द्वारिका/Dwarika

द्वारिका

हिन्दुओं के चार धामों में से एक गुजरात की द्वारिकापुरी मोक्ष तीर्थ के रूप में जानी जाती है। श्रीकृष्ण के आदेश पर विश्वकर्मा ने इस नगरी का निर्माण किया था। यहाँ का द्वारिकाधीश मंदिर, रणछोड़ जी मंदिर व त्रैलोक्य मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित चार पीठों में से एक शारदा पीठ यहीं है। यहाँ पर समुद्र की बड़ी-बड़ी लहरें किनारों पर इस तरह से गिरती है जैसे द्वारिका के चरण पखार रही हों।

मथुरा को छोड़कर श्रीकृष्ण ने द्वारिका को राजधानी बनाया। कंसवध के बाद मगध के राजा जरासंध ने श्रीकृष्ण के साथ-साथ समस्त यदुवंशियों से पृथ्वी को विहीन करने का संकल्प ले लिया और यदु-राजाओं की राजधानी मथुरा पर आक्रमण किया। जरासंध ने कई बार मथुरा पर आक्रमण किया और प्रत्येक बार श्रीकृष्ण के हाथों पराजित हुआ। जरासंध के क्रोध से यदुवंशियों की रक्षा करने के लिए श्रीकृष्ण ने सागर के बीच में द्वारिका नामक अजेय दुर्ग का निर्माण कराया। सागर के मध्य द्वारिका का निर्माण कराने की बात को पुरातत्त्वविद और अन्य बुद्धिजीवी एक लम्बे समय तक कल्पना की उड़ान समझते रहे। हाल के शोधों से बेट द्वारिका के पास अरब सागर के गर्भ में छिपे प्राचीन द्वारिका के प्रमाण मिले हैं।

द्वारिका नगरी के एक हिस्से में चारदीवारी बनी है जिसके भीतर सभी बड़े-बड़े मन्दिर हैं। रणछोड़जी का मन्दिर द्वारिका का सबसे बड़ा एवं सुन्दर मन्दिर है। मंदिर का शिखर 52 मीटर ऊँचा है और मंदिर में 72 अलंकृत स्तंभ हैं। यह मंदिर पांच तलों का है और प्रत्येक तल में आगे की ओर निकले विभिन्न आकृतियों के झरोखे बने हुए हैं। मंदिर की एक बड़ी विशेषता यह है कि यह गोमती नदी के सिन्धुसागर में संगम के स्थल के निकट है। यहां रंगम नारायण, वसुदेव, गऊ, पार्वती, ब्रह्म, मुरधन, गंगा हनुमान व निष्पाप नाम के बारह घाट बने हुए हैं। ऐसी मान्यता है कि गोमती में स्नान किए बिना मंदिर के दर्शन करने पर आधा ही पुण्य मिलता है। नदी से 56 सीढ़ियां चढ़कर रणछोड़जी के मंदिर में पहुंचा जाता है। मंदिर में द्वारिकाधीश या रणछोड़ महाराज चांदी के सिंहासन पर सोने के मुकुट व मालाओं के साथ विराजमान हैं। एक मीटर ऊँची यह प्रतिमा काले आरज पहाड़ के पत्थर से बनाई गई है। इसमें भगवान कृष्ण का चतुर्भुजीय स्वरूप देखने को मिलता है। प्रतिमा और उसका श्रृंगार इतना सुंदर है कि भक्त बस देखते ही रह जाते हैं। मंदिर की एक विशेषता यह भी है कि द्वारिकाधीश के विभिन्न तरह के श्रृंगार निश्चित समय पर सार्वजनिक रूप से आम जनता के सामने किये जाते हैं। प्रतिदिन हजारों श्रद्धालु अपनी आंखों से दिव्य-श्रृंगार होते देखते हैं। मुख्य मंदिर के चारों तरफ परिक्रमा करने के लिए खुला स्थान है। मंदिर परिसर में ही वेणी माधव पुरुषोत्तम जी, देवकी आदि के मंदिर हैं और आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित शारदापीठ भी मंदिर परिसर में ही है। शंकराचार्य ने  भारतवर्ष की चारों दिशाओं मे चार मठों का निर्माण किया था जिनमें से एक शारदा-मठ है।

द्वारिका नगरी से बीस मील आगे कच्छ की खाड़ी में बेट-द्वारिका बसी है। बेट-द्वारिका के दर्शन बिना द्वारिका यात्रा अपूर्ण मानी जाती है।

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