हाँडी

आर्थिक मोर्चे पर खुले बाज़ार और घटते सरकारी संरक्षण ने पैसे के लिए अंधी दौड़ की सीटी बजा दी है. असुरक्षा, प्रतियोगिता, समयाभाव आदि ने नई पीढ़ी को 'मतलब की बात करो' की रिवाल्विंग कुर्सी पर बैठा दिया है. नौकरी चलाए रखने के लिए 'बोलो, और बोलो, बोलते जाओ'. अपनी वाणी को विराम मत दो. शब्दों और जानकारी से मारो, वरना स्वयं मारे जाओगे. जब समय मिल जाए खाना पेट में फेंक लो. फास्ट फूड की 'मैदा शाप्स' हर जगह मौजूद हैं. बीमार हुए तो डॉक्टर के क्लीनिक में लाइन में लगने का समय नहीं. इसलिए इंटरनेट पर अपनी दवा खोजी और कैमिस्ट भैया से ले ली. प्रातः के सूर्य को, अपने जीवन स्रोत या आत्मा को नमस्कार करना तो दूर, देखने की फुर्सत मिले तो भी सौभाग्य है.

व्यस्तता का जीवन है. काल सेंटर से रात तीन बजे ड्यूटी से लौटे और प्रभात फेरी वालों के शोर की मुसीबत आ गई. पत्रिका के पन्ने उलटे-पलटे. आकर्षक भी लगे. परंतु मन कहीं और 'ड्यूटी' दे रहा था. फ्रेंड्स सर्कल में एक पुस्तक की बड़ी चर्चा है, सो खरीद ली. यह जानते हुए भी कि इसे पूरी तरह किसी ने नहीं पढ़ा. अब वह शेल्फ में रखी तकलीफ़ दे रही है.

सच तो यह है कि नौकरी पाने के लिए पढ़ा था, वही पूँजी है. बुज़ुर्गों ने भी कहा था कि पढ़ो वही जो हाँडी चढ़े. अब जो कुछ भी बचा है वह हाँडी के चारों ओर है या हाँडी में है, जब तक पक रहा है.

यह कोई निराशावादी दृष्टिकोण की स्थापना नहीं है. जिस व्यक्ति में स्वयं को किसी भी भाव में भिगोने की आदत बाकी है वह हर हालत में सृजन करने की क्षमता रखता है. कहने का तात्पर्य यह कि जब सरस्वती बोलती नहीं है तब वह लिखती है, उकेरती है. उसे सद्भावनाओं का वातावरण दें.



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