Home‎ > ‎कविता‎ > ‎

पंख

पंख

 

उडता   उडता   एकदा   एक   राघू

झाडाच्या   एका   फांदीवर   येऊन   बसतो

हिरवट   पिवळ्या   पिकल्या   पेरूला

आपल्या   लालबुंद   चोचीने   कोरु   लागतो

 

तोच   एक आवाज   येतो,  "सावध   सावध

लबाड  काळ्या   बोक्यापासून   जरा   जपून   रहा"

राघू   पाहतो, अंगणातल्या   पिंजऱ्यात   पोपट   दिसतो

म्हणतो   "धन्यवाद   मित्रा,  आहेस   तू   कसा "

 

पोपट  म्हणतो "एकदम   झकास,

ताज्या   हिरव्या   मिरच्या,  पेरूच्या   गोड   फोडी,

पिंजऱ्यातला   या   आयुष्याची   तुला

काय   म्हणून   सांगू   गोडी "

 

जो   तो   लाडाने   मला   मिठू   मिठू म्हणतो

मीही   त्यांना   मग   राम   राम करतो

सध्या   घेतोय  जरा   इंग्रजीचा  लेसन

'गुड   मोर्निंगटाटा,  थ्यांक  यु,  नो  मेन्शन'

 

राघू म्हणतो  "नशीबवान   मोठा   आहेस गड्या,

पिंजऱ्याचे   भोवती   तुला आहे   सरंक्षण

खाण्या   पिण्याचीही   नाही   काही   चणचण

वेळे   आधी   तुला  कधी   यायचे   नाही   मरण

 

मी   बापडा   उडत   असतो,  पंख   घेऊन   आपले

पोटासाठी   जिथे   तिथे   वणवण करत

आपले   तर   जगणे   तेवढेच   आहे   जोवर

पंखांमध्ये   दोन   या आहे  थोडी  ताकद

 

तुला  नाही  वाटत   कधी पिंजऱ्याबाहेर   यावे,

पंखांमध्ये   वारे   भरून   लांबवर   उडावे?"

हळू   आवाजात   पोपट म्हणतो "मालकाने   पंख  कापले

पिंजऱ्यात   राहतो   त्याला,  कशाला   पंख हवे ?

 

 तुटल्या   पंखाकडे   पाहत   राघू   पुढे   बोलत   नाही

जाताना   फक्त   म्हणतो  'मित्रा   आता  निघतो'

दूरवर त्याला जाताना  पाहत  पोपट  मात्र

पिंजऱ्यातल्या  झोक्यावर   हळू   झोके   घेत   राहतो

 

 © सुरेश नायर

२ /२०१०

Comments

Suresh Nair - Feb 28, 2010 8:16 AM

या कवितेवर काही प्रतिक्रिया इथे पहा http://www.misalpav.com/node/11191