posted Oct 27, 2009 3:40 AM by Surinder Shanker Anand
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updated Nov 19, 2009 1:19 AM
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अध्याय 1 (विषादयोग) –
अध्याय 2 (सांख्ययोग) -
- स्वधर्म-पालन में बाधक मोह के नाश के उपाय -
- सांख्य-सिद्धान्त (ज्ञान-योग अथवा सन्यास-योग) -
- आत्मा की अमरता, अखण्डता और व्यापकता का सतत विवेक, और उस विवेक से अहंकार का नाश।
- देह का परिणामी और क्षण-भंगुर होने का विवेक।
- योग कला (कर्मयोग) -
- स्थितप्रज्ञ अर्थात् बुद्धि से मन और मन से इन्द्रियों का निग्रह करते हुए, द्वन्द सह कर अन्त:करण को स्वाधीन कर के, निष्काम-भाव से कर्म करना, और भक्ति से अहंकार पर विजय पाते हुए देह को स्वधर्म के लिये उपयोग करना।
- संपूर्ण जीवन शास्त्र = निर्गुण सांख्य–सिद्धान्त + सगुण योग-कला + साकार स्थितप्रज्ञ।
- अहंकार से विषय-ध्यान, विषय-ध्यान से विषय-आसक्ति, विषय-आसक्ति से कामना, कामना में विघ्न पड़ने से क्रोध, क्रोध से सम्मोह (मोह), सम्मोह से स्मृति-भ्रम, स्मृति-भ्रम से बुद्धि-नाश, बुद्धि-नाश से व्यावहारिक और परमार्थिक जीवन का पतन हो जाता है।
अध्याय 3 (कर्मयोग)-
- मनुष्य गुणों द्वारा परवश हुआ कर्म करने से बाध्य है, परन्तु योगी और भोगी के साधन और साध्य में अन्तर होता है -
- भोगी भोजन (साध्य) के लिये कर्म (साधन) करता है।
- योगी कर्म (साध्य) अर्थात् स्वधर्म-पालन के लिये भोजन (साधन) करता है। योगी का कर्म अपने शरीर के निर्वाह, चित्त-शुद्धि, समाज-कल्याण और दूसरों के लिये आर्दश-स्थापना के लिये होता है।
- कर्म दर्पण समान भी है, जो हमें हमारे चित्त की शुद्धता को नापने और चित्त-शुद्धिकरण में सहायक होता है।
- इन्द्रियों का विषय में राग और द्वेष, तथा उनके पीछे काम छिपा रहता है, जो ज्ञान को आच्छादित करके जीवात्मा को मोहित करता है। शरीर से श्रेष्ठ इन्द्रियाँ, इन्द्रियों से श्रेष्ठ मन, मन से श्रेष्ठ बुद्धि, बुद्धि से श्रेष्ठ आत्मा है। इसलिये आत्मा में स्थित रहकर, बुद्धि से मन और मन से इन्द्रियों को वश में करके काम-शत्रु का वध कर देना चाहिए।
अध्याय 4 (ज्ञानकर्मसंन्यासयोग) -
- अकर्म (निष्काम या सहज कर्म) = स्थूल कर्म (स्वधर्म) + सूक्ष्म विकर्म (शुद्ध-चित्त की भावना)। कर्मरूपी नोट पर विकर्म (भावना) की मुहर का महत्त्व होता है। चित्त को शुद्ध करने के लिये कामना त्याग कर के राग, द्वेष और क्रोध पर विजय पाने की आवश्यकता है।
अध्याय 5 (कर्मसंन्यासयोग) -
- कर्म-योग (सगुण) = सब कुछ कर के कुछ ना करना, जो साधकों के लिये सुलभ, सहज, स्वाभाविक और श्रेष्ठ साधन है।
- संन्यास-योग (निर्गुण) = कुछ ना करते हुए सब कुछ करना, जो निष्ठा अथवा साध्य अर्थात् साधना की अंतिम अवस्था है, जिसमें सर्व संकल्पों का त्याग हो जाता है।
अध्याय 6 (आत्मसंयमयोग) -
- विकर्म का साधन एकाग्र-चित्त, जो ध्यान योग अर्थात् त्रिविध योग से प्राप्त होता है -
- चित्त की चंचलता पर अंकुश अर्थात् शुद्ध व्यवहार जो परमार्थ ही है।
- सतत, नियमित और परिमित आचरण अर्थात् इन्द्रियों पर सतत पहरा रखना।
- सम-भाव और परमात्मा की सर्वव्यापकता का सतत अनुभव करना।
- इनमें विध्वंसक-वैराग्य (जैसे घास उखाड़ना) और विधायक-अभ्यास (जैसे बीज बोना) सहायक होते हैं।
अध्याय 7 (ज्ञानविज्ञानयोग) –
- विकर्म के लिये एकाग्रता के साथ-साथ भक्ति की भी आवश्यकता है, जो दो प्रकार की है - निष्काम और सकाम भक्ति।
- सकाम से ही निष्काम की यात्रा आरम्भ होती है।
- भक्त के प्रकार-
- अर्थार्थी अर्थात् सांसारिक पदार्थों के लिये परमात्मा को भेजने वाला।
- आर्त अर्थात् संकट निवारण के लिये परमात्मा को भजने वाला।
- जिज्ञासु अर्थात् यथार्थरूप से जानने की इच्छा से परमात्मा को भजने वाला।
- श्रेष्ठ-ज्ञानी अर्थात् ईश्वर की सर्वज्ञता में स्थित रहना और उस कारण-रूप अखण्ड आत्मा में स्थित अष्टधा और दुहरी प्रकृति की लीला को साक्षी-भाव से देखना।
अध्याय 8 (अक्षरब्रह्मयोग) –
- जन्म-मरण चक्र में जो संस्कार प्रधान-रूप से मृत्यु के समय उपस्थित रहता है, वह गति का कारण होता है। इसलिये जीवन में सतत और प्रतिक्षण ये अभ्यास करने चाहियें-
- शुभ संस्कारों का संचय।
- भीतर मन से सतत ईश्वर-स्मरण (विकर्म) और बाहर देह से सेवारूपी स्वधर्माचरण। अक्षर ब्रह्म का ध्यान-
- नाम अर्थात् ऊँ से।
- गुण, कर्म और स्वाभाव से तत्त्व-स्मरण अर्थात् उदासीन, सर्वज्ञ, सर्वव्यापक, अनादि-अनन्त, नित्य, निराकार, निर्विकार, निष्क्रिय, एक, अखंण्ड, पूर्ण, कूटस्थ, अतीत, अजन्मा, सत-चित्त-आनन्द स्वरूप, सर्वाधार, सृष्टा, अधिष्ठाता, नियन्ता, सर्वशक्तिशाली और सर्वकल्याणकारी आदि।
- आसक्ति का त्याग।
अध्याय 9 (राजविद्याराजगुह्ययोग) -
- राजयोग = कर्मयोग + भक्तियोग अर्थात् कर्म और कर्म-फल ईश्वर-समर्पण।
अध्याय 10 (विभूतियोग) -
- ईश्वर की सर्वव्यापकता का अनुभव-
- स्थूलरूप में प्रत्येक मानव, प्राणि और सृष्टि में।
- तत्पश्चात स्थूल से सूक्ष्म में अनुभव करना।
अध्याय 11 (विश्वरूपदर्शनयोग) -
- ईश्वर का समग्र विराट् विश्वरूप अर्थात् सर्वव्यापकता (देश से) और नित्यता (काल से)।
- अंश में पूर्ण के दर्शन संभव है।
अध्याय 12 (भक्तियोग) -
- भक्ति का उद्देश्य इन्द्रियों को विषयों में ना भटकने देना है, जो सगुण (कर्म-योग) से निर्गुण (संन्यास-योग) की यात्रा है, जो एक-दूसरे के परिपूरक हैं -
- सगुण – ईश्वर की सेवा में इन्द्रिय-समर्पण (भक्तिमय) जो सुलभ है। इस भक्ति में मन के सूक्ष्म मल को मिटाने का सामर्थ्य है।
- निर्गुण – ईश्वर की सेवा में इन्द्रिय-निग्रह (ज्ञानमय), जो साधकों के लिये कठिन है।
अध्याय 13 (क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग) –
- तत्त्व-ज्ञानी यानी तत्त्वमसि –
- क्षेत्र देह से देह-आसक्ति (जो भय का कारण है) त्याग कर उसे साधन रूप में उपयोग करना। क्षेत्र अर्थात् त्रिगुणात्मक मूल-प्रकृति, पाँच महाभूत, अहंकार, बुद्धि, दस इन्द्रियाँ, मन और पाँच इन्द्रियों के विषय (शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध) से इच्छा, राग, द्वेष आदि विकार उत्पन्न होते हैं।
- अलिप्त आत्मा क्षेत्रज्ञ है, जो साध्य है।
- अखण्ड आत्मा ही -
- देह-आसक्ति के तल पर उपद्रष्टा है।
- नैतिकता के तल पर अनुमंता है।
- धारण-पोषण के तल पर भर्ता अर्थात् सहायक है।
- जीवन में फल-त्याग के तल पर भोक्ता है।
- अधिष्ठाता व नियन्ता होने से महेश्वर है।
- सत-चित्त-आनन्द होने से परमात्मा है।
अध्याय 14 (गुणविभागयोग) –
- रजस् और तमस् को मिटाना (विनाशक साधन) और अलिप्त रह कर सत्त्व की पुष्टि (विधायक साधन) -
- मोहित करने वाले तमस् का फल अज्ञान है। अज्ञान से प्रमाद और आलस्य (अकर्तव्य) का बन्ध है, जो शारीरिक श्रम से जीता जा सकता है।
- रजस् का फल कामना और आसक्ति है। कामना और आसक्ति से कर्मों के फल का बन्ध (लोभ, विषयों की लालसा और सकाम कर्म) और अस्थिता होती है, जो कर्म योग (स्वधर्म-पालन) से जीते जा सकते हैं।
- सत्त्व का फल सुख और ज्ञान है। सुख और ज्ञान से अभिमान और आसक्ति का बन्ध होता है, जो सातत्य-योग और ईश्वर को फल-समर्पण से जीते जा सकते हैं। सत्त्व की प्रधानता से विवेक का प्रकाश और वैराग्य उत्पन्न होता है।
- अन्त में आत्म-ज्ञान (दृष्टा अथवा समत्व-योग) और भक्ति से भी गुणातीत हो जाना है।
अध्याय 15 (पुरुषोत्तम-योग) –
- पुरुषोत्तम-योग = सेवक अक्षर पुरुष, सेव्य पुरुषोत्तम परमात्मा की क्षर सृष्टि से सेवा-साधना करता है। सर्वत्र में भक्ति, ज्ञान और कर्म की त्रिपुटि है अर्थात् प्रत्येक कर्म सेवामय, प्रेममय और ज्ञानमय होना चाहिए।
अध्याय 16 (दैवासुरसम्पद्विभागयोग) –
- शास्त्र द्वारा प्रमाणित दैवी सम्पदाओं का विकास करना, जो मुक्ति का कारण हैं -
- भक्ति, ज्ञान और कर्म।
- निर्भयता जिसको आगे रखने से प्रगति होती है।
- अहिंसा और सत्य को बीच में।
- नम्रता को सबसे पीछे रखने से बचाव होता रहता है।
- आसुरी सम्पदाओं, जो बन्ध का कारण हैं, जैसे अहंकार, अज्ञान, काम, क्रोध, लोभ आदि को संयम से जीतना चाहिए।
अध्याय 17 (श्रद्धात्रयविभागयोग) –
- नित्य और नियमित कार्य-क्रम में बंधा हुआ मन मुक्त और प्रसन्न होता है। इसके लिये यज्ञरूपी कर्म से निम्न संस्थाओं की क्षति-पूर्ति अर्थात् साम्यावस्था में लाना चाहिए -
- शरीर-संस्था (शरीर, वाणी और मन) का शुद्धिकरण तप और शुद्ध आहार से।
- समाज-संस्था से ऋण-मुक्त होने के लिये तन, मन और धन से दान।
- ब्रह्माण्ड-संस्था का निर्माण यज्ञ से।
- उक्त कर्मों के मूल में सात्त्विकता, श्रद्धा और फिर ईश्वरार्पणता अर्थात् ऊँ तत्सत् (ऊँ = परमात्मा और सातत्य, तत् = अलिप्तता, सत् = सात्त्विकता)। यज्ञ में सात्त्विकता अर्थात् निष्फलता (तमस्-रहित) और सकामता (रजस्-रहित) का आभाव होता है। स्वार्थ (मैं) + परार्थ (तू) = परमार्थ (समग्रता) की भावना अर्थात् यज्ञ में अग्नि, पात्र, पदार्थ, कर्ता, आहुति, क्रिया और फल आदि ब्रह्म ही हैं।
अध्याय 18 (मोक्षसंन्यासयोग) -
- कर्म सिद्धि हेतु अधिष्ठान (अर्थात् शरीर और देश), कर्ता, करण (अर्थात् बहि:करण और अन्त:करण), चेष्टा और दैव (अर्थात् संस्कार), ये पाँच कारण हैं। ज्ञाता + ज्ञान + ज्ञेय द्वारा कर्म प्रेरणा है, और कर्ता + करण + क्रिया से कर्म संग्रह होता है। इसमें अकर्तापन कर्म संग्रह को रोकने का उपाय है।
- सतत स्वधर्म की अबाध्यता अर्थात् अधर्म और परधर्म का त्याग।
- सत्त्व, रजस् और तमस् कर्म फल-त्यागपूर्वक करने चाहिए। रजस् और तमस् प्रधान कर्म का त्याग कर देना चाहिए। असल में फल-त्याग की कसौटी से रजस् और तमस् प्रधान (अर्थात् काम्य और निषिद्ध) कर्मों का अपने आप त्याग हो जाता है।
- सदोष होने पर भी सहज और स्वाभाविकरूप से प्राप्त सत्त्व-प्रधान शास्त्रविहित यज्ञ-दान-तपरूप कर्तव्य-कर्मों (अर्थात प्रायश्चित, नित्य और नैमित्तिक कर्मों) को करना चाहिए, परन्तु ईश्वरार्पण द्वारा कर्म-फल, कर्म-आसक्ति, कर्तापन और कर्म-फल-त्याग के अभिमान का भी त्याग करना चाहिए।
- सतत फल-त्याग से चित्त-शुद्धि होती है, और शुद्ध चित्त से अकर्तापन से किये गये कर्म में क्रिया तीव्र से सौम्य, सौम्य से सूक्ष्म और सूक्ष्म से शून्य हो जाती है, परन्तु कर्म चलता रहता है, जो सिद्ध पुरुष की पराकाष्ठा अथवा अक्रिया की अवस्था है। देह-आसक्ति टूटने पर सिद्ध पुरुष की निम्न तीन अवस्थाएँ होती हैं, जिसमें सब शुभ और सुन्दर होता है –
- क्रियावस्था में क्रिया का निर्मल और आदर्श होना।
- भावास्था में एकरुप हो कर समस्त पाप-पुण्य का दायित्व लेने पर भी स्वयं पाप-पुण्य से अलिप्त रहना।
- ज्ञानावस्था में लेशमात्र कर्म को अपने पास नहीं रहने देना।
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posted Oct 22, 2009 12:34 AM by Surinder Shanker Anand
ॐ विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परा सुव।
यद्भद्रं तन्न आ सुव॥ |
posted Jun 27, 2009 9:54 AM by Surinder Shanker Anand
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updated Jul 14, 2009 1:44 AM
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- यम –
- अहिंसा
- सत्य
- अस्तेय
- ब्रह्मचार्य
- अपरिग्रह
- नियम –
- शौच
- संतोष
- तपः
- स्वाध्याय –
- स्वाध्याय
- योग और सांख्य
- वेद और उपनिषद
- संध्या और भजन
- ईश्र्वरप्रणिधान
- आसन –
- सूर्य नमसकार
- उर्ध्व-सर्वांगासन और मत्सयासन
- पश्र्चिमोत्तानासन और चक्रासन
- हलासन और उष्ट्रासन
- अर्ध-मत्स्येनद्रासन
- शवासन और प्राण-शक्ति चालन
- व्यायाम
- प्राणायाम –
- ध्वन्यात्मक ॐ
- नाडी-शोधन
- कपालभाति
- भस्त्रिका
- अनुलोमविलोम
- प्रत्याहार
- धारणा और ध्यान –
- भ्रूमध्य ध्यान
- ॐ जप और अर्थ ध्यान
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posted Jun 15, 2009 10:53 PM by Surinder Shanker Anand
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updated Oct 22, 2009 2:51 AM
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ॐ = अकार मात्रा + उकार मात्रा + मकार मात्रा + अमात्र विराम
ॐ की अकार मात्रा
- विराट = चेतनतत्व + समष्टि-स्थूल-जगत का अधिष्ठाता है, और विश्र्व अर्थात् जीव द्वारा उपास्य है। विराट ब्रह्म का स्थूल-रूप अर्थात् शबल-ब्रह्म है और ब्रह्मा-रूप से सृष्टि की उत्पत्ति का कारण है।
- विश्र्व = चेतनतत्व + व्यष्टि-स्थूल-शरीर का अभिमानी जीव 7 अंगों (स्थूलरूप 2 श्रोत, 2 नेत्र, 2 घ्राण और मुख) और 19 मुखों (स्थूलरूप पाँच कर्मेन्द्रियाँ अर्थात् वाणी, हस्त, पाद, उपस्थ और गुदा + पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ अर्थात् श्रोत, त्वचा, नेत्र, रसना और घ्राण + पाँच प्राण अर्थात् प्राण, अपान, समान, व्यान और उदान + मन + अहंकार + बुद्धि + चित्त) से स्थूल विषयों का उपभोगता है। उपास्य-विराट का उपासक-विश्र्व की अभिनिवेश-क्लेश (मरने का भय) सहित तमस-प्रधान अन्नमय-कोश में जाग्रत अवस्था में दाहिने नेत्र में निवास करता है, जिसमें वह व्यष्टि-स्थूल-शरीर द्वारा स्थूल विषयों का ज्ञाता, कर्ता और भोक्ता है। यह विश्र्व क्लेशों के उपाय यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और वितर्क-अनुगत समाधि (सवितर्क अर्थात् शब्द, अर्थ, ज्ञान के विकल्प की मिश्रित भावना सहित और निर्वितर्क अर्थात् शब्द, अर्थ, ज्ञान के विकल्प की मिश्रित भावना रहित केवल अर्थ-मात्र) से स्थूल-भूतों का साक्षात्कार करता हुआ वैकृतिक-मोक्ष की अवस्था को प्राप्त होता है।
ॐ की उकार मात्रा
- हिरण्यगर्भ = चेतनतत्व + समष्टि-सूक्ष्म-जगत का अधिष्ठाता है, और तैजस अर्थात् जीव द्वारा उपास्य है। हिरण्यगर्भ ब्रह्म का सूक्ष्म-रूप अर्थात् शबल-ब्रह्म है और विष्णु-रूप से सृष्टि की स्थिति का कारण है।
- तैजस = चेतनतत्व + व्यष्टि-सूक्ष्म-शरीर का अभिमानी जीव 7 अंगों (सूक्ष्म-रूप 2 श्रोत, 2 नेत्र, 2 घ्राण और मुख) और 19 मुखों (सूक्ष्म-रूप पाँच कर्मेन्द्रियाँ अर्थात् वाणी, हस्त, पाद, उपस्थ और गुदा + पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ अर्थात् श्रोत, त्वचा, नेत्र, रसना और घ्राण + पाँच प्राण अर्थात् प्राण, अपान, समान, व्यान और उदान + मन + अहंकार + बुद्धि + चित्त) से सूक्ष्म विषयों का उपभोगता है। उपास्य-हिरण्यगर्भ का उपासक-तैजस की अस्मिता, राग और द्वेष क्लेश सहित रजस-प्रधान प्राणमय-कोश (क्रिया), मनोमय-कोश (ईच्छा) और विज्ञानमय-कोश (ज्ञान) में स्वप्न अवस्था में मन में निवास करता है, जिसमें वह व्यष्टि-सूक्ष्म-शरीर द्वारा सूक्ष्म विषयों का भोक्ता और ज्ञाता है। यह तैजस क्लेशों के उपाय यम, नियम, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और विचार-अनुगत समाधि (सविचार अर्थात् देश, काल, धर्म के विकल्प की मिश्रित भावना सहित और निर्विचार अर्थात् देश, काल, धर्म के विकल्प की मिश्रित भावना रहित केवल अर्थ-मात्र धर्मी) से सूक्ष्म-भूतों और अहंकार को साक्षात्कार करता हुआ दाक्षिणिक-मोक्ष की अवस्था को प्राप्त होता है।
ॐ की मकार मात्रा
- ईश्वर = चेतनतत्व + समष्टि-कारण-जगत का अधिष्ठाता है, और प्राज्ञ अर्थात् जीव द्वारा उपास्य है। ईश्वर ब्रह्म का कारण-रूप अर्थात् शबल-ब्रह्म है और महेश-रूप से सृष्टि की प्रलय का कारण है।
- प्राज्ञ = चेतनतत्व का कारण-रूप + व्यष्टि-कारण-शरीर (अस्मिता) का अभिमानी जीव है। उपास्य-ईश्वर का उपासक-प्राज्ञ की अविद्या-क्लेश (अनित्य को नित्य, अशुचि को शुचि, दुःख को सुख और अनात्म को आत्म समझना) सहित सत्त्व-प्रधान आनन्दमय-कोश (ज्ञान-प्रधान चित्त और क्रिया-प्रधान अहंकार) में सुषुप्ति अवस्था में ह्रदय-आकाश में निवास करता है, जिसमें वह व्यष्टि-कारण-शरीर द्वारा अकर्ता और अभोक्ता है। यह प्राज्ञ क्लेशों के उपाय आनन्द-अनुगत समाधि (निर्विचार की उच्चतर अवस्था) और अस्मिता-अनुगत समाधि (निर्विचार की उच्चतम अवस्था) से महत्तत्त्व और विवेकख्याति को साक्षात्कार करता हुआ क्रमानुसार प्राकृतिक-मोक्ष और विदेह-मोक्ष की अवस्था को प्राप्त होता है।
ॐ की अमात्र विराम
- शुद्ध-ब्रह्म = शुद्ध-चेतनतत्व (अमिश्रित) जो सम्पूर्ण-जगत (सूक्ष्म + स्थूल + कारण) का अधिष्ठाता है, और आत्मा द्वारा उपास्य है। शुद्ध-ब्रह्म ब्रह्म का निर्गुण-रूप है जो सृष्टि की उत्पत्ति (अकार), स्थिति (उकार) और प्रलय (मकार) का कारण है। शुद्ध-ब्रह्म सर्वज्ञ, सर्वव्यापक, अनादि-अनन्त, नित्य, निराकार, निर्विकार, निष्क्रिय, एक, अखंण्ड, पूर्ण, कूटस्थ, अतीत, अजन्मा, सत-चित्त-आनन्द स्वरूप, सर्वाधार, सृष्टा, अधिष्ठाता, नियन्ता, सर्वशक्तिशाली और सर्वकल्याणकारी है।
- आत्मा = शुद्ध-ब्रह्म का प्रतिबिम्ब है। तुरीय में उपास्य-शुद्ध-ब्रह्म का उपासक-आत्मा अपने स्वरूप में स्थित होता है, जिसमें वह गुणातीत और साक्षी है। निर्बीज-समाधि (असम्प्रज्ञात-समाधि) से कैवल्य-मोक्ष में स्थित हो जाता है।
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अष्टांगयोग की, क्रम अनुसार, आठ सीढियाँ
- यम -
- अहिंसा
- सत्य
- अस्तेय
- ब्रह्मचर्य
- अपरिग्रह
- नियम -
- शौच
- संतोष
- तप
- स्वाध्याय
- ईश्वर-प्रणिधान
- आसन
- प्राणायाम
- प्रत्याहार
- धारणा
- ध्यान
- समाधि
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posted Dec 22, 2008 10:41 PM by Surinder Shanker Anand
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updated Dec 22, 2008 10:54 PM
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अर्जुन बोले
स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव।स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम्॥२- ५४॥
हे केशव, जिसकी बुद्धि ज्ञान में स्थिर हो चुकि है, वह कैसा होता है। ऍसा स्थिरता प्राप्त किया व्यक्ती कैसे बोलता, बैठता, चलता, फिरता है॥
श्रीभगवान बोले
प्रजहाति यदा कामान्सर्वान्पार्थ मनोगतान्।आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते॥२- ५५॥
हे पार्थ, जब वह अपने मन में स्थित सभी कामनाओं को निकाल देता है, और अपने आप में ही अपनी आत्मा को संतुष्ट रखता है, तब उसे ज्ञान और बुद्धिमता में स्थित कहा जाता है॥
दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः।वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते॥२- ५६॥
जब वह दुखः से विचलित नहीं होता और सुख से उसके मन में कोई उमंगे नहीं उठतीं, इच्छा और तड़प, डर और गुस्से से मुक्त, ऐसे स्थित हुऐ धीर मनुष्य को ही मुनि कहा जाता है॥
यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम्।नाभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥२- ५७॥
किसी भी ओर न जुड़ा रह, अच्छा या बुरा कुछ भी पाने पर, जो ना उसकी कामना करता है और न उससे नफरत करता है उसकी बुद्धि ज्ञान में स्थित है॥
यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः।इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥२- ५८॥
जैसे कछुआ अपने सारे अँगों को खुद में समेट लेता है, वैसे ही जिसने अपनी इन्द्रीयाँ को उनके विषयों से निकाल कर खुद में समेट रखा है, वह ज्ञान में स्थित है॥
विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः।रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते॥२- ५९॥
विषयों का त्याग के देने पर उनका स्वाद ही बचता है। परम् को देख लेने पर वह स्वाद भी मन से छूट जाता है॥
यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितः।इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः॥२- ६०॥
हे कौन्तेय, सावधानी से संयमता का अभयास करते हुऐ पुरुष के मन को भी उसकी चंचल इन्द्रीयाँ बलपूर्वक छीन लिती हैं॥
तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः।वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥२- ६१॥
उन सब को संयम कर मेरा धयान करना चाहिये, क्योंकि जिसकी इन्द्रीयाँ वश में है वही ज्ञान में स्थित है॥
ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते।सङ्गात्संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते॥२- ६२॥
चीजों के बारे में सोचते रहने से मनुष्य को उन से लगाव हो जाता है। इससे उसमे इच्छा पौदा होती है और इच्छाओं से गुस्सा पैदा होता है॥
क्रोधाद्भवति संमोहः संमोहात्स्मृतिविभ्रमः।स्मृतिभ्रंशाद्बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति॥२- ६३॥
गुस्से से दिमाग खराब होता है और उस से यादाश्त पर पड़दा पड़ जाता है। यादाश्त पर पड़दा पड़ जाने से आदमी की बुद्धि नष्ट हो जाती है और बुद्धि नष्ट हो जाने पर आदमी खुद ही का नाश कर बौठता है॥
रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन्।आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति॥२- ६४॥
इन्द्रीयों को राग और द्वेष से मुक्त कर, खुद के वश में कर, जब मनुष्य विषयों को संयम से ग्रहण करता है, तो वह प्रसन्नता और शान्ती प्राप्त करता है॥
प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते।प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते॥२- ६५॥
शान्ती से उसके सारे दुखों का अन्त हो जाता है क्योंकि शान्त चित मनुष्य की बुद्धि जलदि ही स्थिर हो जाती है॥
नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना।न चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम्॥२- ६६॥
जो संयम से युक्त नहीं है, जिसकी इन्द्रीयाँ वश में नहीं हैं, उसकी बुद्धि भी स्थिर नही हो सकती और न ही उस में शान्ति की भावना हो सकती है। और जिसमे शान्ति की भावना नहीं है वह शान्त कैसे हो सकता है। जो शान्त नहीं है उसे सुख कैसा॥
इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनु विधीयते।तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि॥२- ६७॥
मन अगर विचरती हुई इन्द्रीयों के पीछे कहीं भी लग लेता है तो वह बुद्धि को भी अपने साथ वैसे ही खीँच कर ले जाता है जैसे एक नाव को हवा खीच ले जाती है॥
तस्माद्यस्य महाबाहो निगृहीतानि सर्वशः।इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥२- ६८॥
इसलिये हे महाबाहो, जिसकी सभी इन्द्रीयाँ अपने विषयों से पूरी तरह हटी हुई हैं, सिमटी हुई हैं, उसी की बुद्धि स्थिर होती है॥
या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी।यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः॥२- ६९॥
जो सब के लिये रात है उसमें संयमी जागता है, और जिसमे सब जागते हैं उसे मुनि रात की तरह देखता है॥
आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत्।तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे स शान्तिमाप्नोति न कामकामी॥२- ७०॥
नदियाँ जैसे समुद्र, जो एकदम भरा, अचल और स्थिर रहता है, में आकर शान्त हो जाती हैं, उसी प्रकार जिस मनुष्य में सभी इच्छाऐं आकर शान्त हो जाती हैं, वह शान्ती प्राप्त करता है। न कि वह जो उनके पीछे भागता है॥
विहाय कामान्यः सर्वान् पुमांश्चरति निःस्पृहः।निर्ममो निरहंकारः स शान्तिमधिगच्छति॥२- ७१॥
सभी कामनाओं का त्याग कर, जो मनुष्य स्पृह रहित रहता है, जो मै और मेरा रूपी अहंकार को भूल विचरता है, वह शान्ती को प्राप्त करता है॥
एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति।स्थित्वास्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति॥२- ७२॥
ब्रह्म में स्थित मनुष्य ऍसा होता है, हे पार्थ। इसे प्राप्त करके वो फिर भटकता नहीं। अन्त समय भी इसी स्थिति में स्थित वह ब्रह्म निर्वाण प्राप्त करता है॥ |
posted Dec 22, 2008 10:15 PM by Surinder Shanker Anand
इत्येतदक्षरमिदँ सर्वं तस्योपव्याख्यानं भूतं भवद् भविष्यदिति सर्वमोङ्कार एव यच्चान्यत् त्रिकालातीतं तदप्योङ्कार एव ॥ १ ॥
सर्वं ह्येतद् ब्रह्मायमात्मा ब्रह्म सोऽयमात्मा चतुष्पात् ॥ २ ॥
जागरितस्थानो बहिष्प्रज्ञः सप्ताङ्ग एकोनविंशतिमुखः स्थूल भुग्वैश्वानरः प्रथमः पादः ॥ ३ ॥
स्वप्नस्थानोऽन्तः प्रज्ञाः सप्ताङ्ग एकोनविंशतिमुखः प्रविविक्तभुक्तैजसो द्वितीयः पादः ॥ ४ ॥
यत्र सुप्तो न कञ्चन कामं कामयते न कञ्चन स्वप्नं पश्यति तत् सुषुप्तम् . सुषुप्तस्थान एकीभूतः प्रज्ञानघन एवानन्दमयो ह्यानन्दभुक् चेतो मुखः प्राज्ञस्तृतीयः पादः ॥ ५ ॥
एष सर्वेश्वरः एष सर्वज्ञ एषोऽन्तर्याम्येष योनिः सर्वस्य प्रभवाप्ययौ हि भूतानाम् ॥ ६ ॥
नान्तःप्रज्ञं न बहिष्प्रज्ञं नोभयतःप्रज्ञं न प्रज्ञानघनं न प्रज्ञं नाप्रज्ञम् । अदृष्टमव्यवहार्यमग्राह्यमलक्षणं अचिन्त्यमव्यपदेश्यमेकात्मप्रत्ययसारं प्रपञ्चोपशमं शान्तं शिवमद्वैतं चतुर्थं मन्यन्ते स आत्मा स विज्ञेयः ॥ ७ ॥
सोऽयमात्माध्यक्षरमोङ्करोऽधिमात्रं पादा मात्रा मात्राश्च पादा अकार उकारो मकार इति ॥ ८ ॥
जागरितस्थानो वैश्वानरोऽकारः प्रथमा मात्राऽऽप्तेरादिमत्त्वाद् वाऽऽप्नोति ह वै सर्वान् कामानादिश्च भवति य एवं वेद ॥ ९ ॥
स्वप्नस्थानस्तैजस उकारो द्वितीया मात्रोत्कर्षात् उभयत्वाद्वोत्कर्षति ह वै ज्ञानसन्ततिं समानश्च भवति नास्याब्रह्मवित्कुले भवति य एवं वेद ॥ १० ॥
सुषुप्तस्थानः प्राज्ञो मकारस्तृतीया मात्रा मितेरपीतेर्वा मिनोति ह वा इदं सर्वमपीतिश्च भवति य एवं वेद ॥ ११ ॥
अमात्रश्चतुर्थोऽव्यवहार्यः प्रपञ्चोपशमः शिवोऽद्वैत एवमोङ्कार आत्मैव संविशत्यात्मनाऽऽत्मानं य एवं वेद ॥ १२ ॥ |
posted Dec 22, 2008 10:05 PM by Surinder Shanker Anand
ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते। पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥ ॐ शांतिः शांतिः शांतिः॥
ईशा वास्यमिदँ सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्। तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्॥१॥
कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतँ समाः। एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे॥२॥
असुर्या नाम ते लोका अन्धेन तमसाऽऽवृताः। ताँस्ते प्रेत्याभिगच्छन्ति ये के चात्महनो जनाः॥३॥
अनेजदेकं मनसो जवीयो नैनद्देवा आप्नुवन्पूर्वमर्षत्। तद्धावतोऽन्यानत्येति तिष्ठत्तस्मिन्नपो मातरिश्वा दधाति॥४॥
तदेजति तन्नैजति तद्दूरे तद्वन्तिके। तदन्तरस्य सर्वस्य तदु सर्वस्यास्य बाह्यतः॥५॥
यस्तु सर्वाणि भूतान्यात्मन्येवानुपश्यति। सर्वभूतेषु चात्मानं ततो न विजुगुप्सते॥६॥
यस्मिन्सर्वाणि भूतान्यात्मैवाभूद्विजानतः। तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः॥७॥
स पर्यगाच्छुक्रमकायमव्रण-मस्नाविरँ शुद्धमपापविद्धम्। कविर्मनीषी परिभूः स्वयम्भू-र्याथातथ्यतोऽर्थान् व्यदधाच्छाश्वतीभ्यः समाभ्यः॥८॥
अन्धं तमः प्रविशन्ति येऽविद्यामुपासते। ततो भूय इव ते तमो य उ विद्यायाँ रताः॥९॥
अन्यदेवाहुर्विद्ययाऽन्यदाहुरविद्यया। इति शुश्रुम धीराणां ये नस्तद्विचचक्षिरे॥१०॥
विद्यां चाविद्यां च यस्तद्वेदोभयँ सह। अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययाऽमृतमश्नुते॥११॥
अन्धं तमः प्रविशन्ति येऽसम्भूतिमुपासते। ततो भूय इव ते तमो य उ सम्भूत्याँ रताः॥१२॥
अन्यदेवाहुः सम्भवादन्यदाहुरसम्भवात्। इति शुश्रुम धीराणां ये नस्तद्विचचक्षिरे॥१३॥
सम्भूतिं च विनाशं च यस्तद्वेदोभयँ सह। विनाशेन मृत्युं तीर्त्वा सम्भूत्याऽमृतमश्नुते॥१४॥
हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम्। तत्त्वं पूषन्नपावृणु सत्यधर्माय दृष्टये॥१५॥
पूषन्नेकर्षे यम सूर्य प्राजापत्य व्यूह रश्मीन् समूह तेजः। यत्ते रूपं कल्याणतमं तत्ते पश्यामि योऽसावसौ पुरुषः सोऽहमस्मि॥१६॥
वायुरनिलममृतमथेदं भस्मांतँ शरीरम्। ॐ क्रतो स्मर कृतँ स्मर क्रतो स्मर कृतँ स्मर॥१७॥
अग्ने नय सुपथा राये अस्मान् विश्वानि देव वयुनानि विद्वान्। युयोध्यस्मज्जुहुराणमेनो भूयिष्ठां ते नमउक्तिं विधेम॥१८॥
ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते। पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥ ॐ शांतिः शांतिः शांतिः॥
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posted Dec 21, 2008 10:03 PM by Surinder Shanker Anand
[
updated Jan 14, 2009 6:42 AM
]
महर्षि पातञ्जल ने हिरण्यगभॅ के आधार पर प्रस्तुत योगशास्त्र का निर्माण किया । इस का लक्ष्य मनुष्य को स्थूलता से सूक्ष्मता की ओर ले जाना अर्थात् चेतना को बाहर से अंतर्मुख कर के परमात्मा में लय करना है ।
योगशास्त्र में कुल छ्ब्बीस तत्त्व माने गये हैं – ईश्वर (पुरुष-विशेष), पुरुष (जीव) प्रकृति के चौबीस तत्त्व अर्थात् मूल-प्रकृति, महत्तत्व, अहंकार, पाँच तन्मात्राएँ (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध), पाँच कर्मेन्द्रियाँ (वाणी, हस्त, पाद, उपस्थ और गुदा), पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ (श्रोत, त्वचा, नेत्र, रसना और घ्राण), पाँच स्थूल भूत (आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी) और मन । ईश्वर सृष्टि का निमित्त-कारण अर्थात् सामग्री जिससे वस्तु का निमार्ण होता है । ईश्वर की सन्निधि मात्र से जङ प्रकृति में निम्न परिणाम होते हैं -
- मूल-प्रकृति से महत्तत्व,
- महत्तत्व से अहंकार,
- अहंकार से पाँच तन्मात्राएँ,
- पाँच तन्मात्राओं से पाँच स्थूल भूत,
- अहंकार से पाँच कर्मेन्द्रियाँ,
- अहंकार से पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ और
- अहंकार से मन
जङ प्रकृति और चेतन पुरुष के संयोग से समस्त सृष्टि का निर्माण हुआ है । यद्यपि पुरुष प्रकृति का स्वामी है, परंतु अविद्या के कारण पुरुष अपने स्वरूप को भूल कर प्रकृति की जङता और उस से उत्पन्न दुःख को अपना स्वरूप समझने लगता है । इस सम्बन्ध में भारतीय दर्शनशास्त्रों (षड्दर्शन - मीमांसा, वेदांत, न्याय, वैशेषिक, सांख्य और योग) में निम्न चार विषयों पर इस प्रकार गहन चिंतन किया गया है –
प्रश्र्न – हेय अर्थात् त्यागने योग्य क्या है ? उत्तर – आने वाला दुःख हेय है । (पातंज्जल योग, साधनापाद, सूत्र 16)
प्रश्र्न – हेयहेतु अर्थात् हेय का कारण क्या है ? उत्तर – द्रष्टा (पुरुष) और दृश्य (प्रकृति) का अविवेकपूर्ण संयोग हेयहेतु है । (पातंज्जल योग, साधनापाद, सूत्र 17)
प्रश्र्न – हान अर्थात् दुःख का नितांत अभाव क्या है ? उत्तर – अविद्या का अभाव हान है । (पातंज्जल योग, साधनापाद, सूत्र 24)
प्रश्र्न – हानोपाय अर्थात् हान का उपाय क्या है ? उत्तर – विवेकख्याति अर्थात् पुरुष और प्रकृति के भेद का साक्षत्कार ज्ञान हानोपाय है । (पातंज्जल योग, साधनापाद, सूत्र 26 और 25)
योग की सहायता से पुरुष विवेकख्याति से अविद्या का नाश कर अपने निज स्वरूप में स्थित हो जाता है, जिसे कैवल्य (मोक्ष) कहते हैं ।
योगशास्त्र में चार पादों में कुल 195 सूत्र हैं । समाधिपाद, साधनापाद, विभूतिपाद और कैवल्यपाद में यथाक्रम से इक्यावन, पचपन, पचपन और चौंत्तिस सूत्र हैं । समाधिपाद और साधनापाद में क्रम अनुसार समाहित-चित्त् और विक्षिप्त-चित्त वालों के लिय समाधि के उपाय बतलाए गए हैं । विभूतिपाद में अश्रद्धालु को श्रद्धापूर्वक योग में प्रवृत्त करने के लिये योग की विभूतियाँ बतलाई गई हैं । कैवल्यपाद में उपयोगी-चित्त तथा चित्त के सम्बन्ध में शंकाऔं का निवारण किया गया है ।
योग के तीन अंतर्विभाग हैं –
- उपासना-योग अर्थात् चित्त को एक लक्ष्य पर ठहराना,
- कर्मयोग अर्थात् निष्काम कर्म और
- ज्ञान-योग
यम (अर्थात् अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह), नियम (शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर-प्रणिधान), आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि अष्टांगयोग की, क्रम अनुसार, आठ सीढियाँ हैं ।
इस संक्षिप्त संग्रह (पातंज्जल (अष्टांग) योग, ISBN 81-7525-725-3) में योगशास्त्र के सूत्रों का निरूपण बहुत सरल और कम शब्दों में किया गया है । अतः यह ग्रंथ उच्च श्रेणी के साधकों और जिज्ञासुओं के लिये अत्यधिक उपयोगी और आवश्यक है । योगशास्त्र में बताए हुए साधनों का पुनः पुनः श्रद्धापूर्वक सेवन अर्थात् श्रवण, मनन और निदिध्यासन करने से साधक को शीघ्र ही आध्यात्मिक लक्ष्य की उपलब्धि हो जाती है । योग पक्षपात और वाद-विवाद रहित कौशल है जो स्वयं को अनुभव द्वारा ही प्राप्त होता है ।
इस ग्रंथ के अंत में साधकों के लिये कुछ आवश्यक विषय परिशिष्ट भाग में दे दिए गए हैं । योगशास्त्र पर विस्तृत जानकारी ब्र. स्वामी श्री ओमानन्दतीर्थ जी कृत, गीता प्रेस द्वारा प्रकाशित पुस्तक, पातंज्जलयोगप्रदीप में उपलब्ध है ।
अनुभवी साधकों से नम्र निवेदन है कि त्रुटियों की सूचना और सुझाव ई-मेल पर देने की कृपा करें, ताकि अगले संस्करण में इस ग्रंथ का सुधार किया जा सके ।
जिन महानुभाव के आशीर्वाद और प्रेरणा से हम इस ग्रंथ को पूर्ण करने में सफल हुए हैं, हम उन के प्रति हर्दिक कृतज्ञता प्रकट करते हैं । अंत में हम भारतीय ऋषि परम्परा को प्रमाण करते हुए इस ग्रंथ को, सश्रद्धा, परमात्मा को समर्पित करते हैं ।
~ॐ~
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posted Nov 15, 2008 12:20 AM by Surinder Shanker Anand
[
updated Jun 15, 2009 11:39 PM
]
| Om |
Form |
Nature |
To be worshiped |
Worshipper |
Level of worshipper's Consciousness |
Attributes/Guna |
Body kosha |
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~~~~~~~~
A-kara |
~~~~~~~~
Gross |
~~~~~~~~~~~~
Bhrama the Creator |
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
Virat is the owner and controller of Collective Consciousness + gross inert nature |
~~~~~~~~~~~~~~~~~
Vishav is individual Consciousness + gross inert body |
~~~~~~~~~~~~~~~~~~
Wake, where worshipper is enjoyer and doer |
~~~~~~~~~~~~~~~
Tammas = non-action |
~~~~~~~~~
Annmay |
| U-kara |
Subtle |
Vishnu the sustainer |
Hirnyagarbha is the owner and controller of Collective Consciousness + subtle inert nature |
Tejas is individual Consciousness + subtle inert body |
Dream, where worshipper is enjoyer and non-doer |
Rajas = action |
Pranmay Manomay Vigyanmay |
| M-kara |
Cause |
Shiva the re-cycler |
Ishvara is the owner and controller of Collective Consciousness + causal inert nature |
Pragya is individual Consciousness + causal inert body |
Deep-Sleep, where worshipper is neither enjoyer nor doer, but suspended ego |
Sattava = light |
Anandmay |
| Stop |
Source |
Paramatma or Bhram |
Parmatama or Bhram is the owner and controller of all above |
Atma |
4th stage where worshipper is neither enjoyer nor doer and dorment ego |
Without attributes i.e. gunateeta |
Atma | |
posted Nov 14, 2008 11:05 PM by Surinder Shanker Anand
[
updated Jul 27, 2009 9:29 PM
]
Whole is pure existence, consciousness and bliss. Whole is complete, one, beyond, infinite, omnipresent, omniscient, owner and controller.
Process of unfolding or emulsion (consciousness and matter) starts when dormant-ego becomes active, which with the help of wrong-knowledge metaphorically demarcates a fraction from the Whole. This gives rise to “I” and “Mine”, which tries to expand in a wrong direction i.e. externally, to consolidate and complete itself.
From Whole, the apparent-fragmentation, inherits the ability to-know, to-desire and to-act. “Knowledge” in apparent-fragmentation creates incompleteness and “desire” to attain, which finally leads to “act” to complete the incompleteness. Since this incompleteness can never be completed externally, the know/desire/act vicious circle never comes to an end.
At the same time, the experience after an “act” gets categorized as good or bad. A good and bad experience defines likes and dislikes pattern, which gives pleasure or pain respectively. Then apparent-fragmentation tries to ensure that likes should be repeated and dislikes should be avoided at all cost. Any obstruction on the way is dealt with worry, anger and violence. Worry, anger and violence further leads to misery.
Happiness is less sadness and sadness is less happiness. Happiness emerges, stays and merges back on the substratum of sadness and vice versa. Happiness and sadness are two sides of the same coin. Happiness and sadness are distorted and impure version of bliss and non-bliss respectively. In fact to attain pleasure or happiness, one has to go through the series of pain such as efforts involved in attainment of an object, safeguard the attained object, pain after the object life cycle is over and violence involved in the above process. Therefore apparent happiness is sadness.
Apparent-fragmentation infected by ego, directly or indirectly, tries to attain eternal existence, consciousness and bliss externally, which is not possible, because they all belong to Whole. When this is understood fully, then the process of folding back starts - ego becomes dormant and it merges back in the Whole, which is pure existence, consciousness and bliss. |
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