श्री शाह ज़मा खान भारत में पाकिस्तानी उच्चायोग के प्रेस मंत्री है.
1978 बैच के वरिष्ठ सिविल सेवा अधिकारी श्री शाह ज़मा खान ने 1974 में अर्थ शास्त्र में एम.ए.
किया. 1980 में उनका निकाह हुआ. उनकी नजर में भारत और पाकिस्तान एक दूसरे के
बिना अधूरे है. उनकी 6 संतानों में से 3 भारत और बाकी तीन पाकिस्तान में निवास करते है.
सामाजिक-सांस्कृतिक-आध्यात्मिक संस्था 'सत्या फाउंडेशन' की वेब साइट www.satyafoundation.com के लिए
स्वतंत्र पत्रकार चेतन उपाध्याय को दिए Exclusive इंटरव्यू में श्री शाह ज़मा खान ने कहा
कि न तो पाकिस्तान और न ही भारत में कोई भी युद्ध चाहता है. मीडिया द्वारा बनाए
गये युद्ध के बादल बस अगले कुछ दिनों में ही पूरी तरह गायब हो जाएंगे. उन्होने यह भी कहा कि
दोनो देशों को लड़ाने
के पीछे विदेशी शक्तियों का हाथ है और समय आ गया है इनका पर्दाफाश करने का.
प्रस्तुत है इस इंटरव्यू के प्रमुख अंश::
सवाल: भारत और पाकिस्तान के बीच वाक् युद्ध जोरों पर है. दोनों देशों के बीच बहुत अधिक तनाव व संभावित युद्ध की खबरें मीडिया में लगातार आ रही है. आपको क्या लगता है?
उत्तर: मेरे विचार में, भारत व पाकिस्तान- दोनों ही देशों की जनता और नेतृत्व- किसी भी प्रकार का युद्ध नही चाहते है. युद्ध के बारे में जो भी बातें सुनी ja रही है, वह सब मीडिया की उपज है. आप देखिएगा कि मीडिया द्वारा फैलाए गये ये युद्ध के
बादल अगले एक-दो हफ्ते में पूरी तरह से गायब हो जाएंगे और भारत-पाक के बीच फिर से बातचीत और संवाद का सिलसिला
चल पड़ेगा.
सवाल: आप पाकिस्तान के बहुत ही ज़िम्मेदार मंत्री माने जाते है. अगर दो जर्मनी एक हो सकते है, तो क्या भारत व पाकिस्तान एक नही हो सकते? विशेष रूप से अगर यह देखा जाए कि सिर्फ 61 वर्षों की जुदाई ने हमे इतने अधिक घाव और दर्द दिए है.
आखिर हम कब तब बँटवारे की कीमत चुकाते रहेंगे? क्या अब वो समय नही आ गया है, जब देशो की सीमायें खत्म करके बंदूक व बम को अलविदा कह दिया जाए?
उत्तर: चेतन जी, मुझे लहता है कि भारत व पाकिस्तान दो अलग- अलग देशों की सीमाओं में रहते हुए भी एक दूसरे के साथ प्रेम
व प्रतिष्ठापूर्वक रह सकते है. हम अलग-अलग अस्तित्व बनाए रखते हुए भी शांति, भाईचारे व मित्रता की मिसाल दुनिया के सामने दे सकते है. हमने जो कुछ भी मुंबई में देखा, वह सीधे-सीधे तीसरे पक्ष की साजिश है. हम दोनो देशों का एक ही साझा दुश्मन है जो भारत
व पाकिस्तान को दोस्त के रूप में नही देखना चाहता.
सवाल: क्या आपको सही में ऐसा लगता है कि यह अंतरराष्ट्रीय साजिश है?
उत्तर: जी हाँ. यह सब 'उनका' खेल है और हम सब तड़प और मर रहे है. यही सही समय है जब भारत व पाकिस्तान इस
हकीकत को स्वीकार करें और 'तीसरी शक्ति' की इस साजिश के खिलाफ उठ खड़े हों. ये बाहरी देश हम दोनो को वर्षों से लड़ाते
हुए हमारा शोषण करने में लगे हुए है. हमें अभी से आँखें खोलकर ऐसे 'तथाकथित शक्तिसम्पन्न तत्वों' को जोरदार तमाचा
मारना चाहिए.
सवाल: क्या आप अपनी बात को थोड़ा विस्तार में समझाएँगे?
उत्तर: अपने अस्त्र-शस्त्र की बिक्री को बढ़ावा देने के लिए कुछ 'महाशक्तियाँ'' भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध भड़काने पर
आमादा है. 'हथियार लॉबी' के दबाव के चलते यह देश भारत, पाकिस्तान और पूरी दुनिया में 'फूट डालो और राज करो' की नीति
पर चल रहे है. यह सब तभी रूक सकता है जब भारत और पाकिस्तान के लोग यह मानना शुरू करें कि हम बिछड़े हुए भाई
है. हममें से ज्यादातर लोग एक दूसरे से बेइंतहा मोहब्बत करते है.... केवल कुछ गंदी मछलियों की वजह से हम पूरे तालाब
को गंदा नही होने देंगे. हमें आतंक का मुकाबला सामूहिक रूप से करना होगा. एक दूसरे पर भरोसा करते हुए उन नकारात्मक
शक्तियों से बचना होगा, जिनका एक मात्र मकसद दोनो देशों का विखंडन करना है.... पूरा का पूरा क्षेत्र आतंकवाद से पीड़ित है.
आखिरकार, आतंकवाद को पाकिस्तान से अधिक किसने महसूस किया है? हमने अपने देश के तमाम नेताओं और आम पुरुषों, महिलाओं व निरीह बच्चों को खोया है इस आतंकवाद की आग में. न जाने कितनी सुहागनों का सुहाग उजाड़ दिया इस
आतंकवाद ने. हम सब थक गये है. आज हर पाकिस्तानी भी उतना ही बेहाल है, जितना कि हिन्दुस्तानी.
अगर युद्ध और सेनाओं पर बेतहाशा खर्च की जगह शिक्षा, कृषि, उद्योग, पर्यावरण व रोजगार पर खर्च किया जाए तो
भारत व पाकिस्तान- दोनो ही देशों में अपार विकास व समृद्धि आ सकती है. अगर दोनो बिछड़े भाई खड़े होकर, एक साथ लड़ाई
लड़ें तो आतंकवाद खत्म होगा और पूरे क्षेत्र में शांति आएगी. हम आतंकवाद के खिलाफ मिलजुलकर निर्णायक युद्द लड़ने के
लिए कृतसंकल्प है.
प्रश्न:: आज की नई पीढ़ी को युद्ध नही, बल्कि पैसा, पद और समृद्धि चाहिए. और शांतिपूर्ण सह अस्तित्व की जरूरत को समझते हुए ढेर सारे ऐसे संगठन है जो चाहते है कि भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका और चीन का महासंघ बनना चाहिए. पाकिस्तान की इस बारे में क्या सोच है?
उत्तर: देखिए, जैसा मैने पहले ही कहा कि हम सब एक है और हमारे बीच खुले दिल से संवाद होना चाहिए. एक दूसरे की सीमा व
मर्यादा को तोड़े बगैर भी हम बहुत प्रेम के साथ रह सकते है. एक दूसरे की भावनाओं व विचारों की अभिव्यक्ति होनी चाहिए.
हमारे बीच सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक व आर्थिक क्षेत्रों में पर्याप्त आदान-प्रदान होना चाहिए. अगर ऐसा हुआ तो
विषमताओं व दूरियों को पाटने में वक्त नही लगेगा. जब बड़े व छोटे का भेद खत्म करके, हम लोग सभी के लिए समान अवसर
दे पाएंगे और सभी क्षेत्रों में उचित विकास होगा तो विश्वास मानिए, सीमायें अपने आप कमजोर पड़ जाएंगी.
अगर हम यूरोप को देखें, तो वहाँ पर एक जगह से दूसरी जगह जाते समय पता ही नही लगता कि कब एक देश की सीमा शुरू हुई और कहाँ पर
खत्म हुई. वहाँ पर एक देश से दूसरे देश जाने के लिए आपको किसी पूर्व अनुमति की भी जरूरत नही पड़ती. यहाँ पर भी वही
स्थिति आएगी मगर उसके लिए हमें हर क्षेत्र में विकास के साथ ही साथ अपने हृदय को उदार बनाना होगा. ऐसा होने पर सीमा का अस्तित्व अपने आप खत्म हो जाएगा और ऐसे में एक नये युग का सूत्रपात होगा.
सवाल: 9.12.2008 को आर.एस.एस. के सरसंघचालक श्री के.एस.सुदर्शन जी ने सत्याफाउंडेशन.कॉम को दिए इंटरव्यू में कहा था कि हर समाज व हर धर्म में अच्छे लोग है व सभी लोगों का आपस में प्रेमपूर्वक रहना सौभाग्य भी है और कर्तव्य भी. साथ ही उन्होने यह भी कहा कि आतंकवाद को धर्म विशेष से न जोड़ा जाए. आप क्या कहेंगे?
उत्तर: मैं सुदर्शन जी की इस बात से पूरी तरह सहमत हूँ कि आतंकवादियों का कोई धर्म और देश नही होता. ये बुद्धि विहीन
लोग होते है. मैं सुदर्शन जी की इस बात से भी सहमत हूँ कि हर देश व समाज में अच्छे लोगों की बहुत बड़ी संख्या होती है.
और शायद इसीलिए पिछले वर्षों में दोनों देशों के बीच आपसी बातचीत व शांति प्रक्रिया को काफी गति मिली है. अगर आप याद
करें तो पाएंगे कि 26/11 को मुंबई पर हमलों से ठीक पहले भारत-पाक के बीच वरिष्ठ स्तर पर किस गंभीरता के साथ वार्ता चल रही थी. पाकिस्तान यह अच्छी तरह जानता और समझता है कि सीमा के दोनों तरफ, शांति में विश्वास रखने वाले,
अच्छे लोग मौजूद है और इन सभी लोगों के संयुक्त प्रयासों की बदौलत दोनों देश समस्या पर विजय पाएंगे. और मैं एक
बात फिर से कह दूँ कि यह तनाव का बहुत ही अस्थाई दौर है, जो महज चंद दिनों में ही समाप्त हो जाएगा.
सवाल: क्या आपको ऐसा लगता है कि लोगों, विशेष रूप से स्कूली बच्चों को धर्म के वास्तविक अर्थ से परिचित कराया जाना चाहिए?
उत्तर: हाँ, मैं आपकी बात से इत्तिफाक रखता हूँ. कोई भी धर्म बेगुनाहों को मारने की बात नही कहता. यह मानवता के खिलाफ है. हमे अपने बच्चों को शुरू से ही अच्छे संस्कार देने चाहिए और उन्हे दोस्ती व भाईचारे की शिक्षा देनी चाहिए. बच्चों को बताया जाना चाहिए कि उपासना पद्धति अलग-अलग होने के बावजूद हम सब एक है और प्रेम ही जीवन का
वास्तविक मूल और सच्चाई है.
सवाल: क्या विद्यार्थियों का आदान-प्रदान कार्यक्रम दोनो देशों के बीच प्रेम व भाईचारे को बढ़ाने में कोई महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है?
उत्तर: हाँ, यह एक महत्वपूर्ण क्षेत्र है जिसमे काफी गुंजाइश है. बच्चे स्वभाव से ही बहुत भोले और निष्पाप होते है. उनके मन में में किसी के प्रति कोई बुरी भावना या पूर्वाग्रह भी नही होता. सच तो यह है की बच्चे भगवान के सबसे नज़दीक होते
है. भारत और पाकिस्तान को नज़दीक लाने में बच्चों की भूमिका बहुत बड़ी हो सकती है मगर उसके लिए यह आवश्यक
है कि दोनों देशों की सरकारें इस दिशा में युद्ध स्तर पर कार्यक्रमों को आगे बढ़ायें.
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चेतन उपाध्याय
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चेतन उपाध्याय पिछले पंद्रह वर्षों से अधिक समय से पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं. भारतीय जन संचार संस्थान (नई दिल्ली) से पत्रकारिता की पढ़ाई की. संप्रति अंग्रेजी व हिन्दी के समाचार पत्रों/पत्रिकाओं/ वेब साइट के अलावा सत्या फाउंडेशन के माध्यम
से अपने गुरु श्री आशीष चटर्जी के निर्देशन में स्कूल, कॉलेज व जेल आदि में ध्यान, योग व संगीत पर आधारित कार्यक्रमों का देश-विदेश में आयोजन करते हैं.