महर्षि पातञ्जल ने हिरण्यगभॅ के आधार पर प्रस्तुत योगशास्त्र का निर्माण किया । इस का लक्ष्य मनुष्य को स्थूलता से सूक्ष्मता की ओर ले जाना अर्थात् चेतना को बाहर से अंतर्मुख कर के परमात्मा में लय करना है ।
योगशास्त्र में कुल छ्ब्बीस तत्त्व माने गये हैं – ईश्वर (पुरुष-विशेष), पुरुष (जीव) प्रकृति के चौबीस तत्त्व अर्थात् मूल-प्रकृति, महत्तत्व, अहंकार, पाँच तन्मात्राएँ (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध), पाँच कर्मेन्द्रियाँ (वाणी, हस्त, पाद, उपस्थ और गुदा), पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ (श्रोत, त्वचा, नेत्र, रसना और घ्राण), पाँच स्थूल भूत (आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी) और मन । ईश्वर सृष्टि का निमित्त-कारण अर्थात् सामग्री जिससे वस्तु का निमार्ण होता है । ईश्वर की सन्निधि मात्र से जङ प्रकृति में निम्न परिणाम होते हैं -
जङ प्रकृति और चेतन पुरुष के संयोग से समस्त सृष्टि का निर्माण हुआ है । यद्यपि पुरुष प्रकृति का स्वामी है, परंतु अविद्या के कारण पुरुष अपने स्वरूप को भूल कर प्रकृति की जङता और उस से उत्पन्न दुःख को अपना स्वरूप समझने लगता है । इस सम्बन्ध में भारतीय दर्शनशास्त्रों (षड्दर्शन - मीमांसा, वेदांत, न्याय, वैशेषिक, सांख्य और योग) में निम्न चार विषयों पर इस प्रकार गहन चिंतन किया गया है –
प्रश्र्न – हेय अर्थात् त्यागने योग्य क्या है ?
उत्तर – आने वाला दुःख हेय है । (पातंज्जल योग, साधनापाद, सूत्र 16) प्रश्र्न – हेयहेतु अर्थात् हेय का कारण क्या है ?
उत्तर – द्रष्टा (पुरुष) और दृश्य (प्रकृति) का अविवेकपूर्ण संयोग हेयहेतु है । (पातंज्जल योग, साधनापाद, सूत्र 17) प्रश्र्न – हान अर्थात् दुःख का नितांत अभाव क्या है ?
उत्तर – अविद्या का अभाव हान है । (पातंज्जल योग, साधनापाद, सूत्र 24) प्रश्र्न – हानोपाय अर्थात् हान का उपाय क्या है ?
उत्तर – विवेकख्याति अर्थात् पुरुष और प्रकृति के भेद का साक्षत्कार ज्ञान हानोपाय है । (पातंज्जल योग, साधनापाद, सूत्र 26 और 25) योग की सहायता से पुरुष विवेकख्याति से अविद्या का नाश कर अपने निज स्वरूप में स्थित हो जाता है, जिसे कैवल्य (मोक्ष) कहते हैं ।
योगशास्त्र में चार पादों में कुल 195 सूत्र हैं । समाधिपाद, साधनापाद, विभूतिपाद और कैवल्यपाद में यथाक्रम से इक्यावन, पचपन, पचपन और चौंत्तिस सूत्र हैं । समाधिपाद और साधनापाद में क्रम अनुसार समाहित-चित्त् और विक्षिप्त-चित्त वालों के लिय समाधि के उपाय बतलाए गए हैं । विभूतिपाद में अश्रद्धालु को श्रद्धापूर्वक योग में प्रवृत्त करने के लिये योग की विभूतियाँ बतलाई गई हैं । कैवल्यपाद में उपयोगी-चित्त तथा चित्त के सम्बन्ध में शंकाऔं का निवारण किया गया है ।
योग के तीन अंतर्विभाग हैं –
यम (अर्थात् अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह), नियम (शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर-प्रणिधान), आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि अष्टांगयोग की, क्रम अनुसार, आठ सीढियाँ हैं ।
इस संक्षिप्त संग्रह (पातंज्जल (अष्टांग) योग, ISBN 81-7525-725-3) में योगशास्त्र के सूत्रों का निरूपण बहुत सरल और कम शब्दों में किया गया है । अतः यह ग्रंथ उच्च श्रेणी के साधकों और जिज्ञासुओं के लिये अत्यधिक उपयोगी और आवश्यक है । योगशास्त्र में बताए हुए साधनों का पुनः पुनः श्रद्धापूर्वक सेवन अर्थात् श्रवण, मनन और निदिध्यासन करने से साधक को शीघ्र ही आध्यात्मिक लक्ष्य की उपलब्धि हो जाती है । योग पक्षपात और वाद-विवाद रहित कौशल है जो स्वयं को अनुभव द्वारा ही प्राप्त होता है ।
इस ग्रंथ के अंत में साधकों के लिये कुछ आवश्यक विषय परिशिष्ट भाग में दे दिए गए हैं । योगशास्त्र पर विस्तृत जानकारी ब्र. स्वामी श्री ओमानन्दतीर्थ जी कृत, गीता प्रेस द्वारा प्रकाशित पुस्तक, पातंज्जलयोगप्रदीप में उपलब्ध है ।
अनुभवी साधकों से नम्र निवेदन है कि त्रुटियों की सूचना और सुझाव ई-मेल पर देने की कृपा करें, ताकि अगले संस्करण में इस ग्रंथ का सुधार किया जा सके ।
जिन महानुभाव के आशीर्वाद और प्रेरणा से हम इस ग्रंथ को पूर्ण करने में सफल हुए हैं, हम उन के प्रति हर्दिक कृतज्ञता प्रकट करते हैं । अंत में हम भारतीय ऋषि परम्परा को प्रमाण करते हुए इस ग्रंथ को, सश्रद्धा, परमात्मा को समर्पित करते हैं । ~ॐ~ |