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सी.वी. रमण< xml="true" ns="urn:schemas-microsoft-com:office:office" prefix="o" namespace="">

चन्द्र शेखर बेंकटरमण (सी.वी. रमण) का जन्म 7 नवम्बर 1888 को अपने नाना के घर में हुआ जो तमिलनाडु में त्रिचनापली के पास थीरूवानायकवल के छोटे ग्राम में था। रमण के माता-पिता थे- आर. चन्द्रशेखर आईयर और पार्वती अम्मल। रमण ने अपनी मैट्रिकूलेशन परीक्षा 11 वर्ष की आयु में उत्तीर्ण की और 13 वर्ष की आयु में एफ.ए. परीक्षा पास की। 1903 में रमण ने प्रेसिडेंसी कॉलेज, मद्रास में दाख़िला लिया और वहां से बी.ए. और एम.ए. परीक्षाएं पास की। रमण की पत्नी लोकसुन्दरी कस्तूरबा गांधी से अच्छी तरह परिचित थी।

रमण ने ध्वनिक, अल्ट्रासोनिक, प्रकाशीय, चुम्बकत्व और क्रिस्टल भौतिक में अनेक बड़ी वैज्ञानिक खोजें की। प्रयोगात्मक भौतिक में महत्वपूर्ण खोज के बीच ‘रमण प्रभाव’ को रखा जा सकता है। ज्ञान के बहुत से क्षेत्रों में महत्वपूर्ण योगदान के अलावा, रमण ने कलकत्ता विश्वविद्यालय में भौतिक विज्ञान का एक जीवन्त और शानदार स्कूल विकसित किया ।रमण ने विज्ञान को बहुत लोक प्रिय बनाया। रमण मद्रास प्रेसिडेंसी कालेज के पहले विद्यार्थी थे जिसने  सुप्रसिद्ध अन्तर्राष्ट्रीय पत्रिका में शोध-पत्र प्रकाशित कराया था । यद्यपि वैज्ञानिक खोजों में रमण ने अपनी प्रतिभा का सबूत दे दिया लेकिन उन दिनों विज्ञान को कैरियर के रूप में लेने के लिए उन्हें प्रोत्साहित नहीं किया गया अपने पिता के कहने पर रमण ने वित्तीय सिविल सेवा की परीक्षा दी। परीक्षा में वह प्रथम स्थान पर रहे और 1907 के मध्य में रमण भारतीय वित्त विभाग में सहायक अकाउंटेंट जनरल के रूप में भरती के लिए18 वर्ष की आयु में कलकत्ता गए। उस समय किसी के स्वपन्न में भी नहीं आया होगा कि रमण पुनः विज्ञान का अनुसरण करने का साहस करेगे । सरकारी सेवा में रमण का भविष्य उज्जवल था और उन दिनों अनुसंधान के लिए अवसर विरले ही थे।

1917 तक रमण अपने फाल्तू समय में में अनुसंधान कार्य करते  रहे । अनुसंधान कार्य फाल्तू समय में अत्यन्त सीमित सुविधाओं के साथ किया जा रहा था, तब भी रमण अग्रणी अन्तर्राष्ट्रीय पत्रिकाओं में अपने अनुसंधान निष्कर्ष प्रकाशित कर सके । इस अवधि के दौरान उन्होंने मूल अनुसंधान शोध-पत्र प्रकाशित किए। 1917 में रमण को नए स्थापित साईंस कालेज में प्रोफ़ेसर बनने के लिए आमंत्रित किया गया। रमण ने एक लाभप्रद और उज्जवल भविष्य वाली सरकारी नियुक्ति को विश्वविद्यालय की प्रोफ़ेसरी के साथ बदलने का निर्णय लिया ।

रमण  ने भारतीय विज्ञान संस्थान बेंग्लोर के निमन्त्रण को स्वीकार कर उसका निदेशक बनने का फ़ैसला किया। उनकी ख्याति के कारण देश के सब कोनों से विद्यार्थी आकृष्ट हुए। रमण भारतीय विज्ञान कांग्रेस के संस्थापकों में से एक थे ।

शैक्षिणक निपुणता प्राप्त करने के लिए उन्होंने स्वयं योग्य विद्यार्थीयों की एक टीम गठित की और भौतिकी के कई क्षेत्रों में उच्च कोटि के अनुसंधान करने आरंभ किए। 1948 में प्रोफ़ेसर के रूप में संस्था से सेवानिवृत्त हुए।

संस्थान से सेवानिवृत्ति के बाद उसने अपना संस्थान – रमण अनुसंधान संस्थान बनाने की ओर ध्यान केन्द्रित किया। इस संस्थान के निर्माण के लिए रमण को धन जुटाना पड़ा। संस्थान चलाने के लिए सरकारी अनुदान प्राप्त करने के विचार के वह खिलाफ़ थे । संस्थान के लिए उन्होंने लेनिन शांति पुरस्कार और अपनी व्यक्तिगत सम्पत्तियों को संस्थान के लाभ के लिए अकादमी को उपहार-स्वरूप दे दिया।

राष्ट्रीय विज्ञान संस्थान 1935 में अस्तित्व में आया।  राष्ट्रीय विज्ञान संस्थान स्थापित करने के पिछे उनका विचार था कि किसी भी देश का भविष्य उस के संचित ज्ञान और नौजवान पीढ़ी पर निर्भर होता है।

रमण का विज्ञान के बारे में विचार धार्मिक था। वह सोचते थे कि प्रकृति सर्वोत्तम शिक्षक है। उन्होंने कहा, “अंतिम विश्लेषण में विज्ञान, प्रकृति के अध्ययन और प्रेम के सिवाय ओर क्या है ?” महात्मा गांधी के विचारों में रमण का बहुत विश्वास था। रमण ने महिलाओं के पक्ष का समर्थन किया। उन्होंने  एक बार कहा : “मैं ऐसा महसूस करता हूँ कि यदि भारत की स्त्रियां विज्ञान को अपनाएं और विज्ञान की प्रगति और उन्नति में भी रूचि लें तो वे सब कुछ प्राप्त कर सकेंगी जो पुरूष प्राप्त करने में विफल रहे हैं। स्त्रियों में एक गुण है – समर्पण का गुण। विज्ञान में सफलता के लिए यह अत्यन्त महत्वपूर्ण है।

भौतिकी प्रकाशकीय, प्रकाश के अणु विवर्तन, द्रवों द्वारा एक्स-रे छितराव और अणु एनीसोट्रापी में अनुसंधानों को मान्यता देते हुए, रमण को 1924 में रॉयल सोसाइटी, लंडन का फ़ैलो चुना गया था। 1929 में उन्हें नाइट की उपाधि से सम्मानित किया। 1930 में उन्हें भौतिकी के लिए नोबेल पुरस्कार दिया गया। 1954 में उन्हें ‘भारत रत्न’ की उपाधि से तथा 1957 में अन्तर्राष्ट्रीय लेनिन पुरस्कार से सम्मानित किया गया । रमण बच्चों से प्यार करते  थे । उनका विश्वास था कि “राष्ट्र की वास्तविक दौलत बैंकों में संग्रहीत सोने, या कारखानों में नहीं बल्कि उसके पुरूषों, स्त्रियों और बच्चों की बौद्धिक और शारीरिक शाक्ति मे होती है।”

जीवन की समाप्ति के नज़दीक रमण ने एकान्तवासी का जीवन अपना लिया। सरकार देश में जिस तरिके से विज्ञान और प्रौद्योगिकी का निर्माण करने की कोशिश कर रही थी वह उससे ख़ुश नहीं थे ।
रमण का निधन 21 नवम्बर 1970 को हुआ।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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