'श्रीरामचरितमानस' के रचियता गोस्वामी तुलसीदास एक महान कवि और सिद्ध संत थे। इनका जन्म 15 वीं शताब्दी में उत्तर प्रदेश के एक गाँव में हुआ था। इनके पिता का नाम आत्माराम दूबे और माता का नाम हुलसी था। कहा जाता है कि जन्म के समय तुलसीदास के मुंह में 32 दाँत मौजूद थे। जन्म के समय इनका शरीर भी साधारण बच्चे से बड़ा था। जन्म लेते समय वे रोये नहीं बल्कि उनके मुंह से 'राम' शब्द निकला। ये देखकर घर के लोग डर गए और इनके जन्म को अपशकुन मानने लगे। ऐसे विचित्र बालक का जन्म सुनकर पड़ोस के लोग भी इकट्ठे हो गए। ज्योतिषी बुलाये गए और विद्वान् लोगों से सलाह मशवरा किया गया। अंत में सबकी राय हुई कि यह बालक जिन्दा नहीं बचेगा। और यदि यह बच गया तो समाज को एक नया रास्ता दिखायेगा और ईश्वर का परम भक्त होगा। माता हुलसी को डर था कि बालक को अपशकुनी मानकर ये लोग कहीं फेंक न दें। इसलिए उन्होंने अपनी दासी मुनिया को बुलाया और अपने गहने और बालक को उसे सौंपकर कहा, "तू इसे लेकर अपनी सास के पास दूसरे गाँव ले जा। वहाँ अच्छी तरह इसका पालन पोषण करना।" इसके बाद हुलसी संसार से चल बसीं। मुनिया शिशु को लेकर रातोरात अपनी सास के गाँव पहुंची। उसकी दयालु सास ने सारा हाल जानकर कहा, "तूने अच्छा किया, जो इसे यहाँ ले आयी। हमारे घर में गाय ब्याही है, उसका दूध पीकर यह जीवित रहेगा।" चुनिया ने तुलसीदास का पालन-पोषण बड़े लाड-प्यार से किया। लेकिन यहाँ भी शिशु के दुर्भाग्य ने पीछा नहीं छोड़ा। चुनिया भी पाँच वर्ष बाद चल बसी। उसे सांप ने डस लिया था। इसके बाद तुलसीदास द्वार-द्वार भटकने लगे। प्रतिदिन दो रोटियों का मिलना भी उनके लिए मुश्किल हो गया। इसी भटकन के दौरान उनकी भेंट गुरु नरहरिदास से हुई। गुरु नरहरिदास के साथ तुलसीदास अयोध्या चले गए। उन्होंने बालक के संस्कार किये। नामकरण संस्कार में नरहरिदास ने तुलसीदास का नाम 'रामबोला' से बदलकर 'तुलसीदास' रखा। तुलसीदास यहीं रहकर पढने-लिखने लगे। बुद्धि के तेज तुलसी बड़े गुरुभक्त थे। वे अपने गुरु की सेवा बड़ी लगन से करते थे। गुरु के मुख से जो कुछ भी सुनते, वह उन्हें याद हो जाता था। गुरु ने उन्हें अयोध्या के राजा राम की कहानी सुनाई। लेकिन उस समय बालक तुलसीदास को राम की कथा पूरी तरह समझ में नहीं आई। यह बात तुलसीदास ने 'रामचरितमानस' में स्वयं स्वीकार की है। अयोध्या से तुलसीदास जी काशी चले गए और गंगा जी के घाट पर ठहरे। वहीं उनकी भेंट एक अन्य महात्मा 'शेष सनातन' से हुई। उन्हीं से तुलसीदास ने वेद-पुराण आदि पढ़े। इसी से तुलसीदास के व्यक्तित्व में निखार आया और उन्हें वह शक्ति मिली, जिसने उन्हें हिन्दू जन-जागृति की प्रेरणा दी। शेष सनातन से तुलसीदास ने केवल किताबी ज्ञान ही नहीं बल्कि सांसारिक और सामाजिक ज्ञान भी पाया। इसीलिए वे बचपन के सारे कडवे अनुभव भूलकर अपने जन्म स्थान पर चले आये। अपने गाँव पहुँचने पर तुलसीदास को पता चला कि उनका सारा परिवार समाप्त हो चुका है। उन्होंने अपने पिता का श्राद्ध किया और गाँव वालों के आग्रह पर वहीं रहने के लिए तैयार हो गए और लोगों को राम कथा सुनाने लगे। धीरे-धीरे तुलसीदास के रामकथा सुनाने की चर्चा दूर-दूर तक फैलने लगी। दूर-दूर से लोग उनकी कथा सुनने के लिए आने लगे। एक दिन पड़ोसी गाँव के एक ब्राह्मण कथा सुनने आये। वे तुलसीदास से रामकथा सुनकर उनसे बहुत प्रभावित हुए। तुलसीदास की योग्यता, गुण और सुन्दरता देखकर उन्होंने अपनी पुत्री 'रत्नावली' का विवाह उनसे कर दिया। तुलसीदास अपनी पत्नी के साथ सुखपूर्वक रहने लगे। रत्नावली सुन्दर और सुशील थी, जिसे देखकर तुलसीदास ने अपने आपको उस पर न्योछावर कर दिया। वे सारी दुनियादारी छोड़कर पत्नी के प्रेम में दीवाने हो गए। यहाँ तक कि वे उसे घड़ी भर के लिए भी अपने से दूर नहीं रखना चाहते थे। इसी तरह करीब पाँच साल बीत गए। एक दिन तुलसीदास किसी काम से दूसरे गाँव गए हुए थे। तब रत्नावली अपने भाई के साथ मायके चली गयीं। तुलसीदास ने घर सूना-सूना देखा तो बहुत दुखी हुए और उसी क्षण अपनी ससुराल के लिए निकल पड़े। रात का समय था। कहा जाता है कि तुलसीदास ने रात में तैरकर नदी पार की और तब रत्नावली से मिले। अपने पीछे-पीछे ही पति का आना देखकर रत्नावली को बहुत शर्म महसूस हुई। उसने तुलसीदास को बहुत धिक्कारा और कहा- 'अस्थि-चर्ममय देह मम तामें ऎसी प्रीत। ऎसी जो श्रीराम महँ होत न तव भवभीत।।" - अर्थात् मेरे हाड़ - माँस के शरीर से आपको जितना प्रेम है, उसका आधा भी श्रीराम से होता तो संसार से डरना नहीं पड़ता। इन शब्दों ने वह काम किया, जो दुनिया भर के उपदेश भी नहीं कर पाते। इन शब्दों ने एक क्षण में तुलसीदास के जीवन की दिशा ही बदल दी। अब उनके हृदय में रत्नावली की जगह राम की मूर्ति विराजमान हो चुकी थी। एक क्षण भी रुके बिना वह वहाँ से चलकर सीधे प्रयाग पहुंचे। वहाँ उन्होंने साधुवेश धारण कर लिया। फिर साधुओं की संगत में शामिल होकर काशी पहुंचे। काशी में तुलसीदास ने रामकथा कहना शुरू कर दिया। तुलसी की एक ही लालसा थी- राम का दर्शन। यहाँ श्रीतुलसीदास ने श्रीराम के प्रत्यक्ष दर्शन प्राप्त किये, इसके सन्दर्भ में तीन दृष्टांत प्रसिद्ध हैं। कहते हैं जब तुलसीदास प्रात:काल शौच के लिये गंगापार जाते थे तो लोटे में बचा हुआ पानी एक वृक्ष की जड़ में डाल देते थे। उस वृक्ष पर एक प्रेत रहता था। नित्य पानी मिलने से वह प्रेत संतुष्ट हो गया और गोस्वामी जी के सामने प्रकट हो कर उनसे वर माँगने की प्रार्थना की। गोस्वामी जी ने रामचन्द्र जी के दर्शन की लालसा प्रकट की। प्रेत ने बताया कि अमुक मंदिर में सायंकाल रामायण की कथा होती है, यहाँ श्रीहनुमान जी नित्य ही कोढ़ी के भेष में कथा सुनने आते हैं। वे सब से पहले आते हैं और सब के बाद में जाते हैं। गोस्वामी जी ने वैसा ही किया और श्रीहनुमान जी के चरण पकड़ कर रोने लगे। अन्त में श्रीहनुमान जी ने चित्रकूट जाने की आज्ञा दी। तुलसीदास जी चित्रकूट के जंगल में साधनारत थे कि तभी दो राजकुमार - एक साँवला और एक गौरवर्ण धनुष-बाण हाथ में लिये, घोड़े पर सवार एक हिरण के पीछे दौड़ते दिखायी पड़े। तुलसी ने इसे अपने ध्यान में व्यवधान समझकर आँखे और भी कसकर बंद कर लीं। श्रीहनुमान जी ने आ कर पूछा, "कुछ देखा? गोस्वामी जी ने जो देखा था, बता दिया। श्रीहनुमान जी ने कहा, 'वे ही राम-लक्ष्मण थे।' दूसरा प्रसिद्ध प्रसंग है कि तुलसीदास चित्रकूट में रामघाट पर ध्यानमग्न थे। एक पुरुष ने चन्दन की मांग की। तुलसी चन्दन घिसने लगे। हनुमान ने उन्हें सचेत करने के लिए तोते की वाणी में कहा- "चित्रकूट के घाट पर भई संतन की भीर। तुलसिदास चन्दन घिसें तिलक देत रघुबीर।।" यह सुनते ही तुलसी मूर्छित हो गए। राम स्वयं चन्दन लगाकर अंतर्धान हो गए। तीसरे प्रसंग के अनुसार चित्रकूट में घूमते हुए तुलसी ने एक जगह रामलीला होते हुए देखी। आगे बढ़ने पर एक ब्राह्मण मिला, जिससे उन्होंने उस रामलीला की प्रशंसा की। ब्राह्मण रूपी हनुमान ने कहा-" पागल हो गए हो, आजकल कहीं रामलीला होती है।" फिर वह अंतर्धान हो गए। तुलसीदास ने जगन्नाथ, रामेश्वर, द्वारका तथा बदरीनारायण की पैदल यात्रा की। वे चौदह वर्ष तक निरंतर तीर्थाटन करते रहे। इस काल में उनके मन में वैराग्य और तितिक्षा निरंतर बढ़ती चली गयी। तुलसीदास चित्रकूट से अयोध्या की ओर चल पड़े। उन दिनों प्रयाग में मेला लगा था इसलिए कुछ दिन वहाँ ठहर गए। एक दिन उन्होंने वट वृक्ष के नीचे दो ऋषियों से वही कथा सुनी, जो बहुत पहले अपने गुरु से सुनी थी। उन्हें उस कथा से रामचरितमानस लिखने की प्रेरणा मिली ओर वे अयोध्या न जाकर काशी की ओर चल दिए। काशी में रामनवमी के दिन तुलसीदास ने रामचरितमानस की रचना आरम्भ की। उस दिन प्रायः वही लग्न-गृह आदि थे, जो राम के जन्म के समय में थे। इस ग्रन्थ को पूरा होने में दो वर्ष 7 महीने 26 दिन लगे। 'श्री रामचरितमानस' के छंद और उसकी कथा तुलसीदास अक्सर लोगों को सुनाया करते थे, जिससे चारों ओर उनकी चर्चा होने लगी। यही वह ग्रन्थ है जिसने तुलसीदास को विश्वकवि बनाया। लोकप्रियता की दृष्टि से यह ग्रन्थ पहले नंबर पर आता है। शायद ही कोई हिन्दू परिवार होगा, जहाँ 'श्री रामचरितमानस' की प्रति न हो। हिन्दू समाज में इसकी मान्यता किसी धर्म ग्रन्थ से कम नहीं है। तुलसीदास जी के समय में हिंदु समाज में अनेक पंथ बन गये थे। मुसलमानों के निरंतर आतंक के कारण पंथवाद को बल मिला था। उन्होंने रामायण के माध्यम से वर्णाश्रम धर्म, अवतार धर्म, साकार उपासना, मूर्तिपूजा, सगुणवाद, गो-ब्राह्मण रक्षा, देवादि विविध योनियों का सम्मान एवं प्राचीन संस्कृति और वेदमार्ग का मण्डन तथा तत्कालीन मुस्लिम अत्याचारों और सामाजिक दोषों का तिरस्कार किया। सब को एक सूत्र में बाँधने का जो कार्य शंकराचार्य ने किया था, वही कार्य बाद के युग में गोस्वामी तुलसीदास जी ने किया। गोस्वामी तुलसीदास ने अधिकांश हिदू भारत को मुसलमान होने से बचाया। तुलसीदास के लिखे बारह ग्रंथ अत्यंत प्रसिद्ध हैं - दोहावली, कवित्तरामायण, गीतावली, रामचरित मानस, रामलला नहछू, पार्वतीमंगल, जानकी मंगल, बरवै रामायण, रामाज्ञा, विनय पत्रिका, वैराग्य संदीपनी, कृष्ण गीतावली। इसके अतिरिक्त रामसतसई, संकट मोचन, हनुमान बाहुक, रामनाम मणि, कोष मञ्जूषा, रामशलाका, हनुमान चालीसा आदि आपके ग्रंथ भी प्रसिद्ध हैं। लेकिन तुलसीदास की परम ख्याति का मूल आधार रामचरितमानस ही है। इसे संक्षेप में मानस भी कहा जाता है। इसमें अयोध्या के राजा दशरथ के ज्येष्ठ पुत्र श्रीराम का चरित्र विस्तार से वर्णित है। अवधी भाषा में लिखे गए इस महान ग्रन्थ के प्रमुख प्रमुख पात्र राम, सीता, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न, हनुमान आदि हिन्दू संस्कृति के आदर्श चरित्र हैं। Please send corrections to [ekatmatastotra@gmail.com] {Last updated April 10, 2010} |
