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सिद्ध लोक-पृथ्वी पर अदृश्य द्वार-पृथ्वी पर स्वर्ग

posted Feb 11, 2012, 2:21 AM by Site Designer   [ updated Feb 11, 2012, 5:58 AM ]

सदियों का समय बीत गया है. पृथ्वी पर एक संसार है जिसे देख पाना हर किसी के लिए संभव नहीं है.पर वो अब तक जीवित है, वैसे का वैसा. एक ऐसा संसार जिसने इस पृथ्वी पर मानव को अध्यात्म और चेतना का ज्ञान दिया. एक ऐसा स्थान जो स्वर्ग है. जिसने इस सृष्टि को बनाने वाले की ओर इशारा किया. ईश्वर को समझ कर मानव को उस तक पहुँचाने का रास्ता दिखाया. मानव उस अदृश्य संसार के बताये मार्ग पर जब भी चला उसने पृथ्वी पर ही आनंद का अहसास कर लिया. जब-जब मानव की बुद्धि पाप की ओर बड़ी, तो उस संसार नें अपन सीनें में छुपाये हीरे जैसे चमकते महापुरुषों को संसार में भेजा. सारे धर्म वहीँ से शुरू हुए हैं वहीँ पर जा कर समाप्त हो जाते हैं. उस अदृश्य लोक तक पहुँचाना सभी की चाह रही है. पृथ्वी पर पूर्व नें धर्म को इतना बढ़ा दिया कि प्राचीन विश्व में कोई देश इस लहर से न बच सका. आज भी जहां से इन सबकी शुरुआत हुई है.वहां न तो कोई मंदिर है न कोई स्तूप या ध्वजा. कोई भी ऐसी निशानी नहीं है लेकिन बड़े से बड़ा अवतारी भी वहां जा कर किसी अनंत में विलीन हो जाना चाहता है. ये रहस्यमय संसार बसता है भारत देश के उत्तर में. जिसे कहा जाता है "महाहिमालय" या कौलान्तक पीठ. इसी कौलान्तक पीठ को स्वर्ग का नाम भी दिया गया गया है. प्राचीन विश्व के सभी धर्मों में पहले बहुत से देवी-देवता हुआ करते थे. जो समय के साथ-साथ पैदा हुए महापुरुषों द्वारा गौण कर दिए गए. और ईश्वर को सम्मुख लाये. बड़े-बड़े इतिहासकार हों या धर्म के शोधकर्ता सब ये तो जानते हैं कि भारत के हिमालयों में कुछ तो है. लेकिन कुछ हाथ नहीं आता. काश्मीर से ले कर नेपाल के बीच एक अदृश्य संसार अभी जीवित है. जिसका द्वार उन्नत मानवों की प्रतीक्षा करता रहता है. उन दिव्य पुरुषों की प्रतीक्षा जो माहामाया द्वारा रचित मायाजाल को समझ कर उससे मुक्त हो कर वहां आ सकें और अनंत के द्वार में समाहित हो जाएँ. हिमालयाई राज्यों में एक राज्य है हिमाचल प्रदेश. जहाँ के लोगों के बारे में कुछ वर्षों पहले तक ये विख्यात था कि वहां के लोग बड़े ही भोले और सहायता करने वाले होते हैं(हालांकि अब ऐसा नहीं है). जिसका कारण था सभी दैविक शक्तियों का गढ़ वहां होना. अनेकों देवी-देवता इस क्षेत्र में आ कर ठहर गए. जिसके पीछे अनेक कथाएं हैं लेकिन असल तथ्य लोग भूल गए औए इसे महाभारत की कथा से जोड़ कर बताते हैं. लेकिन ऐसा नहीं हैं. इस हिमालय में जरूर कुछ ऐसा है कि तंत्र-मंत्र, पूजा-पाठ, भक्ति-साधना से भी आगे यहाँ की भूमि का चयन ऋषियों नें तपस्या के लिए किया. काश्मीर की पहाड़ियों से ले कर नेपाल की भारतीय सीमा से कुछ अन्दर तक ऐसा है जिसे तर्क से समझाना ठीक वैसा है जैसे बिना आँखों के दृश्य को देखना. इस भूमि में भूत-प्रेत से ले कर देवी-देवता और ऋषि-मुनि सभी रहते हैं. लेकिन इन सबके बाबजूद भी यहाँ परम शान्ति है. एक ऐसा आनंद है जिसे योगी ही जान सकते हैं. पश्चिम के प्राचीन विद्वान् तिब्बत को रहस्य की दृष्टि से देखते थे और प्राचीन तिब्बत के लोग भारत की ओर. लेकिन कोई जान नहीं पाया कि आखिर एक अदृश्य धागा जो महसूस तो हो रहा है पर है कहाँ? वो सूत्र हिमालयों में छिपा है. इसके बारे में कोई नहीं बताना चाहता. यदि बताये भी तो क्या बताये? 
जहाँ चौरासी सिद्ध आज भी बसते हैं. जहाँ नव नाथ आज भी विचरते हैं. ऐसी भूमि को अदृश्यों नें रक्षित कर रखा है. लेकिन खोजने वालों नें तो ईश्वर को भी खोज लिया तो भला ये दिव्य भूमि कैसे और कब तक बचती? बात चाहे लंकानाथ की हो या फिर ईसानाथ की. सिद्धों में श्रेष्ठ मुनि कपिल की हो या फिर किसी अवतार की. सबकी जड़ें इसी भूमि पर हैं. यही भूमि मानव को पाप से बचने के लिए प्रेरणा देती है.यही धरती पृथ्वी के हर भाग पर अवतारी चेतनाओं को भेजती है. क्योंकि यहाँ वो महापुरुष और आध्यात्मिक सत्ताएं विद्यमान हैं जो परम पवन हैं. इनके सान्निध्य में आ जाने से साधारण सा बालक भी महापुरुष में बदल जाता है. इस भूमि से अनेक प्रकार के महापुरुष समाज में आ कर दुखी और पीड़ित मानवता को हर बार एक मार्ग दिखाते हैं. जिनका सदियों तक संसार पालन करता हुआ सुख पाता है. लेकिन ये संसार गुप्त है. तब तक दिखाई ही नहीं देता जब तक कि दिव्य चक्षु जागृत न हो जाए और आत्मिक सत्ता पवित्र हो कर निर्मल न हो जाए. संसार में निहित प्राचीनतम पुस्तकों व अवतारों के रहस्यों को अगर खंगाला जाए तो उनमें वो सारे तरीके बताये गए हैं जिनके द्वारा इस अदृश्य को देखा जा सकता हैं. सबसे बड़ी बात तो ये है कि केवल देखा ही नहीं वरन इस भूमि से भेजे गए संतो, महात्माओं, गुरुओं व ईश्वर पुत्रों के संपर्क में आने व उनकी विधियों द्वारा अपने को निर्मल करने पर साधक को भी इस धरा में प्रवेश मिल जाता है. इतिहास को जानने वाले ये भी भली प्रकार जानते हैं कि रेशमी मार्ग द्वारा विदेश के सुदूर क्षेत्रों से भी विभिन्न पंथों और धर्मों के संस्थापक अन्तत: यहाँ जरूर पहुंचे. यहीं बुद्ध द्वारा दिया मार्ग तंत्र से जा मिला और नया बौद्ध धर्म धरा पर आया जो आज जीवंत हो कर तिब्बत में गढ़ के रूप में प्रतिष्ठित है. कौलान्तक पीठ अदृश्य पीठ है किन्तु युगों से गुरु शिष्य परम्परा के कारण ये पीठ आज भी जीवित है. कई धर्म सम्प्रदाय पनपे नष्ट हो गए लेकिन कौलान्तक पीठ दृढ वैसे का वैसा ही है.  कितनी हैरानी की बात है कि वहां लोग आ जा रहे हैं. वो सभी काम वैसे ही कर रहे है जैसे कि दुनिया के किसी और भाग में लोग करते हों. लेकिन किसी को अहसास ही नहीं हो पाता कि उनके चारों और एक अद्भुत संसार है? शायद हठयोग पर गुरु गोरक्ष नाथ जी नें इसीलिए अधिक जोर दिया कि साधक कुण्डलिनी जागरण द्वारा इस स्थिति को पा सके कि इन रहस्यों को समझ सके. आम आदमी बेचारा ये सोचता है कि वो तो बड़ा बुद्धिमान है, उसकी इन्द्रियां बेहद कारगर है. उसकी तर्क शक्ति सबसे बेहतर है. पर गलत! इस स्थिति पर पहुचे व्यक्तित्व की कल्पना बेहतर तो क्या बेहतरीन दिमाग से भी नहीं की जा सकती. इस महाहिमालय में जाने का एक अद्भुत मार्ग भी है जो गुरु बताते हैं. वो है एक अदृश्य हवा का झोंका? आपको हैरानी हो रही होगी? लेकिन ये अदभुत सत्य है. हिमालय के पर्वतों में साधक भटकता फिरता है केवल एक ऐसे हवा के झोंके के लिए जो सुनायी देता है. किसी-किसी को दिखाई भी देता है. यहाँ तक की यदि आध्यात्मिक योग्यता हो तो उसी झोंके में निहित शक्तियों के साथ आप भी एक अदृश्य लोक में प्रवेश पा लेते हैं. अधिक नहीं कहूँगा. आजकल के कृत्रिम मायाजाल में उलझे लोग इसे कपोल कल्पना या कहानी मानेंगे. ठीक भी है ये अदृश्य संसार उनके लिए नहीं है. वो इसे परिहास का विषय ही मानें तो ही बेहतर है. मेरा उद्देश्य तो केवल ये बताना है कि इस अदृश्य को ही धर्म जगत अनेक नामों से पुकारता है. किन्तु इस अदभुत अलौकिक को कुछ लोग देखना और महसूस करना चाहते हैं. किन्तु ढूँढने जाते हैं पर हाथ कुछ नहीं आता. इसलिए इस अदृश्य को इंगित करने वाला एक स्थान बनना चाहिए. ये हमारा विचार है. जहाँ साधक आ सकें बैठ सकें और विश्व के सबसे प्राचीन धर्म और अध्यात्म को गहरे से समझ सकें. किन्तु इस कल्पना को वास्तविकता के धरातल पर उतारना कोई सरल कार्य नहीं है. इसके लिए अध्यात्म बल के साथ-साथ धन बल की भी आवश्यकता होगी. इस समय कौलान्तक पीठाधीश्वर सत्येन्द्र नाथ जी महाराज धरा पर हैं. उनके पावन सान्निध्य का लाभ उठा कर इस कार्य को पूरा किया जा सकता है. इसलिए कौलान्तक पीठ परिवार अब ये सोच रहा है कि ये कार्य कैसे पूरा किया जाए. इसलिए हम उन साधकों से प्रार्थना करते हैं कि वो धन बल से हमारा सहयोग करें ताकि उनके लिए इस स्थान को जीवंत किया जा सके. ये स्थान कहाँ और कैसे बनना है इसके लिए हमने कौलान्तक पीठाधीश्वर महायोगी जी से परामर्श शुरू कर दिया है. सहयोग व आपकी राय से इसे पूर्ण किया जा सकेगा. अतः केवल वो साधक जो इन रहस्यों को जानते हैं वही आर्थिक सहायता प्रदान करें. आपका सहयोग इस धरा पर उस अदृश्य को इंगित करने वाला स्थाई चिन्ह बन जाएगा.
-कौलान्तक पीठ टीम 
(यहाँ हम कौलान्तक पीठाधीश्वर महायोगी सत्येन्द्र नाथ जी महाराज का एक चित्र प्रस्तुत कर रहे हैं जिसमें उनहोंने एक प्राचीन स्तम्भ का आधार पत्थर हाथों में उठा रखा है. जिसका संकेत साफ है कि चाहे कोई सहायता करे या न करे मैं तो ये कार्य पूरा करके ही रहूँगा. तो आपको भी महायोगी जैसी दिव्य चेतना के साथ इस सनातन धर्म कार्य में हाथ बटाना चाहिए-ॐ नम: शिवाय )

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