Home‎ > ‎

विविधा

(खास होळी निमित्त ही लावणी.  मीराबाईंच्या  " केनो संग खेलू होरीपिया  त्यज  गये  है अकेली" या  वरून  स्फुरली. 

चाल  स्वरचित पुरिया धनश्री वर आधारित.)

 

गेली  संक्रांत  आली  बाई  होळी  हो

नाही  काही  तुमचा  पता

कुणासंग  पंचीम  रंगाची  मी  खेळू  हो

 

सन  भाग्याचा,  आहे  फार  मोठा

घरला  या  धनीराग  आता  सोडा

तुम्हांसाठी  केली,  पुरणाची  पोळी  हो

 

दिस  उन्हाळी,  सोसवेना  उन

किती  पुसावं, घामाघूम  अंग

आग  लावी  राती, चंदनाची  चोळी  हो

 

तुमच्याविना  शेज, सुनी  सुनी  लागे

विझली  होळी  अन, राख  उरं  मागे,

रोज  खुणविते, चंद्रकोर  भाळी  हो

 
 
('मियां  मल्हार'  रागात  आणि  रूपक  तालावर  रचलेली  माझी  स्वतःची  एक  चीज)

 

कारी  कारी  बदरा  छाई

नभ  मे  चमके  दामिनी

मोको   जियरा  डर  लागे

आओगे  कब  शामजी

 

ब्रज  को  त्यज  तुम  गये  जबसे

सुनी  सुनी  बासुरी

पपीहे  की  सुनी  बोली

सुनी  बन  की  मोरनी

 

घनन  घन घन  घटा  बरसे

बह  रही  जमुना  भरी

उमड  आयो  मनवा  ऐसे

बह  रही  अखिया  मोरी

 

 

('दुर्गारागातली  पं. शिवकुमार  शर्मा  यांनी  संतूरवर  वाजवलेली  धून  ऐकताना  मला  एक  चाल   सुरुवातीचे  शब्द  सुचले. त्यावर  मग  ही  पूर्ण  रचना  बांधली.)

 

सावरिया  सावरिया,  सावरिया  सावरिया

मन  को  लुभाये  तोरी  बसुरीया

सावरिया  सावरिया

 

मैं  ब्रज  की  हुं  नार  नवेली

जनम  जनम  की  तेरी  सहेली

मोह  लिया,  मोह  लिया,

तन  मन  तुने  मोह  लिया

सावरिया  सावरिया,  सावरिया  सावरिया

 

सावन  के  झुलेसी  मैं  हुं

तुम  बादल  से  हो  घनश्याम

सागर से  घननील  सखा तुम

बलखाती  मैं  एक  नदिया

सावरिया  सावरिया,  सावरिया  सावरिया

 

(यातले  दुसरे  कडवे  मला  विशेष  प्रिय  आहे.  कृष्णाचा  रंग  श्यामल  आणि  निळा  असे  दोन्ही,  ते  या  एकाच  कडव्यात  आढळतात.  साधा  झाडाला  बांधलेला  झोका  पण  त्याला  ओढ  मात्र  आकाशातल्या  ढगाची.  स्वतःला  अश्या  झोक्याची  उपमा  देताना  कृष्णाला  मात्र  ती  ढगाची  उपमा  देते.  त्याचा  श्यामल  वर्णच  नाही  तर  त्याचे  भव्यत्व  सुद्धा  यातून  जाणवते.  तसेच  चंचलपणे  वाहणाऱ्या  नदीच्या  मानाने  सागर  हा  कितीतरी  अथांग, विशाल  आणि  शांत.  कविता  हा  प्रकार  मला  याकरता आवडतो.  थोड्या  शब्दात  कवी  काही  सांगतो.  पण  वाचकाने  मात्र  त्याच्या  परीने  त्याचा  अर्थ  शोधायचा  असतो )
 

© सुरेश नायर

२०१०