महाभारत

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प्रबन्धकाव्य महाभारत

suryakant-bali1-सूर्यकान्त बाली

अगर कोई व्यक्ति सम्पूर्ण महाभारत पढ़ लेगा तो उसके चित्त में विक्षोभ और उसके परिवार में कुछ न कुछ अशुभ जरूर होगा। इस अफवाह के डर के मारे हुआ यह कि प्राय: लोग महाभारत का कभी अपने घर में वैसा धार्मिक पाठ या अनुष्ठान नहीं करवाते जैसे अन्य प्राचीन ग्रंथों का करवाया जाता है।

हमारी एक अद्वितीय निधि महाभारत के बारे में एक अजीब सी अफवाह सारे देश में फैली हुई है और यह अफवाह कोई आज नहीं फैली, बहुत पुरानी है। शायद सदियों से फैली है। क्या है यह अफवाह? यह कि अगर कोई व्यक्ति सम्पूर्ण महाभारत पढ़ लेगा तो उसके चित्त में विक्षोभ और उसके परिवार में कुछ न कुछ अशुभ जरूर होगा। इस अफवाह के डर के मारे हुआ यह कि प्राय: लोग महाभारत का कभी अपने घर में वैसा धार्मिक पाठ या अनुष्ठान नहीं करवाते जैसे अन्य प्राचीन ग्रंथों का करवाया जाता है।

अठारह पर्वों वाली महाभारत के अन्त में एक बहुत लम्बा परिशिष्ट जुड़ा हुआ है, करीब बीस हजार श्लोकों का। इस परिशिष्ट का नाम है- हरिवंश पुराण। इसका नाम तो पुराण है पर अठारह महापुराणों में इसकी गिनती नहीं होती। परिशिष्ट तो यह बेशक महाभारत का है पर शेष महाभारत से अलग इसको स्वतंत्र धार्मिक मान्यता मिली है और जीवन के कुछ विशेष कष्टों खासकर निस्सन्तान होने के कष्ट को दूर करने के लिए हरिवंश पुराण के पाठ और अनुष्ठान का विधान कर दिया गया है। और लोग इस पर आचरण भी करते हैं।

सवाल है, महाभारत के बारे में ऐसी अफवाहें क्यों फैली हैं? क्यों नहीं इसके धार्मिक अनुष्ठान और पाठ का वैसा ही विधान कर दिया गया जैसा उसी के अंगभूत अंश श्रीमद्भगवदगीता का और इसके परिशिष्ट हरिवंशपुराण का किया गया है? विडम्बना यह है कि महाभारत को धर्मशास्त्र माना गया है और इसे पाचवें वेद के श्रेष्ठतम सिंहासन पर बिठाया गया है। पर इसके बावजूद इसे पूरा पढ़ने के बारे में अजीबो-गरीब डर पैदा कर दिया गया है।

चूंकि इसका कोई विशेष कारण नजर नहीं आता, इसलिए एक ही बात समझ में आती है कि महाभारत बेशक हमारा राष्ट्रीय महाकाव्य है, हमारा धर्मशास्त्र है, फिर भी सच यह है कि इसकी कथा पढ़कर वैसा सुख नहीं मिलता, वैसी शान्ति नहीं मिलती, वैसा आराम नहीं मिलता, जैसा रामायण पढ़ने के बाद मिलता है। महाभारत में भयानक युध्द है। भीष्म, द्रोण, कर्ण और शल्य पर्वों में सिर्फ युध्द हैं, मारकाट है, त्राहि-त्राहि है।

युध्द तो रामायण में भी है। पूरा लंकाकाण्ड युध्दमय है तो इससे पहले के काण्डों में भी, खासकर अरण्य और सुंदर काण्डों में युध्द, संघर्ष और विनाश की कथाएं लिखी पड़ी हैं। पर एक फर्क फिर भी है और सभी भारतवासी इस फर्क को जानते हैं। रामायण के युध्द प्रसंगों को पढ़कर एक तसल्ली मिलती है कि दो पक्ष है- एक न्याय का पक्ष और दूसरा अन्याय का। दोनों में संघर्ष हुआ। इस संघर्ष में न्याय के पक्ष की विजय हुई। इसलिए एक श्रेष्ठतम काव्य के रूप में वाल्मीकि रामायण पढ़ने के बाद पाठक को स्पष्ट संदेश मिल जाता है कि राम जैसा बनना है रावण जैसा नहीं।

पर महाभारत के संघर्ष को पढ़ने के बाद क्या वैसा संदेश मिल पाता है? कौरव हारे और पाण्डव जीते। पर क्या इसके बावजूद पाठक को संदेश मिल पाता है कि धृतराष्ट्र जैसा नहीं पाण्डू जैसा बनना है, दुर्योधन जैसा नहीं भीम जैसा बनना है। दुश्शासन जैसा नहीं अर्जुन जैसा बनना है? पूरे महाभारत में अनुकरणीय पात्र कोई कम नहीं है, चार पांच तो हैं ही। भीष्म, कृष्ण, युधिष्ठिर द्रौपदी और विदुर। पर कृष्ण को छोड़ सभी के साथ दो दिक्कतें हैं। एक तो ये सभी बडे ही कठिन हैं।

इतना उलझे हुए हैं कि उन्हें कैसे अनुकरण करें। पाठक को वैसा स्पष्ट नहीं होता जैसे भरत, सीता या हनुमान। इनका अनुकरण करने में पाठक को कोई खास दिक्कत नहीं आती। और फिर द्रौपदी व विदुर आदि ये पात्र युध्द में से निखर कर नहीं आए जिससे और कुछ नहीं तो इनका विजयी चरित्र ही अनुकरणीय बन जाता। कृष्ण का जीवन और जीवन दर्शन इतना विराट और अद्भुत है कि वे तो ईश्वर एवं पूर्णावतार हो गए। पर शेष पात्रों को क्या अपने जीवन में उतारा जाए, यह पाठक को इदमित्थं समझ में नहीं आ पाता। बेशक इन सभी पात्रों का चरित्र वृत्तान्त और घटनाचक्र हमारे मन के तनाव को कम नहीं करता। बढ़ाता जरूर है।

कोई भी पात्र (कृष्ण और युधिष्ठिर के अपवादों को छोड़कर) धर्म और मर्यादा का कोई स्पष्ट मानदण्ड कायम नहीं कर पाता। पूरा महाभारत युध्द, न्याय और धर्म का सीधा संदेश पहीं दे पाता बल्कि उलझनें ज्यादा पैदा करता है। इसलिए प्रश्न पैदा हुआ होगा षड़यंत्रों, कुटिलताओं पापाचारों, धोखाधड़ियों और मारकाट से भरा महाभारत क्यों पढ़ा जाए? पर चूंकि महाभारत इतना ज्यादा महत्वपूर्ण है कि इसे पढे बिना कोई भारतीय रह नहीं सकता। इसलिए इसे थोड़ा ‘गैप’ देकर आगे पीछे करके पढ़ने की बात कही गई।

कहते हैं महाभारत पूरा लिख देने के बाद वेदव्यास इतने उदास हो गए कि वे नारद के पास उपाय पूछने गए जिन्होंने उन्हें कहा कि कृष्ण के लीलाचरित्र का वर्णन करो तो तुम्हारी उदासी दूर हो जाएगी। इस पर वेदव्यास ने भागवत महापुराण लिखा और उन्हें शान्ति मिली। शायद इसी में इस बात का अर्थ छिपा है कि क्यों वेदव्यास ने एक शुध्द महाकाव्य को धर्मशास्त्र और इतिहासग्रंथ में बदल दिया। और महाभारत को वैसा बनाकर अद्भुत कवि ने जिस नई काव्यशैली का प्रवर्तन किया वह इतनी मान्य और लोकप्रिय हो गई कि आगे चलकर सारी पुराण परम्परा ने उस शैली का अनुकरण किया।

इतिहास शैली को व्यास ने इस तरह पूरे महाभारत में पिरोया कि जहां भी उन्हें बातचीत और घटनाक्रम के दौरान सम्भव नजर आया, उन्होंने वहां प्राचीन इतिहास को अपने से तीन हजार साल पहले हुए मनु के परवर्ती ज्ञात इतिहास को और मनु से पहले के माइथोलोजी बन चुके इतिहास को पिरो दिया, गूंथ दिया। व्यास बहुत लम्बा जीवन जिए थे। इसलिए अचरज नहीं कि महाभारत युध्द के बाद की भी अनेकानेक घटनाओं को वे अपने प्रबन्धकाव्य में पिरोते चले गए और ग्रन्थ को महत्वपूर्ण बनाते चले गए।

महाभारत को धर्मशास्त्र बनाने का काम वेदव्यास ने इस तरह से किया कि भारतीय जीवन मूल्यों को, जीवनशैली को, यहां की विचारधाराओं को उन्होंने अवसर मिलते ही महाभारत में यहां-वहां लिख दिया। नतीजा यह हुआ है कि जहां महाभारत में रामोपाख्यान, नलोपाख्यान, शकुन्तलोपाख्यान जैसी कथाएं उसके इतिहास चरित्र को निखारती हैं तो वहां शान्तिपर्व, अनुशासनपूर्व जैसे अंशों से इस प्रबन्धकाव्य का धर्मशास्त्र चरित्र उभर कर सामने आ गया है।

गीता में उस समय की तमाम दार्शनिक विचारधाराओं का अद्भुत समावेश कर दिया गया है। इस तरह महाभारत में इतना कुछ समाविष्ट कर दिया गया है कि एक कहावत चल पड़ी कि महाभारत में जो लिखा है वही बाकी जगहों पर भी लिखा है और अगर कोई वर्णन महाभारत में नहीं है तो वह अन्यत्र भी कहीं मिल पाएगा- यदिहास्ति तदन्यत्र यन्नेहास्ति न तत् क्वचित्।

इतने विशालकाय और विराट महाग्रंथ को देखकर पश्चिमी विद्वानों की बुध्दि ऐसी चकराई कि वे मान ही नहीं पा रहे थे कि इतनी बड़ी किताब किसी एक ही व्यक्ति की रचना हो सकती है। इसलिए वे महाभारत के विकास की विभिन्न अवस्थाओं की कल्पना में खो गए। जाहिर है कि इतना बड़ा ग्रन्थ किसी एक व्यक्ति की रचना नहीं हो सकता। वेदव्यास ने जो महाभारत लिखा उसका शरीर बढ़ाने में उन्हें अपने कई साथियों से मदद मिली।

वेदव्यास की इस टीम में उनके एक शिष्य वैशम्पायन थे। वेदव्यास के पुत्र शुकदेव भी इस टीम के एक अद्भुत और महत्वपूर्ण सदस्य थे। जिन संजय ने धृतराष्ट्र को महाभारत युध्द का पूरा वृन्तान्त सुनाया था वे भी वेदव्यास की महाभारत टीम का एक अंग थे। इन सबने मिलकर महाभारत लिखा और उसमें अपने-अपने हिसाब से, कुछ वेदव्यास के निर्देश से तो कुछ अपने हिसाब से उसमें जोड़ा और उसका कलेवर एक लाख श्लोकों से भी ज्यादा तक पहुंचाया।

महाभारत में आगे चलकर प्रक्षेप अंश नहीं जोडे ग़ए, ऐसा हमारा कोई प्रस्ताव नहीं है। पर महाभारत मुख्य रूप से और लगभग पूर्ण रूप से वेदव्यास और उनकी टीम ने लिखा, इसमें भी कोई दो राय नहीं।





ताज्जुब तो युधिष्ठिर को भी हुआ था और ठीक ही हुआ था कि कैसे उनके चारों भाइयों को बिना किसी युध्द के मार डाला गया। जिस तालाब के किनारे चारों मरे पड़े थे, वहां ऐसा कोई चिह्न भी नहीं था कि जिससे साबित होता कि किसी के साथ द्वंद्वयुध्द में पराजित उन भाइयों को एक-एक कर मार दिया गया है। उसमें से किसी के शरीर पर शस्त्र द्वारा किए गए किसी घाव या प्रहार का कोई छोटा-सा निशान तक नहीं था। इसलिए युधिष्ठिर हैरान थे कि शक्ति में लगभग अजेय उनके भाइयों को किसने मार डाला?

कथा हम सब जानते हैं। जब युधिष्ठिर काम्यक वन छोड़कर फिर से अपने भाइयों के साथ द्वैतवन में रहने लगे तो वन में एक स्थान पर प्यास बुझाने को पानी लाने के लिए उन्होंने अपने भाइयों को निकट के एक सरोवर में भेजा। एक-एक कर चारों भाई गए और कोई नहीं लौटा तो चिन्तित युधिष्ठिर स्वयं अपने भाइयों को खोजते हुए उसी सरोवर की ओर गए। वहां किनारे पर ही चारों भाइयों को मृत पड़ा देखकर उन्हें ताज्जुब हुआ जिसका संकेत पहले पैरा में किया गया है। वे हैरान ही हो रहे थे कि उन्हें एक यक्ष की आवाज सुनाई दी जो पेड़ पर चढ़ा बैठा था। यक्ष ने कहा कि अगर युधिष्ठिर ने भी उसके सवालों का जवाब दिए बिना उस तालाब का पानी पीना शुरू कर दिया तो उसकी भी वही गति होगी जो उनके चारों भाइयों की हो चुकी है। तालाब के किनारे आने के बाद युधिष्ठिर को ताज्जुब यह हुआ कि उनके चारों भाई कैसे मार डाले गए। परन्तु हमें ताज्जुब यह हो रहा है कि क्या वास्तव में ऐसी कोई घटना घटी होगी या कि महाभारतकार ने खुद ही उसकी कल्पना कर डाली है। सहसा विश्वास नहीं होता कि नकुल, सहदेव, अर्जुन और भीम क्रमश: तालाब पर गए होंगे, अदृश्य यक्ष ने पहले कहा होगा कि अगर मेरे सवालों का जवाब दिए बिना मेरे स्वामित्व वाले तलाब का पानी पिया तो तुम्हारे प्राण चले जाएंगे और हर भाई ने इस चेतावनी पर कान दिए बिना पानी पी लिया और जान गंवा बैठा। पहली बार में गफलत में आकर जान गंवा बैठने की बात तो समझ में आ भी सकती है। फिर नकुल-सहदेव को मरा देखकर अर्जुन ने और फिर तीन-तीन भाइयों को मरा देख भीम ने भी यक्ष की चेतावनी की अनुसनी की, क्या यह बात समझ में आती है?

हमारी समझ में तो नहीं आती। उसके बावजूद हम यक्ष-युधिष्ठिर के बीच हुए इस संवाद को, भारत-गाथा के इस प्राचीनतम क्विज को रोचकता के साथ पढ़े बिना नहीं रह सकते। मान भी लिया जाए कि यह संवाद-घटना वास्तव में घटी नहीं और महाभारतकार ने इसे कल्पित कर लिया था। इसके बावजूद यह संवाद इतना महत्वपूर्ण है कि इसमें से जहां एक ओर महाभारतकार का यह प्रयास नजर आता है कि उसने युधिष्ठिर के धर्मराज-चरित्र को उभारने के लिए एक घटना कल्पित की है, वहीं दूसरी ओर संवाद के माधयम से प्रबंधकवि ने भारत की सोच को भी आने वाली पीढ़ियों के लिए दर्ज कर देने का प्रयास किया है।
यक्ष के साथ हुए इस संवाद में ये युधिष्ठिर सचमुच एक महापुरुष के रूप में उभरकर हमारे सामने आते हैं। महानतम संकट के समय भी धैर्य न खोना और हर तरह से विपरीत परिस्थितियां सामने होने पर भी धर्मतत्व के बारे में स्पष्ट कहना- ये कोई छोटी उपलब्धियां नहीं हैं और यक्ष के साथ हुए संवाद के माधयम से युधिष्ठिर के चरित्र की यह विशेषता उभर कर हमारे सामने आती है। जिस चेतावनी पर उनके चारों भाइयों ने कोई धयान नहीं दिया और पानी पीकर प्यास बुझाने के आवेग में अपनी जान से हाथ धो बैठे, उसी चेतावनी पर युधिष्ठिर ने न केवल धयान दिया बल्कि उस पर आचरण भी किया। परन्तु इस संवाद में सबसे बड़ी बात तो यह है कि युधिष्ठिर ने यक्ष के प्रश्नों के उत्तर तब दिए, जब उनके चारों भाइयों के प्राणहीन शरीर उनके सामने उसी तालाब के किनारे जमीन पर पड़े थे और जिस यक्ष के कारण उनके भाइयों की यह गति हुई थी, उसी यक्ष के प्रश्नों के उत्तर युधिाष्ठिर दे रहे थे। धैर्य और संतुलन की पराकाष्ठा क्या इससे ज्यादा हो सकती है? नहीं हो सकती और ठीक यही दिखाने के लिए अगर महाभारतकार ने यक्ष-युधाष्ठिर संवाद की कल्पना कर डाली हो तो कोई गलत काम उसने नहीं किया।

और फिर यक्ष के प्रश्नों के उत्तर युधिष्ठिर ने जिस तत्वदृष्टि से दिए, उससे जाहिर यह होता है कि युधिष्ठिर के पास जीवन के दार्शनिक और व्यवहारिक पक्षों की ठोस जानकारियां भी थी और धर्म का तत्व चिन्तन उनका इतना गहरा और सटीक था कि उन्हें एक भी सवाल का जवाब देने में न तो कोई कठिनाई हुई और न ही यक्ष उनके किसी उत्तर से असन्तुष्ट हुआ। यक्ष ने कुल मिलाकर एक सौ चौबीस सवाल? युधिष्ठिर से किए। सवालों की रेंज बड़ी व्यापक है और पढ़ते ही बनती है।

यहां सभी सवाल-जवाब दोहरा पाना सम्भव नहीं, पर कुछ सवाल-जवाब तो बहुत ही महत्वपूर्ण हैं और हमारी सोच का अविभाज्य हिस्सा बन चुके हैं। मसलन पहले चार सवाल-जवाब एक अलग ही किस्म के हैं। 1. सूर्य को कौन आकाश में ऊपर उठाता है? सूर्य को आकाश में ब्रह्म ऊपर उठाता है। 2. सूर्य के चारों ओर कौन चलते हैं? देवता सूर्य के चारों ओर चलते हैं। 3. कौन सूर्य को अस्त करता है? धर्म उसे अस्त करता है। 4. सूर्य किसमें प्रतिष्ठित है? सूर्य सत्य में प्रतिष्ठित है। इनमें से एक-एक सवाल की गहराई में जाइए तो पूरा चिन्तन उसके पीछे समझ में आने लगता है। इतने अधिक दार्शनिक किस्म के सवालों के साथ इन दो सवालों को रखकर देखें तो कैसा लगता है? 1. खेती करने वालों के लिए कौन-सी वस्तु श्रेष्ठ है? उनके लिए वर्षा सर्वश्रेष्ठ है। 2. बिखेरने के लिए क्या सर्वश्रेष्ठ है? और युधिष्ठिर का जवाब जाहिर तौर पर कहता है बीज। यानी कुछ सवाल शुध्द दार्शनिक स्तर के हैं तो कुछ का ताल्लुक रोजमर्रा की जिन्दगी से है और अगर युधिष्ठिर के पास हर सवाल का जवाब है तो निश्चित ही वे दर्शन और सामान्य जीवन, दोनों की ही गहरी जानकारी रखते हैं।

ज्यादा न सही, पर दो तरह के सवालों के बारे में हम जरूर कुछ कहना चाहेंगे। एक का संबंध ब्राह्मण से है। अपने नौवें सवाल में यक्ष पूछता है कि ‘ब्राह्मण में देवत्व क्या है’ तो युधिष्ठिर का जवाब है कि स्वाधयाय, यानी वेदों का स्वाधयाय करने वाले ब्राह्मण में ही देवत्व का आधान होता है। अपने एक सौ चौदहवें सवाल में यक्ष फिर से पूछते हैं और इस बार खास खुलासा करके पूछते हैं कि किस कारण से व्यक्ति को ब्राह्मण माना जाए- वंश से, आचार से, स्वाधयाय से या शास्त्रें को सुनने से? तो इस बार युधिष्ठिर ने अच्छे आचार को ही ब्राह्मणत्व की निशानी माना है। यानी दोनों ही बार युधिष्ठिर ने जन्म से ब्राह्मणत्व नहीं माना। यही बात कृष्ण ने गीता में कही है कि चातुरर्वण्य का संबंध गुणों और कर्म से है (अर्थात् जन्म से नहीं) चातुरर््वण्य मायां सृष्टं गुणकर्मविभागश: (गीता, 4,13) परन्तु व्यवहार में क्या हो रहा था? जवाब चाहिए तो कृपया कर्ण का जीवन देख लीजिए। जिन्हें महज इस कारण, श्रेष्ठ महापुरुष के गुणों और वैसे ही कर्म से युक्त होने के बावजूद जीवन भर अपमानित और तिरस्कृत होना पड़ा क्योंकि वे सूतपुत्र मान लिए गए थे और सूत को छोटी जाति मान लिया गया था।

दूसरा प्रसंग एक सौ बीसवें सवाल से जुड़ा है। सवाल किया गया कि इस पृथ्वी पर सबसे बड़ा आश्चर्य क्या है? युधिष्ठिर ने जो जवाब दिया, वह हमारे देश के लोगों की जुबान पर इस कदर चढ़ गया है कि शायद उन्हीं विचारों के कारण कहा जाता है कि हर भारतीय जन्म लेते वक्त ही आधा दार्शनिक होता है। जवाब था- हर रोज दिन-रात प्राणी मर रहे हैं, लेकिन जो बचे हुए हैं वे समझते हैं कि वे हमेशा बचे रहेंगे, इससे बड़ा आश्चर्य और क्या हो सकता है।

वनपर्व के अधयाय 313 में शामिल इस विराट संवाद के अन्त में जो हुआ, उसने तो युधिष्ठिर के चरित्र को सच में ही हिमालय के शिखर पर पहुंचा दिया है।