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Vedic wisdom‎ > ‎

posted ‎‎Jun 15, 2009 10:53 PM‎‎ by Surinder Shanker Anand   [ updated ‎‎Oct 22, 2009 2:51 AM‎‎ ]
ॐ = अकार मात्रा + उकार मात्रा + मकार मात्रा + अमात्र विराम
 
ॐ की अकार मात्रा   
  • विराट = चेतनतत्व + समष्टि-स्थूल-जगत का अधिष्ठाता है, और विश्र्व अर्थात् जीव द्वारा उपास्य है। विराट ब्रह्म का स्थूल-रूप अर्थात् शबल-ब्रह्म है और ब्रह्मा-रूप से सृष्टि की उत्पत्ति का कारण है। 
  • विश्र्व = चेतनतत्व + व्यष्टि-स्थूल-शरीर का अभिमानी जीव 7 अंगों (स्थूलरूप 2 श्रोत, 2 नेत्र, 2 घ्राण और मुख) और 19 मुखों (स्थूलरूप पाँच कर्मेन्द्रियाँ अर्थात् वाणी, हस्त, पाद, उपस्थ और गुदा + पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ अर्थात् श्रोत, त्वचा, नेत्र, रसना और घ्राण + पाँच प्राण अर्थात् प्राण, अपान, समान, व्यान और उदान + मन + अहंकार + बुद्धि + चित्त) से स्थूल विषयों का उपभोगता है। उपास्य-विराट का उपासक-विश्र्व की अभिनिवेश-क्लेश (मरने का भय) सहित तमस-प्रधान अन्नमय-कोश में जाग्रत अवस्था में दाहिने नेत्र में निवास करता है, जिसमें वह व्यष्टि-स्थूल-शरीर द्वारा स्थूल विषयों का ज्ञाता, कर्ता और भोक्ता है। यह विश्र्व क्लेशों के उपाय यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और वितर्क-अनुगत समाधि (सवितर्क अर्थात् शब्द, अर्थ, ज्ञान के विकल्प की मिश्रित भावना सहित और निर्वितर्क अर्थात् शब्द, अर्थ, ज्ञान के विकल्प की मिश्रित भावना रहित केवल अर्थ-मात्र) से स्थूल-भूतों का साक्षात्कार करता हुआ वैकृतिक-मोक्ष की अवस्था को प्राप्त होता है।
ॐ की उकार मात्रा
  • हिरण्यगर्भ = चेतनतत्व + समष्टि-सूक्ष्म-जगत का अधिष्ठाता है, और तैजस अर्थात् जीव द्वारा उपास्य है। हिरण्यगर्भ ब्रह्म का सूक्ष्म-रूप अर्थात् शबल-ब्रह्म है और विष्णु-रूप से सृष्टि की स्थिति का कारण है। 
  • तैजस = चेतनतत्व + व्यष्टि-सूक्ष्म-शरीर का अभिमानी जीव 7 अंगों (सूक्ष्म-रूप 2 श्रोत, 2 नेत्र, 2 घ्राण और मुख) और 19 मुखों (सूक्ष्म-रूप पाँच कर्मेन्द्रियाँ अर्थात् वाणी, हस्त, पाद, उपस्थ और गुदा + पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ अर्थात् श्रोत, त्वचा, नेत्र, रसना और घ्राण + पाँच प्राण अर्थात् प्राण, अपान, समान, व्यान और उदान + मन + अहंकार + बुद्धि + चित्त) से सूक्ष्म विषयों का उपभोगता है। उपास्य-हिरण्यगर्भ का उपासक-तैजस की अस्मिता, राग और द्वेष क्लेश सहित रजस-प्रधान प्राणमय-कोश (क्रिया), मनोमय-कोश (ईच्छा) और विज्ञानमय-कोश (ज्ञान) में स्वप्न अवस्था में मन में निवास करता है, जिसमें वह व्यष्टि-सूक्ष्म-शरीर द्वारा सूक्ष्म विषयों का भोक्ता और ज्ञाता है। यह तैजस क्लेशों के उपाय यम, नियम, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और विचार-अनुगत समाधि (सविचार अर्थात् देश, काल, धर्म के विकल्प की मिश्रित भावना सहित और निर्विचार अर्थात् देश, काल, धर्म के विकल्प की मिश्रित भावना रहित केवल अर्थ-मात्र धर्मी) से सूक्ष्म-भूतों और अहंकार को साक्षात्कार करता हुआ दाक्षिणिक-मोक्ष की अवस्था को प्राप्त होता है।
ॐ की मकार मात्रा
  • ईश्वर = चेतनतत्व + समष्टि-कारण-जगत का अधिष्ठाता है, और प्राज्ञ अर्थात् जीव द्वारा उपास्य है। ईश्वर ब्रह्म का कारण-रूप अर्थात् शबल-ब्रह्म है और महेश-रूप से सृष्टि की प्रलय का कारण है। 
  • प्राज्ञ = चेतनतत्व का कारण-रूप + व्यष्टि-कारण-शरीर (अस्मिता) का अभिमानी जीव है। उपास्य-ईश्वर का उपासक-प्राज्ञ की अविद्या-क्लेश (अनित्य को नित्य, अशुचि को शुचि, दुःख को सुख और अनात्म को आत्म समझना) सहित सत्त्व-प्रधान आनन्दमय-कोश (ज्ञान-प्रधान चित्त और  क्रिया-प्रधान अहंकार) में सुषुप्ति अवस्था में ह्रदय-आकाश में निवास करता है, जिसमें वह व्यष्टि-कारण-शरीर द्वारा अकर्ता और अभोक्ता है। यह प्राज्ञ क्लेशों के उपाय आनन्द-अनुगत समाधि (निर्विचार की उच्चतर अवस्था) और अस्मिता-अनुगत समाधि (निर्विचार की उच्चतम अवस्था) से महत्तत्त्व और विवेकख्याति को साक्षात्कार करता हुआ क्रमानुसार प्राकृतिक-मोक्ष और विदेह-मोक्ष की अवस्था को प्राप्त होता है।
ॐ की अमात्र विराम
  • शुद्ध-ब्रह्म = शुद्ध-चेतनतत्व (अमिश्रित) जो सम्पूर्ण-जगत  (सूक्ष्म + स्थूल + कारण) का अधिष्ठाता है, और आत्मा द्वारा उपास्य है। शुद्ध-ब्रह्म ब्रह्म का निर्गुण-रूप है जो सृष्टि की उत्पत्ति (अकार), स्थिति (उकार) और प्रलय (मकार) का कारण है। शुद्ध-ब्रह्म सर्वज्ञ, सर्वव्यापक, अनादि-अनन्त, नित्य, निराकार, निर्विकार, निष्क्रिय, एक, अखंण्ड, पूर्ण, कूटस्थ, अतीत, अजन्मा, सत-चित्त-आनन्द स्वरूप, सर्वाधार, सृष्टा, अधिष्ठाता, नियन्ता, सर्वशक्तिशाली और सर्वकल्याणकारी है।  
  • आत्मा = शुद्ध-ब्रह्म का प्रतिबिम्ब है।  तुरीय में उपास्य-शुद्ध-ब्रह्म का उपासक-आत्मा अपने स्वरूप में स्थित होता है, जिसमें वह गुणातीत और साक्षी है। निर्बीज-समाधि (असम्प्रज्ञात-समाधि) से कैवल्य-मोक्ष में स्थित हो जाता है।  
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अष्टांगयोग की, क्रम अनुसार, आठ सीढियाँ
  1. यम -
    • अहिंसा
    • सत्य
    • अस्तेय
    • ब्रह्मचर्य
    • अपरिग्रह
  2. नियम -
    • शौच
    • संतोष
    • तप
    • स्वाध्याय
    • ईश्वर-प्रणिधान
  3. आसन
  4. प्राणायाम
  5. प्रत्याहार
  6. धारणा
  7. ध्यान
  8. समाधि
  9.