Rajendra Yadav

गर्व से कहो.........

राजेन्द्र यादव

 

पिछले चालीस-पैंतालीस सालों से मैं कभी मंदिर नहीं गया। न भीतर से कभी ऐसी जरूरत महसूस हुई, न ही बाहर से दबाव पड़ा। देवी-देवताओं या भगवान के लिए किसी भी तरह की कोई आस्था या श्रद्धा मैं अपने में नहीं पाता। अकसर कई लोगों ने जानना चाहा कि क्या कभी भी मैंने ईश्वर जैसी किसी शक्ति के लिए कुछ महसूस किया है। बहुत ईमानदारी से सोचने पर अपने से पूछा कि क्या कभी भी कमजोर या बेहद संकट के क्षणों में भी मुझे ईश्वर की जरूरत नहीं लगी? न उससे कुछ मांगने की, न उसे पाने की? उत्तर '' कार में ही मिला। उससे पहले, मुझे याद है; मैंने घंटियां भी बजायी हैं, प्रार्थनाएं और आरतियां भी गायी हैं ; व्रत-उपवास भी किये हैं और परमश्रद्धा के साथ ब्रजभाषा कवित्तों में सत्यनारायण की कथा भी स्वयं लिखी है। तभी बाकायदा प्रचलित धर्म-ग्रंथों को निष्ठा से पढ़ा भी। परिवर्तन शायद 1947 के दिनों ही आया। कारण कोई विशेष ध्यान में नहीं आता- बस, उधर से मन ही फिरता चला गया। जिस तरह के आधार की तलाश रही होगी, वह क्रमशः लेखन में मिलने लगा। बीसियों बार मित्रों ने सुझाया कि मुझे ध्यान करना चाहिए- किसी ईश्वरीय कारण से नहीं, सिर्फ मानसिक एकाग्रता के लिए- महर्षि महेश, मुक्तानंद, रजनीश, साईंबाबा- न जाने किस-किस की नयी-पुरानी ध्यान-पद्धतियां सुझायी गयीं, बताया गया कि इसमें मुझे जो आध्यात्मिक उन्नयन की उदात्त अनुभूति होगी, वह मेरे अपने लेखन में गुणात्मक परिवर्तन लायेगी- मैं तब स्वयं अपनी रचनाओं में अंतर महसूस करूंगा। मुझे लगा, लिखने के लिए जिस तरह मन को घेर-घारकर एक मुद्दे पर लाना पड़ता है, जिस तरह चित्तवृत्तियों को खींच-तानकर एक दिशा में लगाये रखने की कोशिश करनी पड़ती है, वह किस योगाभ्यास से कम है? साधना होगा तो इसे ही साधूंगा- ईश्वरीय पलोथन लगी योग-साधना में भागने की क्या ज़रूरत है?- और इस तरह भीतर के उन सारे मंदिरों को मैं स्वयं तोड़ता चला गया, जहां ईश्वर या उसके प्रतिनिधियों की मूर्तियां बैठी थीं...सारे मानवीय, सामाजिक और नैतिक मूल्यों को ईश्वर से छील-छीलकर अलग करते चले जाना ही ईश्वर को मारना है...

       पुरी, विश्वनाथ, कालीघाट और मथुरा-वृंदावन के मंदिरों में जाने के बाद से मुझे

प्रायः हर हिंदू-मंदिर से घृणा हो गयी है। वे गंदे, घुटन और सड़ांध भरे कीचड़-पसीने से लथपथ कसाईघरों जैसे लगते हैं ; मूर्तियां, फूहड़, भौंड़ी, भद्दी, बेहूदी और जुगुप्सा-जनक हैं- अकसर पथरीले भावों वाली भयानक। इसलिए कभी भीतर जाने को भी मन नहीं करता। स्थापत्य और वास्तुशिल्प के आकर्षण से ही मंदिरों को देखा हो, तो देखा हो। अगर इन सबको अस्पतालों, स्कूलों, होटलों या यहां तक कि घुड़सालों में बदल दिया जाये तो मुझे ईमानदारी से कोई तकलीफ नहीं होगी। करोड़ों और अरबों की संपत्ति का सामाजिक उपयोग होना ही चाहिए- वह यज्ञों, हवनों, भंडारों और ऐयाशियों में फूंकने के लिए नहीं है। देश की आधी से ज्यादा जनता भूखी, बेकार और अशिक्षित हो और लाखों मंदिरों में बैठे 'भगवान' चारों समय खीर-पुरी, हलुआ-लड्डू के भोग लगायें- इससे बड़ी अश्लीलता और क्या होगी।

     लेकिन इस सबके बावजूद मैं हिंदू हूं ; क्योंकि अगर कभी सांप्रदायिक दंगे हुए तो हिंदू के रूप में ही मैं मारा या बचा लिया जाऊंगा...(1984 में मेरे साथ हुआ भी है ) यही नहीं, मुझे हिंदू होने का गर्व भी है। कितने गहन-गंभीर बारीक और तात्विक दार्शनिक चिंतन हमारे यहां है। उपनिषदों में जो कुछ है वह दुनिया के किस धर्म या दर्शन के पास है? गीता जैसी शुद्ध दार्शनिक, धार्मिक और ईश्वरीय ज्ञान की अगाध-भंडार पुस्तक कोई धर्म या सभ्यता दे पायी है? हमारे यहां धर्म सच्चे अर्थों में व्यक्तिगत साधना है। मैं अगर दोनों समय पूजा करता हूं या नहीं करता, मैं सुबह चार बजे उठकर नदी या नल के पानी में नहाता हूं या बिलकुल नहीं नहाता, मैं शिव को पूजते हुए राम-कृष्ण को गालियां दे सकता हूं, दुर्गा, राधा, काली या सरस्वती में से एक या सबकी आराधना करते हुए बाकी सारे देवी-देवताओं की ऐसी-तैसी कर सकता हूं। शुद्ध-शाकाहार भी कर सकता हूं और दोनों समय मांसाहारी भी रह सकता हूं... सारांश यह कि कुछ भी खाता-पीता रहूं, कुछ भी मानता, न मानता रहूं, कुछ भी पहनता, न पहनता रहूं... मैं हर हाल में हिंदू हूं और इसके लिए मैं न कहीं अपमानित होता हूं, न लांछित... मेरे पास हर स्थिति में मेरा एक-न-एक देवता या दर्शन पहले से मौजूद है। मैं दुनिया से सन्यास लेकर भी उतना ही महान हूं, जितना दुनियादारी में लिप्त रहकर_ मैं कुछ भी करूं, कुछ भी सोचूं... मैं हिंदू ही रहूंगा और कोई न कोई मोक्ष का रास्ता मेरे लिए खुला होगा--क्योंकि मेरे धर्म में पहले भी ऐसे उदाहरण हो चुके हैं... योग और भोग के पचासों दृष्टांत मेरे पास हैं। है ऐसी उदारता और किसी धर्म में? जनाब, यह सर्वव्यापी लचक हजारों सालों में ही कोई संस्कृति अर्जित कर पाती है...

      और इसलिए मुझे दूसरे धर्मों से घृणा है। ये जुम्मा-जुम्मा डेढ़-दो हजार सालों के धर्म? कोई धर्म हैं? कठमुल्ले, कट्टर, जड़, जाहिल और बुद्धिनिषेधी। लोगों को परलोक का लालच और खौफ दिखाओ और भेड़-बकरियों की तरह मस्ज़िदों, चर्चों में हांक दो।

अक्ल की बात करो तो काटने दौड़ें। असुरक्षा और डर से पागल एक छोटी-सी किताब, एक तस्वीर, एक फिकरा इनकी चूलें हिलाकर रख देता है। अपनी अक्ल और सोच का इस्तेमाल तो है ही नहीं। एक सियार ने हांक लगायी तो जंगल के सारे सियार हुआ-हुआ करके आसमान सिर पर उठा लें... क्या इनके यहां नयी पीढ़ी में भी ऐसे लोग नहीं हैं जो सवाल कर सकें? कम से कम जड़ता से अपने को तो मुक्त रख सकें। मेरा धर्म प्राणी-मात्र में एक ही ईश्वर के दर्शन करता है, सबके प्रति, करुणा और क्षमा सिखाता है। मेरी आत्मा विश्वात्मा का अंश है- यहां भगवान अलग से आसमान में बैठा कोई चिड़चिड़ा बूढ़ा नहीं- मां- बाप की सेवा करता, भाई-बहनों के बीच खेलता-कूदता, गोपियों से रास रचाता मनुष्य है... सचमुच मेरा धर्म इतना महान है कि उसकी महानता पर विचार करते हुए मेरी वाणी रुंध जाती है, आंखों में आंसू आ जाते हैं और सारी दुनिया मुझे कीड़े-मकोडो़ं जैसी दिखायी देने लगती है। यह है असली मानव-धर्म। बाकी सब साले कठमुल्ले और सांप्रदायिक हैं। कौन है हिंदू से ज्यादा असांप्रदायिक और धर्म-निरपेक्ष?

      मैं बेहद उदार और खुले दिल का मनुष्य हूं, सबको अपना भाई मानता हूं। मगर मेरे सहकर्मी हरिनारायण, कर्णसिंह और दुर्गाप्रसाद मेरी नाक में दम किये हैं। बरसों मैं परेशान रहा हूं- ये भाई और मनुष्य तो अपनी जगह हैं- मगर कितने भाई और कितने मनुष्य हैं, यह कैसे तय हो? गिरिराज किशोर, प्रियंवद, स्वयं प्रकाश, संजीव, ज्ञानरंजन, शिवमूर्ति, संजय- ये सारे के सारे आखिर हैं क्या? इन लोगों के आगे गुप्ता, शर्मा, बंसल-अंसल, शुक्ला, तिवारी-कुछ तो लगा हो। आखिर पता तो चले कि ये ससुर हैं क्या चीज? भीतर से बहुत बैचेन हूं कि इनकी कुछ जात-पांत तय हो, शहर-देश पता चले तो अपने दिमाग के सही खाने में इन्हें फिट करूं- वास्तविक रिश्ता तय हो- नहीं, नहीं- जात-पांत मैं नहीं मानता, खुद दूसरी 'कास्ट' में शादी की है, बेटी भी बाहर ही गयी है। मगर ये सब पता, जानकारियां मिलने से दिमाग को सुकून मिलता है, अपने से ऊंचा है तो बराबर लाने में और नीचा है तो उठाने की 'उदारता', संतोष और गर्व देती है। महिला तो एक बार चेहरे और उम्र के हिसाब से माफ की जा सकती है- मगर पुरुष का तो पता होना ही चाहिए- और यह जिज्ञासा मेरे लिए उतनी ही स्वाभाविक है जितनी एक सुंदर महिला को देखकर उसके विवाहित-अविवाहित होने की बात जानना... आदमी की जात और औरत की हैसियत सीधे पूछने में झिझक लगती है, इसलिए दूसरे तरीकों या उसी की बातों से दो और दो चार करता रहता हूं.. सच बात यह है कि हजारों सालों से आदमी को आदमी की तरह देखने का मेरे पास कोई संस्कार ही नहीं है, मैं सामने वाले के साथ अपना संबंध और व्यवहार उसकी जाति और क्षेत्रीयता से तय करने के लिए अभिशप्त हूं.. हर जाति के लिए मेरे मन में पहले से तय फॉर्मूले हैं, और हर व्यक्ति के प्रति मेरा रवैया प्रायः उन्हीं फार्मूलों से तय होता है। "जगजीवन राम थे तो चमार ; लेकिन साब, कितने इंटेलिजेंट, कितने ऐफिशिएंट, कितने दूरदर्शी और कितने लकी... " या "अरे भाई, शेर का बच्चा है कहीं तो गुर्रायेगा ही... "हर जाति को नीच, कमीना और दुष्ट सिद्ध करने के लिए मेरे पास न जाने कितने लोक विश्वास और मुहावरे-कहावते हैं- लेकिन सच बात यह है कि मेरे अवचेतन में आदमी के नाम, हैसियत और व्यक्तिगत उपलब्धियों का कोई महत्व नहीं है- आधारभूत बात है उसकी जाति... बाकी बाते तो मैं 'लेकिन' या, 'होते हुए भी', या- 'इसलिए' लगाकर तय कर लूंगा... मेरे लिए आदमी नहीं, सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि उसका जन्म कहां हुआ है?

       और यहीं मुझे स्वीकार कर लेना चाहिए कि ऐतिहासिक, धार्मिक और दार्शनिक बकवास मैं चाहे कितनी बघारता रहूं, मुझसे या किसी भी हिंदू से ज्यादा सांप्रदायिक, संकीर्ण, घुन्ना, टुच्चा या क्रूर व्यक्ति शायद ही दुनिया में कोई दूसरा हो... चूंकि 'दुनिया का सबसे पुराना धर्म' होने का दंभ मेरे साथ है, इसलिए जन्म के आधार पर ही आदमी आदमी को बांटकर उसका कद तय करने की मानसिकता मेरा संस्कार ही नहीं- मेरे अस्तित्व की एकमात्र शर्त है। सामाजिक रूप से मैं हमेशा हर दूसरे को उन अपराधों के लिए बेहद क्रूरता से सजा देता रहा हूं, जिनमें न उसका वश है, न चुनाव। अहंकार और असहिष्णुता- हर हिंदू के सिर्फ यही दो जातीय गुण हैं। और जाति की सीढ़ी पर जो जितना 'ऊंचा' है वह उतना ही 'गुणी' है। अपने से नीचे वालों को हमने कभी विकास के अवसर नहीं दिये- मजबूरी में सिर्फ 'रियायतें' दी हैं, इस महान उदारता के लिए अपनी पीठें थपथपाते हुए.. पहला मौका लगने पर उसे उसकी 'औकात' बता देने के अवसर की प्रतीक्षा करते हुए... और इसके लिए हमारे मन में कोई खेद, क्षोभ या कचोट भी नहीं है।

मैंने किसी भी जाति में जन्म लिया हो, दूसरे को अपने से 'नीचा' सिद्ध करने के मेरे पास शास्त्र-सम्मत तर्क हैं- एक ही जाति होते हुए भी और कुछ नहीं तो 'पूरब' और 'पछांह' का अन्तर करके ; किसी नदी-पहाड़ के इधर या उधर होने का आधार देकर सामने वाले से घृणा करना उसे नीचा दिखाना ही मेरी ख़सलत है।

     मूलतः हम आत्मांध लोग हैं। पश्चिमी देशों की रंगभेद नीति और अमेरिका के काले-गोरों के अत्याचार देखकर ऊपर से 'छिः, छिः' करते हैं, मन ही मन खुश होते हैं और अपने भीतर कूट-कूटकर भरी सांप्रदायिकता को जायज़ समझते हैं। अपने हर अपराध और गलत कर्म के 'जायजीकरण' के लिए हमारे पास 'दार्शनिक तर्क' , एतिहासिक कारण और व्यावहारिक मजबूरियां हैं.. दसियों बरस भारतीय कैबिनेट के योग्यतम मंत्री और देश को बम्पर फ़सलें या हजारों साल बाद 'दुश्मनों' पर भारत को विजय का गौरव दिलाने वाले जगजीवन राम का एक ही वाक्य हिंदू समाज पर आज तक की सबसे क्रूर टिप्पणी है। जनता राज में उन्हें प्रधानमंत्री बनाये जाने का आश्र्वासन था और बन गये मोरारजी देसाई। गुस्से से लात मारकर बाबूजी ने टी.वी. तोड़ दिया थाः " ये ब्राह्मण कभी किसी चमार को प्रधानमंत्री नहीं होने देंगे.." हम इस वाक्य के कोड़े का दर्द नहीं महसूस करते ; सिर्फ एक और तर्क थमा देते हैं- "अमेरिका में कोई काला बनकर दिखाये वहां का प्रेसि़डेंट.."

       हजारों बरसों से सामाजिक अन्यायों और अत्याचारों, अपराध-बोध से पीड़ित हिंदू आत्मा को 'शांति' की बेहद तलाश है, इसलिए हम साथी मनुष्य के लिए सबसे अधिक अहसान-फ़रामोश और विश्वासघाती लोग हैं। हम 'नीचों' से अपने मंदिरों का एक-एक कंगूरा-कलश, पूजाग्रह सभी कुछ बनवायेंगे- कुएं बनवायेंगे, खेत जुतवायेंगे, फसलें लदवायेंगे- और सबसे पहले उन्हीं का वहां प्रवेश वर्जित कर देंगे ; जिस मूर्ति को कल तक मैंने अपने पांव के पंजों में दबाकर बारीक छेनी-हथौड़ी से तिल-तिल तराशा है- कल मुझे उसके दर्शन का अधिकार नहीं होगा... जिस रसोई के हर चूल्हे और आले को मैंने बनाया है उसके पास जाने पर मेरा सिर फोड़ दिया जायेगा.. जिस रामायण, महाभारत को लिखकर मैंने लाखों परोपजीवी, जोंक और निकम्मे ब्राह्मणों की हजारों पीढियों के लिए हलुआ-पूरी 'भकोसने' का इंतजाम किया है- वही मुझे भंगी (वाल्मीकि) और हरामजादा मछुआरा (वेदव्यास) बताकर एक तरफ दुत्कार देंगे- स्वतंत्र-भारत की सबसे महत्वपूर्ण पुस्तक 'भारतीय संविधान' तैयार कराने वाला नीच और फ्रस्ट्रेटेड चमार है, क्योंकि उसने आपके शास्त्रों और व्यवहार के चिथड़े उड़ाने का दुस्साहस किया है... और तो और, औरत को इसलिए जला देना, मार देना चाहिए कि उसने आपको जन्म दिया है... हम आदमी, हिंदू और भारतीय होने के लिए निरंतर अपने आपको और अपनों को सजा देते रहते हैं... जिन्होंने हमें जीवन, आस्था और अस्मिता दी है, उन्हें कभी माफी नहीं मिलेगी... करोड़ों लोगों से हमने मानवीय गरीमा, नाम-सम्मान सभी कुछ छीना है, शस्त्र और शास्त्र दोनों को उनकी पहुंच से बाहर रखा है ताकि सिर उठाकर बोल न सकें- प्रतिशोध न कर सकें और हमारी गंदगी ढोने में ही जीवन की सार्थकता मानते रहें... वह तो चंद्रगुप्त और शिवाजी ने हमारी खोपड़ी पर पांव रखकर अपने को क्षत्रिय मनवा लिया ; वर्ना हम किसी को ऊपर आने देते?

      हम मूलतः घूसखोर और दुमुंहे चरित्र के लोग हैं। किस अपराध, पाप या सुविधा के लिए किस 'देवता' की 'पूजा' करने से मुक्ति मिलेगी- यह हमारे धर्मशास्त्रों ने ही हमें सिखाया है। जिंदगी और सोच को दो अलग ध्रुवांतों पर रखने की कला हमने खुद विकसित की है। ढोंग और आडंबर हमारी जिंदगी की अनिवार्य शैलियां हैं ; जिस शूद्र की हम छाया से बचते हैं, कल धर्म-परिवर्तन के बाद वह बिल्कुल दूसरा आदमी हो जाता है- हमारी वर्ण-व्यवस्था के खूनी चंगुल से बाहर... हम व्यवसाय और व्यक्तिगत जीवन की नैतिकता को भी आपस में नहीं मिलाते। मैं नकली चीजें बनाता हूं, जीवन-रक्षक दवाओं और खाने-पीने की चीजों में जहरीली मिलावट करता हूं, लड़कियां बेचता हूं,

वेश्यावृत्ति-जुए से रुपये कमाता हूं, घी में चर्बी मिलाता हूं, तो वह मेरा 'बिजनैस' है, व्यवसाय है। उससे मेरे व्यक्तिगत जीवन का क्या संबंध? वहां मेरी पूजा पाठ, दान-दक्षिणा का क्या लेना-देना... दुहरे जीवन-मूल्य, दुहरी नैतिकताएं ही हमारा चरित्र हैं.. मैं तो कर्म करता हूं, फल से मुझे क्या? कोई मरता या जीता है- यह उसके अपने कर्म हैं।

     चूंकि हम कायर और डरपोक हैं, इसलिए हिंसा नहीं करते- खून देखकर उल्टियां करने लगते हैं- 'उन्हें' बर्बर और हिंसक पशु मानते हैं क्योंकि 'वे' अहिंसा के समर्थक नहीं हैं। हां, हम वॉयलैंट (हिंसक) नहीं, सिर्फ 'कैलस' (नृशंस और क्रूर) हैं। हम छुरा और बंदूक नहीं मारते, सिर्फ जलाते और डुबाते हैं। एक तीली या एक धक्का- बस, इसके बाद तो आग और पानी खुद संभाल लेंगे- हरिजन बस्तियां हों, 'विधर्मीं' दुश्मन हों या घर की बहू-बेटियां-हमें मिट्टी का तेल पेट्रोल और माचिस दे दीजिए फिर आप भी आराम से घर जाकर सोइए, हम भी लंबी तानते हैं- जो जलेंगे वो रो-पीटकर खुद ठंडे हो जायेंगे_

       हां, हम सांप्रदायिक नहीं हैं। हरेक को हमने गले लगाया है, अपने भीतर समेट और समा लिया है- इतिहास गवाह है- हम सांप्रदायिक कैसे हो सकते हैं? सांप्रदायिक और कठमुल्ले तो 'वो' हैं जो.. इसीलिए इस सबके बावजूद गर्व से कहो कि हम हिंदू हैं.. ये सच्चाइयां हैं जो साहित्य आज हमारे सामने रख रहा है और इस आत्म-साक्षात्कार से हमारे रोंगटे खड़े होते हैं- हम इस शीशे को ही तोड़ देंगे.. इसलिए आइए, कुछ सौंदर्यशास्त्र और आस्वाद के बारीक धरातलों की बात की जाये।   

 (पुस्तकः 'गुलामी का आनंद और स्वतंत्रता के खतरे' से साभार) 

 

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