Hinduism and faith - हिदू धर्म और आस्था

फेसबुक पर कई बार बहुत बढ़िया नोट्स पढ़ने को मिलते हैं जिनकी भाषा और विषयवस्तु बहुत महत्व की होती है. उनमें से दो को यहाँ संभाल कर रख रहा हूँ.

गिरिजेश्वर प्रसाद

दरअसल, हिन्दू धर्म को कई नामों से जानते हैं. सनातन धर्म,ब्राह्मण धर्म आदि. हिन्दू धर्म ब्राह्मणों द्वारा ब्राह्मणों को श्रेष्ठ बनाए रखने के लिए चलाया गया धर्म है, इसलिए इसे ब्राह्मण धर्म भी कहा जाता है. इसे ब्राह्मणवाद भी कहा जाता है. इस धर्म में ब्राह्मणों ने भारतीय समाज को जातियों में बाँट दिया. ब्राह्मणों ने खुद को सर्वश्रेष्ठ घोषित कर दिया और शेष को नीचे रखा. नीचे वालों में क्षत्रिय और वैश्य को एक वर्ग में रखा और बाकी को शूद्र-मलेच्छ की श्रेणी में रखा. इस सबसे निचले वर्ग का काम उपर के वर्णों की सेवा करना तय किया गया. इसी के साथ इस वर्ग की दयनीय हालत के लिए ब्राह्मणों ने खुद की बनाई विधान को दोषी नहीं ठहराया, बल्कि इसके लिए पूर्व जन्म के कर्मों और भाग्य को जिम्मेवार बताया. हजारों वर्षों से इस विधान को इस तरह लागू किया जाता रहा कि निचला वर्ग मान बैठा कि उनकी हालत के लिए उनका पूर्व जन्म और भाग्य ही जिम्मेवार है. वे ब्राह्मणों की धूर्त बातों में आ गए और मान गए कि भाग्य में लिखा बदला नहीं जा सकता है. शायद यही कारण है इस वर्ग में आम तौर पर अपनी बदहाली के लिए उस तरह का आक्रोष परिलक्षित नहीं होता है, जैसा होना चाहिए. यदि ऐसा हुआ होता तो यह हिन्दू धर्म और इसके विधान कब के खत्म हो गए होते. निचले वर्ग में वास्तविक शिक्षा, चेतना की कमी और सपनों का न होना ही हिन्दू धर्म को इस रुप में बचाए हुए है. इसके बावजूद इसी वर्ग में एक बहुत ही छोटा तबका है, जो वास्तविक शिक्षा, चेतना और सपनों से लैस हैं और वे हिन्दू धर्म के विधान को सीधे नकारते हैं. ब्राह्मणों की और ईश्वर की सत्ता को ठेंगा दिखाते हैं. वे समझते हैं कि समाज में जिसे दलित, आदिवासी और पिछड़ा कहते हैं, वह ब्राह्मणों की देन है, उनके बनाए हिन्दू धर्म की देन है. इसलिए वे हिन्दू धर्म के खिलाफ और ब्राह्मणों की सत्ता के खिलाफ खड़े हो जाते हैं. समाज में बराबरी के लिए वे हिन्दू धर्म के कर्मकांडों को नकारते हैं. देवी-देवताओं को मानने से इनकार करते हैं. उनका मानना है कि मनुष्य किसी पूर्व जन्म अथवा भाग्य से बंधा हुआ नहीं है. वह खुद अपने वर्तमान और भविष्य का नियंता है. न्हें ही नास्तिक भी कहते हैं. ऐसे लोग पूरी ताकत के साथ हिन्दू धर्म और उसके ब्राह्मणवाद के खिलाफ लड़ते हैं. यह अलग बात है कि उन्हें अपेक्षित सफलता नहीं मिल रही है, क्योंकि एस सी, एस टी और ओबीसी में पढ़ा लिखा (डिग्रीधारी) एक वर्ग ऐसा पैदा हो गया है, जो हिन्दू धर्म और ब्राह्मणवाद का बहुत बड़ा पैरोकार हो गया है. वह ब्राह्मणों से भी कई कदम आगे जाकर हिन्दू धर्म के कर्मकांडों में विश्वास करता है. पहले समझा जाता था कि जब इस वर्ग के भी लोग शिक्षित होने लगेंगे तो समाज से जाति व्यवस्था खत्म हो जाएगी, ब्राह्मणवाद इतिहास की वस्तु बन कर रह जाएगा. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. इसके बावजूद, जैसा मैंने उपर बताया कि कुछ लोग समाज को शोषण मुक्त करने के लिए ब्राह्मणवाद को कमजोर करने में लगे हुए हैं, उन्हें ब भी उम्मीद है कि एस सी, एस टी और ओबीसी का बड़ा तबका हिन्दू धर्म और इसके ब्राह्मणवाद की हकीकत समझ जाएगा उस दिन भारतीय समाज सचमुच गुलामी से मुक्ति पा लेगा. इसी संदर्भ में यह चिंता और सवाल उभर कर सामने आ जाता है कि क्या सचमुच एस सी, एस टी और ओबीसी ब्राह्मण धर्म के खिलाफ हो सकते हैं? हकीकत तो यही है कि यह वर्ग पूरी तरह ब्राह्मणवाद के चंगुल में हैं, लेकिन इसे इसका अहसास नहीं है. इस विषय पर बहुत सारी बातें हो सकती हैं. इस पर बातें करते रहने की जरुरत भी है.



बालेंदु स्वामी

अधिकांश लोग धर्म, अन्धविश्वास और निरर्थक मान्यताओं से केवल इसलिए चिपके रहते हैं और उन आस्थाओं पर शंका होते हुए भी उन्हें इसलिए रिफ्यूज नहीं कर पाते क्योंकि उन्हें लगता है कि पुराने समय से चली आ रहीं ये रूढ़ परम्पराएँ तथा विश्वास उनके बाप-दादाओं की देन हैं और उन्हें ठुकराकर वो अपने पूर्वजों को भला कैसे मूर्ख व गलत साबित कर दें.

यदि गौर करेंगे तो पाएंगे कि वस्तुतः यही धर्म है जो कि बदलाव और विकास नहीं चाहता. आप गीता और कुरान को बदल नहीं सकते. इसीलिये धर्म लोकतांत्रिक नहीं बल्कि तानाशाही और सामन्तवादी है. इसीलिये धर्म ग्राह्य नहीं त्याज्य है और इसीलिए वह शोषण का साधन भी है. धर्म के साथ दिक्कत यही है कि जो उसकी किताबों में लिखा है वही अंतिम सत्य है और उसे चुनौती नहीं दी जा सकती और यही बात विज्ञान से पूर्णतः विपरीत है, इसीलिये धर्म और विज्ञान कभी एक साथ नहीं चल सकते. हालाँकि धार्मिक लोगों के पास धर्म, ईश्वर, आस्था, अन्धविश्वास और शास्त्रों को वैज्ञानिक बताने के अलावा और कोई चारा नहीं होता, जब कि ईश्वर सबसे बड़ी अवैज्ञानिक अवधारणा तथा अन्धविश्वास है. कई बार तो कुछ थोड़ा बहुत विचारवान आस्तिक अन्दर अपने दिल में जानते हैं कि यह गलत, मूर्खतापूर्ण और अविश्वसनीय है परन्तु उनमें इतना साहस नहीं होता (या फिर संकोच होता है) कि वो जिन्हें प्रेम और सम्मान करते हैं (उनके पूर्वज) या स्वयं को मूर्ख अथवा गलत कैसे साबित सकें. और वो फिर भेड़ की तरह लकीर पीटते चले जाते हैं.

यह निष्कर्ष न जाने कितने लोगों से हुयी मेरी बातचीत और मानव मनोविज्ञान पर आधारित है. मैं कहना यह चाहता हूँ कि विज्ञान की हर नयी खोज कुछ पुरानी आस्थाओं, सिद्धांतों और नजरियों को ख़ारिज कर देती है और एक नए प्रकाश के साथ आगे बढ़ने के लिए विकास के नए रास्ते खोलती है जबकि धर्म इसके विपरीत आपकी आस्था को पुराने के साथ ही चिपके रहने का दुराग्रह करता है.

मैं भी उसी रास्ते से चलकर आया हूँ, उसी गंदगी से निकल कर आया हूँ. मैं स्वीकार करता हूँ कि मैं गलत था यह भी मानता हूँ कि मैं मूर्ख था. मैं भी अपने पूर्वजों को प्रेम और सम्मान करता हूँ परन्तु मुझे यह भी स्वीकार करना होगा कि या तो उन्हें सत्य का ज्ञान नहीं था या फिर वो मूर्ख बन गए अथवा मूर्ख बना रहे थे. यह तो ठीक है कि वो मेरे बड़े थे, अपने थे, पूर्वज थे तो मैं उन्हें प्रेम करूँ परन्तु इसका यह मतलब नहीं है कि मैं उनकी हर उलजुलूल (शास्त्रों में लिखी) बात का अनुमोदन या अनुगमन भी करूँ.


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