भगवान महावीर

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कभी वे राजकुमार थे, फिर न देह रहे न मन
कभी वे राजकुमार थे, फिर न देह रहे न मन

वचनेश त्रिपाठी

ज्रम्भिका ग्राम से संलग्न नदी-प्रवाह; नदी का नाम है ऋजुपालिका। उसके पुलिन में देवालय की गैरिक ध्वजा फहर-फहर फहरा रही है। देवालय का पड़ोसी है एक शालवृक्ष- जाने कब से अचल खड़ा है, जाने कितनी बरसातों के प्रहार झेलता वह मौन योगी की भाँति समाधिस्थ है। मंदिर और शाल दोनों ही पुराने हो चले हैं। सर्वत्र नीरवता छायी है। मंदिर में कभी-कभी ज्रम्भिका ग्राम का सामाग नाम का एक गृहस्थ दर्शनार्थ आ जाता है तथा अगर-धूप जलाकर उस देवालय तथा पुलिन को महका जाता है। गैरिक ध्वजा तब कहीं अधिक वेग से फहर, अपनी प्रसन्नता अप्रकट नहीं रख पाती। सामाग किसान है, मंदिर के पास के खेत उसी के हैं- शालवृक्ष भी उसी की भूमि पर खड़ा है।

एक दिन समाग उस देवालय में आया तो हतप्रभ रह गया। उसने शालवृक्ष के नीचे एक अपूर्व दृश्य देखा। सर्वथा दिगम्बरवेशी एक अत्यंत तेजस्वी पुरुष ध्यानमग्न सा उस पेड़ के नीचे बैठा है, उसके नेत्र अर्द्ध निमीलित हैं। शरीर कृश है तथा वर्षा-आतप सहते-सहते उसकी देह की त्वचा कहीं-कहीं फट गयी है, जहाँ से रक्त छलक आया है। शरीर पर कई जगह किन्हीं चोटों-प्रहारों के भी चिन्ह स्पष्ट दिखते हैं। कौन है यह? सामाग कृषक के प्रश्न का उत्तर कौन दे? तभी जैसे उस दिगम्बप्राय पुरुष का पीछा करते हुए दो जन वहाँ जा खड़े होते हैं। सामाग उनसे पूछ रहा है, 'क्यों भाई! कहाँ से आया यह? कौन है?'

उनमें से एक अतीव श्रद्धा से बता रहा है, 'क्या बताऊँ तुम्हें! देख लो जी भर इन्हें। ये वीतराग, निष्काम-निर्लिप्त महात्मा हैं। गृहत्यागी राजकुमार हैं। केश-श्मश्रु त्यागकर भिक्षु हो गये। तप करते बारह वसंत बीत चुके इन्हें। यह तो तेरहवाँ वसंत है।'

'अरे ये तो मुनि हैं। प्रणाम महाराज!' समाग उन्हें पुकार कर अभिवादन करने लगता है। परन्तु न उनकी पलकें उठती हैं न उठती फूटती है। समाग उससे कह रहा है, 'इन्होंने तो उत्तर नहीं दिया! अरे, प्रणाम स्वीकार नहीं किया!'

'कुपित मत हो बंधु। ये कुछ भी बोलेंगे नहीं। प्रणाम का भी उत्तर नहीं देते। इन्हें तो नगर में ईंट-पत्थर मार-मार कर घायल कर देते रहे, पर हमने देखा कि न इन्होंने अपने घाव देखे, न चोटें सहलायीं और न उन पत्थर मारने वाले ऊधमी बच्चों की ओर दृष्टि उठायी। ऐसा निर्लिप्त साधु तुमने देखा है कहीं? तुम्हारा भाग्य कि ये तुम्हारे ग्राम के पास आ गये। ये किस के खेत हैं?'
'मेरी ही हैं। सच, मैं बड़भागी हूँ कि इन मुनिजी की चरण-धूलि मेरे पुरखों की इस भूमि को प्राप्त हो सकी। परन्तु भाई! ये वस्त्रहीन क्यों?'

'बारह साल पहले जो कपड़े गृहत्याग करते समय ये पहनकर निकले थे वे 13 मास में तार-तार होकर गल कर उतर गये, क्योंकि 13 महीनों में वे वर्षा आदि अभी झेलकर जीर्ण हो चले थे। पुन: नये वस्त्र न इन्होंने किसी से माँगे, न अर्जित किये। और अब तो हालत यह है कि इन्हें कुछ भी कहो, बोलेंगे नहीं भिक्षा हाथ में लेकर खा लेते हैं, कर-पात्री हैं। इन में और अबोध शिशु में कोई अन्तर नहीं। सतत आत्मस्थ रहते हैं, यहाँ तक कि इनके शरीर पर कीड़े-मकोड़े व साँप-बिच्छू भी चढ़ गये तो न इन्होंने उन पर कोई ध्यान दिया, न उन्हें हटाने की कोशिश की। देह कई जगह घावों से रिस रही है, फिर भी ये उन जख्मों की पीड़ा का जैसे अनुभव ही नहीं करते, विदेहस्वरूप हैं। इसी स्थिति में इन्होंने बारह वर्ष बिता दिये है, कितना कठिन तप है!'

सामाग समुत्सुक हो बीच में ही पूछता है, 'कौन है यह महाभागी?'

'सुनते हैं इनका नाम वर्द्धमान है। एक राज्य के राजकुमार थे; सब त्याग कर अरण्यवास और यायावरीवृत्ति में भी संतुष्ट हैं। न किसी से शत्रुता, न किसी से लगाव। समदृष्टि: कुछ पूछो, बोलेंगे नहीं; कुछ भी दो, ग्रहण करेंगे नहीं, जैसे इनको कोई आवश्यकता ही अनुभव नहीं होती। कुछ दुष्टजनों ने इन पर दण्ड-प्रहार किये, परन्तु तब भी ये मौन रहे, सब सहा।'

समाग किसान तथा उसके दूसरे पड़ोसी सब सुनते रहे गुनते रहे और वह विदेह भिक्षु उसी देवालय के निकट स्थित शाल पादप के नीचे आत्मलीन ध्यानस्थ। ऋजुपालिका नदी बहती रही अजस्त्र। वसंत ऋतु में चैत्र बीता, वैशाख आया; वैशाख की दशमी, दिन था सुव्रत। अपराह्ण वेला थी, विजय का नाम का मुहूर्त, लगा कि उस एकाकी निस्संग दिगम्बर भिक्षु ने नेत्र खोले, स्थिर ग्रीवा में कुछ कंप आया। जो वह चाहता था, वह 12 वर्षों बाद इस सर्वथा अज्ञात, अपरिचित स्थान में उसे प्राप्त हो गया।

वह अनुभव कर रहा था कि वह देह नहीं है, मन भी नहीं है, वह तो इन्द्रियातीत है, दु:ख-सुख के सभी द्वन्द्वों से परे है उसकी सत्ता। उसी स्थिति को 'केवली' कहते हैं, 'केवल स्वरूप'। केवली स्थिति प्राप्त होते ही राजकुमार वर्द्धमान, वह तप-निरत भिक्षु, 'महावीर' नाम पा गया। अब वह बोलता-चालता था, सुनता था, सलाह देता था और सीख भी देता था। उसके पास पहले कुछ लोग आये, फिर भीड़ जुड़ने लगी; वह फिर संचरणशील हो गया। उसके चतुर्दिक् शिष्य-समुदाय एकत्र होने लगा और वह इतिहास में तीर्थंकर महावीर के नाम से यशस्वी हो गया, अमर-जीवन।

लोग उसका पूर्वनाम-धाम भूल गये, उसके माता-पिता को भूल गये, याद रहा उसका वही निर्बन्ध, मुक्त-प्राण, महाश्रमण स्वरूप, वही केवलिन रूप; और ऋजुपालिका नदी-तटवासी, ज्रम्भिका गाँव का किसान समाग भी इतिहास में स्थान प्राप्त कर सका क्योंकि उसी की भूमि पर खड़े शालवृक्ष के नीचे उस भिक्षु को केवली स्थिति प्राप्त हुई थी।
(सन्दर्भ- ‘यह पुण्य-प्रवाह हमारा’, लेखक- वचनेश त्रिपाठी, सुरुचि प्रकाशन, नई दिल्ली




जब वे बालक थे
जब वे बालक थे

एक बार बच्चे एक बगीचे में खेल रहे थे। शायद वे लुका-छिपी का खेल ही खेल रहे होंगे, क्योंकि एक बच्चा उनमें से अलग होकर किसी निर्जन कोने में एक पेड़ के पीछे जाकर छिप गया था। वहां पहुंचने के थोड़ी देर बाद ही वह बच्चा बड़ी जोर-जोर से चीखने लगा।

सब बच्चे इन चीखों को सुनकर उस ओर भागे। वहां जाकर देखा कि एक अजगर ने उनके साथी को अपनी पूंछ में लपेट रखा है और वह अपना मुंह फाड़े हुए धीरे-धीरे उसे निगलने के लिये बढ़ रहा है। यह भयानक दृश्य देखकर बच्चे रोने लगे, लेकिन वर्द्धमान न रोये न घबड़ाये। उन्होंने आगे बढ़कर अजगर की आंख से आंख मिलाकर देखा और अपने साथी को छुड़ाने के लिए अजगर की पूंछ को कसकर पकड़ा। न जाने क्या चमत्कार हुआ कि बर्द्धमान से आंखें मिलते ही अजगर उस ओर चला गया। अजगर जब जाने लगा तो लड़कों ने उसे मारना चाहा परन्तु वर्द्धमान ने उन्हें ऐसा करने से मना किया, कहा- 'इसने हमारे साथ मित्रता बरती है। यह हमारे साथी को बिना किसी प्रकार का नुकसान पहुंचाये हुये ही जा रहा है, फिर इसे तुम लोग क्यों मारना चाहते हो?' प्रेम से मनुष्य ही नहीं पशु भी वश में हो जाता है।

बालक वर्द्धमान की इस बहादुरी की चर्चा दूर-दूर तक फैली। लोग खुश होकर बालक वर्द्धमान को 'महावीर' कहने लगे। इस प्रकार तीर्थंकर महावीर स्वामी आज अपने नाम से अधिक अपने विशेषण से ही पहचाने जाते हैं।

(सन्दर्भ- प्रेरक प्रसंग, संकलन- वेद प्रकाश पुन्शी)