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हासिल-ए-सैर-ए-जहाँ कुछ भी नहीं, हैरानी है: (शहरयार से बातचीत) - प्रेम कुमार

कमलेश्वर शहरयार को एक खामोश शायर मानते हैं। एक ऐसा खामोश शायर जब इस कठिन दौर व खामोशी से जुड़्ता है, तो एक समवेत चीखती आवाज मे बदल जाता है। बडे अनकहे तरीके से अपनी खामोशी भरी शाइस्ता आवाज को रचनात्मक चीख में बदल देने का यह फन शहरयार की महत्वपूर्ण कलात्मक उपलब्धि है। वे मानते है कि शहरयार की शायरी चौकाने वाली आतिशबाजी और शिकायती तेवर से अलग बड़ी गहरी सांस्कृतिक सोच की शायरी है और वह दिलो दिमाग को बंजर बना दी गयी जमीन को सीचती है। अकादमी पुरस्कार के अतिरिक्त विभिन्न स्तरों पर देश विदेश में सम्मान और ख्याती प्राप्त शहरयार के उर्दू में ‘इस्में आज़्म’, ‘सातवाँ दर’, ‘हिज्र की जमीन’ शीर्षकों से आए काव्य संग्रह काफी चर्चित और प्रशंशित हुए हैं। ‘ख्वाब का दर बंद है’ हिन्दी और अंग्रेजी मे भी प्रकाशित हो चुका है तथा ‘काफिले यादों के’, ‘धूप की दीवारे’, ‘मेरे हिस्से की ज़मीन’ और ‘कही कुछ कम है’ शीर्षकों से उनके काव्य संग्रह हिन्दी मे प्रकाशित हो चुके है। सैरे जहाँ हिन्दी मे शीघ्र प्रकाश्य है।
उमराव जान की गजलों से शहरयार को जो ख्याति, जो सम्मान मिला उसे वे अपनी उपलब्धि और खुशकिस्मती मानते हैं। फिल्म को आज के संदर्भ में वे काफी इफेक्टिव मीडिया मानते हैं। वे कहते है कि उन्होने अपनी आइडियोलाजी के लिये इस मीडिया का बेहतर इस्तेमाल किया। एक श्रेष्ठ और समर्पित कवि के अतिरिक्त वे एक संवेदनशील, विनम्र, आत्मीय और दूसरों की भावनाओं का सम्मान करने वाले व्यक्ति हैं। वे हँसकर बता रहे थे कि अपने अध्यापन काल में उन्होने पोयट्री आलोचना और कथा-साहित्य ही अधिकांशत: पढ़ाया है। गद्य मे न लिखने की बात करते हुए वे कह रहे थे  "हाँ, प्रोफेसर होने से पहले आले अहमद सुसूर ने मुझसे कहा था कि मैं एस्थेटिक्स पर एक किताब लिख दूँ। मैने मना कर दिया कि साहब मै यह काम नहीं करूगा।" वे शान से बताते है कि उन्होने जो कुछ भी पाया है ए.एम.यू. में, अदब में, जिन्दगी और दुनियाँ में सब जगह केवल पोयट्री की वजह से पाया है। पोयट्री के प्रति उनके इस लगाव और गद्य से बचने को लेकर ही मैनें बातचीत के शुरू में उनसे पूछा था-

पिछले दिनों हिन्दी में कविता की मौत और गद्य के भविष्य पर काफी कुछ कहा गया है। उर्दू में भी पोयट्री और फिक्शन की महत्ता अमहंता पर चर्चा होती रही है। पिछले दिनों काजी अब्दुल सत्तार ने पोयट्री पर कई कोणों से प्रहार करते हुए इक्कीसवीं सदी को फिक्शन की सदी कहा है। एक शायर होने के नाते आप इन बिन्दुओं पर किस प्रकार सोचते है?

देखिये इस पर खुश नहीं होना चाहिये कि यह फिक्शन का दौर है। इस पर अफसोस होना चाहिये है, यह अदब का दौर नहीं है। यह गम का मुकाम है कि लोग सीरियस लिटरेचर पढ़े। महसूस करने को आला जुबान है- हर शख्स की मादरी जुबान और उसकी सबसे अच्छी चाहते है, तो महसूस करने का यह माद्दा खत्म नहीं होना चाहिए। जो शख्स महसूस नहीं कर सकता, वह खासा खतरनाक होता है। वह न तो अच्छा शायर हो सकता है, न अच्छा बाप, न शौहर, न पड़ोसी। इसलिये वे आर्गनाइज्ड लोग, जो समाज मे उथल-पुथल करना चाहते हैं. वे इंसानो से उनके महसूस करने का हक छीन लेना चाहते हैं। शायरी, पेंटिग, म्यूजिक सब इमेजिनेशन की पैदावार है। सोसायटी में इनका न होना खतरनाक है। वैल्यूज को जितनी फोर्सफुली और पर्फेक्टली पोयट्री रेप्रेजेंट कर सकती है, उतना और कोई फैकल्टी आँफ आर्ट नहीं कर सकती। पोयट्री से लुत्फ उठाने के लिये, उसे एप्रीशिएट  करने के लिए कई चीज जरूरी हैं-म्यूजिक, पेंटिग, फिलासफी, मीटर्स बगैरह। उन्हें जानना जरूरी है। जब तक रिदम दुनिया मे कायम है, पोयट्री कायम रहेगी। यदि आपको आईरकी सोसायटी चाहिये और उसमें वैल्यूज की बुनियाद चाहिये, तो पोयट्री जरूरी है। पोयट्री फिक्शन की कोई दुश्मन नहीं है। सारी दुनिया की जुबानों में पहले पोयट्री पैदा हुई फिर फिक्शन। फिक्शन को लोमैन भी पढ़ सकता है, पर पोयट्री का लुत्फ बहुत कुछ जानने पर ही लिया जा सकता है। बड़ा फिक्शन भी पोयट्री के बिना नहीं लिखा जा सकता। हमारी सबसे बड़ी फिक्शन राइटर हैदर का उपन्यास आग कादरिया पोयट्री की मिसाल है। मीटर नहीं पर पोयट्री उपस्थित है। काजी साहब भी जब अपना नावेल सुनाते हैं, तो उन्हें वहीं दाद मिलती है जहा पोयट्री है। उपन्यास की बात कहते हुए ये सामने नहीं रखा जाता कि सीरियस फिक्शन कम पढ़ा जाता है। वह अधिक पढ़ा जाता है जो जासूसी या रोमानी होता है और आदमी को जिन्दगी की सच्चाइयों से एस्केप कराता है। थ्रिलर फिल्मो की तरह वक्त गुजार सकने वाला फिक्शन वक्त गुजारने भर को आदमी पढ़्ता है।
आप जांनते कि एशिया का पूरा सोच, बेसिक ट्रेंड पोयटिक है। दुनियाँ में कहीं फिल्मों के माने नहीं होते, पर हमारे यहाँ जब तक एक-दो गीत न हो तो कहाँ कबूलते है? हम इमोशनल है इसलिये पोयटिक है। वैस्ट और खास तौर से अमेरिका की पहचान ही यह है कि इमोशनल नहीं होना चाहिये। उनका हर फैसला सोचा, समझा और फायदे के लिए होता है। फिर भी वहाँ की सोसायटी मे शायरी हो रही है। पापुलरिटी या डिमांड से किसी नतीजे को निकालना ठीक नहीं। आज फिल्म के कैसेट से ज्यादा गजल के कैसिट बिक रहा है, इसका मतलब तो नहीं कि वह पॉपुलर है।
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