LORD RAMA-श्रीराम



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सुस्वागतम_ नमस्कार
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श्रीरामचन्द्र कृपालु भजु मन हरण भव भय दारुणं---नवकंज-लोचन कंज-मुख कर-कंज पद-कंजारुणं---कन्दर्प अगणित अमित छबि नवनील-नीरद सुन्दरं---पट पीत मानहु तड़ित रुचि शुचि नौमि जनक सुतावरं---भजु दीनबंधु दिनेश दानव-दैत्यवंश-निकंदनं---रघुनंद आनँदकंद कोशलचंद दशरथ-नंदनं---सिर मुकुट कुण्डल तिलक चारु उदारु अंग बिभूषणं---आजानुभुज शर-चाप-धर संग्राम-जित-खरदूषणं---इति वदति तुलसीदास शंकर-शेष-मुनि-मन-रंजनं---मम हृदय-कंज निवास कुरु कामादि खलदल-गंजनं

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उमा राम गुन गूढ़ पंडित मुनि पावहिं बिरति
पावहिं मोह बिमूढ़ जे हरि बिमुख न धर्म रति
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introduction_
जौं मो पर प्रसन्न सुखरासी-जानिअ सत्य मोहि निज दासी, तौं प्रभु हरहु मोर अग्याना-कहि रघुनाथ कथा बिधि नाना
प्रभु जे मुनि परमारथबादी- कहहिं राम कहुँ ब्रह्म अनादी, सेस सारदा बेद पुराना- सकल करहिं रघुपति गुन गाना
तुम्ह पुनि राम राम दिन राती- सादर जपहु अनँग आराती, रामु सो अवध नृपति सुत सोई- की अज अगुन अलखगति कोई
जौं नृप तनय त ब्रह्म किमि नारि बिरहँ मति भोरि, देख चरित महिमा सुनत भ्रमति बुद्धि अति मोरि
जौं अनीह ब्यापक बिभु कोऊ।-कबहु बुझाइ नाथ मोहि सोऊ, अग्य जानि रिस उर जनि धरहू- जेहि बिधि मोह मिटै सोइ करहू
मै बन दीखि राम प्रभुताई- अति भय बिकल न तुम्हहि सुनाई, तदपि मलिन मन बोधु न आवा-सो फलु भली भाँति हम पाव
अजहूँ कछु संसउ मन मोरे- करहु कृपा बिनवउँ कर जोरें, प्रभु तब मोहि बहु भाँति प्रबोधा- नाथ सो समुझि करहु जनि क्रोधा
तब कर अस बिमोह अब नाहीं- रामकथा पर रुचि मन माहीं, कहहु पुनीत राम गुन गाथा- भुजगराज भूषन सुरनाथा
बंदउ पद धरि धरनि सिरु बिनय करउँ कर जोरि-बरनहु रघुबर बिसद जसु श्रुति सिद्धांत निचोरि
अति आरति पूछउँ सुरराया- रघुपति कथा कहहु करि दाया, प्रथम सो कारन कहहु बिचारी- निर्गुन ब्रह्म सगुन बपु धारी
पुनि प्रभु कहहु राम अवतारा- बालचरित पुनि कहहु उदारा, कहहु जथा जानकी बिबाहीं- राज तजा सो दूषन काहीं, बन बसि कीन्हे चरित अपारा- कहहु नाथ जिमि रावन मारा, राज बैठि कीन्हीं बहु लीला- सकल कहहु संकर सुखलीला
बहुरि कहहु करुनायतन कीन्ह जो अचरज राम-प्रजा सहित रघुबंसमनि किमि गवने निज धाम
पुनि प्रभु कहहु सो तत्व बखानी- जेहिं बिग्यान मगन मुनि ग्यानी, भगति ग्यान बिग्यान बिरागा- पुनि सब बरनहु सहित बिभागा
झूठेउ सत्य जाहि बिनु जानें- जिमि भुजंग बिनु रजु पहिचानें, जेहि जानें जग जाइ हेराई- जागें जथा सपन भ्रम जाई
बंदउँ बालरूप सोई रामू-सब सिधि सुलभ जपत जिसु नामू, मंगल भवन अमंगल हारी- द्रवउ सो दसरथ अजिर बिहारी
गिरिजा सुनहु राम कै लीला। सुर हित दनुज बिमोहनसीला-रामकथा सुरधेनु सम सेवत सब सुख दानि- सतसमाज सुरलोक सब को न सुनै अस जानि
रामकथा सुंदर कर तारी- संसय बिहग उडावनिहारी, रामकथा कलि बिटप कुठारी- सादर सुनु गिरिराजकुमारी---जथा अनंत राम भगवाना-तथा कथा कीरति गुन नाना----------सगुनहि अगुनहि नहिं कछु भेदा -गावहिं मुनि पुरान बुध बेदा, अगुन अरुप अलख अज जोई -भगत प्रेम बस सगुन सो होई
जो गुन रहित सगुन सोइ कैसें-जलु हिम उपल बिलग नहिं जैसें, जासु नाम भ्रम तिमिर पतंगा- तेहि किमि कहिअ बिमोह प्रसंगा
राम सच्चिदानंद दिनेसा- नहिं तहँ मोह निसा लवलेसा, सहज प्रकासरुप भगवाना- नहिं तहँ पुनि बिग्यान बिहाना
हरष बिषाद ग्यान अग्याना- जीव धर्म अहमिति अभिमाना, राम ब्रह्म ब्यापक जग जाना-परमानन्द परेस पुराना

पुरुष प्रसिद्ध प्रकास निधि प्रगट परावर नाथ-रघुकुलमनि मम स्वामि कहि सिवँ नायउ माथ-निज भ्रम नहिं समुझहिं अग्यानी-प्रभु पर मोह धरहिं जड़ प्रानी,                           बिषय करन सुर जीव समेता- सकल एक तें एक सचेता, सब कर परम प्रकासक जोई- राम अनादि अवधपति सोई
जगत प्रकास्य प्रकासक रामू-मायाधीस ग्यान गुन धामू, जासु सत्यता तें जड माया- भास सत्य इव मोह सहाया

एहि बिधि जग हरि आश्रित रहई-जदपि असत्य देत दुख अहई, जौं सपनें सिर काटै कोई-बिनु जागें न दूरि दुख होई
 बिनु पद चलइ सुनइ बिनु काना- कर बिनु करम करइ बिधि नाना, आनन रहित सकल रस भोगी-बिनु बानी बकता बड़ जोगी
तनु बिनु परस नयन बिनु देखा- ग्रहइ घ्रान बिनु बास असेषा, असि सब भाँति अलौकिक करनी-महिमा जासु जाइ नहिं बरनी

जेहि इमि गावहि बेद बुध जाहि धरहिं मुनि ध्यान-सोइ दसरथ सुत भगत हित कोसलपति भगवान
सादर सुमिरन जे नर करहीं- भव बारिधि गोपद इव तरहीं, राम सो परमातमा भवानी- तहँ भ्रम अति अबिहित तव बानी
अस संसय आनत उर माहीं -ग्यान बिराग सकल गुन जाहीं, राम ब्रह्म चिनमय अबिनासी-सर्ब रहित सब उर पुर बासी
नाथ धरेउ नरतनु केहि हेतू- मोहि समुझाइ कहहु बृषकेतू-हरि गुन नाम अपार कथा रूप अगनित अमित-मैं निज मति अनुसार कहउँ उमा सादर सुनहु
हरि अवतार हेतु जेहि होई-इदमित्थं कहि जाइ न सोई-राम अतर्क्य बुद्धि मन बानी-मत हमार अस सुनहि सयानी
जब जब होइ धरम कै हानी- बाढहिं असुर अधम अभिमानी, करहिं अनीति जाइ नहिं बरनी-सीदहिं बिप्र धेनु सुर धरनी-तब तब प्रभु धरि बिबिध सरीरा,हरहि कृपानिधि सज्जन पीरा-असुर मारि थापहिं सुरन्ह राखहिं निज श्रुति सेतु-जग बिस्तारहिं बिसद जस राम जन्म कर हेतु
सोइ जस गाइ भगत भव तरहीं-कृपासिंधु जन हित तनु धरहीं, राम जनम के हेतु अनेका-परम बिचित्र एक तें एका
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ग्यान गिरा गोतीत अज माया मन गुन पार-सोइ सच्चिदानंद घन कर नर चरित उदार
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गिरिजा सुनहु बिसद यह कथा- मैं सब कही मोरि मति जथा-
राम चरित सत कोटि अपारा- श्रुति सारदा न बरनै पारा
राम अनंत अनंत गुनानी- जन्म कर्म अनंत नामानी
जल सीकर महि रज गनि जाहीं- रघुपति चरित न बरनि सिराहीं
बिमल कथा हरि पद दायनी-भगति होइ सुनि अनपायनी
-----hare Krishna_hare Rama



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ॐ रामाया राम भद्राय राम च्न्द्राया मानसा रघुनाथाया नाथाय सिताये पतिये नम


एक भरोस - एक बल - एक आस - विश्वास - एक रामघन हेतु चातक तुलसीदास

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Truth to know_
fate is inevitable but


सुनहु भरत भावी प्रबल बिलखि कहेउ मुनिनाथ
हानि लाभु जीवन मरनु जसु अपजसु बिधि हाथ

अस बिचारि केहि देइअ दोसू
ब्यरथ काहि पर कीजिअ रोसू
तात बिचारु केहि करहु मन माहीं
सोच जोगु दसरथु नृपु नाहीं
सोचिअ बिप्र जो बेद बिहीना
तजि निज धरमु बिषय लयलीना
सोचिअ नृपति जो नीति न जाना
जेहि न प्रजा प्रिय प्रान समाना
सोचिअ बयसु कृपन धनवानू
जो न अतिथि सिव भगति सुजानू
सोचिअ सूद्रु बिप्र अवमानी
मुखर मानप्रिय ग्यान गुमानी
सोचिअ पुनि पति बंचक नारी
कुटिल कलहप्रिय इच्छाचारी
सोचिअ बटु निज ब्रतु परिहरई
जो नहिं गुर आयसु अनुसरई

सोचिअ गृही जो मोह बस करइ करम पथ त्याग
सोचिअ जति प्रंपच रत बिगत बिबेक बिराग

बैखानस सोइ सोचै जोगु
तपु बिहाइ जेहि भावइ भोगू
सोचिअ पिसुन अकारन क्रोधी
जननि जनक गुर बंधु बिरोधी
सब बिधि सोचिअ पर अपकारी
निज तनु पोषक निरदय भारी
सोचनीय सबहि बिधि सोई।
जो न छाड़ि छलु हरि जन होई

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nectar words_
meaning of being human-human birth is precious
एक बार रघुनाथ बोलाए
गुर द्विज पुरबासी सब आए
बैठे गुर मुनि अरु द्विज सज्जन
बोले बचन भगत भव भंजन
सनहु सकल पुरजन मम बानी
कहउँ न कछु ममता उर आनी
नहिं अनीति नहिं कछु प्रभुताई
सुनहु करहु जो तुम्हहि सोहाई
सोइ सेवक प्रियतम मम सोई
मम अनुसासन मानै जोई
जौं अनीति कछु भाषौं भाई
तौं मोहि बरजहु भय बिसराई
बड़ें भाग मानुष तनु पावा
सुर दुर्लभ सब ग्रंथिन्ह गावा
साधन धाम मोच्छ कर द्वारा
पाइ न जेहिं परलोक सँवारा

सो परत्र दुख पावइ सिर धुनि धुनि पछिताइ
कालहि कर्महि ईस्वरहि मिथ्या दोष लगाइ

एहि तन कर फल बिषय न भाई
स्वर्गउ स्वल्प अंत दुखदाई
नर तनु पाइ बिषयँ मन देहीं
पलटि सुधा ते सठ बिष लेहीं
ताहि कबहुँ भल कहइ न कोई
गुंजा ग्रहइ परस मनि खोई
आकर चारि लच्छ चौरासी
जोनि भ्रमत यह जिव अबिनासी
फिरत सदा माया कर प्रेरा
काल कर्म सुभाव गुन घेरा
कबहुँक करि करुना नर देही
देत ईस बिनु हेतु सनेही
नर तनु भव बारिधि कहुँ बेरो
 सन्मुख मरुत अनुग्रह मेरो
करनधार सदगुर दृढ़ नावा
 दुर्लभ साज सुलभ करि पावा

जो न तरै भव सागर नर समाज अस पाइ
सो कृत निंदक मंदमति आत्माहन गति जाइ

जौं परलोक इहाँ सुख चहहू
सुनि मम बचन ह्रृदयँ दृढ़ गहहू
सुलभ सुखद मारग यह भाई
भगति मोरि पुरान श्रुति गाई
ग्यान अगम प्रत्यूह अनेका
साधन कठिन न मन कहुँ टेका
करत कष्ट बहु पावइ कोऊ
भक्ति हीन मोहि प्रिय नहिं सोऊ

भक्ति सुतंत्र सकल सुख खानी
बिनु सतसंग न पावहिं प्रानी
पुन्य पुंज बिनु मिलहिं न संता
सतसंगति संसृति कर अंता
पुन्य एक जग महुँ नहिं दूजा
मन क्रम बचन बिप्र पद पूजा
सानुकूल तेहि पर मुनि देवा
जो तजि कपटु करइ द्विज सेवा

औरउ एक गुपुत मत सबहि कहउँ कर जोरि
संकर भजन बिना नर भगति न पावइ मोरि

कहहु भगति पथ कवन प्रयासा
जोग न मख जप तप उपवासा
सरल सुभाव न मन कुटिलाई
जथा लाभ संतोष सदाई
मोर दास कहाइ नर आसा
करइ तौ कहहु कहा बिस्वासा
बहुत कहउँ का कथा बढ़ाई
एहि आचरन बस्य मैं भाई

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उमा कहउँ मैं अनुभव अपना
सत हरि भजनु जगत सब सपना


गिरिजा संत समागम सम न लाभ कछु आन
बिनु हरि कृपा न होइ सो गावहिं बेद पुरान


सत संगति दुर्लभ संसारा
निमिष दंड भरि एकउ बारा

बारि मथें घृत होइ बरु सिकता ते बरु तेल
बिनु हरि भजन न भव तरिअ यह सिद्धांत अपेल

बिमल ग्यान जल जब सो नहाई
तब रह राम भगति उर छाई

कलिमल समन दमन मन राम सुजस सुखमूल
सादर सुनहि जे तिन्ह पर राम रहहिं अनुकूल
कठिन काल मल कोस धर्म न ग्यान न जोग जप।
परिहरि सकल भरोस रामहि भजहिं ते चतुर नर

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धीरज धर्म मित्र अरु नारी
आपद काल परिखिअहिं चारी


आगम निगम प्रसिद्ध पुराना
सेवाधरमु कठिन जगु जाना
स्वामि धरम स्वारथहि बिरोधू
बैरु अंध प्रेमहि न प्रबोधू
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नहिं दरिद्र सम दुख जग माहीं
संत मिलन सम सुख जग नाहीं

परम धर्म श्रुति बिदित अहिंसा
पर निंदा सम अघ न गरीसा


Lord Rama_
राम नाम मनिदीप धरु जीह देहरीं द्वार
तुलसी भीतर बाहेरहुँ जौं चाहसि उजिआर

आकर चार लाख चोरासी जाती जीव जल थल नभ वासी सिया राम में सब जग जानी करहु प्रणाम जोरी

जढ़ चेतन जग जीव जत सकल राम मई जानी बंदहू सब के चरण कमल सदा जोरी जग पानी
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Truth unto life and self_
unfold of mystery unto spirit, illusion and the God

सुर नर मुनि सचराचर साईं
 मैं पूछउँ निज प्रभु की नाई
मोहि समुझाइ कहहु सोइ देवा
सब तजि करौं चरन रज सेवा
कहहु ग्यान बिराग अरु माया
कहहु सो भगति करहु जेहिं दाया

ईस्वर जीव भेद प्रभु सकल कहौ समुझाइ
जातें होइ चरन रति सोक मोह भ्रम जाइ

थोरेहि महँ सब कहउँ बुझाई
सुनहु तात मति मन चित लाई
मैं अरु मोर तोर तैं माया
जेहिं बस कीन्हे जीव निकाया
गो गोचर जहँ लगि मन जाई
सो सब माया जानेहु भाई

तेहि कर भेद सुनहु तुम्ह सोऊ
बिद्या अपर अबिद्या दोऊ
एक दुष्ट अतिसय दुखरूपा
जा बस जीव परा भवकूपा
एक रचइ जग गुन बस जाकें
प्रभु प्रेरित नहिं निज बल ताकें
ग्यान मान जहँ एकउ नाहीं
देख ब्रह्म समान सब माही
कहिअ तात सो परम बिरागी
 तृन सम सिद्धि तीनि गुन त्यागी


माया ईस न आपु कहुँ जान कहिअ सो जीव
बंध मोच्छ प्रद सर्बपर माया प्रेरक सीव

{that alone deserve to be called as individual soul, which knows not God nor one's own self-god is creator of both spirit and matter-god awards bondage and liberation according to one's desert-transcendent all and is controller of delusive power so called Maya.}

धर्म तें बिरति जोग तें ग्याना
ग्यान मोच्छप्रद बेद बखाना
जातें बेगि द्रवउँ मैं भाई
 सो मम भगति भगत सुखदाई

सो सुतंत्र अवलंब न आना
तेहि आधीन ग्यान बिग्याना
भगति तात अनुपम सुखमूला
मिलइ जो संत होइँ अनुकूला
भगति कि साधन कहउँ बखानी
 सुगम पंथ मोहि पावहिं प्रानी

प्रथमहिं बिप्र चरन अति प्रीती
निज निज कर्म निरत श्रुति रीती
एहि कर फल पुनि बिषय बिरागा
 तब मम धर्म उपज अनुरागा
श्रवनादिक नव भक्ति दृढ़ाहीं
मम लीला रति अति मन माहीं
संत चरन पंकज अति प्रेमा
 मन क्रम बचन भजन दृढ़ नेमा
गुरु पितु मातु बंधु पति देवा
सब मोहि कहँ जाने दृढ़ सेवा
मम गुन गावत पुलक सरीरा
गदगद गिरा नयन बह नीरा
काम आदि मद दंभ न जाकें
तात निरंतर बस मैं ताकें


बचन कर्म मन मोरि गति भजनु करहिं निःकाम
तिन्ह के हृदय कमल महुँ करउँ सदा बिश्राम
{i ever repose in the lotus heart of those who depend on me in thought, word and deed and who worship me in disinterested way}

Praise of kali age_


कृतजुग त्रेता द्वापर पूजा मख अरु जोग
जो गति होइ सो कलि हरि नाम ते पावहिं लोग

कलिजुग जोग न जग्य न ग्याना
एक अधार राम गुन गाना
सोइ भव तर कछु संसय नाहीं 
नाम प्रताप प्रगट कलि माहीं
कलि कर एक पुनीत प्रतापा
मानस पुन्य होहिं नहिं पापा
कलिजुग सम जुग आन नहिं जौं नर कर बिस्वास
गाइ राम गुन गन बिमलँ भव तर बिनहिं प्रयास

कलिजुग सम जुग आन नहिं जौं नर कर बिस्वास
गाइ राम गुन गन बिमलँ भव तर बिनहिं प्रयास
प्रगट चारि पद धर्म के कलिल महुँ एक प्रधान
जेन केन बिधि दीन्हें दान करइ कल्यान

Glory of Lord_
merits and demerits of illusive world are numerous better not to see both but the grace of God

हरि माया कृत दोष गुन बिनु हरि भजन न जाहिं
भजिअ राम तजि काम सब अस बिचारि मन माहिं

पाई न केहिं गति पतित पावन राम भजि सुनु सठ मना
गनिका अजामिल ब्याध गीध गजादि खल तारे घना
आभीर जमन किरात खस स्वपचादि अति अघरूप जे
कहि नाम बारक तेपि पावन होहिं राम नमामि ते

सुंदर सुजान कृपा निधान अनाथ पर कर प्रीति जो
सो एक राम अकाम हित निर्बानप्रद सम आन को
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परहित बस जिन्ह के मन माहीँ
तिन्ह कहुँ जग दुर्लभ कछु नाहीँ

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कोमल चित अति दीनदयाला
कारन बिनु रघुनाथ कृपाला
गीध अधम खग आमिष भोगी
गति दीन्हि जो जाचत जोगी
सुनहु उमा ते लोग अभागी
हरि तजि होहिं बिषय अनुरागी

essence unto self_
faith is the essence of devotion
without eternal joy, content is a subject of far distant
for eternal joy name of lord is the path
निज सुख बिनु मन होइ कि थीरा
परस कि होइ बिहीन समीरा
कवनिउ सिद्धि कि बिनु बिस्वासा
बिनु हरि भजन न भव भय नासा


बिनु बिस्वास भगति नहिं तेहि बिनु द्रवहिं न रामु
राम कृपा बिनु सपनेहुँ जीव न लह बिश्रामु

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हिम ते अनल प्रगट बरु होई
बिमुख राम सुख पाव न कोई
बारि मथें घृत होइ बरु सिकता ते बरु तेल
बिनु हरि भजन न भव तरिअ यह सिद्धांत अपेल
मसकहि करइ बिंरंचि प्रभु अजहि मसक ते हीन
अस बिचारि तजि संसय रामहि भजहिं प्रबीन



सर्वे भवन्तु सुखिनः। सर्वे सन्तु निरामयाः।सर्वे भद्राणि पश्यन्तु। मा कश्चित् दुःख भाग्भवेत्॥
Divine note_
शान्तं शाश्वतमप्रमेयमनघं निर्वाणशान्तिप्रदंब्रह्माशम्भुफणीन्द्रसेव्यमनिशं वेदान्तवेद्यं विभुम् -रामाख्यं जगदीश्वरं सुरगुरुं मायामनुष्यं -हरिंवन्देऽहं करुणाकरं रघुवरं भूपालचूड़ामणिम्

नान्या स्पृहा रघुपते हृदयेऽस्मदीयेसत्यं वदामि च भवानखिलान्तरात्मा-भक्तिं प्रयच्छ रघुपुङ्गव निर्भरां मेकामादिदोषरहितं कुरु मानसं च

अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहंदनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम्-सकलगुणनिधानं वानराणामधीशंरघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि परमानंद कृपायतन मन परिपूरन काम- प्रेम भगति अनपायनी देहु हमहि श्रीराम




गुर पितु मातु महेस भवानी
प्रनवउँ दीनबंधु दिन दानी

प्रनवउँ पवनकुमार खल बन पावक ग्यानधन
जासु हृदय आगार बसहिं राम सर चाप धर

मंगल करनि कलि मल हरनि तुलसी कथा रघुनाथ की
राम भक्ति जहँ सुरसरि धारा
सरसइ ब्रह्म बिचार प्रचारा
बिनु सतसंग बिबेक न होई
राम कृपा बिनु सुलभ न सोई
जड़ चेतन गुन दोषमय बिस्व कीन्ह करतार-
संत हंस गुन गहहिं पय परिहरि बारि बिकार

जड़ चेतन जग जीव जत सकल राममय जानि
बंदउँ सब के पद कमल सदा जोरि जुग पानि

देव दनुज नर नाग खग प्रेत पितर गंधर्ब
बंदउँ किंनर रजनिचर कृपा करहु अब सर्ब

एक अनीह अरूप अनामा
अज सच्चिदानंद पर धामा
ब्यापक बिस्वरूप भगवाना
तेहिं धरि देह चरित कृत नाना
राम भगत हित नर तनु धारी
सहि संकट किए साधु सुखारी
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नवधा भगति
nine streams of devotion-among them total submission{ego less} is unique

सबरी देखि राम गृहँ आए
मुनि के बचन समुझि जियँ भाए
सरसिज लोचन बाहु बिसाला
जटा मुकुट सिर उर बनमाला
स्याम गौर सुंदर दोउ भाई
सबरी परी चरन लपटाई

कंद मूल फल सुरस अति दिए राम कहुँ आनि
प्रेम सहित प्रभु खाए बारंबार बखानि

केहि बिधि अस्तुति करौ तुम्हारी
अधम जाति मैं जड़मति भारी

कह रघुपति सुनु भामिनि बाता
मानउँ एक भगति कर नाता

जाति पाँति कुल धर्म बड़ाई
धन बल परिजन गुन चतुराई
भगति हीन नर सोहइ कैसा
बिनु जल बारिद देखिअ जैसा
नवधा भगति कहउँ तोहि पाहीं
सावधान सुनु धरु मन माही

प्रथम भगति संतन्ह कर संगा

दूसरि रति मम कथा प्रसंगा

गुर पद पंकज सेवा तीसरि भगति अमान


चौथि भगति मम गुन गन करइ कपट तजि गान
मंत्र जाप मम दृढ़ बिस्वासा

पंचम भजन सो बेद प्रकासा

छठ दम सील बिरति बहु करमा
 निरत निरंतर सज्जन धरमा

सातवँ सम मोहि मय जग देखा
मोतें संत अधिक करि लेखा

आठवँ जथालाभ संतोषा
सपनेहुँ नहिं देखइ परदोषा

नवम सरल सब सन छलहीना
मम भरोस हियँ हरष न दीना

नव महुँ एकउ जिन्ह के होई
 नारि पुरुष सचराचर कोई
सोइ अतिसय प्रिय भामिनि मोरे
सकल प्रकार भगति दृढ़ तोरें
जोगि बृंद दुरलभ गति जोई
तो कहुँ आजु सुलभ भइ सोई

मम दरसन फल परम अनूपा
जीव पाव निज सहज सरूपा
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Result of despising a saintly soul is so bad_
साधु अवग्या कर फलु ऐसा
जरइ नगर अनाथ कर जैसा

Disrespect a saintly soul immediately robs one of all blessings_
साधु अवग्या तुरत भवानी
कर कल्यान अखिल कै हानी

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Prayer_
O ocean of compassion-please bless the life with devotion that make an access to your lotus feet

अबिरल भगति बिसुध्द तव श्रुति पुरान जो गाव
जेहि खोजत जोगीस मुनि प्रभु प्रसाद कोउ पाव

भगत कल्पतरु प्रनत हित कृपा सिंधु सुख धाम

सोइ निज भगति मोहि प्रभु देहु दया करि राम


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सकल काम प्रद तीरथराऊ
बेद बिदित जग प्रगट प्रभाऊ
मागउँ भीख त्यागि निज धरमू
आरत काह न करइ कुकरमू
अस जियँ जानि सुजान सुदानी
सफल करहिं जग जाचक बानी

अरथ न धरम न काम रुचि गति न चहउँ निरबान
जनम जनम रति राम पद यह बरदानु न

मैं जानउँ निज नाथ सुभाऊ
अपराधिहु पर कोह न काऊ
मो पर कृपा सनेह बिसेषी
खेलत खुनिस न कबहूँ देखी
सिसुपन तेम परिहरेउँ न संगू
कबहुँ न कीन्ह मोर मन भंगू
मैं प्रभु कृपा रीति जियँ जोही
हारेहुँ खेल जितावहिं मोही

महूँ सनेह सकोच बस सनमुख कही न बैन
दरसन तृपित न आजु लगि पेम पिआसे नैन
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सत संगति दुर्लभ संसारा
निमिष दंड भरि एकउ बारा

आजु धन्य मैं धन्य अति जद्यपि सब बिधि हीन
निज जन जानि राम मोहि संत समागम दीन

श्री राम - जय राम - जय जय राम

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---- श्रीगुरु चरन सरोज रज निज मनु मुकुरु सुधारि - बरनउँ रघुबर बिमल जसु जो दायकु फल चारि
श्री श्री सत्यनारायण स्वामी जी की जय- astrologer~ vastu vid[art of better & peaceful living]~ palmist[reading of palm lines & signs with respect to life & prospects]~ bhakti yog guide[spirituality]~ subjective on the human life & nature ~ project consultant Above all Ramayani[subjective on life of Lord Rama] FEEL obliged to assist others on the subject I deal जय श्री राधे जय श्री राधे जय श्री राधे जय श्री वृन्दावन जय श्री वृन्दावन जय श्री वृन्दावन ॐ सुर्यपुत्राये विद्माहे दंड हस्ताये धीमहि तन्नो शनि प्रचोदयात_ ॐ श्री सुर्याये नम_ॐ सो सोमाय नम_ॐ भो भोमाया नम_ ॐ बू बुद्ध्या नम_ ॐ ब्रा ब्र्हस्पतिये नम_ॐ शु शुक्राया नम_ ॐ शः शानिच्चारयेय नम_ॐ रा राहुवेय नम_ॐ के केतवे नम श्री श्री अत्री ऋषिये नमो नम श्री श्री भरद्वाज ऋषिये नमो नम श्री श्री गौतम ऋषिये नमो नम श्री श्री कश्यप ऋषिये नमो नम श्री श्री वशिष्ट ऋषिये नमो नम श्री श्री विस्वमित्र ऋषिये नमो नम श्री जमदग्नि ऋषिये नमो नम,ॐ पितर देवाय नम_ॐ शन्नो देवी रभिस्टये आपो भवन्तु पीतये शं योरभि स्त्रवन्तु नः_ श्री श्री मात महा काली नमो नम ॐ भूर्भुवः स्वः तत् सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् श्री राम - जय राम - जय जय राम

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धरमु न दूसर सत्य समाना

आगम निगम पुरान बखाना

काहु न कोउ सुख दुख कर दाता

निज कृत करम भोग सबु भ्राता


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कोटि बिप्र बध लागहिं जाहू

आएँ सरन तजउँ नहिं ताहू

जो सभीत आवा सरनाईं

राखिहउँ ताहि प्रान की नाईं
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I salute the scientist who is working for the welfare of mankind.

I salute the scientist who have contributed even a little to develop the medicines that gives relief from pain and cure the decreases

I salute all those who so ever they may be but working to beatify the life on the planet in true spirit but_

Pity on them-who is working for creating deadliest weapon to destroy the most beautiful planet of the universe,

Pity on them who is cheating the life on the undue greed and lust

Pity on them who encourage violation in any form

May lord bless all

Thanks please

उमा जे राम चरन रत बिगत काम मद क्रोध
निज प्रभुमय देखहिं जगत केहि सन करहिं बिरोध


2011

2011

Wishing all a very happy new year 2011
Jupiter the most auspicious planet will remain in own zodiac sign pieces till 8th of June then enter in Aries, friendly sign. Jupiter in Aries indicates lot of success for Leo Sagittarius Aquarius

Saturn will stay in Virgo till 15th November then enter in friendly sign Libra and indicate respectively on varying zodiac sign.Rahu will remain in Sagittarius till 6th June then enter in Scorpio for 18 monthsKetu to stay in Gemini till 6th June then enter in Taurus a friendly sign will reflect at its optimize pitch but good.

Other events of note_

Solar eclipse on 4th Jan

Lunar eclipse 15th June-10th Dec

Basant panchami on 8th Feb

Mahashivratri 2nd march

Sri sri Ramakrishna Paramhanse jayanti on 6th march {falariya dooj}

Sri sri Chetanya Maha Prabhu jayanti on 19th march

Holi -20th march

Basoda 26th march

Navratri to start on 4th april

Sri sri Ram Naomi on 12th april{appearance day of lord rama}

Sri Sri Parshuram jayanti-5th may

Buddha jayanti on 17th may

Sri Sri anandmai maa jayanti 2oth may

Ganga Dussehera 2nd june

Nirjala Ekadasi 12th june

dev shayan Ekadasi 11th july

guru purnima 15th july

holy month sri sri Shravan 16th july-13th august

Shanishchar Haryali amavasya 30th july

sri sri Tulsi das jayanti 5th august

Raksha bandhan 13th aug

Krishna Janmashtami 21st august

Sri sri Radha ashtami 5th sept

Sri sri ganesh utsav 1st September

Shradha-12rd sept-27th September

Sri sri sharad Navratri start 28th September

Durga maha ashtami -4th Oct

Dussehera 6th

Sharad purnima 11th october

Sri sri kartik month 12th oct-10th nov

Karva chouth 15th oct

Ahoyi ashtami 20th oct

Dhanteras 24th oct

Sri sri diwali_26th oct

Govardhan puja_27th oct

Bhaiya dooj_28th pct

Gopa ashtami 3rd nov

Dev prabodhani Ekadasi 6th nov

Dattatrey jayanti 10th dec

निसिचर हीन करउँ महि भुज उठाइ पन कीन्ह
सकल मुनिन्ह के आश्रमन्हि जाइ जाइ सुख दीन्ह

सतयुग में भगवान् के ध्यान से-त्रेता में यग्य- द्वापर में सेवा से व् कलियुग में केवल भगवान् के नाम  से भागवत प्राप्ति का परम योग होता है




jupiter-बृहस्पति

Let the life smile_

Let the life smile_

Realize unto self

Have faith unto self & the supreme

Have positive attitude

Be optimistic and hopeful ever and always

Respect the sentiment of others

Adore self restraint and self discipline

Don’t pain others

Don’t cheat others

Don’t be a party to greed lust & vanity

Don’t encourage violence

Don’t mislead self

Don’t abuse poor and deprived one

 

Don’t take undue advantage of helpless

 

Help the neediest in life

 

Respect the dignity of women

Respect elders and love youngers

Civic sense is must to adore with

Chant the true name at right pitch at appropriate time

Enjoy the beauty of nature but in true spirit

Have feeling for every creature

No one should be content to promote self alone

Be ever ready to embrace truth & forsake unreal

Every one should subordinate themselves to law of society

Our conduct towards all be guided by love, righteousness and justice


ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः
let their be peace, peace and only peace.

सत्यमेव जयते - truth triumphs

 

 


Stop Global Warming
Save the Whales -------

Rare wisdom

भगवान् श्री श्री बद्री नारायण जी की जय

ईस्वर अंस जीव अबिनासी- चेतन अमल सहज सुख रासी

सो मायाबस भयउ गोसाईं- बँध्यो कीर मरकट की नाई
जड़ चेतनहि ग्रंथि परि गई- जदपि मृषा छूटत कठिनई
तब ते जीव भयउ संसारी- छूट न ग्रंथि न होइ सुखारी
श्रुति पुरान बहु कहेउ उपाई- छूट न अधिक अधिक अरुझाई
जीव हृदयँ तम मोह बिसेषी -ग्रंथि छूट किमि परइ न देखी
सोहमस्मि इति बृत्ति अखंडा- दीप सिखा सोइ परम प्रचंडा
आतम अनुभव सुख सुप्रकासा- तब भव मूल भेद भ्रम नासा
तब सोइ बुद्धि पाइ उँजिआरा- उर गृहँ बैठि ग्रंथि निरुआरा
छोरन ग्रंथि पाव जौं सोई- तब यह जीव कृतारथ होई
छोरत ग्रंथि जानि खगराया- बिघ्न अनेक करइ तब माया
रिद्धि सिद्धि प्रेरइ बहु भाई- बुद्धहि लोभ दिखावहिं आई
कल बल छल करि जाहिं समीपा- अंचल बात बुझावहिं दीपा
तब फिरि जीव बिबिध बिधि पावइ संसृति क्लेस
हरि माया अति दुस्तर तरि न जाइ बिहगेस
कहत कठिन समुझत कठिन साधन कठिन बिबेक
होइ घुनाच्छर न्याय जौं पुनि प्रत्यूह अनेक
ग्यान पंथ कृपान कै धारा-परत खगेस होइ नहिं बारा
जो निर्बिघ्न पंथ निर्बहई- सो कैवल्य परम पद लहई
अति दुर्लभ कैवल्य परम पद-संत पुरान निगम आगम बद
राम भजत सोइ मुकुति गोसाई- अनइच्छित आवइ बरिआई

जिमि थल बिनु जल रहि न सकाई- कोटि भाँति कोउ करै उपाई
तथा मोच्छ सुख सुनु खगराई- रहि न सकइ हरि भगति बिहाई
अस बिचारि हरि भगत सयाने- मुक्ति निरादर भगति लुभाने
भगति करत बिनु जतन प्रयासा- संसृति मूल अबिद्या नासा
असि हरिभगति सुगम सुखदाई-को अस मूढ़ न जाहि सोहाई

सेवक सेब्य भाव बिनु भव न तरिअ उरगारि
भजहु राम पद पंकज अस सिद्धांत बिचारि
जो चेतन कहँ ज़ड़ करइ ज़ड़हि करइ चैतन्य
अस समर्थ रघुनायकहिं भजहिं जीव ते धन्य

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सीता राम सीता राम सीता राम कहिये
जाही विधि राखे राम ताहि विधि रहिये

मुख में हो राम नाम राम सेवा हाथ में
तू नहीं अकेला पराये राम तेरे साथ में

विधि का विधान जान हानि लाभ सहिये
जाही विधि राखे राम ताहि विधि रहिये

किया  अभिमान तो फिर मान नहीं पायेगा
होगा वाही जो श्री राम जी को भायेगा

फल आशा त्याग सुख राम जी को कहिये
जाही विधि राखे राम ताहि विधि रहिये

जिंदगी की डोर सोप राम जी के हाथ में
महलों में रखे चाहे झोपड़ी में वास दे

धन्यवाद निर्विवाद राम राम कहिये
जाही विधि राखे राम ताहि विधि रहिये

आशा एक रामजी से दूजी आशा छोड़ दे
नाता एक राम जी से दूजा नाता छोड़ दे

साधू  संग राम रंग अंग अंग रंगिये
काम रस त्याग प्यारे राम रस पगिये 

सीता राम सीता राम सीता राम कहिये
जाही विधि राखे राम ताहि विधि रहिये

ये ना पुछु मर के कहे जायेगे
जहा भेज देगा वही भक्ति रस पायेगे

If lord is obtained all is obtained-if lord is left out means true meaning of being human is not meet with. Take immutable true name of lord which is only way to fulfill the life in true meaning. One set the heart in the lotus feet of lord means achieve the true meaning of being human.

CYCLE OF LIFE-in bondage of five basics their features unto limps unto sense perception unto law of karma and truth unto self_
From absolute to sky
Sky to air
Air to fire
Fire to water
Water to earth
Earth to feeds
Feeds to mind unto heart
Mind unto heart to karma
Karma to truth unto self
Truth unto self to absolute



अतिथि देवो भव
जिसके आने की तिथि निश्चित न हो, जो आकस्मिक रूप से घर आ जाए उसे अतिथि कहते हैं अतिथि सेवा भारतीय संस्कृति में परंपरा रही है अतिथि अभी भी देवता तुल्य माना जाता है मनुस्मृति-शास्त्रों के अनुसार अतिथि सेवा को एक महायज्ञ माना गया है अर्थात् अतिथि को देव मानो-अतिथि का सत्कार करना सौभाग्य, यश, दीर्घायु देने वाला और सुख को बढाने वाला होता है-अतिथि देवो भव
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रामचरण सुखदाई_भज मन रामचरन सुखदाई_

जिहि चरनन से निकसी सुरसरि संकर जटा समाई

जटासंकरी नाम परयो है, त्रिभुवन तारन आई_भज मन रामचरन सुखदाई

जिन चरनन की चरनपादुका भरत रह्यो लव लाई

सोइ चरन केवट धोइ लीने तब हरि नाव चलाई_भज मन रामचरन सुखदाई

सोइ चरन संतन जन सेवत सदा रहत सुखदाई

सोई चरन गौतम ऋषि-नारी परसि परमपद पाई_भज मन रामचरन सुखदाई

दंडकबन प्रभु पावन कीन्हो ऋषियन त्रास मिटाई

सोई प्रभु त्रिलोक के स्वामी कनक मृगा सँग धाई_भज मन रामचरन सुखदाई

कपि सुग्रीव बंधु भय-ब्याकुल तिन जय छत्र फिराई

रिपु को अनुज बिभीषन निसिचर परसत लंका पाई_भज मन रामचरन सुखदाई

सिव सनकादिक अरु ब्रह्मादिक सेष सहस मुख गाई

तुलसिदास मारुत-सुत की प्रभु निज मुख करत बडाई_भज मन रामचरन सुखदाई

Presiding deities of my heart

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