Yogini Mata

Twilight of a Yogini’s Life

(English gist of the Hindi article given below)

Tripta Devi was born in village Darangli of Gurdaspur, Punjab in the year 1940. She was a beautiful and promising child. After marriage she did not have child and as a result she got her husband married to another women. Children were born to second wife. However home environment remained turbulent. One day she went to a temple with unlocked hair and danced. The statues in temple got entangled in the hair and fell around. She had become a Yogini. Her first guru was Baba Bhag Singh. Her second master was Shraddhanand of Jammu and later she came in contact with Param Dayal Faqir Chandji. He gave her the name of ‘Yogini Mata’ and appointed her guru of women. She stayed in Manavta Mandir, Hoshiarpur for many years and worked as a guru. Here is the summary of conversation with her.

After much searching on the internet I could contact David C Lane a professor of philosophy and sociology in California, United States. In his very first email he enquired about Yogini Mata. Hence, for the past two years I had been searching Yogini Mata. I contacted Mrs. Asha Bhagat, activist of Bhagat Mahasabha, Pathankot. Luckily she had known Yogini Mata for the past many years. I reached Pathankot on 09-10-2010. Yogini lives in a room, a part of her father’s house. I saw her after almost 35 years. She met with all affection but a sort of detachment was visible in her behavior.

I introduced myself and made a mention about Bhagat Munshi Ramji and his wife Karam Devi. She could remember everything. I presented her fruits etc. She enquired about my wife and children. Then I told her the purpose of my visit. She sat in Sukhasana (cross legged).

“Do you remember David C. Lane? He came to the temple.”

“Yes, David!”

Then I further asked, “Do you recall Param Dayalji?”

“Yes.”

“Do you worship him within?”

“No, I do not do that.”

“Do you do inner practices?”

“I have left doing inner practices. During those days I saw all the three forms of Param Dayalji i.e. Dharma, the Form and the Light.”

“Sadhana (inner practice) is also Maya. I used to experience numbness in the body.”

“Do you deliver Satsangs.”

“I do not like delivering Satsang. I am fed up with Guruism. I will not give Namdan to anyone. (Here she recalled a lady). Shanti used to come to me for inner practices. I do not know what happened to her. She just lied on the railway track and committed suicide. Param Dayalji then said to me that Namdan should be given only to the righteous person.”

“Dayal Das and yourself used to instruct people for inner practices,” I asked. She said, “Yes, Dayal Das used to give instructions for very high stages of inner practices. He used to attract mystically. I used to go at his place but I always quarreled with him.”

After a few moments, I expressed my wish to ask her some specific questions about what sort of dreams she would generally see. 70 year Yogini immediately replied, “I do not see any dreams. Param Dayalji did cut them.”

I asked, “What type of visions you see during inner practices?” She said, “Nothing special. Previously I used to see divine forms, used to go to light.” She continued, “Once I was sitting in front of Shraddhanand (her second guru). During inner practices I felt as if five snakes came out of my Joon (योनि, private part) and entered into Shraddhanand. I told it to Shraddhanand. He said, “These five snakes are in fact ‘desire (काम)’, ‘anger (क्रोध)’, ‘greed (लोभ)’, ‘infatuation (मोह) and ‘ego (अहंकार)’. From today onwards you are free from all of them.” 

I asked her, “How about your internal state now.” She said, “Sometimes I get angry. I do quarrel.”

During this conversation Yogini Mata sang and shared many devotional songs. There was intense flow of strong sentiments in her singing.


एक योगिनी की जीवन संध्या

योगिनी अपने आप में एक बहुत आकर्षक नाम है. योगिनी माता कहा जाए तो ममत्व की शीतल छाया भी उसी में भर जाती है. कुल मिलाकर यह योगिनी माता एक रोचक, आकर्षक और सम्मानसूचक नाम है.

तृप्ता देवी का जन्म 1940 के आसपास पंजाब के जिला गुरदासपुर के दरांगली गाँव में हुआ था. इनके पिता का नाम श्री मुल्खराज और माता का नाम श्रीमती सुमित्रा रानी था. इनके पहले गुरु का नाम बाबा भाग सिंह था. तृप्ता का बचपन तो हँसी-खेल में बीत गया. विवाह के बाद सांसारिक कष्ट शुरू हुए. शादी हुई परंतु संतान नहीं हुई. संयोग की बात है कि किसी भी भाई-बहन के संतान नहीं थी. घर का वातावरण अशांत हो गया.

पठानकोट शहर में एक गुरु हैं- श्रद्धानंद. तृप्ता का वहाँ जाना हुआ. गुरु के आश्रम में अधिकतर लड़कियाँ और महिलाएँ ही जाती थीं और उनके पाँव दबाने सी सेवी में लगी रहती थीं. श्रद्धानंद ने तृप्ता को सरोज देवी का नाम दिया लेकिन ऐसे संबोधित करते जैसे वह महिला न हो कर पुरुष हो. तू क्या करता है, कहाँ जाएगा जैसे बोलते हैं.  उनके आश्रम में जा कर अपने भाई के लिए मन्नत माँगी. उन्होंने आशीर्वाद और प्रसाद दिया. भाई के यहाँ संतान होने से श्रद्धानंद पर विश्वास दृढ़ हो गया और उन्हें ये राम और कृष्ण की भाँति अवतार के रूप में देखने लगीं. लेकिन कष्ट तो कष्ट था अपने यहाँ संतान नहीं थीं. घर के अशांत वातावरण का प्रभाव गहरा होता जा रहा था. ये मंदिर में जातीं और बाल खोल कर नाचतीं. एक दिन खुले बालों में लिपट कर मूर्तियाँ गिर कर बिखर गईं. ये योगिनी हो गईं.

समय आने पर तृप्ता ने सबसे कठिन काम किया कि अपने पति का विवाह और जगह करा दिया और वह पिता बना.

इस बीच तृप्ता देवी बाबा फकीर चंद के संपर्क में आई जिन्होंने अपने केंद्र का नाम मानवता मंदिर रखा हुआ था. यह होशियारपुर, पंजाब में स्थित था. फकीर ने तृप्ता का साधक रूप देखा. तब तक फकीर ने महिलाओं को नाम देने के लिए लज्जावती कक्कड़ (कमालपुर वाली माई) को गुरु नियुक्त किया हुआ था. अब यह कार्य तृप्ता देवी को भी सौंपा और उसका नाम योगिनी माता मशहूर कर दिया. निःसंतान तृप्ता पहले सरोज बनी और फिर सरोज से योगिनी माता बन कर जगत माता हो गईं. उन्हें मंदिर में रहने और अभ्यास कराने के लिए एक कमरा दे दिया गया जहाँ वे कई वर्ष रहीं. उस समय वे अपनी युवावस्था में थीं और साधन करने से मुख पर तेज था. मैंने स्वयं उन दिनों योगिनी को मंदिर में देखा था.


परम दयाल जी का शरीर छूटने के बाद मालूम पड़ा कि अन्य कई लोगों के साथ-साथ योगिनी माता ने भी मंदिर छोड़ दिया. डॉ. आई.सी. शर्मा ने फकीर चंद जी की जगह काम करते हुए मंदिर पर अपनी काठी कसी. डॉ. करम चंद कपूर जैसे समर्पित कार्यकर्ता भी वहाँ से अपने गाँव चले गए. भगत मुंशीराम जी चंडीगढ़ चले गए. शर्मा ने अपना नया दायरा बनाया. वर्ष 1978 और 1983 में मानवता मंदिर में एक अमेरिकन शोधकर्ता डॉ. डेविड सी. लेन नए धार्मिक आंदोलनों पर शोध करने आए थे.  उन्होंने तब मंदिर के हालात देखे. उन्होंने कहीं उल्लेख किया है कि शर्मा को मंज़ूर नहीं था कि यह कहा जाए कि फकीर ने अन्य लोगों को भी गुरुवाई का काम दिया था. लेन जानते थे कि योगिनी माता और कई अन्य को भी यह कार्य फकीर ने दिया था. शर्मा ने डेविड को मुकद्दमे की गंभीर धमकी दे डाली. डॉ. लेन अपने मत पर दृढ़ रहे. कालांतर में योगिनी माता को मंदिर छोड़ना पड़ा. कुछ लोगों का कहना है कि फकीर चंद जी ने अपने जीवन काल में ही योगिनी को मंदिर छोड़ जाने की हिदायत कर दी थी. यह बात योगिनी भी कहती हैं. कुछ दिन योगिनी मानवता मंदिर के पास एक कमरा किराए पर लेकर रहती रहीं. फिर वहाँ से चली गईं.

कुछ वर्ष बाद मंदिर ने योगिनी को भुला दिया. लेकिन लेन ने नहीं भुलाया. इस बीच शर्मा का देहांत हो गया. उनके उत्तराधिकारी शून्यो जी ने भी मंदिर छोड़ दिया.

इधर मैं डॉ. लेन की तलाश में था क्यों कि वे वस्तुनिष्ठ दृष्टिकोण वाले हैं. इंटरनेट पर काफी खोज के बाद इस जाने-माने समाज शास्त्री और धार्मिक पाखंडवाद के विशेषज्ञ डॉ. डेविड सी. लेन से संपर्क हो पाया. पहली ही ई-मेल में उन्होंने योगिनी माता का अता-पता पूछा और मैं पिछले दो वर्ष से योगिनी को ढूँढ रहा था. छह माह पूर्व पता चला कि वे पठानकोट, पंजाब में कहीं हैं. इसी सूत्र पर कर्य करते हुए याद आया कि भगत मुंशीराम जी ने पठानकोट के एक कबीरपंथी रवेल पुरी या रवेल दास को एक पत्र लिखवाया था. उन्हें ढूँढने में सफलता नहीं मिली यद्यपि मेरे एक मित्र श्री गिरधारी लाल भगत उन्हें जानते थे. फिर पठानकोट में कार्य कर रही संस्था भगत महासभा से संपर्क बढ़ा. उसी की सामाजिक कार्यकर्ता आशा भगत से पहचान हुई. संयोगवश उनकी माता योगिनी की सहेली निकलीं. बात बन गई और तीन दिन के भीतर 09-10-2010 को सायं मैं पठानकोट पहुँच गया.

हम एक मकान के पिछले आंगन में पहुँचे जहाँ योगिनी एक कमरे में रहती हैं. वे उस समय गली में थीं. आशा दो मिनट में उन्हें ढूँढ लाई. मैंने योगिनी को लगभग 35 वर्ष के बाद देखा था. वे बहुत प्रेम से मिलीं परंतु व्यवहार में योगिनी सुलभ वैराग मिश्रित था.



मैंने अपनी परिचय दिया. भगत मुंशीराम जी और उनकी धर्मपत्नी का उल्लेख किया. तब वे पुरानी स्मृतियों से ताज़ा हो उठीं. मैंने उन्हें फल भेंट किए. उन्होंने मेरी पत्नी-बच्चों का हाल पूछा. कुछ देर पुरानी बातें होती रहीं. तब मैंने अपने आने का उद्देश्य कहा. वे बातचीत के लिए सहज हो गईं और पालथी लगा कर बैठ गईं.

आपको डेविड सी. लेन याद हैं. मंदिर में आए थे?”

हाँ, डेविड!”

तब मैंने बात बढ़ाई, वे आपके बारे में जानने को उत्सुक हैं कि आप कैसी हैं, आज कल क्या करती हैं. यह जानकारी लेने आया हूँ जो डेविड को भेजी जाएगी. आप परम दयाल जी को याद करती हैं?”

हाँ.

क्या उनका ध्यान करती हैं.

नहीं, मैं परम दयाल जी का ध्यान नहीं करती.

अभ्यास करती हैं?”

अभ्यास अपने आप छूट गया. परम दयाल जी के तीनों रूप उस समय देखे- धर्म, मूर्ति और प्रकाश स्वरूप.”

साधन-अभ्यास के बारे में कुछ कहेंगी.”

साधन भी माया है. उस समय अभ्यास के दौरान शरीर में सुन्नपना आता था.

परम दयाल जी के चोला छूटने पर कैसा लगा?”

कहने लगीं, संत मरे क्या रोइए जो अपने घर जाय, रोइए देहवान को जो हाट-हाट बिकाय



इसी सिलसिले बोलते हुए उन्होंने बताया कि वे सुखमनी साहब का पाठ करती हैं. यहीं परम दयालजी के समय में मंदिर में अभ्यास कराने वाले दयाल दास जी का उल्लेख करती हैं जो पुरुषों को अभ्यास कराया करते थे.

अब भी आप सत्संग कराती हैं?”

सत्संग कराना अच्छा नहीं लगता. गुरुआई से मन भर गया. अब किसी को नाम दान नहीं देना.” यहाँ वे अचानक एक महिला को याद करती हैं. फिर कहनी हैं,

वह मेरे पास आकर अभ्यास किया करती थी. एक दिन पता नहीं क्या हुआ कि रेलगाड़ी के आगे जा कर लेट गई. मंदिर में खबर आई. परम दयाल जी के पास बैठे कई लोग खबर-सार लेने चले गए. मैं वहीं बैठी रही. परम दयाल जी बरामदे में टहलते रहे. मैंने परम दयाल जी से कहा कि यह क्या हुआ. कहने लगे कि अधिकारी को ही नामदान देना चाहिए.

पुरानी बातें याद करते हुए वे कहती हैं कि एक बार वे अपनी माता से लड़ कर मानवता मंदिर गई थीं. किसी से बात नहीं की. मास्टर मोहन लाल, बाबा फकीर चंद जी और योगिनी बैठे थे. अचानक फकीर ने इनकी ओर देखा और मास्टर जी की ओर देखते हुए बोल पड़े,

मर वे खसमां मर

तूँ मरें ते वसे मेरा घर

तेरे जींदे रंड कहावां

तेरे मरे सुहागन होवां


और कह दिया कि यह योगिनी अपनी माँ से लड़ कर आई है. योगिनी ने फकीर की बात का अर्थ निकाला कि खसम का अर्थ अहंकार से है. वे मुझ से पूछती हैं कि नागी (विजय नरेश नेगी उर्फ़ शून्यो जी महाराज) कैसे हैं. मैं उन्हें बताता हूँ कि वे मानवता मंदिर छोड़ गए हैं. योगिनी को हल्का झटका सा लगता है. फिर वे मुस्करा उठती हैं और कहती हैं, परम दयाल जी कहा करते थे...

कुछ क्षण प्रतीक्षा करने के बाद मैंने कहा कि बहन जी मैं आपसे एक विशेष सवाल पूछना चाहता हूँ कि आपको सपने कैसे आते हैं. वे एकदम बोल पड़ीं, सपने नहीं आते हैं. परम दयाल जी ने काट दिए. मैंने पूछा, अच्छा यह बताइए कि अभ्यास के दौरान आप कैसे दृश्य देखती हैं. उन्होंने कहा, कुछ ख़ास नहीं. मूर्तियाँ देखती, प्रकाश में चली जाती थी. यहाँ वे संत हरजीत सिंह संधू (इंगलैंड वाले) को याद करती हैं और कहती हैं.कि वे मेरे यहाँ आकर सुमिरन-ध्यान किया करते थे. (ऊपर दिए गए पहले दो चित्र संत हरजीत सिंह संधु जी ने 1982 में मानवता मंदिर में योगिनी के  कमरे में खींचे गए थे. उनका आभार). थोड़ी देर के बाद वे पुनः कहने लगती हैं, एक बार मैं  श्रद्धानंद के सामने बैठी थी अभ्यास कर रही थी. तब मुझे लगा कि मेरे जून में से पाँच साँप निकल कर श्रद्धानंद में प्रवेश कर गए. यह बात मैंने श्रद्धानंद को बताई. उसने कहा कि ये पाँच साँप काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार हैं. आज से तू इनसे मुक्त है. इन्हें मैंने ले लिया.

मैंने पूछा, बहन जी आपकी आज की आंतरिक अवस्था कैसी है?” कहने लगीं, कभी-कभी क्रोध आता है. झगड़ा करती हूँ. जिस माहौल में रहती हूँ वहाँ यह करना पड़ता है.

दयालदास और आप लोगों को अभ्यास कराया करते थे,” मैंने कहा. वे बोलीं, हाँ, दयाल दास बहुत ऊँची अवस्थाओं का अभ्यास कराता था. जैसे खींच मारता था. मैं भी खिंचती थी. उसके यहाँ चली जाती थी लेकिन वहाँ जा कर उससे झगड़ती थी.”

इस बातचीत के दौरान योगिनी माता ने कई पद गा कर सुनाए. उनमें संवेगों का छिपा तीव्र प्रवाह था साथ ही तत्त्व ज्ञान की धारा भी थी.

विशेष टिप्पणी: उनके वर्तमान जीवन का सार

योगिनी कहती हैं कि अब यह विचार नहीं आता कि कहाँ जाना है, क्या होना है. निकट संबंधियों से सहायता की उन्हें आवश्यकता होगी.  योगिनी ने पति की और उसकी दूसरी पत्नी की देखभाल की. दूसरी पत्नी योगिनी के विरुद्ध ही रही. उन दोनों की मृत्यु हो चुकी है. पैसे की कमी नहीं है. घर के एक कमरे में रहती हैं. बहुत बातें करती हैं. पूरा वाक्य बोलती हैं. विषय बदलती हैं. एक घटना से दूसरी घटना के बारे में निरंतर बोलती हैं परंतु सामने वाले की बात सुनने के लिए रुक भी जाती हैं. स्वास्थ अच्छा प्रतीत होता है. कल (21-10-2010) को फोन पर हुई बातचीत में श्वास की बीमारी का उल्लेख किया था. यह भी बताया कि वे श्वास के साथ सुमिरन करती रही हैं. योगिनी माता ने इच्छा प्रकट की कि यदि मानवता मंदिर में जगह मिले तो वे वहाँ रहना चाहेंगी. मैंने कहा कि बहन जी परम दयाल जी के समय के और आज के माहौल में बहुत अंतर है. बहुत कुछ बदल चुका है. वे मेरी बात से सहमत हो गईं. तथापि वे कभी मंदिर में वैसाखी जैसे त्यौहार पर आना चाहती हैं. उनकी इस इच्छा के बारे में मैंने कमल जी को बता दिया है.

                                       
 

Information sent to Dr. David C. Lane in reply to his email

Dear David, I am giving information required by you:-

1. How did your meeting end with Yogini? Did she say she is still meditating? 

The end of the meeting was bit heavy due to the fact that she started jumping from one topic to another. However, when we took permission to leave, she very gracefully got up and accompanied us to the ground floor right up to the street. During conversation she has not said that she still meditates. Rather she says that meditation (Sadhana) is Maya only. She daily recites ‘Sukhmani Sahab’ a holy book of Sikhism.

2.  Does she have any following?

I enquired whether she delivered discourses. She denied. It is obvious that most of the time she talks to the ladies living in the street. Her ‘following’ remains a question since she gave Namdan to many ladies in the temple.

3.  What were your impressions of her when you met her?

She was declared a guru by Param Dayalji for whom I have great respect. She had been a guru of women and I took every care to give her same respect. I garlanded her and offered some fruits to her. I knew that age factor had descended upon her. I knew her family circumstances when she was living in Hoshiarpur. Her husband had been visiting her in the temple. She was very close to my mother while she lived in the temple.


Other details are given below:-

She was born to Mr. Mulkh Raj and Mrs. Sumitra Rani. It was perhaps a matter of chance that none of her brothers or sisters had children. Home environment was disturbed.

Tripta Devi came in contact with Shraddhanand. Mostly girls and women go to his Ashram and press his feet and do other services (Seva) in the Ashram. Shraddhanand gave Tripta Devi a new name i.e. Saroj Devi. He used to address her as if she was a male. Instead of saying ‘सरोज क्या बोलती है he would say ‘सरोज क्या बोलता है. She prayed to Shraddhanand for blessing her brother with child. It was fructified after some time. This strengthened her faith in Shraddhanand.

Faqir had appointed Lajjawati Kakkad (Kamalpur Wali Mai) as guru of women. Now he appointed Tripta Devi also. He called her Yogini Mata and she became famous with this name. Firstly, Tripta Devi became Saroj Devi and then Yogini Mata. A childless Tripta Devi became Yogini Mata and then visitors of the temple rechristened her as Jagat Mata (Mother of the world). She had been given a room for doing Yogic practices and giving Namdan. She remained there for many years. At that time she was in her youth and had a glowing face which is considered to be the result of Yogic practices. In those days I myself saw Yogini Mata in the temple.

After Param Dayal Ji's death, Dr. I.C. Sharma fastened his own saddle of authority on the Temple. Dedicated worker like Dr. Karam Chand Kapoor left the temple and went to his village. Bhagat Munshi Ramji (Faqir’s nominee for Satguru’s work) moved to Chandigarh. Some people say that Faqir, during his life time, had instructed Yogini Mata to leave the temple. Yogini Mata also confirms it. After Faqir’s demise Yogini lived in the temple for few months. She was there when Sharma came to Hoshiapur. Yogini says that Sharma did respect her. After some time she moved to a rented room near temple and finally left for Pathankot.


A short note on her present life

Yogini Mata says that now she does not think about eternal questions like- ‘From where have I come, where shall I go?’ She took care of her husband and his second wife and their children, though second wife had always been against her. Her husband and his second wife have since died. She belongs to a well to do family. Her father left sufficient money for her and lives in a room of a house which belongs to her father. She requires help from near relations.

She talks many things but speaks full sentences. She jumps from one topic to another but stops to listen to the other person. She is seemingly in good health. On 21-10-2010, during telephonic conversation she mentioned about her asthmatic problem. She also told that she had been doing Sumiran (repetition of holy name) with breathing process.

Yogini Mata expressed her wish to live in Manavta Mandir if permitted. I advised her about the changed circumstances after Faqir Chandji. She agreed with me. However, she wanted to come to the temple on festivals like Baisakhi. I have conveyed her desire to Dayal Kamalji (present spiritual head). 



Comments