नया अंक

यूपीए सरकार का नया एजेण्डा : अब बेरोकटोक लागू होंगी पूँजीवादी विकास की नीतियाँ - जनता के गुस्से की ऑंच पर पानी के छींटे डालते हुए देशी-विदेशी पूँजीपतियों की लूट को और मुकम्मल बनाने की तैयारी

पूँजीवादी लोकतंत्र में ''बहुमत'' की असलियत : महज़ 12 प्रतिशत लोगों के प्रतिनिधि हैं देश के नये सांसद

जानवरों जैसा सलूक किया जाता है मज़दूरों के साथ

बादली औद्योगिक क्षेत्र की हत्यारी फैक्टरियाँ

बोलते ऑंकड़े चीख़ती सच्चाइयाँ

20 रुपये रोज़ पर गुज़ारा करने वाले 84 करोड़ लोगों के देश में 300 सांसद करोड़पति

लुधियाना के टेक्सटाइल मज़दूरों का संघर्ष रंग लाया

स्विस बैंकों में जमा 72 लाख करोड़ की काली कमाई पूँजीवादी लूट के सागर में तैरते हिमखण्ड का ऊपरी सिरा भर है

पूँजीपति वर्ग के पास आर्थिक संकट को रोकने का एक ही तरीका है - और भी व्यापक और विनाशकारी संकटों के लिए पथ प्रशस्त करना और इन संकटों को रोकने के साधनों को घटाते जाना!

फासीवाद क्या है और इससे कैसे लड़ें

चीन के नये पूँजीवादी शासकों के ख़िलाफ 4 जून, 1989 को त्येनआनमेन पर हुए जनविद्रोह के बर्बर दमन की 20वीं बरसी पर : कभी चैन की नींद नहीं सो सकेंगे पूँजीवादी पथगामी...

अदम्य बोल्शेविक - नताशा : एक स्त्री मज़दूर संगठनकर्ता की संक्षिप्त जीवनी (छठी किश्त)

नेपाली क्रान्ति किस ओर? नयी परिस्थितियाँ और पुराने सवाल

तस्‍वीर बदल दो दुनिया की

बेर्टोल्‍ट ब्रेष्‍ट की कविता

यूपीए सरकार का नया एजेण्डा

अब बेरोकटोक लागू होंगी पूँजीवादी विकास की नीतियाँ

जनता के गुस्से की ऑंच पर पानी के छींटे डालते हुए देशी-विदेशी पूँजीपतियों की लूट को और मुकम्मल बनाने की तैयारी

कांग्रेस के नेतृत्व में यूपीए गठबन्‍धन की जीत से देश के सारे पूँजीपति खुशी से फूले नहीं समा रहे हैं। शेयर बाज़ार का पारा चढ़ता जा रहा है। देश-विदेश का पूँजीवादी मीडिया बधाइयाँ गाते थक नहीं रहा है। उनके खुश होने की वजह ज़ाहिर है। आख़िर कांग्रेस भारतीय पूँजीपति वर्ग की सबसे पुरानी भरोसेमन्द पार्टी है। आज के दौर में बुर्जुआ वर्ग की मैनेजिंग कमेटी का काम इससे अच्छी तरह कौन-सी पार्टी कर सकती है! देशी-विदेशी पूँजीपतियों के सभी प्रवक्ता लगातार कह रहे हैं कि अब नयी सरकार को आर्थिक ''सुधारों'' की गति को ज्यादा तेज़ी से आगे बढ़ाना चाहिए।.......आगे पढ़ें


पूँजीवादी लोकतंत्र में ''बहुमत'' की असलियत : महज़ 12 प्रतिशत लोगों के प्रतिनिधि हैं देश के नये सांसद

बार-बार यह साबित हो चुका है कि पूंजीवादी जनतंत्र, पूंजीपतियों की मैनेजिंग कमेटी के सिवाय कुछ नहीं होता। इसमें हर पाँच साल बाद लोकतंत्र का फूहड़-नंगा खेल खेला जाता है, जिसमें यह फैसला होता है कि अगले पाँच साल तक मेहनतकश जनता के शोषण का अधिकार किस दल को मिलेगा और कौन-सा दल मालिकों के हित में तमाम नीतियों-काले कानूनों को लागू करेगा। उस पर तुर्रा यह कि इसे अल्पमत पर बहुमत के शासन के रूप में प्रचारित किया जाता है। लेकिन वास्तव में, यह बहुमत पर अल्पमत का शासन होता है और पूँजीपति और उनके पत्तलचाटू बुद्धिजीवी, अखबार, नेता-अभिनेता हमारे इसी ''महान लोकतंत्र'' की दुहाई देते नहीं थकते। मतदाताओं को वोट देने के लिए मनाने के तमाम प्रचार के बावजूद देश के आम चुनावों में वोटों का प्रतिशत बढ़ना तो दूर कम ही हो रहा है। इस बार कुल लगभग 59 प्रतिशत मतदाताओं ने वोट डाला। वोट किस तरह पड़ते हैं इसे बताने की ज़रूरत नहीं।.......आगे पढ़ें

जानवरों जैसा सलूक किया जाता है मज़दूरों के साथ

पिछले तीन बार से बिगुल पढ़ रहा हूँ। पहली बार यह मुझे नारा लगाकर भाषण देते और बिगुल बेच रहे कार्यकर्ताओं से मिला था। उनकी बातें सुनकर ही मैंने बिगुल ख़रीदा और मई दिवस का अंक पढ़कर सोच लिया था कि बिगुल को चिट्ठी लिखूँगा। बिगुल के उन कार्यकर्ताओं ने भी मुझे कहा था कि चिट्ठी लिखना। मैं मज़दूरों को रोज़-रोज़ जिस तरह अपमानित होना पड़ता है, उस पर लिखना चाहता हूँ, लेकिन पहले मैं अपने बारे में थोड़ा-सा बताता हूँ।.......आगे पढ़ें


बादली औद्योगिक क्षेत्र की हत्यारी फैक्टरियाँ

पिछले महीने 2 मई को बादली औद्योगिक क्षेत्र के फेस 1 की एस-59 स्थित फैक्‍टरी में पत्‍ती लगने से मुकेश नामक एक मज़दूर की दर्दनाक मौत हो गयी। फैक्टरी के मालिक ने पुलिस-प्रशासन से मिलीभगत करके मामले की लीपापोती कर दी। जब 'नौजवान भारत सभा' तथा 'बिगुल मज़दूर दस्ता' के कार्यकर्ताओं ने इस घटना के ख़िलाफ पर्चा निकालकर मज़दूरों के बीच प्रचार किया तो स्थानीय विधायक देवेन्द्र यादव के कार्यालय से धमकी भरे फोन आने लगे। 28 मई को भी न्यू लाइन बिल्डकप प्राइवेट लिमिटेड, एस-99, फेस 1, बादली औद्योगिक क्षेत्र में बिजली लगने से रामप्रसाद सिंह नामक मज़दूर की घटनास्थल पर ही मौत हो गयी तथा तीन अन्य मज़दूर झुलस गये। इस घटना में भी वही कहानी दुहरायी गयी, पुलिस-प्रशासन की मदद से मामले की लीपापोती कर दी गयी।.......आगे पढ़ें

बोलते ऑंकड़े चीख़ती सच्चाइयाँ .......आगे पढ़ें


20 रुपये रोज़ पर गुज़ारा करने वाले 84 करोड़ लोगों के देश में 300 सांसद करोड़पति

पूँजीवादी समाज में जनतन्त्र का सिर्फ ढोंग ही होता है। यहाँ जनतन्त्र अमीरों के लिए होता है न कि ग़रीब मेहनतकश जनता के लिए। इतिहास बार-बार इस बात की पुष्टि करता रहा है। हमारे देश की 15वीं लोकसभा के नतीजों से इस बार यह बात और भी ज़ोरदार ढंग से उभरकर सामने आयी है। कांग्रेस की अगुवाई में यूपीए गठबन्‍धन ने भले ही आसानी से सरकार बना ली होगी, लेकिन कोई भी गठबन्‍धन या पार्टी स्पष्ट बहुमत हासिल नहीं कर पाया था। लेकिन संसद में अब करोड़पतियों को स्पष्ट बहुमत हासिल हुआ है। जी हाँ, संसद में इस बार 542 में से 300 करोड़पति सांसद हैं। जिस देश की 84 करोड़ जनता का गुज़ारा रोज़ाना महज़ 20 रुपये प्रति व्यक्ति से भी कम पर होता है, जहाँ लोग भूख-प्यास से मर रहे हों, बीमारियों में जकड़े बिना इलाज के तड़प रहे हों, बच्चे शिक्षा से वंचित हों और उन्हें भी मज़दूरी करके पेट भरना पड़ता हो, मज़दूर बेकारी, तालाबन्दियों-छँटनियों के शिकार हो रहे हों, कर्ज़ में डूबे ग़रीब किसान परिवार समेत आत्महत्याएँ कर रहे हों, जहाँ महिलाएँ गुज़ारे के लिए अपना शरीर तक बेचने को मजबूर हों, उस देश की जनता के साथ इससे बड़ा मज़ाक क्या हो सकता है कि उनके भविष्य का फैसला करने के लिए करोड़पतियों से लेकर खरबपति सिंहासनों पर विराजमान हों।.......आगे पढ़ें

लुधियाना के टैक्सटाइल मज़दूरों का संघर्ष रंग लाया

19 मई को लुधियाना की अमित टैक्सटाइल फैक्टरी में कारीगरों ने एक दिन और रात के लिए काम बन्द कर दिया। मालिक ने मजबूर होकर 50 पैसे प्रति पीस शाल का रेट बढ़ा दिया। पहले 6.50 रुपये मिलता था वह अब 7 रुपये हो गया। पिछले दो वर्ष से रेट नहीं बढ़ा था और महँगाई बढ़ने से कारीगरों को अपना गुज़ारा चलाना मुश्किल हो रहा था। इस बारे में पहले भी मालिक के ध्‍यान में ला दिया गया था, पर कोई भी सुनवाई न होती देख कारीगरों ने काम बन्द कर दिया। अमित टैक्सटाइल नाम से कुल पाँच फैक्टरियाँ हैं जिनके मालिक तीन भाई हैं। जिस फैक्टरी में हड़ताल हुई वह लुधियाना में समराला चौक के पास बेअन्तपुरी मुहल्ले की तीन नम्बर गली में स्थित है। इस फैक्टरी में 22 लूम कारीगर, 7 बाइण्डर, 8 कटाई वाले, 2 नली वैण्डर, 1 ताना मास्टर, हैं। 3 मुनीमों और 1 सफाईकर्मी को मिला कर 43 मज़दूर काम करते हैं। प्रोडक्शन करने वाले मज़दूरों को वेतन पीस रेट के हिसाब से मिलता है। कोई पहचानपत्र, ई.एस.आई. कार्ड, फण्ड-बोनस आदि कुछ नहीं मिलता है। बाकी फैक्टरियों की तरह यहाँ पर भी कोई लेबर कानून लागू नहीं है। शोषण सिर्फ यहीं पर समाप्त नहीं हो जाता।.......आगे पढ़ें


स्विस बैंकों में जमा 72 लाख करोड़ की काली कमाई पूँजीवादी लूट के सागर में तैरते हिमखण्ड का ऊपरी सिरा भर है

बीते आम चुनावों में विदेशों में जमा भारत का 72 लाख करोड़ रुपया जमा होने के खुलासे ने चुनावों पर भले ही कोई असर न डाला हो, लेकिन यह कई पहलुओं को खोलने वाला ऑंकड़ा है। वैसे यह भी जान लेना चाहिए कि यह राशि भले बहुत बड़ी लग रही हो लेकिन असल में यह भारत के धनपतियों के बेहिसाब काले धन का एक छोटा-सा हिस्सा है। लेकिन फिर भी इस छोटी-सी राशि को अगर देश में आम जनता के बुनियादी कामों में लगाने की कल्पना की जाये तो क्या-क्या हो सकता है - इसका एक अनुमान लगाने की कोशिश एक काल्पनिक चार्ट के सहारे की गयी है। (देखें चार्ट) यूँ तो पूँजीवादी अर्थव्यवस्था की नींव ही मेहनत की कानूनी लूट पर खड़ी की जाती है। यानी पूँजीवादी व्यवस्था में मेहनत करने वाले का हिस्सा कानूनन पूँजीपति की तुलना में नगण्य होता है। लेकिन पूँजीपतियों का पेट इस कानूनी लूट से भी नहीं भरता। लिहाज़ा वे पूँजीवाद के स्वाभाविक लक्षण 'भ्रष्टाचार' का सहारा लेकर गैरकानूनी ढंग से भी धन-सम्पदा जमा करते रहते हैं। जनता के लिए सदाचार, ईमानदारी और नैतिकता की दुहाई देकर ख़ुद हर तरह के कदाचार के ज़रिये काले धन के अम्बार और सम्पत्तियों का साम्राज्य खड़ा किया जाता है।.......आगे पढ़ें


पूँजीपति वर्ग के पास आर्थिक संकट को रोकने का एक ही तरीका है - और भी व्यापक और विनाशकारी संकटों के लिए पथ प्रशस्त करना और इन संकटों को रोकने के साधनों को घटाते जाना!

उत्पादन, विनिमय और सम्पत्ति के अपने सम्बन्‍धों के साथ आधुनिक बुर्जुआ समाज, वह समाज, जिसने जैसे तिलिस्म से ऐसे विराट उत्पादन तथा विनिमय साधनों की रचना कर दी है, ऐसे जादूगर की तरह है, जिसने अपने जादू से पाताल लोक की शक्तियों को बुला तो लिया है, पर अब उन्हें वश में रखने में असमर्थ है। पिछले कई दशकों से उद्योग और वाणिज्य का इतिहास सिर्फ आधुनिक उत्पादक शक्तियों की आधुनिक उत्पादन अवस्थाओं के ख़िलाफ, उन सम्पत्ति सम्बन्‍धों के ख़िलाफ विद्रोह का ही इतिहास है, जो बुर्जुआ वर्ग और उसके शासन के अस्तित्व की शर्तें हैं। यहाँ पर वाणिज्यिक संकटों का उल्लेख काफी है, जो अपने नियतकालिक आवर्तन द्वारा समस्त बुर्जुआ समाज के अस्तित्व की हर बार अधिकाधिक सख्त परीक्षा लेते हैं। इन संकटों में न केवल विद्यमान उत्पादों का ही, बल्कि पूर्वसर्जित उत्पादक शक्तियों का भी एक बड़ा भाग समय-समय पर नष्ट हो जाता है।.......आगे पढ़ें


फासीवाद क्या है और इससे कैसे लड़ें

जनवादियों और यहाँ तक कि क्रान्तिकारियों का एक हिस्सा इस बात को लेकर बेहद ख़ुश है कि भारतीय जनता पार्टी के रूप में साम्प्रदायिक फासीवाद की पराजय हुई है और फासीवादी ख़तरा टल गया है। चुनावों के ठीक पहले कई सर्वेक्षण इस बात की ओर इशारा कर रहे थे कि चुनावी नतीजे चौंकाने वाले हो सकते हैं और आडवाणी के नेतृत्व में राष्ट्रीय जनतान्त्रिक गठबन्‍धन को भी विजय हासिल हो सकती है, या कम-से-कम उसे संयुक्त प्रगतिशील गठबन्‍धन के बराबर या उन्नीस-बीस के फर्क से थोड़ी ज्यादा या थोड़ी कम सीटें मिल सकती हैं। चुनाव के नतीजों ने इस बात को ग़लत साबित किया और कांग्रेस के नेतृत्व में संयुक्त प्रगतिशील गठबन्‍धन को विजय प्राप्त हुई। चुनावी नतीजों के हिसाब से चला जाये तो भाजपा को भारी नुकसान उठाना पड़ा है और पराजय के बाद भाजपा में टूट-फूट, बिखराव और आन्तरिक कलह का एक दौर शुरू हो गया है। भाजपा के शीर्ष विचारकों में से एक सुधीन्द्र कुलकर्णी ने हार का ठीकरा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की रणनीति पर फोड़ते हुए काफी हंगामा खड़ा कर दिया। जसवन्त सिंह ने कहा है कि चुनाव में पराजय के कारणों पर भाजपा में खुली बहस होनी चाहिए। भाजपा नेताओं का एक बड़ा हिस्सा भाजपा अध्‍यक्ष राजनाथ सिंह को काफी खरी-खोटी सुना रहा है और राजनाथ सिंह की स्थिति काफी दयनीय हो गयी है।.......आगे पढ़ें

चीन के नये पूँजीवादी शासकों के ख़िलाफ 4 जून, 1989 को त्येनआनमेन पर हुए जनविद्रोह के बर्बर दमन की 20वीं बरसी पर

कभी चैन की नींद नहीं सो सकेंगे पूँजीवादी पथगामी...

सन 1989 के जून महीने की 4 तारीख़ को पूरी दुनिया चीन के बीजिंग शहर में सड़कों पर उतरी आम मेहनतकश जनता और छात्रों के आन्दोलन को संशोधनवादी सेना द्वारा कुचले जाने की गवाह बनी थी। बीजिंग के त्येनआनमेन चौक पर हुए उस बर्बर दमन को पश्चिमी पूँजीवादी मीडिया ने कम्युनिस्टों द्वारा लोकतन्त्र समर्थकों के दमन के रूप में प्रचारित किया और अब तक यही करता रहा है, जबकि वह एक जनविद्रोह था। उसमें माओ की शिक्षाओं को मानने वाले क्रान्तिकारियों के साथ ही वे मज़दूर भी शामिल थे, जो राज्य और पार्टी पर काबिज़ पूँजीवादी पथगामियों की नीतियों के ख़िलाफ सड़कों पर उतरे थे। उनके हाथों में माओ की तस्वीरों वाली तख्तियाँ रहती थीं और ज़बान पर माओ के समर्थन में नारे। इस दमन का शिकार होने वाले हज़ारों लोगों में से अधिकांश वे मज़दूर और छात्र थे, जो माओ के समर्थक और देङपन्थियों के विरोधी थे।.......आगे पढ़ें

अदम्य बोल्शेविक - नताशा : एक स्त्री मज़दूर संगठनकर्ता की संक्षिप्त जीवनी (छठी किश्त) .......आगे पढ़ें

नेपाली क्रान्ति किस ओर? नयी परिस्थितियाँ और पुराने सवाल

नेपाल विगत एक माह से भी अधिक समय से अनिश्चय और उथल-पुथल के भँवर से गुज़र रहा है। प्रधानमन्त्री पद से एकीकृत ने.क.पा. (माओवादी) के अध्‍यक्ष पुष्प कमल दहाल 'प्रचण्ड' के इस्तीफे (4 मई '09) के बाद से ही देशव्यापी बन्द, हड़तालों और प्रदर्शनों के चलते शासन और प्रशासन की मशीनरी लगभग ठप्प है। संकट की शुरुआत तब हुई जब जनता द्वारा चुनी गयी नागरिक सरकार की निरन्तर और जानबूझकर अवमानना के आरोप में प्रधानमन्त्री प्रचण्ड ने सेनाध्‍यक्ष कटवाल को बर्खास्त कर दिया। कटवाल ने प्रधानमन्त्री के इस निर्देश को मानने से इनकार कर दिया। राष्ट्रपति रामबरन यादव ने भी प्रचण्ड के निर्देश को ठुकराते हुए और अन्तरिम संविधान की अवहेलना करते हुए कटवाल से पद पर बने रहने को कहा। फिर इस प्रश्न पर सरकार के दो सहयोगी दलों ने.क.पा. (ए.मा.ले.) मधेसी जनाधिकार मंच ने भी माओवादियों का साथ छोड़ दिया। नतीजतन सरकार अल्पमत में आ गयी और प्रचण्ड को इस्तीफा देना पड़ा। गत 23 मई को 24 में से 21 पार्टियों के समर्थन से माधव कुमार नेपाल के नेतृत्व में नयी सरकार सत्तारूढ़ हुई जिसमें ने.क.पा. (ए.मा.ले.) और नेपाली कांग्रेस मुख्य भागीदार हैं। नयी सरकार को समर्थन के मसले पर मधेसी जनाधिकार मंच दोफाड़ हो चुका है। विजय कुमार गच्छेदार गुट सरकार में शामिल है और गच्छेदार एक उपप्रधानमन्त्री हैं जबकि उपेन्द्र यादव के नेतृत्व वाला गुट विपक्ष में है।.......आगे पढ़ें
Comments