नया अंक

जुलाई 2009

यूपीए सरकार के पहले बजट का मकसद : ग़रीबों को राहत योजनाओं के हवाई गुब्बारे थमाकर पूँजीपतियों की लूट के मुकम्मल इन्तजाम!!

गोरखपुर में तीन कारखानों के मजदूरों के एकजुट संघर्ष की शानदार जीत - ී;बिगुलී; से जुड़े मजदूर कार्यकर्ताओं पर कातिलाना हमला मालिकान को महँगा पड़ा

पाँच साल में शहरों को झुग्गी-मुक्त करने के दावे की असलियत

लिब्रहान रिपोर्ट - फिर दफनाये जाने के लिए पेश की गयी एक और रिपोर्ट

भटिण्डा में पंजाब पुलिस द्वारा मजदूरों का बर्बर दमन

दिल्ली मेट्रो की दुर्घटना में मजदूरों की मौत का जिम्मेदार कौन? - डी.एम.आर.सी. और सरकार की हत्यारी नीतियाँ और ठेका कम्पनी की मुनाफाखोर हवस

कॉमरेड हरभजन सिंह सोही को क्रान्तिकारी श्रद्धांजलि

ग्लोबल सिटी दिल्ली में बच्चों की मृत्यु दर दोगुनी हो गयी है!

वैश्विक वित्तीय संकट का नया ී;तोहफाී; - ग़रीबी, बेरोजगारी के साथ बाल मजदूरी में भी इजाफा

फासीवाद क्या है और इससे कैसे लड़ें? (दूसरी किश्त)

हड़तालों के विषय में -लेनिन

अदम्य बोल्शेविक - नताशा : एक स्त्री मजदूर संगठनकर्ता की संक्षिप्त जीवनी (सातवीं किश्त)


गोरख पाण्डेय की कविता - कानून


यूपीए सरकार के पहले बजट का मकसद 

 ग़रीबों को राहत योजनाओं के हवाई गुब्बारे थमाकर पूँजीपतियों की लूट के मुकम्मल इन्तजाम!!

यूपीए सरकार का पहला बजट वैसा ही था जैसी इस सरकार से उम्मीद थी - यानी ''आम आदमी'' को राहत देने के लिए कुछ लोक-लुभावन घोषणाएँ और वास्तव में पूँजीपतियों की लूट को फायदा पहुँचाने के पुख्ता इन्तजाम करना। वैसे सच तो यह है कि आजकल अर्थव्यवस्था को चलाने वाले ज्यादातर बड़े फैसले तो बजट के आगे-पीछे लिये जाते हैं, फिर भी इस बजट ने सरकार की मंशा तो जाहिर कर ही दी है। जिस ग्रामीण रोजगार योजना को लेकर सरकार बड़े-बड़े दावे कर रही है उसके बजट में वास्तव में केवल 6.5 प्रतिशत की ही बढ़ोत्तरी की गई है।    आगे पढ़ें   

गोरखपुर में तीन कारखानों के मजदूरों के एकजुट संघर्ष की शानदार जीत - 'बिगुल' से जुड़े मजदूर कार्यकर्ताओं पर कातिलाना हमला मालिकान को महँगा पड़ा

    गोरखपुर के तीन कारखानों के मजदूरों ने अपने एकजुट संघर्ष से मालिकों को झुकाकर अपनी सभी प्रमुख माँगें मनवाकर एक शानदार जीत हासिल की है। अंकुर उद्योग लि. की धागा मिल, वी.एन. डायर्स एण्ड प्रोसेसर्स की धागा मिल और इसी की कपड़ा मिल के करीब बारह सौ मजदूरों की इस जीत का महत्‍व इसलिए और भी ज्यादा है क्योंकि यह ऐसे समय में हासिल हुई है, जब मजदूरों को लगातार पीछे धकेला जा रहा है और ज्यादातर जगहों पर उन्हें हार का सामना करना पड़ रहा है।    आगे पढ़ें   

पाँच साल में शहरों को झुग्गी-मुक्त करने के दावे की असलियत

    यूपीए सरकार ने बड़े जोर-शोर से दावा किया है कि पाँच साल में देश के शहरों को झुग्गियों से मुक्त कर दिया जायेगा। वैसे तो एक तरह से शहरों में अमीरों और उच्च मध्‍यवर्ग के लोगों वाले इलाकों को ''झुग्गी-मुक्त'' करने का अभियान लगातार बेरोकटोक चलता ही रहता है। झुग्गी बस्तियों पर बुलडोजर चलाने से लेकर उन्हें आग लगवाकर जगहें खाली कराना और गरीबों को उठाकर शहरों के बाहर दूर-दराज इलाकों में फेंक देने का काम साल भर चलता रहता है। लेकिन अब सरकार कह रही है कि नये तरीके से शहरों को झुग्गी-मुक्त किया जायेगा यानी ग़रीबों को पक्के मकान बनाकर दिये जायेंगे।    आगे पढ़ें   

लिब्रहान रिपोर्ट - फिर दफनाये जाने के लिए पेश की गयी एक और रिपोर्ट

    भारत एक ऐसा देश है, जहाँ अनेक राष्ट्रीयताओं, जातियों और धर्मों के लोग रहते हैं। भारतीय जनता की यह राष्ट्रीयता, जाति और धार्मिक विभिन्नता इस देश के लुटेरे हुक्मरानों द्वारा, यहाँ की जनता की एकता तोड़ने के लिए एक हथियार की तरह हमेशा इस्तेमाल की जाती रही है। हमारे हुक्मरानों ने यह ख़ूबी, फिरंगियों से विरासत में हासिल की है, जिन्होंने 'बाँटो और राज करो' की रणनीति के तहत लगभग 100 वर्ष से भी अधिक समय तक देश को ग़ुलाम बनाये रखा।    आगे पढ़ें   

भटिण्डा में पंजाब पुलिस द्वारा मजदूरों का बर्बर दमन

भटिण्डा (पंजाब) के नजदीक गाँव फुल्लो खारी में सरकार (एच.पी.सी.एल.) और मित्तल एनर्जी इंवेस्टमेण्ट प्राइवेट लिमिटेड, सिंघापुर के साझे सहयोग वाले गुरु गोबिन्द सिंह तेल शोधक कारखाने के निर्माण का काम चल रहा है। यहाँ लगभग 15000 मजदूर काम करते हैं। अधिकतर मजदूर बाहरी राज्यों - उत्तर प्रदेश, बिहार आदि से आये हुए हैं। यहाँ काम कर रहे मजदूर ठेका कम्पनी केजेस्ट्राय प्राइवेट लिमिटेड की तरफ से भरती हैं। इस तरह मजदूरों के काम के हालात और सुरक्षा के मामले में कम्पनी अपनी कोई जिम्मेदारी नहीं समझती।    आगे पढ़ें   

दिल्ली मेट्रो की दुर्घटना में मजदूरों की मौत का जिम्मेदार कौन?

डी.एम.आर.सी. और सरकार की हत्यारी नीतियाँ और ठेका कम्पनी की मुनाफाखोर हवस

    पिछली 12 जुलाई की सुबह दिल्ली के जमरूदपुर इलाके में मेट्रो रेल का बन रहा पुल गिर जाने से 6 मजदूरों की मौत हो गयी और करीब 20 से 25 मजदूर घायल हो गये जिनमें से कुछ की हालत गम्भीर है। उस जगह पर काम करने वाले मजदूरों और उनके सुपरवाइजर ने मेट्रो प्रशासन और ठेका कम्पनी गैमन को बहुत पहले ही बता दिया था कि इस जगह पर काम करना खतरे से खाली नहीं है।    आगे पढ़ें   

कॉमरेड हरभजन सिंह सोही को क्रान्तिकारी श्रद्धांजलि

    देश के कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी आन्दोलन की एक अजीम हस्ती कॉमरेड हरभजन सिंह सोही अब हमारे बीच नहीं रहे। इस देश के कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी हलकों में कॉमरेड हरभजन का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं है। देश के कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी आन्दोलन ने जिन चन्द एक बेहद मेधावी नेताओं को जन्म दिया है, उनमें से एक थे कॉमरेड हरभजन। 16 जून 2009 की सुबह कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी आन्दोलन के लिए एक सदमा लेकर आयी।    आगे पढ़ें   

ग्लोबल सिटी दिल्ली में बच्चों की मृत्यु दर दोगुनी हो गयी है!

    दिल्ली को तेजी से आगे बढ़ते भारत की प्रतिनिधि तस्वीर बताया जाता है। वर्ष 2010 में पूरी दुनिया के सामने कॉमनवेल्थ खेलों के जरिये हिन्दुस्तान की तरक्की के प्रदर्शन की तैयारी भी जोर-शोर से चल रही है। दिल्ली को ग्लोबल सिटी बनाने के लिए जहाँ दिल्ली मेट्रो चलायी गयी है, वहीं सड़कों-लाइटों से लेकर आलीशान खेल परिसर और स्टेडियमों तक हर चीज का कायापलट करने की कवायद भी चल रही है।    आगे पढ़ें   

वैश्विक वित्तीय संकट का नया 'तोहफा' - ग़रीबी, बेरोजगारी के साथ बाल मजदूरी में भी इजाफा

    अन्तरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आई.एल.ओ.) द्वारा हाल ही में जारी रिपोर्ट ''लड़कियों को एक मौका दो : बाल मजदूरी की रोकथाम - भविष्य की कुंजी'' (गिव गर्ल्स ए चांस : टैकलिंग चाइल्ड लेबर - ए की टू द फ्यूचर) के मुताबिक वैश्विक वित्तीय संकट ज्यादा से ज्यादा बच्चों को विशेषकर लड़कियों को बाल मजदूरी की ओर धकेल रहा है। 12 जून को बाल श्रम के ख़िलाफ अन्तरराष्ट्रीय दिवस के उपलक्ष्य में विश्व पूँजीवादी व्यवस्था के शीर्षस्थ संस्थानों में से एक आई.एल.ओ. ने ख़ुद इस तथ्य का खुलासा किया।    आगे पढ़ें   

फासीवाद क्या है और इससे कैसे लड़ें? (दूसरी किश्त)

    अब तक हमने उन आर्थिक प्रक्रियाओं के बारे में पढ़ा जिनके नतीजे के तौर पर वे स्थितियाँ पैदा होती हैं जो फासीवाद को भी जन्म दे सकती हैं। कोई जरूरी नहीं है कि ये आर्थिक परिस्थितियाँ अनिवार्य रूप से फासीवाद को जन्म दें। फासीवाद के उभार को रोका जा सकता है या नहीं, यह काफी कुछ इस बात पर निर्भर करता है कि संकटपूर्ण परिस्थिति का कोई क्रान्तिकारी विकल्प मौजूद है या नहीं।    आगे पढ़ें   

हड़तालों के विषय में

    इधर कुछ वर्षों से रूस में मजदूरों की हड़तालें बारम्बार हो रही हैं। एक भी ऐसी औद्योगिक गुबेर्निया नहीं है, जहाँ कई हड़तालें न हुई हों। और बड़े शहरों में तो हड़तालें कभी रुकती ही नहीं। इसलिए यह बोधगम्य बात है कि वर्ग-सचेत मजदूर तथा समाजवादी हड़तालों के महत्‍व, उन्हें संचालित करने की विधियों तथा उनमें भाग लेने वाले समाजवादियों के कार्यभारों के प्रश्न में अधिकाधिक सतत रूप में दिलचस्पी लेते हैं। हम यहाँ इन प्रश्नों के विषय में अपने विचारों की रूपरेखा प्रस्तुत करने का प्रयत्न करेंगे।    आगे पढ़ें   

अदम्य बोल्शेविक - नताशा : एक स्त्री मजदूर संगठनकर्ता की संक्षिप्त जीवनी (सातवीं किश्त)    पढ़ें   

गोरख पाण्डेय की कविता - कानून    पढ़ें   

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