वेद

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भाषा से नाता जोड़ने वाली सबसे पुरानी किताबें

kalidasa-सूर्यकांत बाली

   जिन लोगों ने यह वहम पाल रखा होगा कि वेद हमारे वैसे ही धर्मग्रंथ हैं जैसे मुसलमानों का कुरान या ईसाईयों का बाइबल है, उन्हें हमारे द्वारा पेश किए गए ऋषि चरित्रों से अब तक काफी सदमा लग चुका होगा।

पर सदमा इसलिए नहीं लगना चाहिए क्योंकि हमारे यहां जब इस्लाम और ईसाइयत जैसा धर्म का मामला रहा ही नहीं, बल्कि धर्म व्यक्तिगत आचरण की एक खुली किताब रहा है तो फिर उस तरह के धर्मग्रंथ की बात भी भला कहां से पैदा होगी? पर धर्मग्रंथ न होने के बावजूद हम वेदों को परम पूजनीय और अपनी आस्था का केंद्र मानते हैं तो इसलिए कि ये वे ग्रन्थ हैं जो मनुष्य का प्राचीनतम साहित्य तो हैं ही इनमें तब के कवियों अर्थात् ऋषियों द्वारा अपने मनोभावों की अभिव्यक्ति इतने निश्छल और सशक्त तरीके से की गई है कि उनमें शक्ति और पवित्रता का, लगभग अपराजेय कालजयिता का तत्व आ समाविष्ट हुआ है। ऐसे विराट साहित्य का अध्ययन अगर न करें, उसका मनन अगर न करें, उसको नमन अगर न करें तो क्या हम इस धरती के कपूत नहीं कहलाए जाएंगे?

नहीं कहलाए जाएं, इसलिए हमें थोड़ा आगे बढ़कर कुछ उन किताबों के बारे में जानकारी करनी चाहिए जिन्हें न जानने के कारण हम भरे-पूरे, समृद्ध, लक्ष्मीसम्पन्न घराने में पैदा होकर भी अज्ञानवश खुद को निर्धन और दरिद्र माने बैठे हैं। पश्चिमी इतिहासकारों अर्थात् भारतनिन्दक कूटनीतिज्ञों ने कहा कि दुनिया की शेष जातियों की तरह भारत में भी शुरू-शुरू में धार्मिक साहित्य लिखा गया और यह कहकर इन कूटनीति विशारद इतिहासकारों ने वेदों, ब्राह्मणग्रन्थों और उपनिषदों को धूमधाम से धर्मग्रन्थों के पाले में सरका दिया। क्या इससे बड़ा कुप्रचार भी कोई हो सकता है? हम देख चुके  हैं कि ऋग्वेद धर्मग्रंथ नहीं, अपने वक्त का उच्चकोटि का साहित्य है। हम देखेंगे कि ब्राह्मण ग्रन्थ धार्मिक साहित्य नहीं, बल्कि सृष्टि और ब्रह्माण्ड के सूक्ष्म रहस्यों को यज्ञ के सहारे समझने की कोशिश करने वाले विलक्षण विज्ञानग्रंथ और दार्शनिक साहित्य का मिलाजुला रूप हैं।

उपनिषदों को ऐसा दार्शनिक साहित्य माना जाना चाहिए जिन्होंने आगे चलकर हमारे विभिन्न दार्शनिक स्कूलों में विचारों के प्राण फूंक दिए। लेकिन आज तो हम यह देखने निकले हैं कि वेदों की रचना के (यानी आज से आठ हजार साल पूर्व से लेकर पांच हजार साल पूर्व तक के) तीन हजार वर्षों की कालावधि की आखिरी सदियों में कुछ ऐसे विलक्षण ग्रन्थ लिखे गए थे, जो भाषा की सूक्ष्मताओं से अपना बुद्धिविलास कर रहे थे। इन ग्रंथों और अपने अजीब नामों वाली इन किताबों के समय के बारे में आसानी से जानना हो तो कह सकते हैं कि ये किताबें महाभारत के करीब तीन-चार सौ साल पहले यानी आज से करीब तिरपन-चौवन सौ साल पहले लिखी गई थीं।

और अगर राष्ट्रीय गौरव से ओतप्रोत होने का आपका मन कर रहा हो तो आप कह सकते हैं कि भाषा का सूक्ष्म और रोचक अधययन करने वाली ये किताबें तब लिखी गईं जब यूरोप घने अंधेरों में डूबा हुआ था और जब मेसोपोटामिया, फारस और चीन में सभ्यता का क्रमश: विकास हो रहा था। पर ऐसे राष्ट्रीय गौरव में क्या रखा है अगर हम इन पुस्तकों को पढ़ना ही छोड़ चुके हैं, बल्कि पूरी तरह भूल ही चुके हैं? आइए, पहले इन पुस्तकों के नामों पर से रहस्य पर्दा हटाया जाए। ये पुस्तके भाषा का सूक्ष्म अध्ययन करती हैं, पर इनका नाम है शिक्षा और प्रातिशाख्य। शिक्षा का अर्थ होता है, सिखाना, तो क्या सिखाती हैं ये किताबें? भाषा सिखाती हैं, भाषा का ज्ञान कराती हैं। इसलिए हम इन्हें भाषा-शिक्षाग्रंथ भी कह सकते हैं।

चूंकि ध्वनि यानी स्वर का सांगोपांग विवेचन इनमें किया गया है, इसलिए इन्हें स्वरशिक्षा ग्रंथ तो प्राय: कह ही दिया जाता है। दूसरी तरह की पुस्तकों का नाम है-प्रातिशाख्य ग्रंथ। अब क्या है यह प्रातिशाख्य? इसमें दो शब्द हैं- प्रति और शाखा। प्रति का अर्थ है हरेक या हर, जैसे प्रतिदिन, अर्थात् हर दिन। शाखा क्या है? थोड़ा समझना पड़ेगा। जब वैदिक संहिताओं का चलन पूरब से बढ़ते-बढ़ते पहले पश्चिम, फिर मध्य और आगे चलकर दक्षिण भारत में होने लगा तो जगह-जगह इनके रूप में, उच्चारण में उस जगह के हिसाब से थोड़ा फर्क पड़ने लग गया। इस फर्क में से एक ही वेद में कई-कई शाखाएं विकसित होने लगीं।

अर्थात् वेद तो चार ही थे- ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, पर भारत की विभिन्न जगहों के हिसाब से इनके मन्त्रों के क्रम और उच्चारण में थोड़ा-थोड़ा फर्क आ जाने के कारण इन चार वेदों की कई शाखाएं बन गईं। तो प्रतिशाखा का मतलब हुआ, हरेक शाखा और प्रातिशाख्य वे ग्रन्थ हुए जिनमें हर शाखा के विशिष्ट उच्चारण प्रकारों का, ध्वनियों और स्वरों का भाषा की विशेषताओं का अलग-अलग अध्ययन किया गया था। अब आप चाहें तो गर्व कर सकते हैं कि आज से तिरपन-चौवन सौ साल पहले हमारे पूर्वजों ने भाषा का इलाकों की विशेषताओं के आधार पर ठीक वैसा ही सूक्ष्म अध्ययन कर डाला था जैसा चौम्स्की वगैरह ने इन वर्षों में अमेरिका में किया है।

तो भाषा विज्ञान की इन प्राचीनतम पुस्तकों में, इन शिक्षा ग्रंथों में और प्रतिशाख्य ग्रंथों में भाषा का कैसा अध्ययन किया गया है? जानना रोचक रहेगा। जैसे मध्यकालीन भारत में इतनी लड़ाइयां लड़ी गईं कि तब का तमाम अर्थतन्त्र, उद्योगतन्त्रा युद्ध को समर्पित था, लगभग वैसे ही महाभारत पूर्ववर्ती भारत में चार वैदिक संहिताओं का ऐसा असर था कि समस्त अध्ययन वेदों को केंद्र में रखकर ही हुआ करता था। इसलिए अगर शिक्षा-प्रातिशाख्य ग्रंथों में भाषा का अध्ययन वेदों की भाषा को केन्द्र में रखकर हुआ तो इसमें न ताज्जुब की कोई बात है और न ही इसमें कुछ गलत है। वैदिक भाषा में बड़ी खासियत उसका स्वरतंत्र यानी स्वर-सिस्टम है।

आज हम स्वर से अ आ इ ई उ ऊ आदि ही समझते हैं। थोड़ा जानकार हो जाने के बाद हम लघु-गुरु और  ”स्व-दीर्घ भी समझने लगते हैं। लघु यानी छोटी मात्रा जैसे अ इ उ। गुरु यानी बड़ी मात्रा जैसे आ ई ऊ। इन्हीं को हम क्रमश: ”स्व और दीर्घ भी कह देते हैं। पर वेदों में इसके अलावा स्वरों को बोलने के तरीके और भी थे- उदात्ता, अनुदात्ता और स्वरित। अगर आप अपने स्वर उच्चारण को थोड़ा ऊंचा ले जाएंगे तो वह उदात्ता हो जाएगा, उसे थोड़ा नीचे ले आएंगे तो अनुदात्ता हो जाएगा और बीच में कहीं रखेंगे तो वह स्वरित हो जाएगा। हम  ये मुश्किल-मुश्किल बातें इसलिए बता रहे हैं ताकि हमें मालूम रहे कि वैदिक भाषा में एक ही शब्द के इसलिए अलग-अलग अर्थ हो जाया करते थे क्योंकि उसके स्वरों के उदात्ता-अनुदात्ता-स्वरित उच्चारणों में फर्क पड़ जाया करता था। मसलन एक शब्द है- इन्द्र-शत्रु। स्वर में फर्क पड़ जाने से उसके दो अर्थ हो जाते हैं- ‘इन्द्र का शत्रु’ और ‘इन्द्र जिसका शत्रु है।’ पहले में महत्व इन्द्र वेफ शत्रु वृत्र का है। जबकि दूसरे में महत्व वृत्र के शत्रु इन्द्र का है।

यह तो एक नमूना हुआ। ऐसे सैकड़ों-हजारों शब्द हैं जो अध्ययन की अपेक्षा रखते हैं और जिनका अध्ययन इन शिक्षा-प्रातिशाख्य ग्रंथों में हुआ है। पूछ सकते हैं कि इस प्रकार के अध्ययन की जरूरत ही क्यों पड़ी? तो लीजिए, जवाब भी जान लीजिए। अध्ययन की जरूरत हमेशा उस चीज की पड़ती है जो हमारे जीवन का सहज हिस्सा नहीं रह पाती। हम जानते हैं कि वेदों के मन्त्रों  की रचना करीब-करीब तीन हजार साल तक होती रही। शुरू-शुरू में मन्त्रों की भाषा और बोलचाल की भाषा एक ही रही तो किसी को भी मन्त्रों का अर्थ समझने में कोई दिक्कत नहीं रही होगी। पर मन्त्रा रचना के दो हजार साल पूरे होते-होते हम देखते हैं कि वाल्मीकि ने उस संस्कृत में अपना रामायण प्रबंधकाव्य लिखा जो दो हजार साल के दौरान नए रूप में विकसित होकर बोलचाल में आ गई थी।

पर वैदिक कवि अपनी उसी भाषा में मन्त्र लिखते रहे जिसमें वे पिछले दो हजार सालों से लिखते आ रहे थे। जबकि यह भाषा अब क्रमश: चलन से बाहर होती जा रही थी और इसलिए उसे सीखने की जरूरत पड़ने लगी थी। शिक्षा-प्रातिशाख्य ग्रन्थ इसी नई जरूरत को पूरा कर रहे थे। पर एक बार जब भाषा के कठिन स्वर-विन्यास को सिखाया जाने लगा तो पिफर क्या बात वहां तक रुक सकती थी? ज्ञान चूंकि रुकता नहीं, ज्ञान चूंकि हमेशा आगे बढ़ता है, इसलिए स्वरों के अध्ययन के साथ-साथ इन भाषा ग्रंथों में क, ख, ग आदि व्यंजनों का अध्ययन भी होने लगा। फिर दो स्वरों या दो व्यंजनों को मिलकर बनने वाले शब्दों का अध्ययन कर उसे संधि कहा जाने लगा। फिर दो पदों को जोड़कर पढ़ा जाने लगा तो समास नामक नए अध्याय की शुरूआत हो गई। करते-करते इन शिक्षा-प्रातिशाख्य ग्रंथों में भाषा के हर पहलू का अध्ययन होने लगा और इस तरह ये ग्रन्थ हमारे देश के (हमारे ही क्या, दुनिया भर के) भाषा विज्ञान और व्याकरण-विज्ञान के प्राचीनतम ग्रन्थ के रूप में हमेशा के लिए प्रतिष्ठित हो गए। पर हम अपने इतने महत्वपूर्ण वैज्ञानिक ग्रंथों को हमेशा के लिए भूल गए। लेकिन चिंता मत करिए, इनमें से कई ग्रन्थ आज भी सुरक्षित हैं और प्रकाशित हैं। पढ़ना चाहेंगे तो ऋक प्रातिशाख्य, अथर्व प्रातिशाख्य, (पाणिनीयध्) शिक्षा सरीखी किताबें आपको आसानी से पुस्तकालयों में मिल जाएंगी।

भाषा के अध्ययन के दौरान कुछ रोचक पहलुओं पर भी इन पुस्तकों में रोशनी डाली गई है। मसलन एक सवाल है कि किसे अच्छा पढ़ने वाला माना जाए? जवाब है- माधुर्यमक्षरव्यक्ति:, पदच्छेदस्तु सुस्वर: धौर्यं लयसमर्थश्च षडेते पाठकागुणा।

यानी वह जिसमें छह खूबियां हों- मधुर वाणी में पढ़ना, अक्षरों को अलग-अलग करके पढ़ना, पदों को भी अलग-अलग करके पढ़ना, ठीक स्वर में पढ़ना, आराम से पढ़ना, लय पर काबू रखना। इसके विपरीत जो गाकर पढ़े, तेज से पढ़े, सिर हिला हिला कर पढे, लिखा हुआ ही पढ़ पाए, बिना मतलब समझे पढ़े और जिसका पढ़ा, धीमा होने के कारण समझ न आए वह अधम पाठक है- ‘गीती, शीघ्री, शिर:कम्पी तथा लिखितपाठक:, अनर्थज्ञोल्पवंफठश्च षडेते पाठकाधामा:।’ आपको एक बात बताएं? ये दोनों वर्णन पाणिनीय शिक्षा के हैं।



भूमिसूक्त : जमीन से हमारा रक्त का सम्बन्ध जोड़ने वाला

vedas-सुर्यकांत बाली

   सूक्त यानी एक से अधिक मन्त्रों का एक संकलन। इस शब्द से हमारा परिचय अब काफी अच्छी तरह से हो चुका है। इसलिए अब हमारे लिए यह कोई नई सूचना नहीं रही कि ऋग्वेद में एक हजार से अधिक सूक्तों का संकलन है तो अथर्ववेद में सूक्तों की संख्या सात सौ से अधिक है और उनमें क्रमश: दस हजार और पांच हजार से अधिक मन्त्रों का संकलन है।

जैसे अब तक हमें यह मालूम पड़ चुका है कि हमारे सम्पूर्ण इतिहास में आर्य नामक कोई जाति कभी मानी ही नहीं गई और वैदिक मन्त्रों की रचना का प्रारंभ भारत के पूर्वी हिस्से यानी अयोध्या, वैशाली और कान्यकुब्ज के आसपास हुआ, वैसे ही हमें इस बात का अहसास भी हो चुका है कि वेद या किसी भी पुस्तक को धर्मग्रंथ के रूप में माने जाने के बजाए हम लोगों द्वारा उनको इसलिए इतना अधिक सम्मान मिला कि चारों वेद इस देश की प्राचीनतम लिखित निधि हैं, जिनमें तब के श्रेष्ठतम कवियों अर्थात् ऋषियों की श्रेष्ठतम कविता का अविस्मरणीय संकलन कर दिया गया है।

तो क्यों न वेदों के कुछ प्रसिद्धतम सूक्तों का एक हल्का-सा जायजा ले लिया जाए ताकि एक तस्वीर तो बने कि दार्शनिक और सांसारिक भावभूमियों से जुड़े इन सूक्तों में ऋषियों ने किन बुलंदियों को छुआ है? वेदों में सूक्तों की कुल संख्या दो हजार के आसपास है, जिनमें करीब बीस हजार मन्त्र संकलित हैं। लेकिन हम सिर्फ तीन सूक्तों को ही (स्थान और औचित्य की सीमाएं देखते हुए) पाठकों के बीच प्रस्तुत कर देना चाहते हैं। जैसे ऋग्वेद का विभाजन मंडलों में है, वैसे ही अथर्ववेद काण्डों में बंटा है। अथर्ववेद के बारहवें काण्ड का पहला सूक्त है- भूमिसूक्त, जिसे विद्वान लोग कई बार पृथ्वीसूक्त भी कह दिया करते हैं। नाम से ही जाहिर है कि इसमें भूमि को लेकर कवि ने अपने उद्गार लिख दिए हैं।

उद्गारों से परिचित हों, इससे पहले दो बातें कह दी जाएं और दोनों का रिश्ता इस सूक्त की मन्त्र संख्या 12 से है, जिसमें एक वाक्य है- माता भूमि: पुत्रेहं पृथिव्या: यानी यह भूमि मेरी मां है और मैं इसका पुत्र हूं। कैसे हमारी अपनी धारणाएं और व्याख्याएं वैदिक मन्त्रों का अर्थ करते वक्त हम पर हावी रहती हैं, इसी का नमूना हैं ये दो बातें। जैसे पश्चिमी विद्वानों ने इस देश के लोगों का मनोबल तोड़ने के लिए कई तरह की अफवाहें फैला दीं कि भारत कभी एक राष्ट्र रहा ही नहीं, इस देश के लोग भारत के थे ही नहीं, भारतवासियों का अपने देश के साथ राष्ट्रीयता के आधार पर कभी कोई नाता रहा ही नहीं, तो बजाय इसके कि दूसरी अफवाहों की तरह इन अफवाहों को भी एक कान से सुनकर दूसरे से निकाल देते, हमने पश्चिमी विद्वानों की कूटनीति का शिकार होकर अपना मनोबल टूटने दिया और पुराने साहित्य में उन अंशों को ढूंढने में लग गए कि जिससे हम पुराने भारत में भी वह राष्ट्रवाद दिखा सकें, जिस तरह का राजनीतिक राष्ट्रवाद आज की दुनिया की सोच का हिस्सा बन चुका है।

इसके तहत हमने भूमिसूक्त के इस वाक्य (12.1.12) की भी राष्ट्रवादी व्याख्या कर दी कि यहां कवि ने भारत को अपनी मां और खुद को उसका पुत्र कह दिया है और कि हमारे यहां भी आज के जैसा राष्ट्रवाद काफी पुराने समय से रहा है। दूसरी व्याख्या पश्चिमी विद्वानों ने की। भारत में शव को जला देने की प्रथा है और काफी पुराने समय से चलती आ रही है। पश्चिम में शव को गाड़ने की प्रथा है। हम लोग भारत के हैं ही नहीं, कहीं बाहर से इस देश में आए और पश्चिम से यहां आए, इस गप्प को प्रतिष्ठित करने के घोर प्रयास में लगे पश्चिमी विद्वान यह साबित करने में लग गए कि भारत में पहले शव दफनाने की पश्चिम जैसी प्रथा थी और उसका प्रमाण है यह वाक्य-माता भूमि: पुत्रेहं पृथिव्या-जिसमें मृत व्यक्ति के शव को उसी तरह पृथ्वी में सहेज देने का संकेत है, जैसे कोई पुत्र अपने को मां की गोद में लिटा कर निश्चित हो जाता है।

हम यह नहीं कहते कि पुराने भारत में राष्ट्रवाद जैसी भावना भारतीयों में नहीं थी। हम यह भी नहीं कहते कि शवों को जलाने की प्रथा शुरू होने से पहले यहां शवों को पृथ्वी में गाड़ने की प्रथा नहीं रही होगी। पर निवेदन यह है कि अपनी-अपनी बद्धमूल धारणाओं की पुष्टि के लिए अत्यंत महनीय वैदिक काव्य से क्यों खिलवाड़ करना हुआ? मसलन इसी वाक्य को समेटने वाला पूरा मन्त्र पढ़ें तो उसका अर्थ जानने के बाद कितना दुख होता है कि भूमि को मां मानने वाले कवि की सहज भावनाओं को कैसे अपनी अवधारणाओं के दुराग्रह की चोट हमने पहुंचा दी है। मन्त्र (12.1.12) है: ‘यत् ते मधयं पृथिवि यच्च नभ्यं, यास्ते ऊर्जस्तन्व: संबभूवु:, तासु नो धे”यभि न: पवस्व, माता भूमि: पुत्रेहं पृथिव्या:, पर्जन्य: पिता स उ न: पिपर्तु।’ यानी हे पृथ्वी, यह जो तुम्हारा मध्यभाग है और जो उभरा हुआ ऊधर्वभाग है, ये जो तुम्हारे शरीर के विभिन्न अंग ऊर्जा से भरे हैं, हे पृथ्वी मां, तुम मुझे अपने उसी शरीर में संजो लो और दुलारो कि मैं तो तुम्हारे पुत्र के जैसा हूं, तुम मेरी मां हो और पर्जन्य का हम पर पिता के जैसा साया बना रहे।

इस तरह के संवेदना से भरे उद्गारों को पढ़ते जाइए तो लगता है कि कवि को यह भूमि पहाड़ों और नदियों का मात्र कोई भौगोलिक पिंड नजर नहीं आ रही, बल्कि उसने पृथ्वी से अपना खून का रिश्ता जोड़ लिया है, क्योंकि भूमि ने उसे इतना कुछ दिया है, पाल-पोस कर बड़ा कर दिया है। एक मन्त्र (12.1.16) क्यों न पढ़  लिया जाए, जिसमें कवि पृथ्वी के प्रति इसलिए कृतज्ञता से भरा है, क्योंकि अपने भीतर समाए धन और अपनी छाती पर उगे धान्य से उसने कवि को समृद्ध कर दिया है, रईस बना दिया है: ‘विश्वंभरा वसुधानी प्रतिष्ठा, हिरण्यवक्षा जगतो निवेशनी, वैश्वानरं बिभ्रती भूमिरग्निम् इन्द्र ऋषभा द्रविंण नो दधातु’ अर्थात् पूरी दुनिया का भरण-पोषण करने वाली यह पृथ्वी वसु (धन) की खानें अपने में धारण किए है, इसकी छाती (वक्ष) सोने की है, सारा जगत उसमें समाया है, सारे संसार की भूख यह मिटाती है, हमारी कामना है कि यह हमें समृद्धि में नहलाए रखे।

खेतों और खानों से मिलने वाली समृद्धि से अभिभूत कवि इस बात से भी चकाचौंध है कि कैसे इस भूमि पर दिन-रात पानी की प्रभूत धाराएं बिना किसी प्रमाद के लगातार बहती रह कर उसे वर्चस्व से सम्पन्न कर रही हैं (12.1.19)- यस्यामाप: परिचरा समानी: अहोरात्रे अप्रमादं क्षरन्ति, सा नो भूमिर्भूरिधारा पयोदुहा अथो उक्षतु वर्चसा।

सूक्त में ऋषि ने सचमुच भूमि के साथ मां का नाता जोड़ लिया है और उससे वैसे ही दूध की कामना कर रहा है जैसे कोई शिशु अपनी मां से दूध की कामना करता है- सा नो भूमिर्विसृजतां माता पुत्रय मे पय: (12.1.10), यानी यह भूमि मेरे लिए वैसे ही दूध (पय:) की धारा प्रवाहित करे, जैसे मां अपने बेटे के लिए करती है। पर वह भूमि मां है कैसी? कवि उसकी दिव्यता से अभिभूत है और कल्पना करता है, उसी मन्त्र 12.1.10. में कि यह वह पृथ्वी है, जिस पर अश्विनी  कुमारों ने अपना रथ चलाया था, जिसे विष्णु ने अपने कदमों से लांघा था, जिसे इन्द्र ने अपने लिए शत्रुविहीन कर दिया था, वह मेरी मां मेरे लिए अपने शिशु की तरह दूध प्रवाहित करे। कवि चाहता तो पृथ्वी को अन्न देने वाली कह कर रुक जाता, पर उसने उसमें मां के दर्शन किए, उसमें दिव्यता के दर्शन किए और उसे अपने और पूर्वजों के इतिहास से भी जोड़ दिया।

मन्त्र संख्या 12.1.24 में कवि ने एक बड़ी ही मजेदार बात कही है कि भूमि की गंध को सूर्या के विवाह में भी बिखेरा गया। (यस्ते गंध: पुष्करमाविवेश यं संजभ्रु: सूर्याया विवाहे) अगली ही गाथा में हम देखेंगे कि कैसे सूर्या का विवाह हमारे राम परवर्ती और महाभारत पूर्ववर्ती इतिहास की अद्भुत सामाजिक घटना थी जो या तो ‘भूमिसूक्त’ के समकालीन थी या फिर थोड़ा ही पहले घटी थी।

मन्त्र संख्या 12.1.38 में कवि ने पृथ्वी पर होने वाले यज्ञों की बात कही है तो इस बात को भी रिकार्ड कर दिया है कि इन यज्ञों में विद्वान लोग ऋचाओं, यजुषों व सोमों से हवि डालते हैं और यही वह पृथ्वी है, जहां भूतकाल में ऋषियों ने अनेक प्रकार का काव्य लिखा है- ‘यस्यां पूर्वे भूतकृत ऋषयो मा उदानृचु:’ (12.1.39) पृथ्वी को देख कर कवि इस कदर मुखर हो गया है कि वह सब कुछ लिख देना चाहता है, जो भी उसे पृथ्वी पर नजर आता है या वह उसके बारे में सोचता है। फटाफट एक विहंगावलोकन कर लिया जाए। इसी पृथ्वी पर समुद्र हैं, नदियां हैं और जल (यस्या समुद्रं उत सिंधुरापो: 12.1.3)।

इसी पृथ्वी पर पत्थरों और हिम वाले पहाड़ हैं और जंगल फैले हैं (गिरयस्ते पर्वता हिमवन्तोरण्यं ते 12.1.11) इसी जमीन पर मनुष्य और पशु विचरण करते हैं (मर्त्यास्त्वं बिभर्षि द्विपदश्चतुष्पद: 12.1.12)। यही भूमि तमाम औषधियों की जननी है (विश्वस्वं मातरमोषधीनां 12.1.17) जिसकी गंध को गंधर्व और अप्सराएं सूंघते नहीं अघाते (यं गंधर्वा अप्सरसश्च भेजिरे तेन या सुरभि कृपु: 12.1.23) इसी पर सभी वृक्ष और वनस्पतियां अपनी जड़े टिकाए हैं (यस्यां वृक्षा वानस्पत्या ध्रुवास्तिष्ठन्ति 12.1.27) और इसी पर हैं शिलाएं, पत्थर और मिट्टी (शिला भूमिरश्मा पांसु: सा भूमि: संध्रता धृता: 12.1.26) पर इसी भूमि को, भूमि मां को अपने फायदों के लिए खोदना पड़ता है तो कारुणिक कवि प्रार्थना करता है कि वह तो करना ही पड़ेगा, पर हे भूमि, उससे तुम्हारे मर्मस्थलों और हृदय को पीड़ा न पहुंचे-यत् ते भूमे विखनामि क्षिप्रां तदपि रोहतु मा ते मर्म विमृग्वरि (12.1.35)।

कवि के उद्गारों की तीव्रता, अनुभूति और अभिव्यक्ति इन दोनों स्तरों की तीव्रता देखकर तो लगता है कि वह अपने भूमि वर्णन में कभी रूकेगा ही नहीं। पर ऐसा चूंकि संभव नहीं था, इसलिए 63 मन्त्रें का लम्बा, रंगबिरंगा और भावप्रवण सूक्त लिख कर कवि थम जाता है। पर 63 मन्त्रों के इस बृहत्तर सूक्त में कम से कम तीन स्थानों पर सूक्तकार ने उस सत्य को खोजने का प्रयास किया है, जिसके कारण यह भूमि टिकी है और जिस कारण वह इसमें मां के दर्शन कर रहा है।

सूक्त के पहले ही मन्त्र (12.1.1) में वह कहता है कि सत्य, दीक्षा, तप, ब्रह्म और यज्ञ ने इस पृथ्वी को टिका रखा है- सत्यं बृहदुग्रं दीक्षा तपो ब्रह्म यज्ञ: पृथिवीं धारयन्ति। आठवें मन्त्र में कवि फिर कहता है कि पृथ्वी का हृदय सत्य से ओतप्रोत है- यस्या हृदयं परमे व्योमन् सत्येनावृतं अमृतं पृथिव्या:। मन्त्र 12.1.17 में कवि कहता है कि इस पृथ्वी को धर्म ने धारण कर रखा है- भूमिं पृथिवीं धर्मणा धृताम्।

पृथ्वी को भौतिकता और अतिभौतिकता के साथ इस कदर जोड़ता हुआ कवि अंत तक उसके मां रूप को नहीं भुला पाता और इस भावचित्रण के साथ सूक्त समाप्त करता है कि हे भूमि मां, मुझे अपने समस्त कल्याणभाव से हमेशा जोड़े रखना- ‘भूमे मातर्नि धेहि मा भद्रया सुप्रतिष्ठितम्।’ आज से करीब पांच-सवा पांच हजार वर्ष पूर्व, अर्थात् महाभारत के आसपास लिखे गए इस सूक्त को अगर वेदों के दर्जनभर श्रेष्ठतम सूक्तों में शीर्ष जगह मिली हो तो हैरानी क्या?