पौराणिक भगवदभक्तोमें प्रह्लाद अत्यंत सम्मानीय एवं प्रसिद्द रहे है / अपने पिता हिरण्यकश्यप से उनके वैचारिक मत भेद था / हिरन्यकश्यप परम्परागत सनातम धर्म के विरोधी थे /वह ,यज्ञ ,पूजा-पाठ,भगवन्नाम -स्मरण आदि कार्यो के घूर विरोधी थे ;क्योंकि की उनके भाई हिरन्यक्ष को भगवन विष्णु ने मार डाला था;जबकि प्रह्लाद भगवन विष्णु का परम भक्त था / हिरन्यकश्यप ने लम्बे समय तक तपस्या करके ब्रह्माजी से वर प्राप्त कर लिया था की उसके मृत्यु न आकाश में हो ,न धरती पर ;न दिन नि हो ,न रात में;न शस्त्र से हो,न अस्त्र से ;न घर में,न बाहर;न मनुष्य से ,न पशु से /इसलिय वह अपने आप को अमर समझता था/हिरण्यकश्यप के चार पुत्र थे ,जिसमे प्रह्लाद अपने सद्गुणों के कारण श्रेष्ठ थे/प्रह्लाद की माता का नाम कयाधु/जब प्रह्लाद अपनी माता के गर्भ में थे तब एक बार वह हिरण्यकश्यप से छिप कर संतो के सत्संग में रही थी और भगवन नारायण की कथा भी सुनी थी/कहा जाता है इसी कारण प्रह्लाद को भी गर्भ में ही भगवन नारायण के प्रति विशेष श्रद्धा -भक्ति हो गयी और दैत्य कुल में जन्म लेने के बाद भी वह असुरी प्रव्रत्तियो से दूर ही रहे/ जब प्रह्लाद कुछ बड़े हुए तो हिरण्यकश्यप ने उन्हें पढने के लिया गुरु शुक्राचर्य के पास भेजा /शुक्राचर्य दैत्यों के कुलगुरु थे/उनके पाठशाला में अनेक दैत्य -पुत्र पढ़ने के लिया आते थे /वहाँ शुक्राचर्य ने प्रह्लाद की आरंभिक शिक्षा -दीक्षा का दायित्व अपने पुत्र चाँद और अमर्क पर डाल दिया /प्रह्लाद अपने गुरुजनों द्वारा पढाए गए पाठ को बड़े ध्यान से सुनते और याद कर लेते / यह पृष्ठ निर्माणाधीन है. आपको हुई असुविधा के लिए हमें खेद है. हम जल्द इस इस पृष्ठ को संपादित करने की कोशिश करेंगे. पुनः पधारें ! |