मध्य प्रदेश में बौद्ध धर्म का अध्ययन



मध्य प्रदेश में बौद्ध धर्म का अध्ययन

(Key Note Address) by Sh. Tararam

जीवाजी विश्व विद्यालय ग्वालियर में आयोजित द्वि दिवसीय 'Buddhist Studies in Madhya Pradesh' सेमिनार में आपके विश्व विद्यालय का हृदय से आभार व्यक्त करता हूँ. इस महत्वपूर्ण राष्ट्रीय सेमीनार के उद्घाटन के अवसर पर मैं माननीया कुलपति महोदया व इस सेमिनार के समन्वयक प्रो. एस. के. द्विवेदी, Head, School of Studies in Ancient Indian History, Culture & Archaeology व इस सेमिनार के अयोजक-सचिव डॉ शांतिदेव सिसोदिया और आप सबका तहे दिल से शुक्रिया अदा करते हुए आभार व्यक्त करता हूँ कि आपने इस अवसर पर बौद्ध धर्म पर मुझे दो शब्द कहने के सुखद क्षणों का लाभ प्रदान किया.


आप सभी इस बात से भली-भांति परिचित है कि भारत में पैदा हुआ यह एक मात्र धर्म है जिसने विश्व में भारत के मान-सम्मान और गौरव को बढाया, साथ ही भारतीय संस्कृति और सभ्यता की सुहास सुगंध को करुणा और प्रेम के बल पर विश्व के कोने-कोने में अनेकानेक प्रकार से फैलाया और एक मानव संस्कृति का पथ-प्रशस्त किया. यह सब कैसे संभव हुआ? इतिहासकारों के लिए यह महत्वपूर्ण विचारणीय बिंदु है. यह भी विचारणीय है कि एक विशेष प्रकार का प्रभाव दुनिया के लाखों-लाख लोगों पर डालने वाले इस धर्म में ऐसा क्या है कि आज भी यह आकर्षण का धर्म बना हुआ है. इस धर्म की उत्पति से लेकर आज तक का इसका इतिहास किसी पहेली से कम नहीं है. यह भय और आर्त का धर्म नहीं है बल्कि आशा और प्रमुदिता का धर्म है. यह दुनिया के metempsychosis को सरल रूप में प्रस्तुत करता है. यह बिना किसी ईश्वर या सृष्टिकर्ता के जीवन को सुखमय बनाने का उपागम प्रस्तुत करता है, जिन पर विमर्श की हमेशा गुंजाइश बनी रहती है. यह बिना किसी दण्ड, बलि-कर्म या दैवीय शक्तियों के करुणा और प्रज्ञा के बल पर खड़ा धर्म है. इतना होने के बावजूद भी इसके साधक या उपासक/गृह्स्थ खुश-मिजाज और सरल-हृदयी व सेवाभावी है. उनके आराध्य स्थल या पैगोडा, मठ या विहार आदि बिना किसी विषाद या अन्धकार के आज भी अनवरत मानव-कल्याण में संलग्न है. इनकी पूजा अपने मुक्तिदाता के प्रति निष्ठापूर्वक श्रद्धा में समाहित है, जिसकी शुरुआत इस पृथ्वी पर शुद्धोधन के घर जन्म लेने वाले अद्वितीय बालक सिद्धार्थ के साधना पथ के संचलन की प्रत्येक उस क्रिया और प्रतिक्रिया से जुड़ी है जिसने उन्हें तथागत और बौद्धि पथ का राही बनाया और उसने बुद्धत्व को प्राप्त कर दुनिया में आलोक फ़ैलाया. उनके अनुयायी सारी दुनिया में उनके उत्सव मुक्त-हस्त दानशीलता और उन्मुक्त उल्लास से सम्पन्न करते हैं. ये जो बातें उल्लेखित हुई हैं, वे साधारण नहीं है बल्कि इन्हीं से बुद्ध धर्म और दर्शन का विकास हुआ है, जिस पर विमर्श करने के लिए यह सेमिनार एक महत्त्वपूर्ण मील का पत्थर बनने जा रही है. जब तक आप इन पर मंथन नहीं करते हैं तब तक आप सारगर्भित सन्देश नहीं दे सकते. वस्तुतः बौद्ध धर्म का इतिहास भारतीय इतिहास का एक अत्यंत उज्जवल एवं गौरवमय पृष्ठ है. अतः आशा है कि विद्वत जन इस अवसर पर इसके धर्म और दर्शन पर पूर्ण विमर्श करेंगे क्योंकि उसको जाने बिना बौद्ध धर्म के इतिहास को हम सम्यक रूप से समझ ही नहीं सकते हैं


जब सिद्धार्थ गौतम का जन्म हुआ, उस समय भारतीय विचारों के इतिहास में बड़ी उहा-पोह थी. जिसकी झलक हमें न केवल वैदिक साहित्य में मिलती है बल्कि त्रिपिटक साहित्य में भी इसका निदर्शन होता है. ऐसा विदित होता है कि व्यापक मानवीयता, करुणा और नैतिकता के आध्यात्मिक आन्दोलन के रूप में भारत में इस धर्म का प्रादुर्भाव हुआभारत में बुद्ध धर्म की उत्पति का प्रश्न और पृष्ठभूमि तथा उसके परावर्तन और पराभव पर बहुत कम विमर्श हुआ है. यहाँ यह ध्यान देने योग्य है कि प्राचीन भारत के लगभग 1200 स्मारकों (गुफ़ा, बौद्ध मठ, पूजा-स्थल, मन्दिर) में से 100 जैन धर्म के हैं, 200 ब्राह्मन धर्म के हैं और शेष बुद्ध धर्म के हैं. यह तीन चौथाई प्राचीन भारतीय प्रस्तर उत्कीर्ण वास्तु कला अथवा अजंता की बौद्ध चित्र कला की अनुपम श्रेष्ठ कृतियाँ इस धर्म की जीवटता को स्वतः ही प्रकट कर देते हैं. फिर भी विद्वत जन इसकी उत्पति और प्रभाव को एक वाक्य में समाहित कर देते हैं कि बुद्ध धर्म का उद्भव एक धार्मिक सुधार के रूप में हुआ या यह कि यह हिन्दू धर्म के प्रति प्रतिक्रिया थी और यह कि यह क्षत्रिय-ब्राह्मण संघर्ष का परिणाम था और भारत से अपनी तांत्रिक साधना के कारण विलुप्त हुआ या कि आंशिक रूप से शंकर की विजय के कारण हुआ. कुछ पढ़े लिखे लोग जिन्होंने बुद्ध धर्म की कुछ पुस्तकें पढ़ रखी है, वे यह अभिमत जाहिर करते हैं कि बौद्ध-धर्म हिन्दू धर्म में समाहित हो गया, बुद्ध एक महान सुधारक थे, बुद्ध एक महान हिन्दू गुरु थे, आदि -आदि. यह सुविधाजनक सिद्धांत भारत में इस कदर प्रचलित कर दिया गया है कि बौद्ध धर्म पर आप्लावित इस कचरे को फेंकने में, इस भ्रम को दूर करने में विद्वानों और इतिहासकारों को बहुत वर्षों तक गंभीर प्रयत्न करने पड़ेंगे. ऐसा करके ही वे भारत में बौद्ध धर्म के अध्ययन के रास्ते को सुगम और गतिशील बना सकेंगे एवं बौद्ध अध्ययन का विकास कर सकेंगे.


ऐतिहासिक रुप से देखा जाय और पुरातात्विक साक्ष्यों एवं कला-संस्कृति की गवेषणाओं को परखा जाय तो बौद्ध धर्म कभी भी ब्राह्मण धर्म की तरह कपोल कल्पना या कथा-किंवदंती नहीं रहा है. कला, साहित्य, भाषा, नैतिकता, रहस्यवाद, दर्शन, प्रमाण, या ज्ञान मीमांसा, तर्क शास्त्र, मनोविज्ञान, सामाजिक चिंतन आदि विभिन्न आयामों का विस्तृत परिदृश्य बुद्ध धर्म को ब्राह्मणवाद के विरोध में उठा विचार भी नहीं ठहराता है. इस सम्बन्ध में हुई गवेषणाएं स्पष्ट करती हैं कि बुद्ध की अपनी परंपरा है. बुद्ध से पूर्व 27 बुद्धों की उत्पति हो चुकी थी. जिनका उल्लेख केवल बुद्ध साहित्य में है अपितु वेदों एवं वैदिक साहित्य में भी है. विनयपिटक, निदान कथा, जातकों आदि में इनका वर्णन है. ललित विस्तर में 54 बुद्धों का जिक्र है तो महावत्थु में 25 से अधिक बुद्धों का जिक्र है. भगवान बुद्ध 28 वें बुद्ध हैं. इस प्रकार से बुद्ध और बौद्ध धर्म की एक सुदीर्घ परंपरा रही है. इनकी ऐतिहासिकता पर अध्ययन अपेक्षित है. इनमें 5 बुद्धों यथा विपस्सि, सिखि, वेस्सभु, ककुसन्ध, कोणागमन और कस्सप के ऐतिहासिक प्रमाण मिल चुके हैं. कनक मुनि और कोणागमन का उल्लेख अशोक के शिलालेखों में उपलब्ध होता है. यह स्पष्ट है कि उनमें से कई बुद्धों की ऐतिहासिकता कई प्रकार के साक्ष्यों से स्पष्ट हो चुकी है. उन्हें जानते हुए हम बुद्ध धर्म को हिन्दू सभ्यता का एक परिदृश्य या एक घटना भी नहीं कह सकते हैं. इन सबके होते हुए भी भारत की प्राचीन सभ्यता एवं संस्कृति को 'भारोपीय-आर्यों' की वैदिक संहिताओं के परिप्रेक्ष्य में महिमामंडित किया जाता है तो यह किसी भी प्रकार से ठीक नहीं है. जबकि वस्तुस्थिति यह है कि इन सबको बौद्ध धर्म ने गौरवान्वित किया है. वैदिक साहित्य में बुद्ध-परंपरा की अवधारणाएँ जुड़ने लगी तो वैदिक धर्म गौरवशाली बनता गया, न कि वैदिक परम्पराएँ अपने सिद्धांतों से महत्वपूर्ण बनी.


स्थूल या सूक्ष्म रूप से इतिहासकारों ने इन सबका विश्लेषण दो धाराओं के रूप में किया है. उनका आग्रह है कि दो ऐतिहासिक स्रोतों पर विचार किया जाना चाहिए, उनमें एक वैदिक या ब्राह्मण व दूसरा श्रमण या बौद्ध-जैन है. ये दोनों स्रोत या परम्पराएँ अपने-अपने में अनेकानेक ऐतिहासिक उपागमों का प्रतिनिधित्व करते हैं. इन दोनों धाराओं के स्रोत पर, उनके प्रवाह पर गंभीरता से ऐतिहासिक विवेचन किया जाना अभी भी अपेक्षित है. इनका विभाजन आचार-विचार एवं सामाजिक रीति-रिवाज़ों की भिन्नताओं के आधार पर स्पष्ट किया जाता है. ये विभिन्नताएं अपने ऐतिहासिक काल में किस तरह से उभरीं एवं इनका परस्पर विरोध व समन्वय कैसे हुआ, इस पर भी विचार किया जाना चहिये. ये दोनों विचार धाराएँ एक ही मूल की नहीं है, अपितु एक ही 'मूल विचार' की परस्पर विरोधी व्याख्याएं है और उसके आधार पर भिन्न-भिन्न आचार-पद्धतियों का विकास है. श्रमण व ब्राह्मण के बीच आज कोई वैसी स्पष्ट विभाजक रेखा नहीं दिखती है, परन्तु आज से ढाई-तीन हजार वर्ष पूर्व वह स्पष्ट थी, जिसके पुरातात्विक व ऐतिहासिक साक्ष्य हैं. वैदिक ब्राह्मणवाद और श्रमणवाद की जीवन-दृष्टि तथा आचारगत दृष्टि का भेद बहुत स्पष्ट रहा है, जिन्हें उनके तत्कालीन साहित्य से परखा जा सकता है. इन्हीं दोनों धाराओं की क्रिया व प्रतिक्रिया से, विरोध और सामंजस्य से भारत का धार्मिक इतिहास विकसित हुआ है, इसे किसी भी प्रकार से नकारा नहीं जा सकता है. अतः धर्मों के विकास को समझने के लिए या उनके तुलनात्मक अध्ययनों के लिए भी हमें ऐतिहासिक नजरिये को अपनाना चाहिए . इसकी क्या जटिलतायें हैं व क्या सम्यक्त्व है- इन सब पर ऐसी विचार गोष्ठियों में विवेचन करने का अवसर मिलता है. जिससे आप और हम सभी लाभान्वित होंगे.


बौद्ध धर्म न तो वेदों से निकला है और न वैदिक हिंसा अर्था यज्ञ-याज्ञ या वैदिक कर्म कांड के विरुद्ध एक सुधारवादी दृष्टिकोण है. यह मानवीय गौरव की स्थापना की एक स्वतंत्र परंपरा है। यह व्यक्ति और समाज, धर्म और नीति तथा जीवन के दृश्य और अदृश्य उद्देश्यों का विवेचन करता है एवं उनके परस्पर संबंधों का वैज्ञानिक अध्ययन प्रस्तुत करता है। यह मनुष्य के जीवन की आन्तर-बाह्य समस्याओं का आधिकारिक विवेचन है। समाज और धर्म के क्षेत्र में फैलाये गए मिथ्या-विश्वासों, मिथ्या-दृष्टियों और रुढ़ कर्म-कांडों का विरोध यह सुधारक या विद्रोही के स्वरूप में नहीं करता है बल्कि उसका यह विरोध या प्रतिरोध उसकी अपनी घोषणाओं या स्थापनाओं और आदर्शों के फलस्वरूप करता है। जिस मानवीय गौरव या आदर्श को यह साध्य मानता है, उसके विरुद्ध जितने भी मत या वाद हैं, वे स्वतः ही उसके प्रतिपक्ष में आ जाते हैं। उसका अपने सिद्धांतों का प्रतिपादन, व्याख्या और विरोध अपने सिद्धांतों की वजह से है। जो भी उन सिद्धांतों के प्रतिपक्ष में है, वे स्वतः ही उसके विरोध में खड़े दिखते हैं और ऐसा प्रतीत होता है कि यह पक्ष या प्रतिपक्ष है परन्तु वास्तविकता यह है कि बुद्धवाद की अपनी परंपरा है। जिसके रहते यह विरोध या सुधारक रवैया लगता है। इसकी जड़ें वेदवाद में नहीं हैं बल्कि श्रमणवाद में हैं जिसका आयाम विशाल एवं विस्तृत है। यह वैदिक परंपरा के साथ-साथ चल रही परंपरा है और भारत की परंपरा है। इसी प्रकार से ब्राह्मण-क्षत्रिय आदर्शों के विरोध स्वरूप बुद्ध धर्म की उत्पति दिखाने के जो प्रयास किये गए हैं, वे भी निर्मूल हैं। यह कहा गया कि बौद्ध धर्म ब्राह्मण और क्षत्रियों के वर्चस्व के संघर्ष का परिणाम है. ब्राह्मणों और क्षत्रियों के आदर्श अलग-अलग रहे. उनके अनुसार बौद्ध धर्म और जैन धर्म क्षत्रियों के आदर्शों का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो ब्राह्मण धर्म के आदर्शों के विरोधाभासी हैं. यह लुभावना सिद्धांत भी परिकल्पित है. आप देखिये भगवान बुद्ध के प्रथम पाँच शिष्य ब्राह्मण ही थे. उनके महापरिनिर्वाण के तीन महीने बाद आयोजित 'प्रथम-संगीति' के अध्यक्ष महाकाश्यप भी ब्राह्मण ही थे. महान सम्राट अशोक को बुद्ध अनुयायी बनाने वाले मोग्गली पुत्र तिस्स भी ब्राह्मण ही थे. नागार्जुन भी ब्राह्मण थे और भी अनेकानेक थे. 84 सिद्धों में अधिकांश ब्राह्मण थे. जब ऐसे ऐतिह़ासिक तथ्य हैं तो उत्पति का यह मत भी धराशायी हो जाता है. ये सब बताते हैं कि बुद्ध अपनी परंपरा से ही आते हैं, न कि वैदिक परंपरा से और न वेद विरोधी या ब्राह्मण क्षत्रिय वर्चस्व के संघर्ष स्वरूप बौद्ध धर्म की उत्पति हुई.


अगर बौद्ध धर्म का अध्ययन हिन्दू अवधारणाओं के आधार पर या हिन्दू प्रस्थानों के आधार पर किया जाता है तो निःसंदेह वह बौद्ध धर्म का अध्ययन नहीं होता है बल्कि वह तो हिन्दू धर्म का ही अध्ययन होता है. समस्या यह है कि भारत में वैदिक धर्म को आधार रूप में प्रस्तुत करके धर्मों का तुलनात्मक अध्ययन किया जाता रहेगा तो वह सही गवेषणा नहीं कही जा सकेगी. बौद्ध धर्म के अध्ययन में या अध्यापन में जब तक ऐसी अभिवृति रहेगी, तब तक बौद्ध धर्म का सही अध्ययन नहीं हो सकेगा. साथ ही इससे बौद्ध धर्म के अध्ययन का भविष्य भी संदेह के गहरे अंध-कूप मे दब जायेगा. वस्तुतः बुद्धवाद भारतीय विचार चिंतन का एक ऐसा विशाल दर्शन है, जो काल की दृष्टि से प्राचीनतम और वैचारिक उत्कर्ष की दृष्टि से सारे विश्व में बेजोड़ है. इसकी अपनी सुदीर्घ परंपरा है. यह माना जाता है कि बुद्धवाद या बौद्ध धर्म सम्यक सम्बुद्ध से प्रारंभ हुआ, जो शुद्धोदन के घर जन्मे थे एवं घर बार छोड़ कर श्रमण बन गए थे. उनको जो ज्ञान हुआ, उनके जो उपदेश हुए, वही बुद्धवाद है, उन्हीं से बौद्ध धर्म बना परन्तु बुद्ध स्वयं कहते हैं कि यह समस्त बुद्धों की देशना है. स्पष्टतः सम्यक सम्बुद्ध से पूर्व भी बुद्धों की परंपरा रही है. जिसका ऐतिहासिक अन्वेषण और अध्ययन होना चाहिए .


इतना सब कुछ होने के बावजूद भी एक समय आया कि बुद्ध का नाम लेने वाला तक भारत में नहीं रहा. हम इसे विदेशियों का धर्म समझते रहे परन्तु पिछली शताब्दियों में अंग्रेजों के पुरातत्व प्रेम से जो उत्खनन और शोध हुए उनसे हमें बुद्ध और बौद्ध धर्म के बारे में बहुत कुछ मिला. बुद्ध भारत के प्रथम ऐतिहासिक महापुरुष गवेषित हुए. भारत के इतिहास की तिथियाँ निर्धारित हुईं और बहुत कुछ हुआ. इन सब प्रयत्नों पर भी शोध और विमर्श अवश्य होना चाहिए, हकीकत में भारत में जो छोटे बड़े पुरातत्व सर्वेक्षण हुए हैं या शोध कार्य हुए हैं, उसने भारत की विविध रूपा स्थापत्य, कला, एवं चित्रकारी आदि के क्रमिक विकास पर हमें महत्वपूर्ण जानकारी से परिपूर्ण किया है. जिनमें मध्य देश के भू-भाग के पुरातत्व सर्वेक्षण एवं उत्खनन भी महत्वपूर्ण इतिहास स्रोत एवं इतिहास सामग्री के रूप में स्थापित हुए हैं.


साँची, भरहुत, विदिशा, या अन्यान्य कई ऐसे स्थल हैं, जो इस प्रदेश को दुनिया की नज़रों में गौरवान्वित करते हैं. समय के क्रूर हाथों में जर्जर होती इस थाति को संभाल कर एवं संवार कर रखने का कार्य सरकार का होना चाहिये, उसमें वह कितना सफल हुई है, इस पर भी विमर्श आवश्यक जान पड़ता है क्योंकि किसी भी देश के भूगोल और संस्कृति को जानने के लिए पुरा-अवशेष नायाब नमूने होते हैं. हमारे देश के प्राचीन इतिहास को जानने में इन बौद्ध स्मारकों ने इतिहासकारों को प्रकाश स्तम्भ की तरह मार्ग निर्देशित किया है. परन्तु किसी भी पुरातत्ववेत्ता द्वारा किसी भी ध्वस्त इमारत या खँडहर का मात्र विवरण दे देना तब तक सार्थक नहीं हो पाता, जब तक कि उसको उसकी सम्बंधित इतिहास सामग्री से इतिहासकार ओत-प्रोत नहीं कर देता है. अतः इन अवशेषों के सर्वेक्षण और अध्ययन में भी बुद्ध साहित्य और इतिहास की जानकारी होना महत्वपूर्ण ही नहीं बल्कि आवश्यक बन पड़ता है. इस सेमिनार के विवेच्य विषयों में समाहित 'पुरातत्व' या archaeology पर विमर्श की कई संभावनाएं रेखांकित की जा सकती हैं. उन सबको इस क्षेत्र में हुए पहले के खोज कार्यों की कड़ी में प्रस्तुत कर हम हमारे पुरातत्व शोध के विकास क्रम को एक गति देते हैं.


अगर देखा जाय तो भारत में पुरातत्व के नाम पर जो कुछ सर्वेक्षण हुए हैं उनसे हम में इतिहास-प्रेम जागा है और कई नयी प्रच्छाओं का भी जन्म हुआ है. अंग्रेजों द्वारा किये गए प्रयत्नों में सर विलियम जोन के साथ या यों कहिये 'Indian Antiquities' के साथ एक नए युग का प्रारम्भ हुआ था. भारतीय पुरातत्व के इन प्रारंभिक प्रयत्नों में सर विलियम जोन्स, चार्ल्स विल्किन्स, हेनरी कोल्ब्रॊक, फ्रेंसिस ग्लद्विन, विलियम चेम्बर्स और कॉलिन मैकेंजी सदैव स्मरणीय रहेंगे. जिसे बचनान हेमिल्तन, होर्फ विल्सन आदि ने आगे बढाया. इन लोगों को उस समय के युवा अनुसन्धान कर्ताओं ने अपने श्रम एवं शोध से सहयोग किया. वे सभी स्तुत्य है. आज का यह अवसर युवा शोधकर्ताओं में वैसी ही उर्जा का संचार करेगा, ऐसी अपेक्षा की जा सकती है. बौद्ध धर्म से सम्बंधित पुरावशेषों के प्रारंभिक प्रकाशनों में कई लोगों के नाम शुमार है. अपने आप में यह शोध का विषय बन सकता है. अगर देखा जाय तो कर्नल पोलिएर ने फिरोजशाह-लाट नामक बौद्ध-स्तम्भ के शिलालेख का प्रकाशन 'एशियाटिक रिसर्च' में करके नयी पहल की थी. इसी पर कोलेब्रूक का शोध पत्र भी प्रकाशित हुआ. बलात और एवर ने कुतुब मीनार स्तम्भ पर तथा हरिग्टन और बचानन ने बौद्ध गया के अवशेषों पर 'एशियाटिक रिसर्च' में शोध पत्र प्रकाशित किये. इनसे बौद्ध-पुरावशेषों के उत्खनन और अध्ययन की पृष्ठभूमि बनी. सन 1797-1809 के बीच थामस डेनियल ने 'Indian Architectural Art' का जो कार्य दुनिया के सामने रखा, वह भी Indian Antiquities का प्रथम चरण ही था .


जेम्स प्रिन्सेप के साथ शुरू हुआ दूसरा चरण इन्डियन आर्क्योलोजी का अद्वितीय चरण माना जाता है. इस चरण में बौद्ध पुरातत्व-अवशेषों का जो उद्घाटन हुआ वे प्राचीन भारत के इतिहास को जानने के महत्वपूर्ण स्रोत साबित हुए. दिल्ली और इलाहबाद के स्तम्भों पर खुदे लेखों के प्रकाशन ने पुरातत्ववेत्ताओं को बड़ा परेशान और अधीर कर दिया था. जोन्स और कोलेब्रूक इसको पढ़ने में लगे थे. सन 1835-1836 के मध्य जेम्स प्रिन्सेप द्वारा इसे पढ़ लिए जाने बाबत लेख छपा, इस पर चार अभिलेख मिले. जिसमें पहला दिल्ली स्तम्भ से, दूसरा गया-लेख से मेल खाता था. विल्किन के अंग्रेजी अनुवाद ने इस पर महत्वपूर्ण प्रकाश डाला. ऐसे अनेकानेक प्रयासों की वास्तविक परिणति तो मध्य प्रदेश के साँची के लेख के उजागर होने से ही हुई. सन 1873 में प्रिन्सेप ने केप्टिन ई. स्मिथ के साँची के लेख की प्रति से मिलाकर इसे पाली भाषा के रूप में ज्ञेय किया और भारतीय इतिहास के युग पुरुष 'चन्द्र गुप्त' की पहचान की जा सकीदिल्ली, इलाहबाद, आदि के स्तम्भ एक ही समय के 'अशोककालीन' प्रमाणित हुए. अतः यह निर्विवाद रूप से कहा जा सकता है कि भारतीय इतिहास के प्राचीन पन्नों को उजागर करने में मध्य प्रदेश की पुरातत्व सामग्री ने एक पारस-पत्थर का कार्य किया. मैं उन सबको जानकर हतप्रभ हूँ. आपको यह जानकर भी ख़ुशी और आश्चर्य होगा कि अशोक के समय बुद्ध धर्म के प्रचारार्थ जाने वाले महेंद्र और संघ मित्ता की माँ महारानी देवी इसी प्रदेश के विदिशा क्षेत्र की थी. ऐसी सभी सामग्रियों के संकलन और पठन के सुअवसर का जरिया ऐसी सेमिनार ही होती है. मैं दूसरे पक्ष पर कुछ बोलूं उससे पहले यह बता दूँ कि पुरातत्व अन्वेषण का सिलसिला प्रिन्सेप की मृत्यु सन 1840 के बाद भी चलता रहा और आज भी जारी है. बाद के प्रयत्नों में जनरल कांनिंघम मैस्यि, फ़र्गुसन, मीडोज टेलर, विल्सन, वाल्टर इलियट आदि पुरोधाओं से हमारे पुरातत्व और इतिहास को समृद्धि मिली. कला के क्षेत्र में फर्गुसन का कार्य आज भी मील का पत्थर है. उसकी रॉक कट टेम्पल्स पर लिखी सामग्री और कला पर प्रकाशित वांग्मय निःसंदेह आज भी कलाकारों के लिए गाईड का कार्य करती है.


इन सब गवेषणाओं से जहाँ एक और भारतीय इतिहास की स्पष्ट उपलब्धि हुई वहीं दूसरी ओर बुद्ध के धर्म और दर्शन की जानकारी भी हुई. विभिन्न देशों से भारत के संबंधों और व्यापारिक मार्गों आदि के संधान का रास्ता भी सुगम हुआ. यह निश्चित हुआ की ईसा पूर्व छठी शताब्दी में भारत में बुद्ध का जन्म हुआ. विदेशी यात्रियों के यात्रा विवरणों की उपलब्धि ने भी इस कार्य की सफल परिणिति में बहुत योगदान दिया और उनके विवरणों से हम अपने देश के प्राचीन भूगोल का ठीक ठीक पता लगा सके. इस सन्दर्भ में बौद्धधर्म की जो धार्मिक यात्राओं की परंपरा थी वह हमारी इतिहास सामग्री को समेटने वाली व उपलब्ध करने वाली साबित हुई. वस्तुत बौद्ध धर्म के प्रचारकों ने ही इस धर्म को फैलाया. यह इस धर्म का पर्यटन पक्ष था. महेंद्र, संघमित्रा, ह्वेनसांग, फाहियान, इत्सिंग आदि के द्वारा पर्यटन की महता को प्रतिपादित किया गया. जब ऐसी यात्राएँ विलुप्त हो गईं तो बौद्ध धर्म का अवसान भी शुरू हो गया. इस लिए पर्यटन का विशेष महत्त्व होता है इसे हमें नहीं भूलना चाहिये. बौद्ध अध्ययनों को गति देने के लिए हमें पुनः ऐसी व्यवस्था करनी चाहिये. इससे एक तरफ तो धम्म का प्रचार होता है तो दूसरी ओर उन पर्यटन स्थलों की सुरक्षा और उपादेयता भी बन जाती है. जो चीज हमें पढ़ने-सुनने से ठीक से समझ में नहीं आती हैं वह इन स्थलों के भ्रमण से सहज रूप में समझ में आ जाती हैतः इस क्षेत्र में लगे शोधार्थियों के लिए भी इन स्थलों का भ्रमण आवश्यक करके हम उनमें ज्ञान की नयी फेकल्टी खोल देते हैं बौद्धगया, सारनाथ, कपिलवस्तु, कुशीनगर, श्रावस्ती ही परिभ्रमण के पथ क्यों बने. मध्य प्रदेश में भी कई ऐसे तिहासिक स्थल हैं जो बौद्ध धर्म से जुड़े रहे हैं उनका एक पर्यटन क्षेत्र विकसित कर हम इसे अध्ययन की परिधि में ला सकते हैं. अभी तक जो कुछ इस क्षेत्र में हुआ है वह अधिकांशतः व्यक्तिगत प्रयासों की देन है परन्तु समय की मांग है कि इस क्षेत्र में लगी शिक्षण संस्थाओं को भी इसे बढ़ावा देने के लिए अपने पाठ्यक्रमों में शामिल करना चाहिये. इस सेमीनार में आशा की जा सकती है कि मध्य प्रदेश के ऐसे स्थलों की एक रूपरेखा हमारे सामने आएगी, जिस पर आपका विभाग विचार कर अमली जामा पहनाने में कामयाब हो सकेगा. यह नए शोध कर्ताओं के लिए बहुत ही उपयोगी होगा.


जैसा मैंने पहले बताया कि स्थलों के विवरण मात्र से ज्यादा कुछ नहीं होता. उनके पीछे का इतिहास विवरण भी आवश्यक होता है. बौद्ध अध्ययनों या इतिहास हेतु उसके साहित्य और उसकी भाषा के पठन-पाठन की अगर समुचित व्यवस्था नहीं होती है तो ये सारे प्रयास वो फल नहीं देते जिसकी हम अपेक्षा करते हैं. अतः पाली भाषा के अध्ययन की व्यवस्था भी आवश्यक जान पड़ती है. यह देखा गया है कि इस भाषा के प्रति उपेक्षापूर्ण व्यवहार और दृष्टि न केवल सरकार की ओर से है बल्कि अध्येत्ताओं की तरफ से भी है. जब तक आप पाली के मूल ग्रंथों से उन विवरणों की छान-बीन नहीं कर लेते तब तक आप धिकारिक रूप से बुद्ध की बात करने हेतु सक्षम नहीं होते हैं. कुछ प्रदेशों में पाली भाषा पढाई जाती है. पर उसके हाल बुरे हैं. उसको कोई संरक्षण नहीं है. प्राचीन इतिहास के विद्यार्थी के लिए इसे पढ़ना और समझना आवश्यक है इस हेतु इस सेमिनार में भी आप विमर्श कर सकते हैं कि मध्य प्रदेश में इसके शिक्षण की व्यवस्था कैसे सुगम बनायी जाय.


बुद्धधर्म का जो कला पक्ष है वह अपनी सैद्धांतिक मान्यताओं से विचलित नहीं हुआ है. यह पूरे एशिया महाद्वीप में कला के सम्बन्ध में शोध करने वालों की राय है और मैं मानता हूँ कि यह ठीक भी है. बौद्ध कला यात्रियों को लुभाने या आकर्षण के लिए नहीं रही है और न वर्त्तमान में है बल्कि वह अपने सैधांतिक पक्ष के प्रतिपादन से घनिष्ठ रूप से जुडी है और उसका सैधांतिक पक्ष उनकी पाली भाषा के साहित्य के अध्ययन से ही जाना जा सकता है. इसलिए भी बौद्ध धर्म के पाली साहित्य का अध्ययन और अध्यापन जरूरी है. उनका अपना विस्तृत साहित्य है, दर्शन है, कला है और सबसे आगे बढ़कर एक सांगोपांग संस्कृति है. इसमें भी आप देखेंगे कि विचारों के विकास का निरंतर प्रवाह होने के बावजूद भी यह कभी भी अपनी मान्यताओं या सिद्धांतों से हटा नहीं है. चाहे थेरवाद हो या महासांघिक, हीनयान हो या महायान. इन सबको जानने के बाद यही कहना अभीष्ट लगता है कि बुद्ध दर्शन अपने आप में विभिन्न दर्शनों का समूह है. इसके साहित्य की विशालता न केवल पाली में है बल्कि जहाँ जहाँ यह धर्म गया वहां वहां उसने उस देश की भाषा और बोली में साहित्य का विपुल भंडार दिया और कला के विभिन्न रूप और सौन्दर्य का विलक्षण संसार सृजित किया. उन सब को देख कर और जान कर हर एक का मन अभिभूत हुए बिना नहीं रह सकता. इसने शासक और शासन के रूप में न केवल भारत में बल्कि एशिया महाद्वीप में एक से बढ़कर एक सम्राट दिए हैं. इसने बर्बर और जन जातीय लोगों को भी संस्कृति का पाठ पढ़ाया और आततायी और निरंकुश राजाओं को भी सहृदयी और प्रजा-वत्सल बना दिया. यह सब उसके करुणा और प्रज्ञा के कारण हुआ. इसको मानने वालों का जो मानवीय समाज विकसित हुआ, वह समता, स्वतंत्रता और बंधुत्व की डोर में एक सार होता गया. यह सब इस धर्म के प्रभाव के कारण हुआ और आज भी ये प्रभाव देखे जा सकते हैं. अतः इतिहासकारों के द्वारा उन समाजों का अध्ययन भी किया जाना चाहिए. हालांकि इतिहास के प्रति बौद्धों में इतिहास चेतना का अभाव मिलता है जो भगवान बुद्ध की त्रिच्छान विद्या की परिधि में आते हैं. पर इतिहासकारों को भी इस ओर आँखें नहीं मूँद देनी चाहिए. यह इसलिए जरूरी है कि जैसे मैंने पहले कहा कि पुरा-अवशेषों में बुद्ध धर्म से सम्बंधित 75 प्रतिशत सामग्री मिलती है पर साहित्यक रूप से बिलकुल शून्य है. वैदिक साहित्य की भरमार मिलती है. ऐसा कैसे हो गया? यह जुगुप्सा का ही नहीं बल्कि अन्वेष का विषय होना चाहिये. ऐसा लगता है कि वैदिक मौन वृति उसकी विरोधवृति थी. ऐसे कई सवाल हैं जो आप इस अवसर पर साझा कर सकते हैं एवं अंधकार का जो आच्छादन है उसे हटा सकते हैं.


अन्त में, मैं पुनः आप सब का आभार व्यक्त करता हूँ कि आपने मुझे यह सुअवसर प्रदान करके एक महान धर्म की तिहासिक सन्दर्भ में विवेचना करने का मौका दिया. पर एक बात मैं यह कहना चाहता हूँ कि जिस उत्साह और प्रतिबद्धता से ऐसे कार्यक्रम आयोजित होते हैं वैसा पश्चातवृति कार्य भी होना चाहिए. इसके साथ ही इस सेमीनार के प्रारंभ की घोषणा आपके शोध कार्यों की सफलता में अनुगुंजित हो- ऐसी मंगल कामना करते हुए मैं विराम लेता हूँ.



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