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नया अंक

जनवरी 2011



21वीं सदी के पहले दशक का समापन : मजदूर वर्ग के लिए आशाओं के उद्गम और चुनौतियों के स्रोत

राजधानी की चमकती इमारतों के निर्माण में ठेका मजदूरों का नंगा शोषण : ऐसे में बेमानी हैं कानून और संविधान की बातें...

यह कमरतोड़ महँगाई क़ुदरत की नहीं बल्कि पूँजीवादी व्यवस्था की देन है : ''महँगाई डायन'' का इलाज पूँजीवादी ओझाओं के पास है ही नहीं

आपने ठीक फ़रमाया मुख्यमन्त्री महोदय, बाल मजदूरी को आप नहीं रोक सकते!

उन्हें स्त्रियों की अस्मिता या जिन्दगी से ज्यादा प्यारा है मुनाफा! : देश की राजधानी में कामगार महिलाएँ सुरक्षित नहीं

कैसा है यह लोकतन्त्र और यह संविधान किनकी सेवा करता है? (छठी किस्त)

त्रिपुर (तमिलनाडु) के मजदूर आत्महत्या पर मजबूर : मजदूरों को संगठित संघर्ष की राह अपनानी होगी

माइक्रो फ़ाइनेंस : महाजनी का पूँजीवादी अवतार

हैरिंग इण्डिया में मजदूरों का शानदार संघर्ष और अर्थवादी सीटू का विश्वासघात

एलाइड निप्पोन में सीटू की ग़द्दारी के कारण आन्दोलन दमन का शिकार और मजदूर निराश

माँगपत्रक शिक्षणमाला - 3 :: ठेका प्रथा के ख़ात्मे की माँग पूँजीवाद की एक आम प्रवृत्ति पर चोट करती है

झिलमिल और बादली औद्योगिक क्षेत्र में माँगपत्रक आन्दोलन का सघन प्रचार अभियान

न्यूनतम मजदूरी और बुनियादी अधिकारों के लिए बंगलादेश के टेक्सटाइल मजदूरों का आन्दोलन : ट्रेड यूनियनों की ग़द्दारी, मजदूरों के हक़ की नहीं मालिकों के मुनाफ़े की चिन्ता

पूँजीवादी गणतन्त्र में कौन बच्चा और कौन पिता! : आजाद-पाण्डेय के एनकाण्टर पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी

सीटू की गद्दारी से आई.ई.डी. के मजदूरों की हड़ताल नाकामयाब : मजदूरों को कानूनी विभ्रमों और विजातीय प्रवृत्तियों से छुटकारा पाना होगा

21वीं सदी के पहले दशक का समापन : मजदूर वर्ग के लिए आशाओं के उद्गम और चुनौतियों के स्रोत
वर्ष 2010 के बीतने के साथ 21वीं सदी का पहला दशक बीत गया। यह दशक पूरी दुनिया में उथल-पुथल के दशक के तौर पर याद किया जायेगा। इसके पहले ही वर्ष में साम्राज्यवादी अमेरिका ने अपनी डगमगाती आर्थिक नैया को बचाने के लिए आतंकवाद के सफाये के नाम पर एक विनाशकारी युध्द दुनिया पर थोप डाला जिसकी कीमत मध्‍य-पूर्व की आम जनता अपने ख़ून से आज भी चुका रही है।... आगे पढ़ें...

राजधानी की चमकती इमारतों के निर्माण में ठेका मजदूरों का नंगा शोषण : ऐसे में बेमानी हैं कानून और संविधान की बातें...
राष्ट्रमण्डल खेलों (सी.डब्ल्यू.जी.) के समाप्त होने के बाद सभी अख़बारों और टीवी ख़बरों में लगातार घोटालों से सम्बन्धित भ्रष्टाचार के खुलासों की एक बाढ़ सी आ गयी है। इस सबके बीच हर उत्पादन और निर्माण कार्य में ठेकाकरण के चलते, राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में सी.डब्ल्यू.जी. और अन्य निर्माण कार्य में लगे कितने ही ठेका मजदूर विकास की चमक-दमक के खोखले दिखावे के चलते मौत के शिकार हो चुके हैं।... आगे पढ़ें...

यह कमरतोड़ महँगाई क़ुदरत की नहीं बल्कि पूँजीवादी व्यवस्था की देन है : ''महँगाई डायन'' का इलाज पूँजीवादी ओझाओं के पास है ही नहीं
देश की मेहनतकश आबादी पिछले पूरे साल भीषण महँगाई से जूझती रही। दाल, अण्डे, दूध, मांस व मछली जैसी प्रोटीनयुक्त चीजें तो पहले ही देश की आम आबादी की पहुँच के बाहर हो गयी थीं, साल का अन्त आते-आते प्याज, टमाटर और हरी सब्जी आदि भी मजदूर वर्ग और निम्न मध्‍य वर्ग के रोजमर्रा के भोजन से नदारद दिखे। साल के मध्‍य में देश के अर्थशास्त्री प्रधानमन्त्री ने जनता को भरोसा दिलाते हुए कहा कि साल के अन्त तक महँगाई पर काबू पा लिया जायेगा। लेकिन साल का अन्त आते-आते तो महँगाई अपनी चरमसीमा पर पहुँच गयी।... आगे पढ़ें...

आपने ठीक फ़रमाया मुख्यमन्त्री महोदय, बाल मजदूरी को आप नहीं रोक सकते!
बंगाल के ''संवेदनशील'' मुख्यमन्त्री बुध्ददेव भट्टाचार्य बाल श्रम पर रोक लगाने के पक्षधर नहीं हैं! जहाँ 14 वर्ष की आयु से कम के बच्चों को मजदूरी कराये जाने को लेकर दुनियाभर में हो-हल्ला (दिखावे के लिए ही सही!) मचाया जा रहा हो, वहीं मजदूरों के पैरोकार का खोल ओढ़े भट्टाचार्य जी मजदूरों की एक सभा में कहते हैं कि वे बच्चों को मजदूरी करने से इसलिए नहीं रोक सकते, क्योंकि अपने परिवारों में आमदनी बढ़ाने में वे मददगार होते हैं और इसलिए भी ताकि वे काम करते हुए पढ़ाई भी कर सकें।... आगे पढ़ें...

उन्हें स्त्रियों की अस्मिता या जिन्दगी से ज्यादा प्यारा है मुनाफा! : देश की राजधानी में कामगार महिलाएँ सुरक्षित नहीं
हाल ही के दिनों में दिल्ली में रात की पारी में काम करने वाली महिलाओं के उत्पीडन की ख़बरें अख़बारों में छपीं। इसके बाद जैसाकि हमेशा होता है अपनी लाज बचाने के लिए सरकार ने कुछ 'सख्त' दिशा-निर्देश जारी किये। ऐसा लगा मानो सरकार को कामगार महिलाओं की कितनी चिन्ता है। लेकिन सरकार भी जानती है कि इन दिशा- निर्देशों का क्या हश्र होना है। पूँजीपति सर्दियों के इस मौसम में इन्हें अपने फायरबॉक्स में जलाकर हाथ भी सेंक सकते हैं। पूँजीपतियों ने यह साफ कह दिया है कि इन दिशा-निर्देशों का पालन करना उनके लिए सम्भव नहीं है।... आगे पढ़ें...

कैसा है यह लोकतन्त्र और यह संविधान किनकी सेवा करता है? (छठी किस्त) ... आगे पढ़ें...

त्रिपुर (तमिलनाडु) के मजदूर आत्महत्या पर मजबूर : मजदूरों को संगठित संघर्ष की राह अपनानी होगी
तमिलनाडु के त्रिपुर जिले में जुलाई 2009 से लेकर सितम्बर 2010 के भीतर 879 मजदूरों द्वारा आत्महत्या की घटनाएँ सामने आयी हैं। 2010 में सितम्बर तक 388 मजदूरों ने आत्महत्या की जिनमें 149 स्त्री मजदूर थीं। सिर्र्फ जुलाई-अगस्त 2010 में 25 स्त्रियों सहित 75 मजदूरों ने अपनी जान दे दी। दिल दहला देने वाले ये ऑंकड़े भी अधूरे हैं। ये ऑंकड़े आत्महत्या करने वाले मजदूरों की महज वह संख्या बताते हैं जो काग़जों पर दर्ज हुई है। इससे भी अधिक दिल दहला देने वाली बात यह है कि इस जिले में हर रोज आत्महत्याओं की औसतन बीस कोशिशें होती हैं... आगे पढ़ें...

माइक्रो फ़ाइनेंस : महाजनी का पूँजीवादी अवतार
पिछले कुछ महीनों में आन्धा्र प्रदेश में ग़रीबों की आत्महत्याओं के कई मामले सामने आये हैं। आत्महत्या करने वाले ज्यादातर लोग ऐसे थे जिन पर किसी न किसी माइक्रो फाइनेंस संस्था का कर्ज था। माइक्रो फाइनेंस संस्थाओं के बर्बर और शोषक चरित्र के इस नग्न रूप में सामने आने पर प्रदेश एवं देश के हुक्मरानों में खलबली मची हुई है। इन माइक्रो फाइनेंस संस्थाओं को ग़रीबी हटाओ मुहिम के अग्रदूत के रूप में बढ़ावा दिया गया था लेकिन ग़रीबी तो नहीं हट रही है, हाँ इन संस्थाओं द्वारा लादे गये भारी कर्ज के बोझ से ग़रीबों का ही सफाया हो रहा है।... आगे पढ़ें...

हैरिंग इण्डिया में मजदूरों का शानदार संघर्ष और अर्थवादी सीटू का विश्वासघात
हैरिंग इण्डिया प्रा. लिमिटेड मोहन नगर, गाजियाबाद में स्थित एक कारख़ाना है। इस कारख़ाने में ट्रैक्टर और उसके पुर्जे एवं हाईड्रोलिक लिफ्ट बनाने का काम होता है। जिन दिनों साहिबाबाद के एलाइड निप्पोन के मजदूरों का आक्रोश अख़बारों में चर्चा का विषय था, उन्हीं दिनों इस कारख़ाने के मजदूर भी संघर्ष कर रहे थे। मालिक, प्रशासन व श्रम विभाग की तिकड़ी के मकड़जाल से कदम-कदम पर मजदूर आज भी दो-चार हो रहे हैं। 6 मजदूर जिन्हें हैरिंग के मालिकान ने बेवजह काम से बाहर कर दिया था, उन्हें दोबारा काम पर रखे जाने का सवाल अधर में है।... आगे पढ़ें...

एलाइड निप्पोन में सीटू की ग़द्दारी के कारण आन्दोलन दमन का शिकार और मजदूर निराश
एलाइड निप्पोन अभी कुछ समय तक अख़बारों की सुर्खियों में बना रहा था। ज्ञात हो कि साहिबाबाद की एलाइड निप्पोन फैक्टरी में मजदूरों ने अपने ऊपर प्रबन्धान के गुण्डों द्वारा फायरिंग के जवाब में आत्मरक्षा में जो संघर्ष किया, उसमें प्रबन्धान का एक आदमी मारा गया। इसके बाद, मालिकों के इशारे पर ग़ाजियाबाद प्रशासन ने मजदूरों पर एकतरफा कार्रवाई करते हुए दर्जनों मजदूरों को गिरफ्तार किया और यह रपट लिखे जाने तक मजदूरों की धरपकड़ जारी थी। प्रबन्धान के लोगों पर गोली चलाने और मजदूरों को उकसाने के लिए कोई कार्रवाई नहीं की गयी।... आगे पढ़ें...

माँगपत्रक शिक्षणमाला - 3 :: ठेका प्रथा के ख़ात्मे की माँग पूँजीवाद की एक आम प्रवृत्तिा पर चोट करती है
माँगपत्रक आन्दोलन-2011 के द्वारा प्रस्तुत किये गये माँगपत्रक में तीसरी और चौथी माँग आज मजदूर वर्ग के लिए भारी महत्तव रखती है। यह माँग है ठेका प्रथा के ख़ात्मे की माँग और साथ ही पीस-रेट पर काम करने वाले और कैजुअल मजदूरों से जुड़ी माँगें। इन माँगों का राजनीतिक महत्तव और आधार समझना हमारे लिए महत्तवपूर्ण है। ये माँगें उन महत्तवपूर्ण राजनीतिक माँगों में से हैं जो पूँजीवादी व्यवस्था के कुछ सबसे अहम आम रुझानों पर चोट करती हैं।... आगे पढ़ें...

झिलमिल और बादली औद्योगिक क्षेत्र में माँगपत्रक आन्दोलन का सघन प्रचार अभियान
दिसम्बर के पहले सप्ताह में राजधानी दिल्ली के झिलमिल औद्योगिक क्षेत्र और इससे लगी मजदूर बस्तियों की दीवारों पर मजदूरों के एक नये आन्दोलन के नारों ने फैक्ट्री आते-जाते मजदूरों का धयान खींचना शुरू कर दिया। 'अब चलो नयी शुरुआत करो, मजदूर मुक्ति की बात करो', 'मजदूर साथियो जागो, अपना हक लड़कर माँगो', 'मजदूर माँगपत्रक आन्दोलन का नारा - लड़कर लेंगे अपना हक सारा' जैसे नारे दीवारों पर लिखे थे और कारख़ानों तथा बस्तियों की दीवारों पर चिपके हाथ से लिखे पोस्टर मजदूरों की बुनियादी माँगों को उठाने के साथ ही संघर्ष के लिए एकजुट होने का आह्नान कर रहे थे।... आगे पढ़ें...

न्यूनतम मजदूरी और बुनियादी अधिकारों के लिए बंगलादेश के टेक्सटाइल मजदूरों का आन्दोलन : ट्रेड यूनियनों की ग़द्दारी, मजदूरों के हक़ की नहीं मालिकों के मुनाफ़े की चिन्ता
पिछले 12 दिसम्बर 2010 को बंगलादेश की राजधानी ढाका में सरकार द्वारा तय न्यूनतम मजदूरी लागू न करने के ख़िलाफ आन्दोलनरत कपड़ा मजदूरों पर बंगलादेशी पुलिस की गोलीबारी से चार मजदूरों की मौत हो गयी और अनेक घायल हो गये। सरकार और पूँजीपतियों की तरफ से खुला हाथ मिलने के बाद पुलिस ने मजदूरों और उनके परिवारों पर कहर बरपा करने में कोई नरमी नहीं दिखायी।... आगे पढ़ें...

पूँजीवादी गणतन्त्र में कौन बच्चा और कौन पिता! : आजाद-पाण्डेय के एनकाण्टर पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी
14 जनवरी को भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने केन्द्र सरकार और आन्धा्र प्रदेश सरकार से भाकपा (माओवादी) के नेता चेरीकुरी राजकुमार 'आजाद' और पत्रकार हेमचन्द्र पाण्डेय के फर्जी एनकाउण्टर पर जवाब माँगा और कहा कि केन्द्र सरकार और आन्धा्र प्रदेश सरकार को बहुत से अनुत्तरित प्रश्नों का जवाब देना होगा। सर्वोच्च न्यायालय हेमचन्द्र पाण्डेय की पत्नी बबीता और स्वामी अग्निवेश द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रहा था। यह एक तरह से न्यायपालिका द्वारा इस बात का स्वीकार है कि आजाद और पाण्डेय की आन्धा्र पुलिस द्वारा की गयी हत्या ग़ैर-कानूनी थी और यह मुठभेड़ फर्जी थी।... आगे पढ़ें...

सीटू की गद्दारी से आई.ई.डी. के मजदूरों की हड़ताल नाकामयाब : मजदूरों को कानूनी विभ्रमों और विजातीय प्रवृत्तियों से छुटकारा पाना होगा
पिछले अंक में हमने इण्टरनेशनल इलेक्ट्रॉन डिवाइसेज, नोएडा के कारख़ाने में मजदूरों की स्थिति पर रपट में बताया था कि पिछले कुछ वर्षों के दौरान मालिकों और प्रबन्धान के कारण वहाँ करीब 300 मजदूर अपने हाथ की उँगलियाँ कटवाकर अपंग हो चुके हैं। इस कारख़ाने में कम्प्यूटर मॉनीटर और टेलीविजन के पिक्चर टयूब समेत कई इलेक्ट्रॉनिक उपकरण बनाने का काम होता है। हमने यह भी बताया था कि किस प्रकार दुर्घटना के शिकार इन मजदूरों को कम्पनी के मालिकान मशीनमैन से हेल्पर बना देते हैं और उन्हें कोई मुआवजा नहीं दिया जाता है।... आगे पढ़ें...

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bigul akhbar,
2 Sep 2010, 07:57
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bigul akhbar,
2 Sep 2010, 07:09
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bigul akhbar,
1 May 2011, 01:32
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bigul akhbar,
5 Dec 2010, 08:28
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bigul akhbar,
29 Aug 2010, 11:08
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