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मेरा नाम भारत भूषण है. मेरा जन्म 13 जनवरी 1951 में फिरोज़पुर में प्रातः 04 बजे हुआ. बचपन अमृतसर में बीता. प्रारंभिक पढ़ाई भी वहीं हुई. पिता जी का नाम श्री मुंशीनाम भगत और माता का नाम श्रीमती कर्मदेवी था. एक बड़े भाई थे- श्री मायाधारी- और तीन बहनें हैं श्रीमती कांता देवी, श्रीमती सत्या देवी और श्रीमती संतोष. पिता की नौकरी के सिलसिले में मंडी (हिमाचल प्रदेश), रामपुराफूल, चंडीगढ़, रोहतक, टोहाना, सिरसा आदि में पढ़ाई हुई. कालेज की शिक्षा चंडीगढ़ में डी.ए.वी. कालेज और पंजाब यूनीवर्सिटी, चंडीगढ़ में हुई. एम.ए. हिंदी साहित्य में किया. अनुवाद का डिप्लोमा लिया और रूसी भाषा में सर्टिफिकेट भी किया. नौकरी के सिलसिले में पहली पोस्टिंग हैदराबाद में हुई. दूसरी चंडीगढ़ में, फिर तिरुवनंतपुरम् में, मुंबई में, जम्मू में, फिर दिल्ली और पुनः चंडीगढ़ में हुई.


मेरे दिल्ली प्रवास के दौरान एक पुस्तक विक्रेता से संपर्क हुआ और मालूम पड़ा कि वह प्रकाशक भी था. कुछ दिनों के बाद चंडीगढ़ आया तो बड़े भाई साहब के परिवार से पिता जी की लिखी पुस्तकों के बारे में जानकारी ली. भाभी ने वे कागज़ बहुत संभाल कर रखे हुए थे. जानकर बहुत तसल्ली हुई. उनसे पांडुलिपियाँ लेकर दिल्ली आ गया और उन्हें तरतीब से लगाने का कार्य किया. पहली पुस्तक
 'संत सत्गुरु वक़्त का वसीयतनामा' छपने के लिए तैयार हो गई. 

अब प्रश्न था इसे किस-किस को दिया जाए. इस पुस्तक में जो कुछ भी लिखा था वह मानवता मंदिर होशियारपुर का था. जो पुस्तक में रेखांकित था वह परम दयाल फकीरचंद जी महाराज जी की शिक्षा की पुष्टि में हलफ़नामे से कम नहीं था. 1981 के बाद से मैं मंदिर कभी नहीं गया. वहाँ उस समय मानव दयाल डॉ. आई.सी.शर्मा के देहांत के बाद शून्यो जी महाराज कार्य कर रहे थे. मैं उन्हें नहीं जानता था. उनका फोन ढूँढ कर उन्हें अपना परिचय दिया और उनकी अनुमति लेकर उनके निवास स्थान डग्शई चला गया. पुस्तक की पहली प्रति उन्हें भेंट की. भगत (मुंशीराम) जी के बारे में बातें हुईं. परम दयाल जी के बारे में बातें हुईं. शून्यो जी ने एक बात बड़ी गंभीरता से कही कि मंदिर भगत जी के सत्संगों से वंचित रह गया. मैंने आग्रह किया कि पहले आप इस पुस्तक को पढ़ लें. उन्होंने कहा कि भगत जी को सत्गुरु का कार्य परम दयाल जी ने दिया था. वे कोई ग़लत बात कह ही नहीं सकते. आप इस पुस्तक को मानवता मंदिर में लेजा कर वितरित कर सकते हैं. मेरे लिए यह अनुमति अमूल्य थी.

उसके पश्चात 'सत्गुरु की महिमा और माया का रूपतथा 'संतमतप्रकाशन हुआ और इन सभी पुस्तकों को भगत जी के आदेशानुसार निःशुल्क बाँटा गया. इस बीच मंदिर के हालात बदलते नज़र आने लगे.

इधर मेरा स्थानांतरण चंडीगढ़ हो गया. शेष कार्य यहाँ रह कर हो रहा है. भगत जी की दो अन्य पुस्तकें नामतः 'अंतर्राष्ट्रीय मानवता केंद्रऔर 'प्रेम शब्दावलीका प्रकाशन किया गया. ये पुस्तकें भी परम दयाल जी की शिक्षा और मानवता मंदिर से जुड़े सज्जनों में निःशुल्क वितरित की गईं. 'अगम वाणीके प्रकाशन में भी मैं सहयोग दे पाया. खेल-खेल में 'गरुड़ पुराण रहस्यभी तैयार हो गई. इसके कुछ अंशों का अंग्रेज़ी अनुवाद 'राधास्वामीस्टडीज़'' के लिए भी मैंने भेजा  जिस पर काफी चर्चा हुई.  इसी प्रकार 'प्रेम रहस्य,' 'गुरु तत्त्वऔर 'मानवता युगधर्मभी यूनीकोड में तैयार हो गईं और मेरा सपना साकार हुआ.

मेरे गूगल साइट्स और विकिपीडिया पर आने की कहानी बड़ी दर्दीली है. एक बार कमर दर्द से मैं पीड़ित था और मुझे लंबे और पूर्ण आराम की सलाह दी गई थी. लेटे-लेटे क्या करता. गूगल पर अपनी बिरादरी के बारे में खोज करते-करते अंग्रेज़ी विकिपीडिया पर एक आलेख लिखा जिसे एक अन्य आलेख में मिला दिया गया. इससे मेरा उत्साह बढ़ा. परम दयाल जी के बारे में खोज की. केवल डेविड सी लेन और संत हरजीत सिंह (इंग्लैंड) की साइट्स ही मुख्यतः दिखाई देती थीं जिनका रखरखाव ठीक से हो रहा था. लेकिन मुख्य कार्य डॉ. लेन ने ही किया हुआ था. उनसे संपर्क करने की बहुत कोशिश की. उनकी तलाश ऐसे थी जैसे जादूगर मैनड्रेक के घर 'ज़नाडूमें घुसना. खैर मैं केलीफोर्निया में रह रहे परम विद्वान प्रो मार्क जर्गंसमेयेर की सहायता से वहाँ जा पहुँचा. कुछ दिनों के पत्राचार के बाद मालूम पड़ा कि डॉ. लेन संतमत संबंधी एक हिंदी पुस्तक को गूगल ट्रांसलेट की सहायता से अंग्रेज़ी में अनूदित करने की कोशिश में थे. बात नहीं बन पा रही थी. इस समस्या के साथ मैं भी जूझ चुका था. सारी जानकारी मेरे पास भी नहीं थी. भारत सरकारगृह मंत्रालयराजभाषा विभाग के डीआईटी के उप निदेशक डॉ.केवल कृष्ण से संपर्क करके उनसे जानकारी माँगी. उन्होंने बहुत सहायता की. तब अंग्रेज़ी विकिपीडिया पर जाकर 'मेघवाललेख पर उस जानकारी का थोड़ा सा प्रयोग किया. परिणाम उत्साहवर्धक रहा. इस बीच परम दयाल जी पर काफी सामग्री एकत्रित हो चुकी थी. अतः उन पर एक लेख लिखा. जिसपर अन्य लोगों ने भी आकर कार्य किया (मेरी अंग्रज़ी में सुधार किया). यह अच्छा बन गया. तब हिंदी विकिपीडिया पर जाने का विचार आया. वहाँ एक बहुत ही सज्जन युवा आशीष भटनागर ने विकिपीडिया को समझने में सहायता की.

इस प्रकार मिली तमाम जानकारी का प्रयोग परम दयाल जी और भगत जी के साहित्य के लिए करना संभव हो पाया. इसका लाभ यह है कि यूनीकोड फाँट्स पर तैयार यह सामग्री दुनिया में कहीं भी पढ़ी जा सकती है. गूगल ने भी इन्हीं फ़ाँट्स को अपनाया है. इस लिए यहाँ कार्य करने में बहुत सुविधा हुई. अब गूगल ट्रांसलेट की सहायता से इनका आंशिक अंग्रेज़ी अनुवाद कुछ ही पलों में तैयार हो जाता है. है यह आंशिक परंतु आगे चल कर यह बहुत उपयोगी बन पाएगा.

भविष्य में दुनिया के किसी भी कोने में बैठे शोधार्थी इसका लाभ उठा पाएँगे.

 

 


































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My name is Bharat Bhushan. Born January 13, 1951 at 04 AM in the Firozpur was. Amritsar childhood spent. Initial studies were also there. Father's name was Mr. Muanshinama Karmedevi Bhagat and Smt. Had an older brother - Mr. Amayadhahari - and three sisters Mrs. Kanta Devi , Smt Satya Devi and Mrs. satisfaction. Father's job as part of the market (HP) , Arampuraful , Chandigarh , Rohtak , Tohana , Sirsa etc. were studied. DAV College of Education in Chandigarh College and Punjab University , Chandigarh was. MA In Hindi literature. Russian language translation of the diploma and certificate have done. The first posting was in Hyderabad as part of the job. The other in Chandigarh , then in Tihruvenntpuram , Mumbai , Jammu , Delhi and back again took place in Chandigarh.

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