हिंदी की कुछ संज्ञाएँ – परिभाषाओं एवं उदाहरणों के साथ : ४१ - ५०

४१) पहचान = किसी वस्तु से संबंध रखनेवाली ऐसी बातें जिनकी सहायता से वह अन्य वस्तुओं से अलग की जा सके । किसी वस्तु की विशेषता प्रकट करनेवाली बातें । लक्षण । निशानी । जैसे “ भारत की पहचान - https://www.youtube.com/watch?v=Eu54HKW9ank&list=PLTXVEYsLhq0EDL1Afzn-x0VCOQ-NHIsQg “ (इस श्रृंखला के २६ वीडियो ऊपर वाली श्रृंखला पर दायीं तरफ़ दिखाई देंगे |)

४२) एकतरफ़ा = एक ही पक्ष का, एक ही पक्ष से संबंध रखनेवाला। जैसे, “ https://youtu.be/RGJaHKU6Bh4

४३) हिंदी विज्ञापन = उम्मीद का दिया : https://youtu.be/ixGmLsP0NGk

कालेकर जुवेलर्स : https://twitter.com/DrNandiniBJP/status/1317852009958055943

४४) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता = अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में किसी व्यक्ति के विचारों को किसी ऐसे माध्यम से अभिव्यक्त करना सम्मिलित है जिससे वह दूसरों तक उन्हे संप्रेषित(Communicate) कर सके। इस प्रकार इनमें संकेतों, अंकों, चिह्नों तथा ऐसी ही अन्य क्रियाओं द्वारा किसी व्यक्ति के विचारों की अभिव्यक्ति सम्मिलित है। अनु० 19 में प्रयुक्त 'अभिव्यक्ति' शब्द इसके क्षेत्र को बहुत विस्तृत कर देता है। विचारों के व्यक्त करने के जितने भी माध्यम हैं वे अभिव्यक्ति, पदावली के अन्तर्गत आ जाते हैं। इस प्रकार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में प्रेस की स्वतन्त्रता भी सम्मिलित है। विचारों का स्वतन्त्र प्रसारण ही इस स्वतन्त्रता का मुख्य उद्देश्य है। यह भाषण द्वारा या समाचार-पत्रों द्वारा किया जा सकता है। भारतीय संविधान वाक्-स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति-स्वातंत्र्य की प्रत्याभूति देता है। किंतु इस स्वतंत्रता पर राज्य द्वारा युक्तियुक्त निर्बन्धन इन बातों के संबंध में लगाए जा सकते हैं (क) मानहानि, (ख) न्यायालय-अवमान, (ग) शिष्टाचार या सदाचार, (घ) राज्य की सुरक्षा, (ङ) विदेशी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध, (च) अपराध-उद्दीपन, (छ) लोक व्यवस्था, (ज) भारत की प्रभुता और अखंडता(16वां संविधान संशोधन 1963 से जोड़ा गया)। जैसे, “ https://youtu.be/_VLqPJZhNfg

४५) येन केन प्रकारेण = 1. किसी न किसी प्रकार से 2. जैसे भी हो 3. जैसे-तैसे। जैसे “ https://youtu.be/H1dIY1BL8ec

४६) चुल्लू भर पानी में डूब मरना = अत्यंत लज्जाजनक स्थिति में होना। जैसे, “ https://youtu.be/bcF9tT6lK2Y

४७) कट्टरपंथी = रूढिवादी ढंग से किसी मत को मानने वाला या बिना समझे-बूझे या आँखें बंद करके किसी मत को मानने वाला | जैसे, “ https://youtu.be/dST3AYQLf9w

४८) चरमपंथ = सामाजिक बुराइयों को शक्ति प्रयोग द्वारा ख़तम करने का पक्ष, जैसे “आज हम जिस दुनिया में रहते हैं ये मोटे तौर पर फ्रांस की ही बनाई हुई दुनिया है। लिबरलिज्म (असली वाला), मानवाधिकार, सेक्युलरिज्म (असली वाला), लेफ्ट-राइट, लोकतंत्र, समेत जिन नागरिक अधिकारों और आदर्शों को हम जानते हैं ये सब फ्रांस की महान क्रांति से ही दुनिया को मिले हैं। फ्रांस की महान क्रांति जिसके चार्टर को विश्व के पहले लोकतांत्रिक देश अमेरिका ने अपने संविधान का आधार बनाया। लेकिन पिछले कुछ दिनों इस्लामिक चरमपंथ का सामना कर रहा फ्रांस आज खुलकर इसके खिलाफ खड़ा है। अपनी महान विरासत, सेक्युलरिज्म या लिबरलिज्म के बोझ में फ्रांस दबा नहीं जा रहा। जिस कार्टून की वजह से चार्ली हब्दों में आतंकी हमला हुआ या सैम्युल पैटी की जिस कारण हत्या हुई फ्रांस ने वो कार्टून अपने सरकारी बिल्डिंगों पर लगा दिये हैं।

वहां नाथूराम गोडसे, संघ या सावरकर को गाली देने के नाम पर चरमपंथ पाला नहीं जा रहा। वहां सेक्युलरिज्म का बोझ उनकी राष्ट्रीय पहचान पर भारी नहीं पड़ रहा। दुनिया क्या सोचेगी, 56 देश क्या कहेंगे फ्रांस इसकी चिंता में मरा नहीं जा रहा और ये करने के बाद भी फ्रांस वो ही फ्रांस रहेगा जिसने आज की सभ्य दुनिया की नींव रखी। फ्रांस को कोई हिन्दू पाकिस्तान की तरह फ्रंच पाकिस्तान नहीं कहेगा। वहां कोई बाटला हाउस के बाद आंसू बहाने वाला नहीं है। वहां कोई माओ त्से तुंग को चेयरमैन बताने वाली कम्युनिस्ट पार्टी से गठबंधन करने के बाद चीनी आक्रमण की चिंता का ढोंग रचाने वाला नहीं है। इसलिए अपनी बौद्धिक विरासत पर गर्व रखते हुए। अपनी अहिंसा, सर्वधर्म सम्भाव के मूल विचार को कसकर पकड़े रखते हुए भी विश्व में सबसे ज्यादा आतंकवाद और सबसे ज्यादा धार्मिक नरसंहार झेलने वाले भारत को फ्रांस से ये सीखना चाहिए।

पाकिस्तान, बांग्लादेश और कश्मीर हमारा इतिहास है। केरल, बंगाल और पंजाब में साइरन बज ही रहा है। भविष्य सामने खड़ा है। अगले जन्म मोहे यूरोपिएन ही कीजो | “ https://www.facebook.com/tripathi.shandlya.avinash/posts/3538557869533794

४९) काफ़िर = अगर कोई व्यक्ति इस दुनिया में अल्लाह को एकमात्र खुदा नहीं मानता , उसके भेजे पैगम्बर मुहम्मद को नहीं मानता और इस्लाम की किताब कुरान व उसकी शिक्षाओं को नहीं मानता वह काफिर है । अगर वह अल्लाह को मानता है , मुहम्मद को पैगम्बर समझता है और कुरान को दैवीय किताब मानकर कलमा पढ़ता है , नमाज पढ़ता है , रोजे रखता है , हज जाता है तो वह मोमिन (मुस्लिम) माना जायेगा । अगर वह यह सब नहीं मानता तो इसके इतर वह काफिर माना जायेगा और इस्लाम में काफ़िर को "वाजिब उल कत्ल" अर्थात कत्ल करने के योग्य माना गया है क्योंकि इस्लाम में कुफ्र और काफिर को सबसे बुरा बताया गया है । यही काफिर का वास्तविक अर्थ है जिसे छुपाया जाता है और दुनिया में फैले इस्लामिक आतंकवाद की असली जड़ है । जैसे, “ https://youtu.be/JROyGzW_lyg

५०) जड़वादी = एक दार्शनिक सिद्धान्त जिसके अनुसार चेतन आत्मा का अस्तित्व नहीं माना जाता और सब कुछ को जड़ता का ही विकार माना जाता है | जैसे, "इस्लाम में महिलाओं या किसी भी विषय पर क्या सही है अथवा क्या नहीं इसके लिए नैतिकता या अपनी बुद्धि का प्रयोग करने की अनुमति नहीं है । इस्लाम में नैतिकता से धर्म ग्रंथों का विवेचन नहीं होता है वरन् कुरान व हदीस में जो लिखा है वह स्वयं नैतिकता का सबसे बड़ा प्रमाण है । जड़वादी मुल्लाओ के अनुसार कुरान व हदीस मे लिखी हर बात सत्य है । हो सकता है कि हिन्दुओं के ग्रंथों में भी स्त्री के लिए यही सब कुछ लिखा हो पर विषय यह है कि क्या हिन्दू अपने धर्म ग्रंथों पर आंख बंद कर विश्वास करते हंत । हिन्दू अपने धर्म ग्रंथ की किसी भी बात को अपनी बुद्धि पर कस कर ही उस को मानते हैं यही कारण है भारत स्त्री की दशा को उन्नत करने के लिए कई कानून संसद द्वारा बनाए जा चुके हैं । परन्तु इस्लाम में सुधार की कोई गुंजाइश नहीं है । मुसलमानों कहते हैं कि कुरान व हदीस में किसी भी संशोधन की कोई जरूरत नहीं है । इस्लाम का एक मात्र ध्येय सारी दुनिया को मुसलमान बनाना है । इसीलिये इस्लाम द्वारा हिन्दु महिलाओ के लिये लविग जेहाद चलाया जा रहा है। कोई भी हिन्दू लड़की मुस्लिम बनने से पहले इस लेख को अवश्य पढ़ें |

गर्भ निरोधक हराम - सामान्य व्यक्ति भी यह अंदाजा लगा सकता है कि यदि गर्भ निरोधक को हराम बताया जाता है तो स्त्री की दशा तो बच्चे पैदा करने की मशीन की तरह ही होगी । यदि यह माना जाए कि स्त्री 15 वर्ष की आयु से बच्चे पैदा करना प्रारम्भ करती है व 50 वर्ष की आयु तक बच्चे देती है प्रति दो वर्ष में एक बच्चे की दर से वह 17 बच्चे देगी । स्त्रियों का यह मजहबी कर्तव्य है कि वे अधिकाधिक संख्या में बच्चे पैदा करें,( इब्न ऐ माजाह खण्ड 1 पृष्ठ 518 और 523 ) । अपने ‘‘ सुनुन ’’ में यह उल्लेख है पैगम्बर ने कहा थाः ‘‘ शादी करना मेरा मौलिक सिद्धान्त है । जो कोई मेरे आदर्ष का अनुसरण नहीं करता, वह मेरा अनुयायी नहीं है । शादियाँ करो ताकि मेरे नेतृत्व में सर्वाधिक अनुयायी हो जांए फलस्वरूप मैं दूसरे समुदायों ( यहूदी और ईसाइयों ) से ऊपर अधिमान्यता प्राप्त करूं । इसी प्रकार मिस्कट खण्ड 3 में पृष्ठ 119 पर इसी प्रकार की एक हदीस हैः कयामत के दिन मेरे अनुयायियों की संख्या अन्य किसी भी संख्या से अधिक रहे । सूरा रूमें सूरा 3 आयत 30 - शारीरिक संरचना को मत बदलो । इतरा सूरा 17 आयत 21 अनाम सूरा 6 आयत 152 आप अपने बच्चों की हत्या मत कीजिए ।

एक पुरूष को चार विवाह करने की अनुमति है । ‘‘ यदि स्त्रियाँ आपके आदेषो का पालन करें तो उन्हें उत्पीडि़त न करो ......................................... उनकी बात ध्यान से सुनो, उनका आप पर अधिकार है कि आप उनके भोजन तथा वस्त्रों का प्रबंध करो ’’( इब्न ऐ माजाह खण्ड 1 पृष्ठ 519 ) इस प्रकार स्त्री के अधिकार उसके भरण पोषण तक ही सीमित हैं बशर्ते कि वह अपने पुरुष की आज्ञाओं का पालन करे । इस्लाम का सामान्य विश्वास है कि पुरुष स्त्री की अपेक्षा श्रेष्ठ होता है । वास्तव मे कुरआन का कानून इस विचार की पूर्णतया पुष्टि करता है । स्पष्टीकरण प्रस्तुत है । ‘‘ ............................................. स्त्रियों में से जो तुम्हारे लिए जायज हो दो दो , तीन तीन , चार चार तक विवाह कर लो । ’’( 4 अननिसा 3 )

पर्दा अनिवार्य - जड़वादी सोच का एक प्रमाण यह भी है कि " अल्लाह ने स्त्रियो पर पर्दे का कानून लागू किया है " अर्थात उन्हें सामाजिक जीवन में भाग नहीं लेना चाहिए ‘‘ और ईमान वाली स्त्रियों से कहा कि वे अपनी निगाहें नीची रखें और अपनी शर्मगाहों ( गुप्त इंद्रियों ) की रक्षा करें और अपना श्रृंगार न दिखांए सिवाय उसके जो जाहिर रहे और अपने सीनों ( वक्ष स्थल ) पर अपनी ओढ़नियों के आंचल डाले रहें और वे अपने श्रृंगार किसी पर जाहिर न करें ................................ अनुवादक मुहम्मद फारूक खाँ, मकतबा अल हसनात ( देहली ) संस्करण ( अल अन नूर: 31 ) पुनः कुरआन में कहा है हे नबी ! अपनी पत्नियों और अपनी बेटियों और ईमान वाली स्त्रियों से कह दो कि वे ( बाहर निकलें तो ) अपने ऊपर चादरों के पल्लू लटका लिया करें । ( 33 अल अहजाब: 59 ) चादरों के पल्लू लटका लेने के साथ साथ , अल्लाह स्त्रियों के कार्यकलाप उनके घरों की चार दीवारों के भीतर ही सीमित कर देता है । ‘‘ अपने घरों के अंदर रहो । और भूतपूर्व अज्ञान काल की सज धज न दिखाती फिरो ’’ ( 33 अल अहजाब: 33 )

केवल पुरुष को तलाक का अधिकार - इस्लाम में केवल पुरूष को तलाक का अधिकार दिया गया है । महिला को इस विषय में कोई अधिकार नहीं है । इस्लाम में महिला को केवल भरण पोषण का अधिकार दिया गया है । यदि एक महिला के १० बच्चें हैं व पुरूष उसे किसी भी बात पर तलाक की धमकी देता है तो यह विचारणीय विषय है कि उस महिला की क्या हालत हो जाएगी । उसकी हालत उस बकरी की तरह होगी जिसके सामने कसाई सदैव छुरा लिए ‌खड़ा रहता हो ।

हलाला- इसमें यदि पति किसी भी कारण से अपनी पत्नि को तलाक दे देता है व उसके बाद पुनः उससे शादी करना चाहता है तो उस स्त्री को पहले किसी अन्य मर्द से निकाह करके उसके साथ एक रात बितानी होगी उसके साथ हमबिस्तर होना होगा फिर दूसरा मर्द उसे तलाक देगा तब वह पहले मर्द के साथ दोबारा शादी कर सकती है । मुसलमान इस प्रथा को जारी रखने के लिये तर्क देते है कि यह इसीलिये बनाया गया है ताकि कोइ मर्द अपनी पत्नी को बिना बात के तलाक न दे । पर उस स्त्री के मन पर क्या बीतती होगी क्या किसी मर्द ने इस बात की भी कल्पना की है ।

बलात्कार हुई महिला की स्थिति - जिस महिला का बलात्कार होता है वह पुलिस में जाती है तो आरोपी द्वारा उस पर यह आरोप लगाया जाता है कि उसे संभोग करने के लिए महिला द्वारा उकसाया गया है । उल्टे महिला पर इस्लाम के कानून की धार लटक जाती है । उल्लेखनीय है कि इसमें परिस्थितिजन्य साक्ष्य का कोई स्थान नहीं है । इस कानून के कारण मुस्लिम देशों में हजारो महिलाओं को हर साल जिना का आरोपी मानकर पत्थर मार मार कर हत्या कर दी जाती है । किसी महिला का बलात्कार होने की स्थिति में आरोपी को दण्ड तभी दिलाया जा सकता है जब १-वह आरोपी स्वयं अपना अपराध मान ले, २- चार पुरूष गवाह मिलें ।

सामान्यतः ये दोनों ही बातें असम्भव है इसी कारण मुस्लिम देशों में महिला को ही जिना का आरोपी मानकर पत्थर मारकर मारने की सजा सुनाई गयी है । स्पष्ट है कि यह कानून मूर्खता का पराकाष्ठा है पर इस्लाम में किसी भी सुधार की कोई गुंजाइश नहीं है । शरीयत के कानून को मुसलमान सर्वश्रेष्ठ मानते हैं ।

पत्नि की पिटाई का अधिकार - सऊदी अरब की सरकारी वैबसाइट http://www.islamhouse.com/p/292386 के फतवे के पृष्ठ 26 पर स्पष्ट किया है कि पति को चार बातों के होने पर पत्नि की पिटाई का अधिकार है ।

पहला श्रृंगार को परित्याग करना जबकि वह श्रृंगर का इच्छुक हो।

दूसरा जब वह बिस्तर पर बुलाये और वह पवित्र होने के बावजूद उस के पास न आये। ( अर्थात सेक्स करने मे स्त्री के मन का कोई महत्व नही है यदि किसी स्त्री का बाप मर जाता है व उसका मन नही है तब भी वह ना नही कर सकती ।) एक स्त्री अल्लाह के प्रति अपने कर्तव्य का निर्वाह नहीं कर सकती जब तक उसने अपने पति के प्रति अपने कर्तव्यों का पालन नहीं किया है, यदि वह स्त्री ऊँट पर सवारी कर रही हो और उसका पति इच्छा प्रकट करे तो उस स्त्री को मना नहीं करना चाहिए । ( इब्न ऐ माजाह खण्ड 1 अध्याय 592 पृष्ठ 520 ) पुनः यदि एक पुरुष का मन संभोग करने के लिए उत्सुक हो तो पत्नी को तत्काल प्रस्तुत हो जाना चाहिए भले ही वह उस समय सामुदायिक चूल्हे पर रोटी सेक रही हो । ( तिरमजी खण्ड 1, पृश्ठ 428 )

तीसरा नमाज़ छोड़ देना।

चौथा उस की अनुमति के बिना घर से बाहर निकलना। -शाफेईय्या और हनाबिला का कथन है कि : उस के लिए पति की अनुमति के बिना अपने बीमार बाप की तीमारदारी के लिए निकलना जाइज़ नहीं है, और उसे उस से रोकने का अधिकार है . . .; क्योंकि पति का आज्ञा पालन करना अनिवार्य है, अत: अनिवार्य चीज़ को किसी ऐसी चीज़ के कारण छोड़ देना जो वाजिब नहीं है, जाइज़ नहीं है।

दो मुस्लिम औरत की गवाही का एक पुरूष के बराबर होना - इस्लामी साक्ष्य विधि में एक पुरूष की गवाही दो मुस्लिम औरतो के बराबर बतायी गयी है ।

इस्लाम में स्त्री एक वस्तु के समान है जिसे बदला जा सकता है | पैगम्बर की एक प्रसिद्ध परंपरा भी है जो कि कातिब अल वकीदी से संबंधित है और जिसको मुल्ला लोग मुस्लिम भाई चारे की घोषणा के लिए गर्व से बताते हैं:

‘‘ मेरी दो पत्नियों की ओर देखो और इनमें से तुम्हें जो सर्वाधिक अच्छी लगे उसे चुन लो । ’’

इस भाई चारे का प्रदर्शन मदीने के एक मुसलमान ( अंसार ) ने एक प्रवासी मुसलमान से उस समय किया था । जब पैगम्बर ने अपने अनुयायियों समेत मक्का से भागकर मदीने में शरण ली थी । यह प्रस्ताव तुरंत स्वीकार कर लिया गया था और भेटकर्ता ने अपनी उस पत्नि को तलाक दे दिया था जिसको प्रस्ताव के स्वीकारकर्ता व्यक्ति ने चुना था ।

लड़कियों का खतना किया जाना - हांलाकि इस विषय मुस्लिम विद्वानों में एक राय नहीं है । अफ्रीका के मुस्लिम देशों में यह प्रथा है कि वहां लड़की का भी खतना किया जाता है । यह इस्लामी मूर्खता की एक और मिसाल है किसी भी बात का निर्धारण उसके वैग्यानिक रूप से उपयोगी होने अथवा न होने से नहीं किया जाता बल्कि हर बात के कुरान व हदीस के आदेशों का सहारा लेना पड़ता है । बताया जाता है कि लड़की खतना काफी कष्टकारी प्रक्रिया है । व इसके होने का कारण यह बताया जाता है कि चूकिं इस्लाम में एक पुरूष को चार पत्नियां रखने का अधिकार है इस कारण वह अपनी चारों पत्नियो को संतुष्ट नहीं कर सकता । महिला के खतना करने से उसे संभोग से मिलने वाले आंनद में कमी आ जाती है इस कारण वह अपने पति के प्रति ईमानदार बनी रहती है ।

स्त्री का मरहम के बिना घर से बाहर न जाना - कोई स्त्री बिना मरहम ( एसा पुरूष जिससे इस्लाम के अनुसार विवाह नहीं किया जा सकता हो जैसे सगा भाई व पिता ) के घर से बाहर नहीं जा सकती ।

सारांश यह है कि इस्लाम में स्त्री को केवल भोग की वस्तु माना गया है । उसे केवल भरण पोषण का अधिकार दिया गया है जैसा कि एक गुलाम को दिया जाता है । भारत के सभी जागरूक लोगों से अपील है कि भारत में रहने वाली इन दस करोड़ मुस्लिम महिलाओं की स्थिति को सुधारने के लिए महिला आयोग व सरकार पर दबाव बनाएं । https://www.facebook.com/556687607814959/photos/a.558535544296832/616249081858811/?type=3&theater