विश्वामित्र अपनी विशाल सेना सहित विजयी होकर अपने राज्य को लौट रहे
थे। मार्ग में ब्रह्मा जी के पुत्र महर्षि वशिष्ठ का गुरुकुलमय आश्रम
पड़ा। विश्वामित्र ने उनका आशीर्वाद लेने के विचार से आश्रम में प्रवेश
किया। महर्षि वशिष्ठ ने राजा के रूप में उनका यथोचित सम्मान किया और कुछ
समय आश्रम में रुककर आतिथ्य स्वीकार करने का विनम्र निवेदन किया।
विश्वामित्र ने कहा, ``आप जैसे तपस्वी ऋषिवर का आतिथ्य स्वीकार करना मेरे
लिये गौरव एवं सम्मान की बात होगी, किन्तु मेरे साथ एक लाख से अधिक का
सैनिक-समूह तथा काफी संख्या में हाथी-घोड़े हैं, जिससे उनके आवास तथा
भोजनादि की व्यवस्था करने में आपको तथा गुरुकुल परिसर निवासी
विद्यार्थियों को असुविधा एवं अनावश्यक कष्ट होगा।'' इस पर मुनिवर वशिष्ठ
ने कहा, ``राजन, मेरे इस गुरुकुल में आपको और आपके सैनिक-समूह को किसी
प्रकार की असुविधा तथा कष्ट नहीं होगा। सब व्यवस्थाएं सुचारु रूप से हो
जायेंगी।
महर्षि वशिष्ठ के आश्रम में कपिला नामक अलौकिक क्षमता
युक्त एक कामधेनु गाय थी, जिससे आश्रम तथा गुरुकुलवासियों को कभी किसी
वस्तु का अभाव नहीं हुआ। कामधेनु की अलौकिक क्षमता से आवश्यक आवश्यकताओं
की निर्बाध एवं निरंतर आपूर्ति हो जाती थी। दो दिन तक ब्रह्मर्षि वशिष्ठ
के गुरुकुलमय आश्रम में मिले आदर तथा सत्कार से अभिभूत होकर विश्वामित्र
ने उनसे प्रस्थान की अनुमति मांगते हुए कहा, ``हम आपके इस आतिथ्य सत्कार
के लिये सदैव कृतज्ञ रहेंगे। एक राजा के रूप में तो मुझे आपके गुरुकुल तथा
आश्रम को कोई अमूल्य भेंट देनी चाहिए, किन्तु युद्ध से लौटने के कारण यह
संभव नहीं है। इसके विपरीत मैं जाने से पूर्व आपसे एक चीज मांगता हूं। आशा
है मेरी इच्छित वस्तु देकर आप मुझे उपकृत करेंगे।'' इसके उत्तर में ऋषिवर
ने कहा, ``आप मांगिये, यदि मैं इच्छित वस्तु देने में समर्थ हुआ तो आपको
निराश नहीं करूंगा।'' विश्वामित्र ने कहा, ``ऋषिवर, मुझे आपकी कपिला नामक
कामधेनु गाय चाहिए।'' ``राजन, कामधेनु गाय देना मेरे लिये संभव नहीं है।
इस गौमाता की महत्ती कृपा से ही इस आश्रम तथा गुरुकुल का निर्बाध संचालन
संभव हो पा रहा है।'' हठी राजा विश्वामित्र ने जब कामधेनु गाय को बलात् ले
जाने का प्रयास किया तो कपिला गाय के खुरों से असीम सैनिकों की उत्पत्ति
हुई, जिससे विश्वामित्र को पराजित होकर खिन्न मन से अपने राज्य को लौटना
पड़ा।
इस घटना के पश्चात् ही अपनी पराजय से क्षुब्ध एवं निराश
विश्वामित्र ने राजपाट का त्याग कर दिया। गहन वन में जाकर दीर्घकाल तक घोर
तपस्या की। जब भी कभी ब्रह्मऋषि वशिष्ठ से उनकी भेंट होती थी, तो ऋषिवर
वशिष्ठ उन्हें `राजऋषि' कहकर संबोधित किया करते थे, जबकि विश्वामित्र उनके
मुख से स्वयं के लिये ब्रह्मऋषि का संबोधन सुनना चाहते थे। अंतत एक दिन
तपस्यालीन विश्वामित्र में पुन राजसी तेज आ गया। उन्होंने निश्चय किया कि
ऋषि वशिष्ठ यदि उन्हें ब्रह्मऋषि कहकर संबोधित करेंगे तो ठीक है अन्यथा वह
उनकी हत्या कर देंगे। इसी बदले की भावाना के साथ एक संध्या को ऋषि
विश्वामित्र ने शस्त्र लेकर वशिष्ठ मुनि के आश्रम की ओर प्रस्थान किया।
आश्रम के अति समीप पहुंचकर विश्वामित्र वशिष्ठ युगल की बात सुनने लगे।
वशिष्ठ
मुनि की पत्नी अरुंधती ने कहा, ``ऋषिवर, आज कितनी स्निग्ध शीतल चांदनी है,
जिसका प्रकाश चहुं ओर फैल रहा है।'' अरुंधती के इस कथन के उत्तर में
महर्षि वशिष्ठ ने कहा, ``नहीं प्रिय, यदि प्रकाश देखना है तो ऋषि
विश्वामित्र की तपस्या का प्रकाश देखो, जो तीनों लोकों को प्रकाशमान कर
रहा है। उनके तप का कोई सानी नहीं है।'' ऋषिवर वशिष्ठ के इन क्षमाशील
शब्दों ने पशुबल पर विजय पायी। वशिष्ठ जी की इस उपमा को सुनकर गायत्री
मंत्र के रचयिता विश्वामित्र ने ऋषि वशिष्ठ के सम्मुख अपना शस्त्र फेंककर
उनके चरणों में नमन किया और उनके शरणागत हुए। इस पर ब्रह्मा जी के
मानस-पुत्र महर्षि वशिष्ठ ने उन्हें उठाकर आलिंगनबद्ध करते हुए कहा,
``ब्रह्मऋषि, आपकी यश-कीर्ति आने वाले युगों तक दैदीप्यमान रहेगी।''
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-सूर्यकांत बाली
किसी भी भारतवासी के सामने आप वसिष्ठ का नाम ले लें तो एकदम बोल उठेगा,
वही जो, दशरथ के कुलगुरू, जिन्होंने उनके चार बेटों, राम, भरत, लक्ष्मण,
शत्रुघ्न को शिक्षा-दीक्षा प्रदान की थी। वही तो, जिन्होंने तब दशरथ को
समझाकर ढांढस बंधाया था कि अगर मुनि विश्वामित्र राम और लक्ष्मण को
राक्षसों का वध करने अपने आश्रम ले जाना चाहते हैं, तो कोमल हृदय पिता
होने के बावजूद दशरथ को घबराना नहीं चाहिए और अपने दोनों बेटों को उनके
साथ भेज देना चाहिए।
वही तो, जिन्होंने तब कौशल
देश का शासन बड़ी मुस्तैदी से चलाया, जब दशरथ का देहांत हो चुका था, राम
ने वन से वापस लौटने के लिए मना कर दिया था और भरत ने बाकायदा राजतिलक
करवा कर राजसिंहासन पर बैठने की बजाय राम की चरणपादुका को वहां बिठा खुद
नन्दिग्राम से राजकाज चलाने की औपचारिकता भर पूरी की थी। जी हां, वही
वसिष्ठ।
जो कुछ ज्यादा जानकार होंगे,
वे यह बताना भी नहीं भूलेंगे कि वसिष्ठ और विश्वामित्र में जमकर संघर्ष
हुआ था, जिसके रंग-बिरंगे विवरण पुराण ग्रंथों में मिल जाते हैं। कहेंगे
कि वसिष्ठ के पास एक कामधेनु गाय थी जो हर इच्छा पूरी कर सकती थी, जिसकी
एक वत्सा थी, नन्दिनी। कामधेनु तथा उसका बछड़ा-गाय नन्दिनी की अद्भुत
विशेषताओं से विश्वामित्र इतने प्रभावित और आकर्षित हुए कि उन्होंने
वसिष्ठ से कहा कि मुझे इनमें से एक गाय दे दो।
वसिष्ठ ने मना कर दिया तो
दोनों में जमकर युद्ध हुआ जिसमें वसिष्ठ के सौ बेटे मारे गए, पर
विश्वामित्र के मन की इच्छा पूरी नहीं हो सकी। जी हां, वही वसिष्ठ।
जिन्हें वसिष्ठ के बारे में कुछ और भी ज्यादा मालूम होगा तो वे
वसिष्ठ-विश्वामित्र संघर्ष को विभिन्न वर्णों और जातियों के संघर्ष के रूप
में पेश करने को उतावले होंगे और कहेंगे कि पुराने जमाने में जब मनुष्य की
जाति का निर्धारण जन्म से नहीं कर्म से होता था, तब भी ब्राह्मण कुल में
पैदा हुए वसिष्ठ ने क्षत्रिय कुल में पैदा हुए विश्वामित्र को विद्वान,
ज्ञानी, मन्त्रकार होने के बावजूद ब्राह्मण मानने से इनकार कर दिया। खुद
को उन्होंने ब्रह्मर्षि कहलाया तो विश्वामित्र को उन्होंने हद से हद
राजर्षि ही माना।
जी हां, ये वही वसिष्ठ हैं,
जिनके बारे में हमारी स्मृति में इतना कुछ लिखा-बिछा पड़ा है। और अगर इतना
कुछ हम भारतवासियों को वसिष्ठ के बारे में याद है, पता है, तो जाहिर है कि
हमारे देश के इतिहास में उनकी एक महत्वपूर्ण जगह रही है। पर जिस तरह की
चीजें हमें वसिष्ठ के बारे में पता हैं, क्या उतने भर से वे इस देश की
इतिहास यात्रा के मीलपत्थर साबित हो जाते हैं? यानी क्या इन यादों के
विवरण में से उनका कोई ऐसी योगदान झलकता है, जिसने हमारे देश के विचार को,
यहां के समाज की सोच को, सभ्यता को आगे बढ़ाया हो?
वसिष्ठ ने दशरथ से कहा कि
राम और लक्ष्मण को विश्वामित्र के साथ भेज दो, उन्होंने दशरथ की मृत्यु के
बाद कोशल राज्य को संभाला, विश्वामित्र से कामधेनु को लेकर उनके युद्ध
हुए, उन्होंने विश्वामित्र को ऋषि तो माना पर ब्रह्मर्षि नहीं, सिर्फ
राजर्षि माना, तो इस तमाम कथामाला में ऐसा क्या है कि वसिष्ठ को भारत
राष्ट्र का विराट या विशिष्ट पुरूष माना जाए? है और चूंकि यकीनन है, इसलिए
हमें वसिष्ठ के बारे में थोड़ा गहरे जाकर और ज्यादा सच्चाइयां टटोलनी
होंगी। वसिष्ठ की कुछ ऐसी खास और बार-बार उल्लेख के लायक कोई विशेष देन थी
कि हमारे जन के बीच क्रमश: उनकी प्रतिष्ठा मनुष्य से बढ़कर देव पुरूष के
रूप में होने लगी।
माना जाने लगा कि वसिष्ठ
जैसा महान व्यक्ति सामान्य मनुष्य तो हो नहीं सकता। उसे तो लोकोत्तर होना
चाहिए। इसलिए उन्हें ब्रह्मा का मानस पुत्र मान लिया गया और उनका विवाह
दक्ष नामक प्रजापति की पुत्री ऊर्जा से बताया गया जिससे उन्हें एक पुत्री
और सात पुत्र पैदा हुए। अपने महान नायकों को दैवी महत्व देने का यह भारत
का अपना तरीका है, जिसे आप चाहें तो पसंद करें, चाहें तो न करें, पर तरीका
है। यही वह तरीका है जिसके तहत तुलसीदास को वाल्मीकि का तो विवेकानंद को
शंकराचार्य की तरह शिव का रूप मान लिया जाता है। ऐसे ही मान लिया गया कि
वसिष्ठ जैसा महाप्रतिभाशाली व्यक्ति ब्रह्मा के अलावा किसका पुत्र हो सकता
है? पर चूंकि ब्रह्मा का परिवार नहीं है, इसलिए मानस पुत्र होने की कल्पना
कर ली गई। खैर।
ठीक इसी मुकाम पर आकर हमें
यह मान लेना चाहिए कि वसिष्ठ के बारे में जितनी तरह की खट्टी-मीठी कथाएं
और रंग-बिरंगे विवरण हमें याद हैं, वे सभी एक वसिष्ठ के नहीं, अलग-अलग
वसिष्ठों के हैं, यानी वसिष्ठ वंश में पैदा हुए अलग-अलग मुनि-वसिष्ठों के
हैं। वसिष्ठ एक जातिवाची नाम है और आजकल भी जैसे कोई जातिवादी नाम पीढ़ी
दर पीढ़ी व्यक्तियों के साथ जुड़ा रहकर चलता रहता है, वैसी ही परम्परा
काफी पुराने काल से चलती आ रही है।
वे वसिष्ठ थे जिन्होंने दशरथ
से ऋष्यश्रृंग की देखरेख में पुत्रकामेष्टि यज्ञ कराया, राम आदि का
नामकरण किया, शिक्षा-दीक्षा दी और राम-लक्ष्मण को विश्वामित्र के साथ
भेजने के लिए दशरथ का मन बनाया। पर इनका अलग से नाम नहीं मिलता। जिन
वसिष्ठ के साथ विश्वामित्र का भयानक संघर्ष हुआ, वे शक्ति वसिष्ठ थे। जिन
वसिष्ठ ने विश्वामित्र को ब्राह्मण मानने से इनकार कर दिया, उनका नाम
देवराज वसिष्ठ था। ये सब वसिष्ठ अलग-अलग पीढ़ियों के हैं।
तो वसिष्ठ पर पाठकों के साथ
अपना संक्षिप्त संवाद खत्म करने की शुरूआत इस सवाल से की जाए कि वसिष्ठ
नाम आखिर कैसे पड़ा? वसिष्ठ में वस शब्द है जिसका अर्थ है रहना और निवास,
प्रवास, वासी आदि शब्दों में वास का अर्थ इसी आधार पर निकलता है। वरिष्ठ,
गरिष्ठ, ज्येष्ठ, कनिष्ठ आदि में जिस ष्ठ का प्रयोग है, उसका अर्थ है सबसे
ज्यादा यानी सर्वाधिक बड़ा तो वसिष्ठ यानी सर्वाधिक पुराना निवासी।
जो वसिष्ठ, जो आद्य वसिष्ठ,
जो सबसे पुराने वसिष्ठ कोशल देश की राजधानी अयोध्या में आकर बसे वे स्मृति
परम्परा के मुताबिक हिमालय से वहां आए थे और अयोध्या में आकर रहने से पहले
का विवरण चूंकि हमारे ग्रंथों में खास मिलता नहीं, इसलिए उन्हें ब्रह्मा
का पुत्र मानने की श्रद्धा से भरी तो कभी ऋग्वेद के मुताबिक ‘वरूण-उर्वशी’
की सन्तान मानने की रोचक कथाएं मिल जाती हैं।
सवाल है कि वसिष्ठ हिमालय से
नीचे क्यों उतरे होंगे? क्यों अयोध्या में आकर रहने लगे? इन छोटे से
सामान्य सवालों में ही वसिष्ठ का वह अमूल्य योगदान छिपा पड़ा है जिसने इस
देश की विचारधारा को एक नया मोड़ दे दिया। हम जान चुके हैं कि सामाजिक
अव्यवस्था से निजात पाने के लिए ही जन समाज ने मनु को अपना पहला राजा
बनाया और मनु ने समाज और शासन के व्यवस्थित संचालन के लिए नियमों की
व्यवस्था दी।
देश के इतिहास में यह एक नया
प्रयोग था जहां पूरे समाज ने अपनी सारी शक्तियां, अपना पूरा वर्तमान और
अपने तमाम सपने एक राजा के हाथ में सौंप दिए थे, जिसके बाद राजा का
अतिशक्तिशाली बन जाना स्वाभाविक था। यह एक नई बात थी, जहां एक व्यक्ति
पूरे समाज के वर्तमान और भाग्य का विधाता बन गया। आद्य वसिष्ठ को, जो
हिमालय में ही रहते थे और जिनके नाम का ठीक-ठीक पता नहीं, ठीक ही खतरा
महसूस हुआ कि इतना शक्तिशाली और ऐश्वर्य सम्पन्न राजा उन्मत्त हो सकता है।
राजदंड कहीं उन्मत्त और
आक्रामक न हो जाए, इसलिए उस पर नियंत्रण आवश्यक है और जाहिर है कि ऐसे
राजदंड पर नियंत्रण करने के लिए कोई बड़ा राजदंड काम नहीं आ सकता था,
बल्कि ज्ञान का, त्याग का, अपरिग्रह का, वैराग्य का, अंहकार-हीनता का
ब्रह्मदण्ड ही राजदंड को नियमित और नियंत्रित कर सकता था। वसिष्ठ के अलावा
यह काम और किसी के वश का नहीं था, यह वसिष्ठ ने अपने आचरण से ही आगे चलकर
सिद्ध कर दिया।
हिमालय से उतरकर वसिष्ठ जब
अयोध्या आए, तब मनु के पुत्र इक्ष्वाकु राज्य कर रहे थे। इक्ष्वाकु ने
उन्हें अपना कुलगुरू बनाया और तब से एक परम्परा की शुरूआत हुई कि राजबल का
नियमन ब्रह्मबल से होगा और एक शानदार तालमेल और संतुलन का सूत्रपात शासन
व्यवस्था में ही नहीं समाज में भी हुआ। यहां तक कि क्रमश: एक सामाजिक
आदर्श बन गया कि जब भी रथ पर जा रहे राजा को सामने स्नातक या विद्वान मिल
जाए तो राजा को चाहिए कि वह अपने रथ से उतरे, प्रणाम करे और आगे बढ़े।
एक बड़े विचार या आदर्श की
स्थापना जितनी मुश्किल होती है, उससे कहीं ज्यादा मुश्किल उस पर आचरण होता
है और अगर वसिष्ठों का खूब सम्मान इस देश की परम्परा में है तो जाहिर है
कि इस आदर्श का पालन करने में वसिष्ठों ने अनेक कष्ट भी सहे होंगे। कुछ
कष्ट तो हमारे इतिहास में बाकायदा दर्ज हैं।
मसलन अयोध्या के ही एक राजा
सत्यव्रत त्रिशंकु ने जब अपने मरणशील शरीर के साथ ही स्वर्ग जाने की पागल
जिद पकड़ ली और अपने कुलगुरु देवराज वसिष्ठ से वैसा यज्ञ करने को कहा तो
वसिष्ठ ने साफ इनकार कर दिया और उसे अपने पद से हाथ धोना पड़ा। पर जब इसी
वसिष्ठ ने एक बार यज्ञ में नरबलि का कर्मकाण्ड करना चाहा तो फिर
विश्वामित्र ने उसे रोका और देवराज की काफी थू-थू हुई। इसके बाद जब
वसिष्ठों को वापस हिमालय जाने को मजबूर होना पड़ा तो हैहय राजा कार्तवीर्य
अर्जुन ने उनका आश्रम जला डाला। फिर से वापस लौटे वसिष्ठों में दशरथ और
राम के कुलगुरू वसिष्ठ इतने बड़े ज्ञानी, शांतशील और तपोनिष्ठ साबित हुए
कि उन्होंने परम्परा से उनसे शत्रुता कर रहे विश्वामित्रों पर अखंड
विश्वास कर राम और लक्ष्मण को उनके साथ वन भेज दिया।
उसी परम्परा में एक
मैत्रावरूण वसिष्ठ हुए जिनके 97 सूक्त ऋग्वेद में मिलते हैं, जो ऋग्वेद का
करीब-करीब दसवां हिस्सा है। इतना विराट बौद्धिक योगदान करने वाले कुल में
एक शक्ति वसिष्ठ हुए जिनके पास कामधेनु थी जिसका दुरूपयोग कर अहंकार पालने
का मौका उन्होंने कभी भी नहीं दिया। पर घमंडी विश्वामित्रों को ऐसी गाय न
मिले, इसके लिए अपने पुत्रों का बलिदान देकर भी एक भयानक संघर्ष उन्होंने
विश्वामित्रों के साथ किया।
जो लोग सिर्फ राजाओं के
कारनामों और देशों की लड़ाइयों में ही इतिहास ढूंढ़ने की इतिश्री मान लेते
हैं, उनके लिए वसिष्ठ का भला क्या महत्व हो सकता है? कुछ नहीं, इसलिए हम
भारतीय, सिर्फ हम भारतीय ही समझ सकते हैं कि कितना कठिन काम उन वसिष्ठों
ने किया और कितना नया और विलक्षण योगदान उन्होंने भारत की सभ्यता के विकास
में किया। जाहिर है कि इसका श्रेय उन आद्य वसिष्ठ को जाता है जिन्होंने
राजदंड के ऊपर ब्रह्मदंड का संयम रखने का विचार इस देश को दिया, जिस पर यह
देश आज तक आचरण कर रहा है।
-सूर्यकांत बाली
इसमें शक नहीं कि सप्तर्षि यानी सात ऋषि (सप्त+ऋषि) हमारे दिल और हमारे
दिमाग पर छाए हुए हैं। बचपन में जैसे हम लोगों को चन्द्रमा में नजर आने
वाले काले धब्बे को लेकर कई तरह की कहानियां सुनाई जाती हैं, ध्रुव तारे
को लेकर कई तरह की बातें बताई जाती हैं, वैसे ही सप्तर्षियों के बारे में
भी कई तरह की गौरव-गाथाएं सुनाई जाती हैं।
जहां आकाश में आकाशगंगा नजर
आती है, वहां सप्तर्षियों का वास है, वे तारे जिन्हें सात की संख्या तक
पहुंचाया जाता है, वे ही वहां रहने वाले सात ऋषि हैं, इस तरह की अद्भुत
बातें, कहानियां, गाथाएं सुनकर हमारे देश के बच्चे बड़े होते हैं। जाहिर
है कि हम लोगों के जेहन में सप्तर्षि अमिट तरीके से अंकित हैं और उनके
प्रति हमारे मन में अगर कोई भाव है तो सिर्फ सम्मान का है, श्रद्धा का है।
पर इसमें भी कोई शक नहीं कि
हम नहीं जानते कि ये सात ऋषि हैं कौन और क्यों इनको इस कदर सम्मान का और
श्रद्धा का पात्र बना दिया गया कि सातवें आसमान पर तारों के बीच हमेशा के
लिए, कभी नष्ट न होने के लिए बिठा दिया जाए? इन सात ऋषियों के बारे में
बहुत सी बातें हैं जिन्हें हम अभी एक-एक कर बताएंगे।
पर इनके बारे में सबसे
ज्यादा गड़बड़ परम्परा यह चला दी गई कि ये ब्राह्मण कुलों के प्रवर्तक थे,
और जब ब्राह्मण कुलों के कथित प्रवर्तकों के नाम गिनवाने की बारी आती है
तो ब्राह्मण कहे जाने वाला हर भारतीय सबसे पहले अपने कुल और उसके ठीक या
गलत प्रवर्तक का नाम गिनवा देता है और उसके बाद कोई भी छह मशहूर नाम, मसलन
दुर्वासा का या परशुराम का या मार्कण्डेय का नाम गिनवा देता है।
सामने कोई दूसरा ब्राह्मण
जाति वाला बैठा हुआ हो और उसके कुल प्रवर्तक का, मसलन किसी कश्यप का, या
किसी कौशिक का या किसी पराशर का नाम न गिनवा सका हो तो क्षमायाचना पूर्वक
कह देगा कि फलां-फलां कारणों से आपके कुल प्रवर्तक सप्तर्षियों की गिनती
में नहीं आ पाए।
जिसके प्रति इतना सम्मान हो,
श्रद्धा हो पर उसके बारे में ठीक-ठीक पता न हो, पता लगाने की कोशिश भी अब
बन्द कर दी गई हो, इसका कोई दूसरा उदाहरण कभी मिलेगा तो बताएंगे। पर
फिलहाल इसमें यह बात जोड़नी जरूरी लग रही है कि उन सप्तर्षियों के नामों
के साथ लिबर्टी, यह रिआयत हजारों सालों से ली जा रही है। महाभारत में
सप्तर्षियों की दो नामावलियां मिलती हैं।
एक नामावली में कश्यप,
अत्रि, भरद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और वसिष्ठ के नाम आते हैं तो
दूसरी नामावली में पांच नाम बदल जाते हैं। कश्यप और वसिष्ठ वही रहते हैं
पर बाकी के बदले मरीचि, अंगिरस, पुलस्त्य, पुलह और क्रतु नाम आ जाते हैं।
कुछ पुराणों में कश्यप और मरीचि को एक माना गया है तो कहीं कश्यप और कण्व
को पर्यायवाची माना गया है।
इसके अलावा एक धारणा यह भी
है कि चारों दिशाओं के अलग-अलग सप्तर्षि हैं और इस प्रकार अट्ठाइस
ऋषियों के नाम मिल जाते हैं। बल्कि पुराणों में तो मामला इस हद तक खिंच
गया है कि चौदह मन्वन्तरों के अलग-अलग सप्तर्षि माने गए हैं और यह संख्या
कुल अट्ठानवे तक चली जाती है और वहां भी तुर्रा यह कि नामों में कई बार
बदल हो जाता है। नहुष ने जिन सप्तर्षियों को अपनी पालकी ढोने के काम में
लगाया था उनमें अगस्त्य भी एक थे, जिनके बारे में विवाद लगातार रहा है कि
वे सप्तर्षि हैं या नहीं।
तो कैसे बात बनेगी?
सप्तर्षियों के नामों के बारे में बेशक इस कदर विविधता रही हो, पर जैसे यह
तय है कि हमारे हृदय में उनके प्रति अपार सम्मान और श्रद्धा बसी है वैसे
ही दो बातें और भी तय हैं। एक, कि अपने देश में कोई न कोई वक्त ऐसा था जब
सप्तर्षि शब्द बेशक प्रचलित न हुआ हो पर कोई सात ऋषिकुल ऐसे थे जो शेष
ऋषिकुलों से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण थे और दो, कि ये सात ऋषिकुल ऐसे थे
जिन्होंने देश की सभ्यता के विकास में, विचारों के प्रवाह में, बौद्धिक
योगदान में अपना नाम जरूर कमाया था। तो क्यों न इन्हीं दो तार्किक आधारों
पर अपने सप्तर्षियों के पास पहुंचने की एक उम्दा कोशिश की जाए?
सप्तर्षि शब्द और इसके
आभामण्डल के तले पनपी महनीय सप्तर्षि अवधारणा का विकास महाभारत और खासकर
उस के बाद पुराणों के काल में हुआ तो जाहिर है कि इसका आधारकाल इससे काफी
पहले का रहा होगा। कौन सा रहा होगा? इस सवाल के जवाब में फिर से ऋग्वेद
हमारी सहायता करता है। कभी हमने बताया था कि ऋग्वेद में करीब एक हजार
सूक्त हैं, करीब दस हजार मन्त्र हैं (चारों वेदों में करीब बीस हजार हैं)
और इन मन्त्रों के रचयिता कवियों को हम ऋषि कहते हैं। पर यह नहीं बताया था
कि वे ऋषि कौन थे। आज वह बताने का वक्त है।
बाकी तीन वेदों के मन्त्रों
की तरह ऋग्वेद के मन्त्रों की रचना में भी अनेकानेक ऋषियों का योगदान रहा
है। पर इनमें भी सात ऋषि ऐसे हैं जिनके कुलों में मन्त्र रचयिता ऋषियों की
एक लम्बी परम्परा रही। ऋग्वेद के सूक्त दस मंडलों (कह सकते हैं कि खण्डों)
में संग्रहित हैं और इनमें दो से सात यानी छह मंडल ऐसे हैं जिन्हें हम
परम्परा से वंशमंडल कहते हैं क्योंकि इनमें छह ऋषिकुलों के ऋषियों के
मन्त्र इकट्ठा कर दिए गए हैं। एक बार नाम जान लिए जाएं तो तर्क का सिलसिला
आगे बढ़े। मंडल संख्या दो – गृत्समद वंश या ऋषिकुल, तीन-विश्वामित्र,
चार-वामदेव, पांच-अत्रि, छह-भारद्वाज, सात-वसिष्ठ।
इस तरह छह नाम तो साफ-साफ
मिल जाते हैं। इस नामावली के संदर्भ में दो महत्वपूर्ण सूचनाएं हमारे
पाठकों को पता रहनी चाहिए। एक कि इनमे गृत्समद ऋषि ने अपना गोत्र बदलकर
शौनक कर लिया था और इसलिए आगे अब इन्हें शौनक कहना इतिहास की दृष्टि से
ज्यादा स्वाभाविक रहेगा। दूसरी महत्वपूर्ण सूचना यह है कि इन छह कुलों के
अलावा एक और कुल भी था, कण्वकुल जिसके अनेक ऋषियों ने कई पीढ़ी तक मन्त्र
रचे और वे सभी मन्त्र ऋग्वेद में हैं।
फिर क्यों नहीं वेदव्यास ने
ऋग्वेद के मन्त्रों का संकलन (मौजूदा) तैयार करते समय उनके मन्त्रों को
कण्वकुल का एक पृथक वंशमंडल देने का वैसा गौरव नहीं दिया जैसा शेष छह
कुलों को दिया? जवाब आसान नहीं। अनुमान ही लगाया जा सकता है कि चूंकि
कण्वकुल के अनेक ऋषियों ने अपने मन्त्र कुछ दानदाताओं की प्रशंसा में बना
डाले इसलिए वेदव्यास ने इन्हें पसंद न कर, काव्यकर्म के विरूद्ध मानकर,
पृथक वंशमंडल का गौरव न दिया हो। कण्वों के इस तरह के मन्त्रों को
‘नाराशंसी’ कहते हैं और दाता राजाओं की प्रशंसा में होने के कारण ये मंत्र
पुराने राजाओं के बारे में हमारी जानकारी बढ़ाने में खासी सहायता करते
हैं। पृथक वंशमंडल बेशक न मिला हो, पर कण्वकुल तो है।
तो सात ऋषिकुल सामने आ
गए-वसिष्ठ, विश्वामित्र, कण्व, भारद्वाज, अत्रि, वामदेव और शौनक। इनका
कालक्रम भी करीब-करीब इसी श्रृंखला में है। जिस ग्रंथ का नाम ऋग्वेद है,
जो ग्रन्थ हमारे देश की बौद्धिक प्रखरता का पर्यायवाची और दुनिया भर में
हमारी पहचान का अभूतपूर्व प्रतीक बना हुआ हो और जिसके प्रति विद्वानों का
आकर्षण लगातार बढ़ता जा रहा हो और पढ़ने वालों की मांग बढ़ती जा रही हो,
उस ऋग्वेद के मंत्रों का अधिकतम भाग जिन सात ऋषिकुलों ने पीढ़ी दर पीढ़ी
रचा हो, उन सात कुलों का कितना अद्वितीय सम्मान इस देश के लोगों के बीच
रहा होगा, क्या इसकी कल्पना कर सकते हैं?
कर सकते हैं, इसलिए जाहिर है
कि ये सात ऋषिकुल, ये सात ऋषि हमारी विचार धरोहर के पुरोधा होने के कारण
हमारी स्मृति में अमर हो गए और बाद में कभी व्यावसायिक तो कभी राजनीतिक
कारणों से सप्तर्षियों के नामों में और अवधारणा में फर्क आता गया हो तो
कोई क्या कर सकता है? पर अगर तर्क और इतिहास की सीढ़ी चढेंग़े तो इस
अवधारणा के शिखर पर आप इन्हीं सात ऋषियों को बैठा पाएंगे। इसलिए अचरज नहीं
कि किसी भी सप्तर्षि गणना में इनमें से अधिकांश नाम, कभी चार, कभी पांच तो
कभी छह नाम इन्हीं में से आते हैं और इनमें से हरेक का सप्तर्षित्व आज तक
सुरक्षित है।
फिर इनमें से हर कुल के
प्रवर्तक ने या उसके परवर्ती ने देश की सभ्यता के विकास में अपना अनूठा
योगदान किया है। आद्यवसिष्ठ ने राजसत्ता पर अंकुश का विचार दिया तो
मैत्रावरूण वसिष्ठ ने सरस्वती नदी के किनारे सौ सूक्त एक साथ रचकर नया
इतिहास बनाया जिसका अनुकरण करते भविष्य में किसी से नहीं बना। विश्वामित्र
ने इस देश को ऋचा बनाने की विद्या दी और गायत्री मन्त्र की रचना की जो
भारत के हृदय में और जिह्ना पर हजारों सालों से आज तक अनवरत निवास कर रहा
है।
अत्रि ऋषि ने इस देश में
कृषि के विकास में पृथु और ऋषभ की तरह अद्भुत योगदान दिया था। अत्रि लोग
ही सिन्धु पार कर ईरान (आज का) चले गए थे, जहां उन्होंने यज्ञ का प्रचार
किया। इस देश के सबसे महत्वपूर्ण यज्ञ सोमयज्ञ को कण्वों ने व्यवस्थित
किया तो भरद्वाजों में से एक भरद्वाज विदथ ने दुष्यन्त पुत्र भरत का
उत्तराधिकारी बन राजकाज करते हुए मन्त्र रचना जारी रखी। वामदेव ने इस देश
को सामगान (अर्थात् संगीत) दिया तो शौनक ने दस हजार विद्यार्थियों के
गुरूकुल को चलाकर कुलपति का विलक्षण सम्मान हासिल किया और किसी भी ऋषि ने
ऐसा सम्मान पहली बार हासिल किया।
फिर से बताएं तो वसिष्ठ,
विश्वामित्र, कण्व, भरद्वाज, अत्रि, वामदेव और शौनक-ये हैं वे सात ऋषि,
सप्तर्षि, जिन्होंने इस देश की मेधा को इतना कुछ दे डाला कि कृतज्ञ देश ने
इन्हें आकाश के तारामंडल में बिठाकर एक ऐसा अमरत्व दे दिया कि सप्तर्षि
शब्द सुनते ही हमारा हृदय खुद ब खुद किसी अपूर्व मनोभाव से भर जाता है।
बाद में जो अपने-अपने कारणों
से अपने-अपने नाम जोड़ने की होड़ लगी तो यह सप्तर्षि के महत्व को ही
दिखाता है। पर सप्तर्षि तो सप्तर्षि हैं। हमें उनके नाम तो मालूम रहने ही
चाहिएं, यह भी मालूम रहना चाहिए कि वे सप्तर्षि क्यों हैं। इन्हें भूल
सकते हैं भला?