हिंदी की कुछ संज्ञाएँ – परिभाषाओं एवं उदाहरणों के साथ : १ - १०

१) अक्षरश: = पूर्ण रूप से / पूरी तरह से | जैसे, “राजस्थान के करौली में एक पुजारी को ज़िंदा जला दिया गया। हाथरस की दंगाई मीडिया खामोश है, क्योंकि वहां उनकी मालकिन की सरकार है। पालतू श्वान नहीं भौंकते, भारतीय मीडिया पर यह अक्षरशः लागू होता है!” https://twitter.com/IndiaSpeaksISD/status/1314549950215192577

२) धर्मनिरपेक्षता = धर्म के आधार पर भेदभाव ना करना | परन्तु इन दिनों इसे केवल एक विशेष धर्म के लोगों पर ही लागू किया जाता है | जैसे, “हाथरस में पीड़िता दलित थी तो बलरामपुर में भी दलित लड़की से बलात्कार हुआ और उसकी आरोपियों द्वारा जघन्य हत्या हुई, लेकिन राहुल प्रियंका, कांग्रेस पोषित मीडिया और पूरा विपक्ष बलरामपुर नहीं गया। क्योंकि हाथरस में आरोप सवर्ण हिन्दू परिवार पर है जबकि बलरामपुर में आरोप शाहिद , साहिल और रफीक जैसे मुस्लिम समुदाय से आने वालों पर है। विपक्षी दलों की यही धर्मनिरपेक्षता है कि हिंदुओ को आपस मे लड़ाओ और आरोपी यदि मुस्लिम समुदाय से है तो चुप हो जाओ।“ https://www.indiaspeaksdaily.com/why-did-hathras-not-become-balrampur-investigation-on-congress-riot-strategy-started/

३) सार्वजनिक होना = सब को पता चल जाना | जैसे, “"टाइम" ही नहीं बीबीसी, दी इकोनॉमिस्ट, न्यूयॉर्क टाइम्स, वाल स्ट्रीट जनरल, वाशिंगटन पोस्ट, गल्फ न्यूज, एफ़वी, डीपीए, रॉयटर्स, एपी, गार्डियन जैसे बड़े मीडिया हाउस का भारतीय एजेंडा देश के उन्हीं बुद्धिजीवियों द्वारा निर्धारित और प्रसारित होता है, जिनकी पहचान पिछले कुछ वर्षों में टुकड़े-टुकड़े, अवॉर्ड वापसी के रूप में सार्वजनिक हो चुकी है। मई 2014 के बाद से सरकारी धन और स्वाभाविक शासक दल की सुविधाओं पर टिके रहने वाला यह बड़ा बौद्धिक गिरोह भारतीय लोकतंत्र और संसदीय व्यवस्था के प्रति लोगों को भड़काने में भी जुटा हुआ है। सुविधाओं से सराबोर लुटियंस से बेदखली ने इस गिरोह को इतना परेशान कर दिया है कि आज भारत के विरुद्ध खड़े होने में भी इन्हें संकोच नहीं है। वस्तुतः हिंदुत्व और बाद में नरेंद्र मोदी के विरुद्ध लंबा प्रायोजित अभियान चलाने के बावजूद जनता द्वारा मोदी को राज दिए जाने के संसदीय घटनाक्रम ने इस वर्ग की कमर तोड़ दी है। 2014 के बाद 2019 की मोदी की ऐतिहासिक जीत तो किसी पक्षाघात से कम नहीं है। ध्यान से देखा जाए तो भारतीय उदारवादियों ने बेशर्मी की सीमा लांघकर दुनिया में भारत और हिंदुत्व को लांछित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। हिन्दू नेशनलिस्ट, हिन्दू तालिबान, हिन्दू रेडिकल, हिन्दू मर्डरर जैसी शब्दावलियों को सर्वप्रथम किसी विदेशी मीडिया ने नहीं बल्कि भारतीय वाम बुद्धिजीवियों ने ईजाद किया है।“ https://news.agniban.com/pseudo-intellectuals-foreign-media-yarana/

४) हितग्राही = जिसे लाभ मिलता है | जैसे, “सवाल यह है कि दुनिया की सबसे बड़ी निर्वाचन प्रक्रिया से दो बार चुनकर आये मोदी को निष्पक्ष चुनाव प्रक्रिया के बाद भी खारिज किया जाएगा? लोकतंत्र का झंडा लेकर घूमने वाले अमेरिकी मीडिया के लिए भारत में निष्पक्ष चुनाव की स्वीकार्यता कोई महत्व नहीं रखती है? क्या यह निष्कर्ष हमारे संसदीय लोकतंत्र की विश्वसनीयता पर ठीक वैसा ही आक्षेप नहीं है जो अवॉर्ड वापसी गैंग पिछले 6 वर्षों से स्थानीय विमर्श में लगाता आ रहा है। कभी ईवीएम, कभी वोट परसेंट, कभी चुनावी मुद्दों की विकृत व्याख्या और हिन्दू ध्रुवीकरण जैसे कुतर्कों को खड़ा कर मोदी सरकार की स्वीकार्यता पर प्रश्नचिह्न यहां भी लगाये जाते हैं। केवल बीजेपी को हिन्दू राष्ट्रवादी विशेषण लगाया जाना कुत्सित मानसिकता को प्रमाणित नहीं करता है? क्या अमेरिका, इंग्लैंड या यूरोप में गैर ईसाई राष्ट्राध्यक्ष बनते रहे हैं? चेक रिपब्लिक और फ्रांस को छोड़ कितने देशों ने खुद को धर्मनिरपेक्ष घोषित कर रखा है। बुनियादी सवाल यही है कि क्यों भारत के सिर पर सेक्यूलरिज्म को थोपकर इसकी सुविधाजनक व्याख्या के आधार पर हमारे चुने हुए प्रधानमंत्री को लांछित किया जाए। इससे भी बड़ा सवाल यह है कि विदेशी मीडिया के पास क्या कोई अध्ययन और शोध मौजूद है जो यह प्रमाणित करता हो कि मोदी और बीजेपी मुसलमानों को निशाने पर ले रहे हैं? सबका साथ-सबका विकास-सबका विश्वास मोदी सरकार का दर्शन रहा है। सरकार की फ्लैगशिप स्कीमों में प्रधानमंत्री आवास, उज्ज्वला, जनधन, हर घर शौचालय, सुकन्या, किसान सम्मान निधि, खाद्य सुरक्षा, मुद्रा लोन में किसी हितग्राही को केवल मुसलमान होने पर बाहर किया गया हो, ऐसा कोई उदाहरण आजतक सामने नहीं आया।“ https://news.agniban.com/pseudo-intellectuals-foreign-media-yarana/

५) बलात्कार दर = जनसंख्या में प्रति लाख जनसंख्या पर बलात्कार | जैसे, “पश्चिमी मीडिया भारत को दुनिया की बलात्कार की राजधानी के रूप में चित्रित करता है, जबकि स्वीडन में बलात्कार दर 63.5 है, ऑस्ट्रेलिया में 28.6, संयुक्त राज्य अमेरिका में 27.3 और भारत में केवल 1.8 है। NCRB के आँकड़ों के अनुसार, छत्तीसगढ़ की 14.7 बलात्कार दर की तुलना में यूपी में बलात्कार की दर 3.7 है। राजस्थान में बलात्कार दर 11.7 और केरल की 10.7 है। अधिकांश मीडिया हाउस दिल्ली या नोएडा में स्थित होने के कारण, योगी का उत्तर प्रदेश ‘डोर स्टेप रिपोर्टिंग’ का शिकार हो जाता है। https://hindi.opindia.com/editors-picks/media-doorstep-journalism-why-it-hates-yogi-adityanath-hathras/

६) पुख्ता करना = पक्का करना | जैसे, “हालांकि चैनल्स को भी हाथरस की हकीकत पता चल चुकी है कि एएमयू, एसएफएल और सफदरजंग हॉस्पिटल तीनों ही रेप की बात खारिज कर चुके हैं, फिर भी वो टिके हुए हैं, कभी जयंत चौधरी को कवर करने तो अखिलेश यादव का इंतजार करने, सवर्णों या ठाकुरों की पंचायत कवर करने आदि। उधर द वायर ने एक और खेल किया, एक ऐसी रिपोर्ट चलाई जिस पर एक्सक्लूसिव लिखकर 22 तारीख के लड़की के उस सैक्सुअल असॉल्ट फॉर्म पर लिखे बयान को डॉक्टर की रिपोर्ट की तरह दिखाया, कई मीडिया वालों ने इस गलतफहमी फैलाने वाली खबर को भी उठाया। इधर एसआईटी की प्रारम्भिक रिपोर्ट के आधार पर पांच पुलिस अधिकारियों पर एक्शन ले चुकी है योगी सरकार और सीबीआई जांच का भी ऐलान कर दिया गया है। परिवार का नार्को के लिए मना करना, सीबीआई जांच के लिए मना करना और केवल डीएम को निशाने पर लेना, इस बात को और पुख्ता करता है कि इस पूरे केस की हकीकत वो नहीं है, जो आपको नेशनल मीडिया ने दिखाई है।“ https://prajaatantra.com/the-channels-who-were-lagging-in-coverage-of-sushant-case-and-truth-of-hathras-forgot-professionalism-to-achieve-top-spot/

७) बुद्धिजीवी = जो बुद्धि के द्वारा अपनी जीविका का निर्वाह करते हैं, जैसे की पत्रकार, लेखक। जैसे, “अयोध्या में श्री राम मंदिर निर्माण कार्य का नेत्र दीपक शुभारम्भ करोड़ों भारतीयों और दुनियाभर में भारतीय मूल के लोगों ने गौरव से देखा। जहां एक ओर कई सदियों के संघर्ष और सभी बाधाओं को पार कर करोड़ों भारतवासियों का स्वप्न साकार हो रहा था, वहीं दूसरी ओर भारत में सेकुलरवाद के नाम पर सांप्रदायिक राजनीति करने वाले राजनेता और देश-विभाजनकारी गतिविधियों की दुकान चलाने वाले बुद्धिजीवी-पत्रकार बहुत चिंतित दिखे। सांप्रदायिक राजनीति करने वाले कई सेकुलर नेताओं ने तो बदलते हुए भारतीय जनमानस को भांपकर राम मंदिर के संदर्भ में अपनी भूमिका ही बदल डाली, क्योंकि आने वाले चुनावों में उन्हें जनता का सामना करना पड़ सकता है। परन्तु, सेकुलरवाद की आड़ में भारत-विभाजन की दुकानदारी चलाने वाले बुद्धिजीवी-पत्रकार एक नया राग अलापते दिख रहे हैं-‘भारतीय संविधान खतरे में है, क्योंकि सेकुलरिज्म खतरे में है।’ इस कथन से वे ऐसा भ्रम निर्मित करने का प्रयास कर रहे हैं कि मानो यह ‘सेकुलरवाद’ भारतीय संविधान का प्राण है जो आरम्भ ही से संविधान का अभिन्न अंग था। यह वैसा ही हुआ जैसे किसी का तांगे के घोड़े को समझाना कि वह तो मुंह में लगाम लेकर ही पैदा हुआ था। खुद को संविधान का हितैषी बताने वाले इन बुद्धिजीवियों का दावा है कि संविधान के साथ बहुत बड़ा ‘धोखा’ हो रहा है। वास्तव में सेकुलर शब्द का संविधान में समावेश ही संविधान के साथ हुआ सबसे बड़ा धोखा था। 1975 में देश में ‘इमरजेंसी’ लागू की गई। जनतांत्रिक जीवन ठप हो गया। संसद में विपक्ष अनुपस्थित था। (क्योंकि विपक्ष के अधिकांश नेताओं को जेल में बंद कर दिया गया था और जो जेल में नहीं थे, वे भूमिगत थे) तब यह सेकुलरिजम शब्द संविधान में जोड़ा गया। सुव्यवस्थित भारतीय न्याय व्यवस्था में निचली अदालतों के निर्णयों को उच्च न्यायालयों में चुनौती देने का प्रावधान है। वहां समाधानकारक निर्णय न हो तो सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया जा सकता है। सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय से भी समस्या-निवारण न हो तो न्यायाधीशों की बड़ी पीठ के समक्ष अपना मत रखने का प्रावधान भी है। अगर समस्या का हल संविधान में परिवर्तन करना ही हो तो संसद में चर्चा कर पर्याप्त बहुमत के समर्थन से आप वह भी कर सकते हैं। किंतु संविधान सभा द्वारा अस्वीकृत इस ‘सेकुलर’ शब्द को संविधान में जोड़ने के लिए इनमें से किसी भी प्रक्रिया का उपयोग नहीं हुआ। आपातकाल के आतंक में, बिना किसी आवश्यकता, बिना किसी मांग और बिना किसी चर्चा या बहस के यह परिवर्तन संविधान की प्रस्तावना में छल से किया गया। यही भारतीय संविधान के साथ हुआ सबसे बड़ा धोखा था।“ https://www.panchjanya.com/Encyc/2020/9/28/India-is-a-pseudo-identity-of-secular-clan.amp.html

८) हास्यास्पद = हँसी / उपहास का विषय | जैसे, “सूचना एवं प्रसारण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर द्वारा बुधवार को टीआरपी के संदर्भ में एक बयान देने के दूसरे दिन गुरुवार को मुंबई पुलिस ने एक फर्जी टीआरपी रैकेट का भंडाफोड़ करने का हास्यापद दावा किया है। मुंबई पुलिस ने पैसा देकर टीआरपी खरीदने के मामले में रिपब्लिक भारत समेत तीन चैनलों पर आरोप लगाया है। गुरुवार शाम मुंबई पुलिस कमिश्नर परमबीर सिंह ने प्रेस वार्ता कर इस बात की जानकारी दी। इसके बाद पहले से चल रहे चैनल वॉर में और उबाल आ गया। सर्वविदित है कि सुशांत सिंह हत्या प्रकरण के बाद से देश का मीडिया न केवल परस्पर विरोधी हो गया, बल्कि महाराष्ट्र सरकार की दमनकारी गतिविधियों ने चैनल वॉर को और भी अधिक भड़का दिया है। परमबीर सिंह की प्रेस वार्ता के बाद इस हास्यापद आरोप को समझे बिना जिस तरह से सारी मीडिया ने इस खबर को प्रकाशित किया, उससे जाहिर हो गया है कि समूचा मीडिया अपने ही एक साथी मीडिया का विरोधी हो गया है। प्रेस क्लब द्वारा संज्ञान न लिया जाना भी आश्चर्यजनक लग रहा है क्योंकि महाराष्ट्र की सरकार ने सीधा प्रेस की स्वतंत्रता पर गंभीर हमला किया है। परमबीर सिंह की प्रेस वार्ता के बाद पता चला कि मुंबई पुलिस की एफआईआर में रिपब्लिक भारत का नाम था ही नहीं। मुंबई पुलिस की लिस्ट में मीडिया संस्थान इंडिया टुडे का नाम पाया गया है। इसके बाद सोशल मीडिया पर मुंबई पुलिस कमिश्नर को बुरी तरह ट्रोल किया जाने लगा।“ https://www.indiaspeaksdaily.com/arnabs-shout-after-the-case-on-republic-india-stop-it-if-you-can/

९) सांप्रदायिक = किसी विशेष संप्रदाय या पंथ से ही संबंध रखनेवाला तथा शेष संप्रदायों का विरोध करनेवाला या उनसे द्वेष रखनेवाला | जैसे, “दिल्ली के आदर्श नगर में एक मुस्लिम भीड़ द्वारा 18 वर्षीय हिंदू लड़के राहुल राजपूत पर किए गए क्रूर हमले के बाद उनकी मौत हो गई। राहुल राजपूत की दुर्भाग्यपूर्ण मौत के बाद आम आदमी पार्टी (AAP) नेता पवन कुमार शर्मा ने एक बयान जारी किया। AAP ने इस बयान में मुस्लिम युवकों द्वारा की गई इस भीड़ हत्या में धार्मिक एंगल न लाने की ‘अपील’ की है। दिल्ली विश्वविद्यालय के 18 वर्षीय छात्र राहुल राजपूत की मुस्लिम लड़की के साथ प्रेम प्रसंग होने की वजह से मोहम्मद अफरोज और मोहम्मद राज ने अपने तीन अन्य साथियों के साथ मिलकर उस पर बर्बरतापूर्वक हमला किया। मोहम्मद अफ़रोज़ और उसके साथियों द्वारा राहुल को पीटने का वीडियो CCTV में सामने आया है। उन्होंने पूरी तैयारी के साथ राहुल के चचेरे भाई के फोन पर कहा कि उन्हें अपने बच्चे को ट्यूशन दिलाना है, इसलिए राहुल को बाहर भेज दें। फोन सुनकर राहुल बिना किसी को बताए बाहर गली में आ गया। घर के बाहर मौजूद 4-5 लोग उसे अपने साथ ले गए और गली नंदा रोड पर लात- घूंसों से उसको मारना शुरू कर दिया। CCTV में देखा गया कि मारपीट के बाद घायल हालत में ही राहुल किसी तरह से अपने घर पहुँचा। फिर उन्हें पास के एक अस्पताल में ले जाया गया, जहाँ इलाज के दौरान राहुल ने दम तोड़ दिया। 18 वर्षीय राहुल की पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में अंदरूनी चोटों को मौत का कारण बताया गया। गौर करने वाली बात है कि ये उसी AAP के विधायक मामले का सांप्रदायिकरण नहीं करने का ज्ञान दे रहे हैं, जिनका सांप्रदायिक भावनाओं को भड़काने का लंबा और पुराना इतिहास रहा है। जाहिर सी बात है कि यह हिंदू लड़का और मुस्लिम लड़की से जुड़ा मामला है, इसलिए इस ‘सेक्युलर अपराध’ पर पर्दा डालने की कोशिश की जा रही है। कुछ महीने पहले, AAP नेता उन लोगों में शामिल थे, जिन्होंने नागरिकता संशोधन अधिनियम के खिलाफ ‘शांतिपूर्ण’ विरोध प्रदर्शन करने की आड़ में राष्ट्रीय राजधानी में हिंदू विरोधी दंगे भड़काने की साजिश रची थी। तब AAP पार्षद ताहिर हुसैन कथित रूप से एक मुस्लिम भीड़ को उकसाने में शामिल थे। इस दौरान AAP पार्षद के घर के अंदर इंटेलिजेंस ब्यूरो के कर्मचारी अंकित शर्मा को घसीटा गया और फिर बेरहमी से मार डाला गया। शर्मा को चार से छ: घंटे तक कम से कम 400 बार चाकू मारा गया। आईबी के कर्मचारी अंकित शर्मा की मौत के मामले में दर्ज एफआईआर में ताहिर हुसैन का नाम शामिल होने के बाद AAP ने उन्हें निलंबित कर दिया था। AAP पार्षद ताहिर हुसैन ने बाद में दिल्ली में हिन्दू विरोधी दंगों को अंजाम देने की बात कबूल की। दिल्ली पुलिस को अपने कबूलनामे में, हुसैन ने कहा कि खालिद सैफी, जो उनके बहुत करीब हैं, ने उनके साथ दंगों की योजना बनाई। उन्होंने एक बार उनसे कहा था कि उनकी राजनीतिक स्थिति और धन का उपयोग हिंदुओं के खिलाफ और समुदाय के लिए किया जाना चाहिए।“ https://hindi.opindia.com/politics/aap-asks-not-to-communalise-the-communal-murder-of-rahul-rajput/

१०) सर्वविदित = जिसे सभी जानते हों | जैसे, “सभी जानते हैं कि शाहीन बाग का धरना अवैध था उस धरने में भारत के विरुद्ध षडयंत्र रचे गए। शरजील इमाम, उमर खालिद जैसे छात्र नेताओं ने भारत के चिकिन नेक काटने, ट्रम्प के दौरे पर अराजकता फैलाने से लेकर दिल्ली दंगों तक की पृष्ठभूमि तैयार की। नागरिकता संशोधन कानून का सबन्ध भारत के किसी मुसलमान से नही है, यह सर्वविदित तथ्य है। एनआरसी का प्रारूप तब और आज भी सामने नहीं था, लेकिन देश भर में झूठ और नफरत फैलाकर मोदी-अमित शाह के साथ भारत को बदनाम किया गया। इसी नकली और प्रायोजित धरना-प्रदर्शन की आइकॉन के रूप में राणा अयूब के जरिये टाइम ने बिलकिस को मोदी के समानान्तर जगह देकर अपनी चालाकी को खुद ही प्रमाणित कर दिया। राणा के हवाले से बिलकिस को लेकर लिखा गया है कि "वो ऐसे देश में प्रतिरोध का प्रतीक बन गईं जहाँ मोदी शासन बहुमत की राजनीति द्वारा महिलाओं और अल्पसंख्यक की आवाज को बाहर कर रही है।" सवाल यह है कि तीन तलाक के नारकीय दंश से मुक्ति दिलाने वाले मोदी राज में महिलाओं और अल्पसंख्यक के उत्पीड़न का प्रमाणिक साक्ष्य किसी के पास उपलब्ध है? सिवाय अतिरंजित मॉब लिंचिंग की घटनाओं के जो 130 करोड़ के देश में स्थानीय कानून की न्यूनता का नतीजा है जो अखलाक के साथ पालपुर में भी घटित होती है। लेकिन शोर केवल अल्पसंख्यक और उसमें भी मुसलमानों को लेकर खड़ा किया जाता है।“ https://news.agniban.com/pseudo-intellectuals-foreign-media-yarana/ https://dakhal.net/dakhal-media-news.php/rssfeeds/