी मध्‍य प्रदेश भारत का अव्वल राज्य है जहाँ ज़िन्दा पैदा होने वाले हर 1000 बच्चों में से 72 की पैदा होते ही मौत हो जाती है (नमूना पंजीकरण सर्वेक्षण् 2007-08)।   आगे पढ़ें    

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नारकीय हालात में रहते और काम करते हैं दिल्ली मेट्रो के निर्माण कार्यों में लगे हज़ारों मज़दूर

'मेट्रो कामगार संघर्ष समिति' के सदस्य पर मेट्रो प्रशासन-ठेका कम्पनी का जानलेवा हमला 
मेट्रो कामगार संघर्ष समिति का जन्तर-मन्तर पर प्रदर्शन 

दिल्ली मेट्रो में कार्यरत मज़दूरों की जीवन-स्थिति यह सोचने के लिए मजबूर कर रही है कि आज़ादी के 63 साल बाद भी क्या सचमुच देश की मेहनतकश आबादी आज़ाद है? और आज़ादी का उसके लिए क्या बस यही मतलब है भी कि हर रोज़ 10-12 घण्टे मौत के कुएँ में ऐसा खेल खेले जहाँ ज़िन्दा बचे तो पगार मिल जायेगी, और अगर मर गये तो न इन्साफ मिलेगा न परिवार को रोटी। 12 जुलाई 2009 को दिल्ली के जमरूदपुर मेट्रो हादसे की घटना इसी का एक और प्रमाण है जिसमें 6 मज़दूरों की मौत हो गयी और 20 से 25 मज़दूर गम्भीर रूप से घायल हो गये। इस घटना के बाद डीएमआरसी और सरकार द्वारा खेले गये ड्रामे और किए गए वादों और दावों के बाद भी काम पुराने ढंग-ढर्रे पर ही हो रहा है। हज़ारों मज़दूरों की ज़िन्दगियों को दाँव पर लगाकर दिल्ली मेट्रो का निर्माण कार्य बदस्तूर चल रहा है। वैसे देश में रोज़ाना तकरीबन 1,000 मज़दूरों की मौत काम के दौरान हो जाती है। इन मौतों के ज़िम्मेदार दोषियों को न तो सज़ा मिलती है, न गिरफ्तारी होती है और न ही मज़दूरों को कभी इन्साफ मिल पाता है।   आगे पढ़ें   

रामचरस को इन्साफ कब मिलेगा

रामचरस लगभग 20 वर्ष पहले रोजी-रोटी की तलाश में लुधियाना आया। उत्तार प्रदेश के सन्त कबीर नगर ज़िले के रहने वाले रामचरस की पृष्ठभूमि किसानी से जुड़ी है। थोड़ी बहुत ज़मीन होने के कारण घर का गुज़ारा मुश्किल से चलता था। इसलिए रामचरस की पढ़ाई नहीं हो सकी। जवान होने पर बाकी भाइयों की शादी हो गयी तो थोड़ी सी पुश्तैनी ज़मीन की खेती से सबका गुज़ारा हो पाना कठिन हो गया। इसलिए 18-19 वर्ष की उम्र में ही रामचरस को घर छोड़कर लुधियाना में काम की तलाश में आना पड़ा। यहीं उसके दो भाई रेहड़ी लगाते थे।   आगे पढ़ें   

छँटनी के ख़िलाफ कोरिया के मजदूरों का बहादुराना संघर्ष

मन्दी के दौर में दुनिया भर में छँटनी-तालाबन्दी का दौर जारी है। लेकिन मज़दूर भी चुपचाप इसे झेल नहीं रहे हैं। जगह-जगह वे इसके ख़िलाफ जुझारू तरीके से लड़ रहे हैं। कई देशों में मज़दूरों ने छँटनी के विरोध् में फैक्ट्री पर ही कब्ज़ा कर लिया और पुलिस तथ सशस्त्र बलों से जमकर टक्कर ली। इसी कड़ी में पिछले दिनों कोरिया की एक ऑटोमोबाइल कंपनी द्वारा नौकरी से निकाले जाने पर उसके मजदूरों ने फैक्ट्री पर कब्जा कर लिया और 77 दिनों तक सशस्त्र बलों का डटकर सामना किया। 6 अगस्त 2009 को दक्षिणी कोरिया की स्यांगयोंग मोटर कम्पनी में 77 दिनों तक चले संघर्ष के बाद मजदूर एक समझौते के तहत बाहर आये। सरकार की पूरी ताकत का उन्होंने मुकाबला किया और उसे समझौते के लिए बाध्‍य किया।   आगे पढ़ें   

फासीवाद क्या है और इससे कैसे लड़ें? (तीसरी किश्त)

इटली में फासीवाद 
इटली में फासीवाद की हमारी चर्चा के इतना विस्तृत होने की कोई आवश्यकता नहीं है। हम यहाँ उन कारकों की चर्चा करेंगे जिनके मामले में इटली में फासीवादी उभार जर्मनी से अलग था। इटली में फासीवादी आन्दोलन की शुरुआत 1919 में हुई। युद्ध की समाप्ति के बाद इटली के मिलान शहर में बेनिटो मुसोलिनी ने फासीवादी आन्दोलन की शुरुआत करते हुए एक सभा बुलायी। इस सभा में कुल जमा करीब 100 लोग इकट्ठा हुए। इसमें से अधिकांश युद्ध में भाग लेने वाले नौजवान सिपाही थे। पहले विश्वयुद्ध में मित्र राष्ट्रों की तरफ से युद्ध में हिस्सा लेने के बावजूद इटली को उसका उचित पुरस्कार नहीं मिला जबकि युद्ध में उसे काफी क्षति उठानी पड़ी थी। इससे पूरे देश में एक प्रतिक्रिया का माहौल था, ख़ासकर सैनिकों के बीच। दूसरी तरफ, देश की आर्थिक स्थिति बुरी तरह से डावाँडोल थी। सरकार एकदम अप्रभावी और कमज़ोर थी और कोई भी कदम नहीं उठा पा रही थी। एक ऐसे समय में मुसोलिनी ने फासीवादी आन्दोलन की शुरुआत की। 
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अदम्य बोल्शेविक - नताशा : एक स्त्री मज़दूर संगठनकर्ता की संक्षिप्त जीवनी (आठवीं किश्त)   पढ़ें  

कान्ति मोहन - मज़दूर एकता   पढ़ें   

गोरखपुर में मज़दूरों की बढती एकजुटता और संघर्ष से मालिक घबराये : बरगदवा क्षेत्र में फिर से मज़दूर आन्दोलन की राह पर

गोरखपुर में पिछले दिनों तीन कारखाने के मज़दूरों के जुझारू संघर्ष की जीत से उत्‍साहित होकर बरगदवा इलाके के दो और कारखानों के मजदूर भी आन्‍दोलन की राह पर उतर पड़े हैं। इलाके के कुछ अन्‍य कारखानों में भी मजदूर संघर्ष के लिए कमर कस रहे हैं। 
वर्षों से बुरी तरह शोषण के शिकार, तमाम अध्किरों से वंचित और अंसगठित बरगदवा क्षेत्र के हज़ारों मज़दूरों में अपने साथी मज़दूरों के सफल आन्दोलन ने उम्मीद की एक लौ जगा दी है।
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