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In our heavenly land of Uttarakhand ! Mera Dandi Kanthiyoon ka Muluk Jailyu Mera dandi kanthiyoon ka muluk jailyu, Basant ritu ma jaiyi -2 ------------------------------ हिमालय की गोद में - देवभूमि उत्तराखंड
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नरेंद्र सिंह नेगी ने 1994 में उत्तरकाशी में जब यह पंक्तियां लिखीं, तब सामने अलग राज्य का संघर्ष था। आज अलग राज्य तो है, लेकिन आम आदमी का संघर्ष वही है। ऐसे में उनका यह गीत आज मुझ जैसे न जाने कितने लोगों को संबल देता है।
द्वी दिनू की हौरि छ अब खैरि मुट्ट बोटीकि रख घुघुती ना बासा, आमे कि डाई मा घुघुती ना बासा तेर घुरु घुरू सुनी मै लागू उदासा रीतू आगी घनी घनी, गर्मी चैते की तेर जैस मै ले हुनो, उड़ी बेर ज्यूनो उडी जा ओ घुघुती, नेह जा लदाखा जन्म: 20 मई 1900 जन्म स्थान ग्राम कौसनी, अल्मोड़ा -------------------------- ग्राम श्री फैली खेतों में दूर तलक रोमाँचित-सी लगती वसुधा अब रजत-स्वर्ण मंजरियों से पीले मीठे अमरूदों में बगिया के छोटे पेड़ों पर लटके तरुओं पर विहग नीड़ हँसमुख हरियाली हिम-आतप |
Peace (The following poetry is a selection from works of Swami Vivekananda and was composed by him at Ridgely Manor, New York, on 21st September, 1899.) Behold, it comes in might, It is not joy nor sorrow, THOU BLESSED DREAM If things go ill or well- कही एक मासूम नाजुक सी लडकीकही एक मासूम नाजुक सी लडकीबहुत खुबसुरत मगर सांवली सी मुझे अपने ख्वाबों की बाहों में पाकरकभी नींद में मुस्कुराती तो होगीउसी नींद में कसमसा-कसमसाकरसरहाने से तकिये गिराती तो होगी वही ख्वाब दिन के मुंडेरों पे आकेउसे मन ही मन में लुभाते तो होंगेकई साझ सीने की खामोशियों मेंमेरी याद से झनझनाते तो होंगेवो बेसख्ता धीमें धीमें सुरों मेंमेरी धुन में कुछ गुनगुनाती तो होगी चलो खत लिखें जी में आता तो होगामगर उंगलियाँ कंपकपाती तो होगीकलम हाथ से छुट जाता तो होगाउमंगे कलम फिर उठाती तो होंगीमेरा नाम अपनी किताबों पे लिखकरवो दातों में उंगली दबाती तो होगी जुबाँ से कभी अगर उफ् निकलती तो होगीबदन धीमे धीमे सुलगता तो होगाकहीं के कहीं पाँव पडते तो होंगेजमीं पर दुपट्टा लटकता तो होगाकभी सुबह को शाम कहती तो होगीकभी रात को दिन बताती तो होगीनर हो न निराश करो मन को नर हो न निराश करो मन को जग में रहके निज नाम करो संभलो कि सुयोग न जाए चला जब प्राप्त तुम्हें सब तत्त्व यहाँ निज गौरव का नित ज्ञान रहे क्यूँ डराती है ये हवा अक्स मेरा न तू दिखा मुझको मेरी नज़रों से मत गिरा मुझको ।
मुझको रहने दे मेरे जैसा ही अपने जैसा न तू बना मुझको ।
एक सूखा हुआ शज़र हूँ मैं इतना ज़्यादा भी मत झुका मुझको ।
एक पैसा फकीर ने लेकर बख़्श दी ढेर सी दुआ मुझको ।
भूल जाऊँ न मैं उड़ान अपनी छोड़ कुछ देर तो खुला मुझको ।
टिमटिमाता चिराग़ हूँ मैं जब क्यूँ डराती है ये हवा मुझको ।
बेरुखी बेहिसी और ख़ुदग़र्जी शहर में आके ये मिला मुझको ।
मैं हूँ खुश्बू मुझे बिखरना है ऐ हवा दूर तक उड़ा मुझको ।
कैसे कर लूँ ज़मीर का सौदा रोकती है 'फ़िगार' अना मुझको ।
रईस अहमद 'फ़िगार' 56, जवाहर कॉलोनी, बल्लूपुर रोड देहरादून, उत्तराखंडAmir Khusro Amir Khusro was born in 1253 in Patiyali (Etah district in U.P.). He compiled his first divan of poetry Tuhfatus-Sighr in 1250. He wrote the famous ‘Tughlaq Nama’ in 1321 and died in 1325. Khusro is regarded as the first poet (Adikavi) of Hindi. His works are in a language which is a mixture of Braj, Hariyanvi, Khadi Boli, Farsi and sometimes Sanskrit. He himself called it Hindavi. The various styles of poetry used by him are:
1. Dohe (दोहे) – These are generally composed of two lines and are very brief. खीर पकायी जतन से, चरखा दिया जला। आया कुत्ता खा गया, तू बैठी ढोल बजा।।
2. Keh-mukarni (कह-मुकरनी) – They are used to point to the ‘lover’ but they finally turn out to be some very mundane thing. लिपट-लिपट के वाके सोई, छाती से छाती लगाके रोई। दांत से दांत बजे तो ताड़ा, ऐ सखी साजन ? ना सखी जाड़ा।
3. Dosukhne (दोसुखने) – In these two questions have the same answer and there is a pun. समोसा क्यूं न खाया ? जूता क्यूं न पहना ? तला न था। सितार क्यूं न बजा ? औरत क्यूं न नहाई ? परदा न था।
4. Paheliyaan (पहेलियाँ) – These are interesting riddles. एक परख है सुंदर मूरत, जो देखे वो उसी की सूरत। फिक्र पहेली पायी ना, बोझन लागा आयी ना।। तुम इक गोरख धन्दा हो!! कभी यहाँ तुम्हें ढूँढा, कभी वहाँ पहुँचा हो भी नहीं और, हर जा हो हर ज़र्रे में किस शान से तू जल्वा\-नुमा है तुझे दैर\-ओ\-हरम में मैंने ढूँढा तू नहीं मिलता ढूँढे नहीं मिले हो, न ढूँढे से कहीं तुम जब बजुज़ तेरे कोई दूसरा मौजूद नहीं जो उल्फ़त में तुम्हारी खो गया है मैं जिसको कह रहा हूँ अपनी हस्ती हैरां हूँ इस बात पे तुम कौन हो क्या हो? अक़्ल में जो घिर गया ल\-इन्तहा क्योंकर हुआ? छुपते नहीं हो सामने आते नहीं हो तुम दैर\-ओ\-हरम के झगड़े मिटाते नहीं हो तुम ये माबाद\-ओ\-हरम, ये कलीसा, वो दैर क्यों? दिल पे हैरत ने अजब रँग जमा रखा है! रूह को जिस्म के पिंजरे का बनाकर कैदी राह\-ए\-तहक़ीक़ में हर ग़ाम पे उलझन देखूँ बनके रह जाता हूँ तसवीर परेशानी की कहीं ज़हमत की सुलग़ती हुई पत्झड़ का समा कहीं फुँकारते दरिया, कहीं खामोश पहाड़! दिन के हाथों में फ़क़त एक सुलग़ता सूरज कहीं मुरझाए हुए फूल हैं सच्चाई के रात क्या शय है, सवेरा क्या है? मैं भी नायिब हूँ तुम्हारा आख़िर जो कहता हूँ माना तुम्हें लगता है बुरा सा कल ताज सजा देखा था जिस शक़्स के सर पर तुम इक गोरख धन्दा हो!! 6 Reasons to Drink Wine by Debra Gordon Why a little glass each day may do you good. The list of wine’s benefits is long—and getting more surprising all the time. Already well-known as heart-healthy, wine in moderation might help you lose weight, reduce forgetfulness, boost your immunity, and help prevent bone loss. With America likely to edge out France and Italy in total wine consumption in the near future, according to one analyst, and with women buying more than 6 out of every 10 bottles sold in this country, we’re happy to report that wine may do all of the following: 1. Feed your head 2. Keep the scale in your corner 3. Boost your body’s defenses 4. Guard against ovarian woes 5. Build better bones 6. Prevent blood-sugar trouble —Freelance writer Debra Gordon, a pinot noir fan, specializes in health reporting. कटोरा भर याद में डूबी टिहरी बचपन की धुँधली यादों में टिहरी मेरे दिमाग़ में तब से उभरता है, जब पाँच वर्ष का होने पर पीले कपड़ों में मेरा मुंडन कराया जा रहा था। हमारा घर, जहाँ मैं पैदा हुआ था, दयाराबाग में था, यानी भिलंगना नदी के दाहिने किनारे, मदननेगी-प्रतापनगर जाने वाली सड़क के पहले पड़ाव पर। नीचे कंडल गाँव था, जहाँ की सिंचित ज़मीन बहुत उपजाऊ मानी जाती थी। टिहरी के घंटाघर की तरफ़ से चलें तो भादू की मगरी तक सीधा रास्ता था। फिर भिलंगना की घाटी में नीचे उतरना पड़ता था, जहाँ एक पुल था और फिर पुल के पार दयाराबाग का किनारा छूते हुए खड़ी चढ़ाई पर यह सड़क प्रतापनगर तक जाती थी, जहाँ टिहरी के महाराजा ने अपने ग्रीष्मावकाश के लिए एक महल बनाया हुआ था। |











