उत्तर प्रदेश में दलित नेताओं की मूर्तियाँ

श्यामा प्रसाद को हाँ है तो भीमराव को क्यों नहीं.
दिलीप मंडल
दिल्ली की सबसे ऊंची इमारत का नाम जनसंघ के संस्थापक श्यामाप्रसाद मुखर्जी के नाम पर रखा गया है। ये इमारत दिल्ली नगर निगम की है और इस समय दिल्ली नगर निगम में भारतीय जनता पार्टी का बहुमत है। इसलिए माना जा सकता है कि बीजेपी जिन लोगों से प्रेरणा लेती है और जिन्हें महान मानती है, उनके नाम पर किसी सरकारी इमारत का नाम रखने का उसे अधिकार है। इस बात पर न तो कांग्रेस ने सवाल उठाया है न ही वामपंथी दलों ने और न ही सपा, बसपा या राजद ने। सभी राजनीतिक पार्टियां इस राजनीतिक संस्कृति को मानती हैं कि सत्ता में होने के दौरान वे किसी सरकारी योजना या भवन, पार्क, सड़क, हवाई अड्डे या किसी भी संस्थान का नाम अपनी पसंद के किसी शख्स के नाम पर रख सकती हैं। इस मामले में राजनीतिक दलों के बीच आम सहमति है। इसलिए जिस जनसंघ की विचारधारा और परंपरा से सेकुलर दलों को इतना परहेज है, उसके संस्थापक के नाम पर किसी सरकारी इमारत का नाम रखे जाने को लेकर कहीं किसी तरह का विवाद नहीं है।
इस मामले में एकमात्र व्यतिक्रम या अपवाद या विवाद आंबेडकर और कांशीराम की स्मृति में बनाए गए पार्क और स्थल हैं। इस देश में हर दिन किसी न किसी नेता की स्मृति में कहीं न कहीं कोई शिलान्यास, कोई उद्घाटन या नामकरण होता है, लेकिन विवाद सिर्फ तभी होता है जब किसी दलित या वंचित नायक के नाम पर कोई काम किया जाता हो। ऐसा भी नहीं है कि विवाद सिर्फ तभी होता है, जब बहुजन समाज पार्टी किसी दलित नायक के नाम पर कोई काम करती है। कांग्रेस के शासनकाल में मराठवाड़ा विश्वविद्यालय का नाम भीमराव आंबेडकर के नाम पर रखे जाने को लेकर कई दशकों तक हंगामा चला और कई बार विरोध ने हिंसा का रूप भी ले लिया। लगभग दो दशक तक नामांतर और नामांतर विरोधी आंदोलन और हिंसा तथा आत्मदाह की घटनाओं के बाद जाकर 1994 में मराठवाड़ा विश्वविद्यालय का नाम बाबा साहब आंबेडकर मराठवाड़ा विश्वविद्यालय रखा जा सका। नामांतर विरोधी आंदोलन को लगभग सभी बड़े राजनीतिक दलों का खुला या प्रछन्न समर्थन हासिल था।
नामांतर आंदोलन के बाद देश में इस तरह का सबसे बड़ा विवाद उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी के शासन काल में बनाए जा रहे स्मारकों को लेकर है। इस विवाद में विरोधियों के पास मुख्य रूप में ये तर्क हैं कि उत्तर प्रदेश जैसे गरीब और पिछड़े राज्य में सरकार इतनी बड़ी रकम स्मारकों पर क्यों खर्च कर रही है। दूसरा तर्क ये दिया जाता है कि बहुजन समाज पार्टी सिर्फ अपनी विचारधारा के नायकों के नाम पर स्मारक क्यों बनवा रही है। यह आरोप भी लगाया जाता है बहुजन समाज पार्टी ये सब राजनीतिक फायदे के लिए कर रही है। ये सारे तर्क बेहद खोखले हैं। अगर इन्हें दूसरे दलों की सरकारों पर लागू करके देखा जाए, तो इनका खोखलापन साफ नजर आता है। राजघाट, गांधी स्मृति, शांति वन, वीर भूमि, शक्ति स्थल, तीनमूर्ति भवन, इंदिरा गांधी स्मृति, दीन दयाल उपाध्याय पार्क आदि-आदि हजारों स्मारकों पर आने वाले खर्च की अनदेखी करके ही बहुजन समाज पार्टी सरकार पर इस मामले में फिजूलखर्ची का आरोप लगाया जा सकता है।
कांग्रेस ने अपने पार्टी से जुड़े नायकों के नाम पर जो कुछ किया है, उस पर आए खर्च की बराबरी बहुजन समाज पार्टी शायद कभी नहीं कर पाएगी। इस देश में जितने गांधी पार्क और नेहरू पार्क हैं, उतने फुले, आंबेडकर और कांशीराम पार्क बीएसपी अगले कई दशक में नहीं बना पाएगी। ये बराबरी का मुकाबला नहीं है। बीजेपी भी अपने नायकों की प्रतिमाएं और स्मारक खड़े करने में पीछे नहीं है और ये सब सरकारी खर्च पर ही होता है। हेडगेवार, गोलवलकर, विनायक दामोदर सावरकर, दीनदयाल उपाध्याय और श्यामाप्रसाद मुखर्जी के नाम को चिरस्थायी बनाने की बीजेपी ने भी कम कोशिश नहीं की है। यहां तक कि अटल बिहारी वाजपेयी के नाम पर केंद्र सरकार का एक सूचना प्राद्योगिकी संस्थान ग्वालियर में है और हिमाचल प्रदेश में भी वाजपेयी के नाम पर एक माउंटेनियरिंग इंस्टिट्यूट है। अपने नायकों को स्थापित करने में कांग्रेस और बीजेपी की तुलना में समाजवादी पार्टी, आरजेडी, बीएसपी जैसी पार्टियां काफी पीछे हैं। देश के ज्यादातर सरकारी अस्पतालों, पार्कों, सड़कों, शिक्षा संस्थानों, पुलों, संग्रहालयों, चिड़ियाघरों पर कांग्रेस के नेताओं के नाम हैं और इस गढ़ में बीजेपी ने थोड़ी-बहुत सेंधमारी की है। ये संयोग हो सकता है कांग्रेस और बीजेपी जिन नायकों के नामों को चिरस्थायी बनाने के लिए उनके नाम पर कुछ करती है, उनमें लगभग सभी सवर्ण जातियों के हैं। जबकि बीएसपी ने जिन महापुरुषों के नाम पर स्मारक बनाए हैं, वे सभी अवर्ण हैं। सिर्फ इस एक बात को छोड़ दें तो कांग्रेस, बीजेपी और बीएसपी में कोई फर्क नहीं है।
कुछ लोगों को इस बात पर एतराज हो सकता है कि गांधी और नेहरू जैसे नेताओं को खास जाति या पार्टी से जोड़कर बताया जा रहा है। यहां सवाल उठता है कि आंबेडकर जैसे विद्वान और संविधान निर्माता को दलित नेता के खांचे में फिट किया जाता है और उनके स्मारकों की अनदेखी की जाती है(दिल्ली में जिस मकान में रहने के दौरान उनका देहांत हुआ, उसके बारे में कितने लोग जानते हैं और इसकी तुलना गांधी स्मृति या तीन मूर्ति भवन से करके देखें) तो जाति के प्रश्न की अनदेखी कैसे की जा सकती है। एक विश्वविद्यालय का नाम आंबेडकर के नाम पर रखने के सरकार के फैसले को अगर दो दशक तक इसलिए लंबित रखा जाता हो कि कुछ लोग इसके खिलाफ हैं, तो इसकी जाति के अलावा और किस आधार पर व्याख्या हो सकती है? जाति भारतीय समाज की एक हकीकत है और जिसने जाति की प्रताड़ना या भेदभाव नहीं झेला है, वही कह सकता है कि भारत में जाति का असर नहीं है। जाति का अस्तित्व और उसके प्रभाव को संविधान भी मानता है और कानून भी। जो जाति को नहीं मानते, उन्हें भी कोई न कोई जाति अपना मानती है।
ऐसे में सवाल सिर्फ इतना है कि गांधी, नेहरू, इंदिरा गांधी, हेडगेवार और श्यामाप्रसाद मुखर्जी की स्मृति को जिंदा रखने में अगर कोई बुराई नहीं है तो फुले, शाहूजी महाराज, आंबेडकर, कांशीराम की स्मृति को स्थायी बनाने के लिए प्रयास करने में कोई दोष कैसे निकाला जा सकता है? पिछड़ी और दलित जातियों के मुसलमानों के नायकों की भी स्थापना होनी चाहिए। बल्कि ये वे काम हैं, जो स्थगित थे और उन्हें अब पूरा किया जाना चाहिए। आखिर हर किसी को अपने नायक चाहिए। महाविमर्श के अंत के बाद अब कोई नायक हर किसी का नायक नहीं है। आज दलित और वंचित अपने नायकों की स्थापना कर रहे हैं। देश के लिए ये शुभ है। इससे घबराना नहीं चाहिए।
(यह लेख 28 अप्रैल को नवभारत टाइम्स के संपादकीय पेज पर छपा है)


Saturday, October 15, 2011

मूर्तियां बनाने से कुछ नहीं होता ???? मूर्तियों से कुछ तो होता होगा।

DILIP MANDAL..
मूर्तियां बनाने से कुछ नहीं होता, यह बात उन्हें भी तो समझाएं जिन्होंने गली-गली में बने मंदिरों में किसिम-किसिम की मूर्तियां लगाई हैं और जिन्होंने गांधी-नेहरू-इंदिरा-पंत-दीनदयाल आदि की मूर्तियों से देश के चौराहे भर दिए हैं। मूर्तियों से कुछ तो होता होगा। प्रमुख राजनीतिक धाराओं में लोहियावादियों के अलावा मूर्ति परंपरा से कोई दूर नहीं है। खास तरह की मूर्तियों का समर्थन किया जाता है और खास मूर्तियों का विरोध। और आपको लगता है कि लोगों को बात समझ में नहीं आएगी।


राजघाट बनाने से किसी को क्या मिला? या शांति वन या शक्ति स्थल? उस जमीन को बाजार भाव पर बेचा जाए तो क्या हर जिले में एक AIIMS नहीं बनाया जा सकता है? दो-तीन लाख करोड़ की तो जमीन होगी यमुना के पश्चिमी किनारे पर, जहां स्मारक बने हैं।स्कूलों से इतना प्यार है तो राजघाट की जमीन बेच दें। हजारों स्कूल बनाने का खर्च निकल जाएगा। 


दिल्ली में मोतीलाल नेहरू कॉलेज, कमला नेहरू कॉलेज और कस्तूरबा गांधी पार्क का आपने जरूर विरोध किया होगा?

ऐसा ही विरोधी गांधी-नेहरू की मूर्तियां लगाने पर होता, तो आपकी बात सुनी जाती।अब तो नीयत पर सवाल खड़ा होगा। 

एक प्रतीकवादी, दूसरे प्रतीकवादी की इस आधार पर निंदा नहीं कर सकता है कि देखो, वह प्रतीकवाद कर रहा है।


राजीव गांधी की नानी तक के नाम पर सरकारी कॉलेज बने हैं। किसी को शिकायत नहीं होती। खेल को नियम से खेलने की बात हो रही है तो फाउल-फाउल चिल्ला रहे हैं। शिकायत सिर्फ इतनी सी है कि दूसरा भी खेलने लगा है। खाली मैदान में गोल मार रहे थे, तो कितना मजा आ रहा था।

दिल्ली में यमुना के पश्चिमी तट की गलतियां अगर आपको नहीं दिखतीं तो पूर्वी तट पर जो हो रहा है उसकी आलोचना करने की विश्वसनीयता आपकी नहीं है।


SANJAY SAMANT

पैसा सरकारी है , लेकिन उसका बड़ा हिस्सा मजदुर , कारीगर , इनके पास ही गया है..
और ये राशि कुल बजेट के १ प्रतिशत है.. रही बात विकास की, वो भी कर रही है बी एस पी सरकार..मीडिया जो दिखाता है वो अगर विकास माने तो ये  धारना अभी सही होने के चांसेस कम है..मीडिया ने ७०० करोड़ का आकडा जनता तक पहुँचाने का नेक काम तो किया है.. शांतिवन, राजघाट , कमला नहरू पार्क और राजीव गाँधी मेमोरिअल क्या परदेस से राशि मंगाकर बनाए है ?? और इसका निर्माण खर्च  आज तक किसी मीडिया ने दिया भी नहीं है.. शायद इसका निर्माण खर्च अभी तय हुआ ही नहीं है..

RAKESH SAMMAURYA

हम उन काल्पनिक चरित्रों की मूर्तियाँ नहीं लगा रहे हैं जिन्होंने हर अमानवीय कार्य किया और आज तक मानव के सर्वांग शोषण का माध्यम बने हुए हैं फिर भी उन दुष्टों को भगवान के रूप में प्रचारित कर आम आदमी को ठगा जा रहा है और उनके दलाल अय्याशियों और विलासिताओं में डूबे हैं. इस धंधे में मुब्तिला लोगों को हमारे प्रयास ज़रूर परेशान करेंगे जिसमें उन महापुरुषों और नायकों को सम्मानित करने की नीयत और दृढ संकल्प है जिन्होंने अपने अपने जीवनों की कुर्बानियां देकर मानवीय जीवन और गरिमामय पूर्ण बनाने को संघर्ष किया. इन महापुरुषों के प्रेरनादायी जीवन को अंधकर में रखकर ही इन धंधेबाजों की ठगी निर्बाध रूप से चल सकती है. मैं इस आलोचना को निहित स्वार्थी तत्वों का व्यर्थ का प्रलाप से अधिक manane को तैयार नहीं.


DINESH KUMAR

भवन किले ,पार्क बनवाना तो राजाओ की परम्परा है भारत के सभी राजाओ महाराजो ने ये काम किया था और किसी ने विरोध नहीं किया था
आज बहिन जी ये काम कर रही हैं तो जलन क्यों हो रही है आप लालकिला,ताजमहल,कुतुबमीनार,
किसी किले,किसी गांधी के नाम पर बने स्मारक,भवन आदिपर जाओ तो उसे देखकर किसका इतिहास याद किया जायेगा 

उन्ही का ना जिन्होंने उसको बनवाया देश भर में गांधी,नेहरु के नाम पर हजारों स्मारक भवन बने हैं लेकिन उसको कोई नहीं कहता कि इसमें जनता की गाढ़ी कमाई लगी है ,,ये भेदभाव की सोच नहीं है तो क्या है
 ? इसी सोच वालो को जवाब देने के लिए देश भर में स्मारकों और पार्को का निर्माण होना जरुरी है.....क्योकि दलितों को अपना इतिहास स्वयं बनाना है आगे आने वाले समय में सभी पोंगे ,पाखंडी याद करेंगे कि किसी दलित लौह महिला ने हम पर ऱाज किया था .

PRACHAND NAG

जब लोग बहन मायावती का विरोध करते हैं तो न जाने क्यों मैं उनके पक्ष में अनायास स्वयं को खड़ा पाता हूँ । आज नोयडा पार्क के उदघाटन पर भी ऐसा ही महसूस कर रहा हूँ । ब्राह्मण और उनके पिटठू विरोध कर रहे हैं । न जाने कैसे कैसे कुतर्क गढ़ रहे हैं । इतना पैसा यदि दलितों की स्थिति पर खर्च किया जाता तो यह होता वह होता । मेरा उनसे कहना है । क्या तुम हमारा सचमुच भला चाहते थे ? क्या अब भी सचमुच भला चाहते हो ? तो फिर विभिन्न बहानों से हमारा सत्यानाश क्यों कर रहे हो ! आरोप बहुत हैं । हमने 2000 सालों के इतिहास से यह सीखा है कि तुम्हारी बात कभी भी न मानी जानी चाहिए। क्योंकि तुम जो भी करते -कहते हो जब भी कहते हो वह हमारे विरोध में ही होता है। सारा इतिहास गवाह है । जब मुगल आए तब भी और जब अंग्रेज़ आए तब भी तुमने हमें गुलाम बनाए रखा । और जिस जिस ने हमें आज़ाद करने कि कोशिश की तुमने उनसे सम्झौता किया और हमें गुलाम ही रखा। तुम सभी से यही सम्झौता करते हो कि सब करना लेकिन इन्हें आज़ाद मत करना । तब तुम्हारा कहना क्यों माना जाए ? हमारी समस्या रोटी-कपड़ा-मकान नहीं है । वह तो हम बना ही लेंगे । हमारी समस्या है कि तुमने हमें गुलाम बनाकर हमारा सब कुछ छीन लिया । और अब जब सब कुछ पाना है तो पहले आज़ादी ही पानी होगी । आज़ाद वही हो सकते हैं जिनमें स्वाभिमान शेष है । हमारे महापुरुषों की मूर्तियाँ हममे साहस का संचार करती है । वह बताती है कि अभी समर शेष है ! और यही बात है जिससे तुम डरते हो .

SANAT SINGH

लखनऊ में आंबेडकर पार्क के बगल में एक लोहिया पार्क भी है, लम्बा चौड़ा..उसमे लोहिया की मूर्ति भी कुछ कम विशाल नहीं है..बगल से गुजर रहे बाइपास के साथ लोहिया पथ भी बनवाया था उनके स्वनाम धन्य शिष्यों ने...खैर अपने अपने देवता हैं..


SANTOSH KUMAR PANDE

At least, after the gap of centuries, creation of some architectural beauties are taking place in Uttar Pradesh. Thanks to Mayawati. At the same time, She should not built her own statues as it’s like self glorification. She must concentrate on providing quality governance in the State and her statues will come and sprang throug out the state very naturally in future.

JAYANT RAMTEKE

The grand memorial for the social revolutionary heroes from Bahujan Samaj - Mahatma Jyotiba Phule, Chatrapati Rajshri Shahu Maharaj, Guru Ghasidas, Sant Kabir , Birsa Munda, Sri Narayana Guru and the Indian nation Builder Bodhisatva Dr Babasaheb Ambedkar , is finaly inaugurated at Noida by Chief Minister of Uttar Pradesh and BSP Supremo Bahen Mayawati.
This is a big slap on the face of casteist
 Congress/BJP and their leaders who have all along denied a rightful place to the Sant, Gurus and Mahapurush from the Bahujan Samaj. While the politicians of Congress like Mohandas Gandhi, Nehru, Indira, Rajeev and even notorious Sanjay Gandhi have got 1000s of acres of space along the bank of Yamuna in Delhi for their memorials , the same was denied to the Father of Indian Constitution Dr Babasaheb Ambedkar. The inauguration of the 'National Monument for the Dalit Inspiration' at Noida has set right the injustice and humiliation metted out by ruling savarna caste leaders of Congress and BJP, to the Sant, Gurus and Mahapurush from Bahujan Samaj . 
For the people who look at these parks wearing a casteist spectacle and those with savarna caste feudal mindset, the money spent on these parks is a waste. But for the millions and millions of people from Bahujan Samaj whose many generations have been stripped off cultural identity for past 2500 years, the monuments like the onse in Lucknow and Noida, help them resurrect their cultural identity and reconstruct their glorious past.



DILIP MANDAL..

जीते जी अटल बिहारी वाजपेयी के नाम पर संस्थान खुल गए। भारत सरकार ने खोला है। http://www.iiitm.ac.in/
उत्तर प्रदेश को बेचारा और लाचार किसने बनाया। उत्तर प्रदेश 1995 में आजाद नहीं हुआ था?मुलायम सिंह-मायावती के आने से पहले उत्तर प्रदेश क्या धरती का स्वर्ग था?


DALIT MAT

सब अद्भुत था. लग रहा था चारो ओर मैं ही मैं हूं, हम ही हम हैं. हमारी सरकार, हमारे लोग, हमारे पूर्वक, हमारे नायक. एक क्षण को भूल गया कि पत्रकार हूं. लोगों के साथ उन्हीं की लय में बह गया. जब लोगों ने आवाज दी, बाबा साहब....मैं भी कह पड़ा 'अमर रहें'. मायावती जी ने यह अद्भुत काम किया है. उन्हें धन्यवाद।। और भी बहुत बातें हैं वेबसाइट (www.dalitmat.com) पर लिखूंगा, आप सबसे साझा करुंगा. तब तक आपके लिए फोटो लेकर आया हूं, देखिए. महसूस कीजिए, गौरव कीजिए.

इस प्रेरणा स्थल के निर्माण को पैसों की बर्बादी कहने वालों से भी सवाल पूछा जाना चाहिए कि गांधी और नेहरू के नाम पर देश भर में बने सैकड़ों स्मारकों पर कितना खर्च आया, वो भी इसका हिसाब दें. उनसे पूछा जाना चाहिए कि जिस दिल्ली में कांग्रेस सरकार ने बाबा साहेब के नाम पर होटल ली-मेरिडयन के बगल में जनपथ रोड पर पांच फ्लैट दे दिया और जिस पर भव्य पुस्तकालय बनाना था, वह अभी तक क्यों नहीं बन पाया है. जिस दिल्ली

 में देश के एक बड़े तबके के रहनुमा भारत रत्न बाबा साहब अंबेडकर ने अंतिम सांस ली, उन्हें कांग्रेस की सरकार या फिर भाजपा की सरकार ने क्या सम्मान दिया. इस बहुजन समाज को इस स्मारक पर कोई ऐतराज नहीं. जिन्हें ऐतराज है, वो हमारे ठेंगे पे. ऐसे पार्क और बनने चाहिए. 

पूरी खबर पढ़ने के लिए नीचे लिंक पर जाएं.......।।

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ANOOP KUMAR

Oh My God, media forgot to tell, even give a hint to us that Maya inaugurated actually not 1 but 2 of her pet projects yesterday - Rs 687 crore Memorial and Rs 600 crore Dr Ambedkar Multi-specialty hospital !I will not vote for Mayawatiji this time, for not appointing someone who can create at least Wikipedia entries for all her "pet projects" like hospitals, medical colleges, universities, hostels, libraries, sports facilities etc for us to actually calculate how much money she wasted..


ANIL SUTAR

इस पार्क में हमने 11 भव्य मूर्तियां बनाई हैं. मायावती जी की इच्छानुसार 18 फीट की ऊंचाई की इन मूर्तियों के ज़रिए लोग सभी दलित नेताओं और सुधारकों को एकसाथ देख पाएंगे. साथ ही इमारतों के अंदर मौजूद भित्ती चित्रों के ज़रिए इन महान नेताओं के जीवन चित्र को सजीव करने की कोशिश की गई है. इनृसके अलावा हमने शायद विश्व के सबसे पड़े फव्वारों के रुप में 52 फीट ऊंचे दो फव्वारे भी बनाए हैं."

RAJEEV KUMAR

और जब आखिर में बोला---जय भीम, जय भारत !!

तब मानो ऐसा लग रहा था भीम राज आ गया है ....
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