भरतपुरा गांव History

 भरतपुरा:- गांव में प्रवेश करते ही दूर-दूर तक हरे-भरे खेत दिखाई देते है और उन्हीं के बीच एक ऊंचे टीले पर सरकारी सुरक्षा गार्डो से घिरी लाइब्रेरी की इमारत नजर आती है।
लाइब्रेरी के साथ-साथ भरतपुरा का ऐतिहासिक महत्व है। लाइब्रेरी के संस्थापक गोपाल नारायण सिंह के पूर्वज राजा कान्हचन्द अपने वक्त के बहादुर और बुद्धिमान व्यक्ति थे। राजा गुलालचन्द राजा कांचन के दत्तक पुत्र थें। उनका परिवार महाराष्ट्र से चलकर बिहार में आकर बस गया था। यह मुगल बादशाह शाहजहां का वक्त था। बादशाह के यहां उनकी अच्छी प्रतिष्ठा थी। बाद में मुगल बादशाह फारूखशियर और शाह आलम ने फरमान के जरिए राजा गुलालचन्द को राजा साहब का खिताब दिया। उन्हीं के पुत्र राजा भरत सिंह ने रामपुर मोहकम में एक किला बनवाया जो कालान्तर में भरतपुरा गढ़ के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

पुस्तकालय की नींव 19वी सदी के उत्तरार्ध में राजा गुलाल नारायण सिंह ने रखी। बाद में 12 दिसंबर 1912 को उनके पुत्र बाबू गोपाल नारायण सिंह ने इसकी विधिवत स्थापना की। यह गुलामी के दिन थे। शिक्षा का घोर अभाव था। ऐसे समय में इस पुस्तकालय की स्थापना एक बड़ी घटना थी। पुस्तकालय का  उदघाटन तत्कालीन जिलाधीश डब्लू.डी.आर. प्रेन्टीस ने किया। दो वर्षो के बाद ही पुस्तकालय का स्थापना दिवस मनाया गया जिसमें तत्कालीन आयुक्त श्री सी.ए. ओल्ढ़म उपस्थित हुए। उन्होने लाइब्रेरी देखकर कहा था,  “I visited the G.N. Library with the Collector of Patna and have been greatly interested in looking through the collection of old books and painting. The library is kept very tidy and it is a pleasure to be shown round it by Babu Gopal Narayan Singh to whom the collection due and who evidently takes the keenest interest in it.”

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*** बिहार के छोटे से गांव की इस लाइब्रेरी में हैं ऐसी अनमोल ऐतिहासिक चीज़ें जो कहीं और नहीं मिलेंगी ***

सिर्फ यहीं देखी जा सकती है सूर्य की अखंडित मूर्ति, हाथी के दांत से बनी शाहजहां की छड़ी भी है खास। लाइब्रेरी में मौजूद हैं 8000 पांडुलिपियां, 400 प्राचीन मूर्तियां, 1000 ऐतिहासिक चित्र और 4000 से अधिक प्राचीन सिक्के।
आप भले ही देश-विदेश के कई म्यूज़ियम और लाइब्रेरी की सैर कर चुके होंगे, मगर बिहार की राजधानी पटना से करीब 45 किलोमीटर दूर भरतपुरा गांव में एक ऐसी लाइब्रेरी कम म्यूज़ियम है जहां ऐसा ऐतिहासिक खजाना देखने को मिलेगा जो कि भारत की किसी और लाइब्रेरी में नहीं है। चलिए आज हम आपको छोटे से गांव में बनी एक ऐसी ही खास और अनोखी गोपाल नारायण पब्लिक लाइब्रेरी की सैर कराते हैं।

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*** कई मायनों में खास है गोपाल नारायण पब्लिक लाइब्रेरी ***

पटना से पालीगंज जाने वाली टूटी सड़क पर ऐतिहासिक धरोहरों और खजानों को समेटे एक गांव है भरतपुरा और इसी गांव में एक ऊंचे टीले पर स्थित है गोपाल नारायण पब्लिक लाइब्रेरी। अकबर के शासन काल के दौरान यहां महाराष्ट्र से राजा कंचन सिंह आकर बसे थे। उनके वंशज राजा भरत सिंह ने यहां एक किले का निर्माण करवाया था। बाद में भरत सिंह के नाम पर ही इलाके का नाम भरतपुरा पड़ा। उन्हीं के वंशजों में से एक गोपाल नारायण सिंह ने 12 दिसंबर 1912 में इस लाइब्रेरी की स्थापना की। इसका उद्घाटन तत्कालीन जिलाधिकारी डब्लू डी आर प्रेंटिस ने किया था। शुरुआत में गोपाल नारायण ने अपने पुर्वजों से संबंधित कई एंटीक और खास वस्तुओं का संग्रहण उस लाइब्रेरी में किया। उसके बाद धीरे-धीरे उन्होंने अपनी लाइब्रेरी कम म्यूजियम को ऐतिहासिक खजानों से भर दिया। बताया जाता है भरतपुरा गांव के आस-पास से खुदाई में कई ऐतिहासिक महत्व की चीजें प्राप्त हुई है जिन्हें इसी लाइब्रेरी में रखा गया है।

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*** सिर्फ यहीं देखी जा सकती है सूर्य की अखंडित मूर्ति ***

इस लाइब्रेरी में करीब 8000 पांडुलिपियों, 400 प्राचीन मूर्तियों, 1000 ऐतिहासिक चित्रों, 4000 से भी ज्यादा प्राचीन सिक्कों समेत कई एंटीक एवं ऐतिहासिक महत्व की वस्तुओं का संग्रह है। लाइब्रेरी के वर्तमान सचिव एवं गोपाल नारायण के पौत्र ध्रुपद नारायण सिंह बताते हैं कि यहां 5वीं सदी की शिव और पार्वती की श्रृंगारिक मुद्रा में एक ऐसी खास मूर्ति है जो कि देश-विदेश में कहीं नहीं है। वहीं 8वीं और 9वीं सदी में निर्मित सूर्य की 3 खास मूर्तियां हैं। भारतीय पुरातत्व विभाग के अनुसार आज तक विश्व में सूर्य की ऐसी पूर्ण आकार की मूर्ति कहीं भी नहीं मिली है। यह मूर्ति 2012 में तीढ़ी मोड के पास चल रही खुदाई में मिली थी। इसके अलावा यहां नंदी की 8 किलोग्राम अष्टधातु की मूर्ति भी खास है। यहां भगवान बुद्ध की भी एक मूर्ति जो कि सिर्फ 8 इंच की है लेकिन वजन 10 किलोग्राम है, जो अपने आप में अनोखा है। यह मूर्ति गुप्त काल की बतायी जाती है। इसके अलावा मौर्य वंश समेत कई अन्य काल की खास मूर्तियां भी यहां की शोभा बनी हुई हैं।

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*** फिरदौसी के सचित्र शाहेनामा की इकलौती प्रति ***

गोपाल नारायण लाइब्रेरी कम म्यूज़ियम पूरे विश्व में एक मात्र ऐसी लाइब्रेरी है जहां फिरदौसी के सचित्र शाहेनामा की इलकौती प्रति मौजूद है। इस शाहेनामा में ईरान की सभ्यता, संस्कृति को नीलम और सोने द्वारा बनाए गए चित्रों के माध्यम से जाना सकता है। इसके अलावा यहां निज़ामी रचित सचित्र सिकंदरनामा, सलामत अली रचित मुताल-उल-हिंद, 11वीं सदी की दीवाने हाफिज जैसे कई महत्वपूर्ण ऐतिहासिक महत्व की किताबें और चित्र मौजूद हैं। वहीं यहां अकबर के नौ रत्नों में शुमार बसावन की पेटिंग साधु भी देखने को मिल सकती है। जबकि तार के पत्ते पर ब्रह्मी लिपि में लिखी महाभारत भी यहां के खास आर्कषण में से एक है। ध्रुपद नारायण कहते हैं कि हमारे यहां जो आंकड़े हैं उसके हिसाब से यह 780 ई. की है।

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*** हाथी के दांत से बनी शाहजहां की छड़ी भी है खास ***

एक छोटे से गांव में स्थित इस लाइब्रेरी में कई और भी एंटीक वस्तुएं आपका ध्यान ज़रूर खीचेंगी। यहां बाबर के समय के कई चिराग-ए-गुल हैं जो कि उस समय रोशनी फैलाने के काम में लाए जाते थे। वहीं हाथी के दांत से निर्मित शाहजहां की छड़ी भी इस म्यूजियम में सुशोभित है। इसके अलावा यहां पंचमार्क सिक्के, अकबर के समय के दिन-ए-इलाही सिक्के, बुद्धा के समय के स्वर्ण सिक्के, एक तार से बनी साइकिल, खास घड़ी, पीपल के पत्ते पर गोल्ड से पेटिंग, मुगल पेटिंग, याक्षिणी की मूर्ति समेत कई अन्य बहुमूल्य वस्तुएं लोगों का ध्यान आकर्षित करने वाली हैं। सिंह बताते हैं कि यहां धातुओं से बनी एक आदिवासी महिला का चित्र है जो कि हाथ में पुस्तक लिये हुए है। यह चित्र बताता है कि उस समय भी महिलाओं में शिक्षा के प्रति काफी रुचि थी। उस समय भी महिला सशक्तिकरण महत्वपूर्ण था।

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*** बड़ी हस्तियों ने माना यहां की लाइब्रेरी का महत्व ***

धुप्रद नारायण के कहा कि अभी कुछ दिनों पहले पुणे में भी लाइब्रेरी कम म्यूजियम की स्थापना हुई है लेकिन यहां जितने महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक खजानें उपलब्ध हैं, वह किसी अन्य लाइब्रेरी कम म्यूज़ियम में नहीं हैं। इसकी महत्ता को देखते हुए बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी यहां कई बार आ चुके हैं और इसे बड़ा स्वरूप देने की बात कह चुके हैं। वहीं दूसरे राज्यों एवं केन्द्र के पुरातत्व विभाग के अधिकारियों, लेखकों, कलाकारों और पत्रकारों ने भी इस लाइब्रेरी की महत्ता को स्वीकार किया है। इसके संचालन के लिए समिति गठित है। इसका चेयरमैन जिलाधिकारी होता है। लेकिन, इन सबके बावजूद भी लाइब्रेरी को यहां की सरकार बड़ी पहचान दिलाने में विफल रही है। प्रशासनिक सुस्ती की वजह से यहां सुरक्षा के इंतजाम भी नाकाफी हैं। हालांकि लाइब्रेरी के लिए नये भवन का निर्माण हो रहा है। उम्मीद है आने वाले समय में यह और भव्य रूप में नज़र आएगी।

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Updated By Abhishek kumar

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