भारतीय
चिकित्सा के इतिहास में धन्वंतरि का नाम श्रद्धा और सम्मान के साथ लिया
जाता है। इनको आयुर्वेद का जनक माना जाता है। महर्षि धन्वंतरि को आज भी
चिकित्सा विज्ञान के इष्टदेव के रूप में धनतेरस के दिन पूजा जाता है। इन्होंने ऐसी अमृतमय औषधियों की खोज की जिससे मनुष्यों को रोगों, बुढापे और मृत्यु से बचाया जा सके। वे सभी रोगों के निवारण में निपुण थे। धन्वंतरि ने आयुर्वेद को आठ भागों में विभाजित किया जिसमे शल्य चिकित्सा (सर्जरी) एक प्रमुख विभाग है। इन्होंने सुश्रुत को शल्य चिकित्सा का ज्ञान दिया जो कि विश्व के प्रथम शल्य चिकित्सक के रूप में आज भी प्रसिद्ध हैं। भारतीय संस्कृति में चिकित्सकों को भगवान के समकक्ष दर्जा दिया गया है। पौराणिक मान्यता है कि भगवान धन्वंतरि अमृत कलश के साथ सागर मंथन से उत्पन्न हुए थे। कार्तिक मास में कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी (दीवाली से दो दिन पूर्व) के दिन महर्षि धन्वंतरि का जन्म हुआ था। इस दिन को धनतेरस के रूप में आज भी मनाया जाता है। भगवान धन्वंतरि के अमृत कलश लेकर प्रकट होने की घटना के प्रतीक स्वरूप ही धनतेरस के दिन बर्तन खरीदने की परम्परा की शुरुआत हुई। इनको आयुर्वेद यानी स्वस्थ जीवन प्रदान करने वाले देवता के रूप में भी पूजा जाता है। जैसे धन-संपत्ति की प्राप्ति के लिए देवी लक्ष्मी की उपासना और पूजा करते हैं, उसी प्रकार स्वस्थ जीवन के लिए स्वास्थ्य के देवता धन्वंतरि की पूजा करते हैं। धन्वंतरि चिकित्सा के देवता माने जाते हैं इसलिए चिकित्सकों के लिए धनतेरस का विशेष महत्व है। आयुर्वेद चिकित्सक अपने चिकित्सालय पर धनतेरस के दिन महर्षि धन्वंतरि की विशेष पूजा का आयोजन करते हैं। वैदिक काल में जो महत्व और स्थान अश्विनी कुमारों को प्राप्त था वही पौराणिक काल में धन्वंतरि को प्राप्त हुआ। जहाँ अश्विनी के हाथ में मधुकलश था वहाँ धन्वंतरि को अमृत कलश मिला। क्योंकि विष्णु संसार की रक्षा करते हैं अत: रोगों से रक्षा करने वाले धन्वंतरि को विष्णु का अवतार माना गया। Please send corrections to [ekatmatastotra@gmail.com] {Last updated May 19, 2010} |
