न कोई नारा, न कोई मुद्दा
चुनाव नहीं ये लुटेरों के गिरोहों के बीच की जंग है लोकसभा
चुनाव की महानौटंकी देश में चालू हो गयी है। चुनावी महारथियों की हुंकारें
शुरू हो गयी हैं। एक-दूसरे को चुनावी जंग में धूल चटाने के ऐलान के साथ ही
चुनावी हम्माम में एक-दूसरे को नंगा करने की होड़ भी मची हुई है। जो
चुनावी नज़ारा दिख रहा है, उसमें तमाम जोड़-तोड़, तीन-तिकड़म और सिनेमाई
ग्लैमर की चमक-दमक के बीच यह बात बिल्कुल साफ उभरकर सामने आ रही है कि
किसी भी चुनावी पार्टी के पास जनता को लुभाने के लिए न तो कोई मुद्दा है
और न ही कोई नारा। जु़बानी जमा खर्च और नारे के लिए भी छँटनी, तालाबन्दी,
महँगाई, बेरोज़गारी कोई मुद्दा नहीं है। कांग्रेस बड़ी बेशर्मी के साथ
‘इंडिया शाइनिंग’ की ही तर्ज़ पर ‘जय हो’ का राग अलापने में लगी हुई है,
तो भाजपा उसकी पैरोडी करते हुए यह भूल जा रही है कि पाँच वर्ष पहले वह भी
देश को चमकाने के ऐसे ही दावे कर रही थी। विधानसभा चुनावों में आतंकवाद के
मुद्दा न बन पाने के कारण भाजपा न तो उसे ज़ोरशोर से उठा पा रही है और न ही
छोड़ पा रही है। वरुण गाँधी के ज़हरीले भाषण का पहले तो उसने विरोध किया और
फिर वोटों के ध्रुवीकरण के लालच में उसे भुनाने में जुट गयी। ........आगे पढ़ें
आर्थिक संकट का सारा बोझ मज़दूरों पर -- देश भर में हो रही है मज़दूरों की छँटनीविश्वव्यापी
आर्थिक संकट की लपटें पूरे भारत में तेज़ी से फैल रही हैं और सबसे ज्यादा
मज़दूरों को अपनी चपेट में ले रही हैं। अन्तहीन मुनाफाखोरी की हवस में पागल
पूँजीपतियों द्वारा मेहनतकश जनता की बेरहम लूट और बेहिसाब उत्पादन से पैदा
हुए इस संकट की मार मेहनतकश जनता को ही झेलनी पड़ रही है। सरकार के श्रम
विभाग के सर्वेक्षण की रिपोर्ट के अनुसार पिछले वर्ष के अन्तिम तीन महीनों
में 5 लाख से अधिक मज़दूरों की छँटनी की जा चुकी थी। यह एक प्रकार की नमूना
रिपोर्ट थी, जिससे मेहनतकशों पर पड़ने वाले छँटनी-तालाबन्दी के भयावह असर
का केवल अनुमान ही लगाया जा सकता है। ........आगे पढ़ें दिल्ली मेट्रो प्रबंधन के खिलाफ एकजुट हो रहे हैं सफाईकर्मी
- मेट्रो कामगार संघर्ष समिति के नेतृत्व में धरना
मेट्रो भवन का गेट जाम कियासफाईकर्मियों को धमका रहे हैं ठेकेदार
दिल्ली
मेट्रो के सफाईकर्मियों ने मेट्रो प्रशासन के दमन-उत्पीड़न के ख़िलाफ आवाज़
बुलन्द करने की शुरुआत कर दी है। 25 मार्च को मेट्रो कामगार संघर्ष समिति
के नेतृत्व में न्यूनतम मज़दूरी, साप्ताहिक छुट्टी, ई.एस.आई., पी.एफ. जैसे
बुनियादी कानूनी अधिकारों के लिए मेट्रो सफाईकर्मियों ने मेट्रो भवन पर
चेतावनी प्रदर्शन किया। पूरा दिल्ली मेट्रो मज़दूरों के ख़ून-पसीने और
हड्डियों की नींव पर खड़ा किया गया है लेकिन इसके बदले में मज़दूरों को
न्यूनतम मज़दूरी, साप्ताहिक छुट्टी, पी.एफ, ई.एस.आई. और यूनियन बनाने के
अधिकार जैसे बुनियादी अधिकारों से भी वंचित रखा गया है। श्रम कानूनों की
खुलेआम धज्जियाँ उड़ायी जाती हैं। हालाँकि मेट्रो स्टेशनों और डिपो के बाहर
मेट्रो प्रशासन ने एक बोर्ड ज़रूर लटका दिया है कि ‘यहाँ सभी श्रम कानून
लागू किये जाते हैं’। चाहे मेट्रो में काम करने वाले सफाई मज़दूर हों या
फिर निर्माण मज़दूर, सभी से जानवरों की तरह हाड़तोड़ काम लिया जाता है और
उन्हें कई बार साप्ताहिक छुट्टी तक नहीं दी जाती है। पी.एफ या ई.एस.आई. की
सुविधा तो बहुत दूर की बात है। ऊपर से यदि कोई मज़दूर इसके खिलाफ आवाज़
उठाता है तो उसे तरह-तरह से प्रताड़ित किया जाता है या फिर उसे निकालकर
बाहर ही फेंक दिया जाता है।........आगे पढ़ें नरेगा : सरकारी दावों की ज़मीनी हकीकत -- एक रिपोर्ट
देहाती
मज़दूर यूनियन और नौजवान भारत सभा द्वारा मर्यादपुर इलाके में नरेगा के तहत
जारी भ्रष्टाचार और घोटाले का भण्डाफोड़ करती रिपोर्ट राष्ट्रीय
ग्रामीण रोज़गार गारण्टी योजना (नरेगा) को सत्तारूढ़ यूपीए गठबंधन की सबसे
बड़ी उपलब्धि बताया जा रहा है। इसे इस रूप में पेश किया जा रहा है जैसे कुछ
भ्रष्टाचार और धाँधलियों के बावजूद यह एक क्रान्तिकारी परिवर्तन लाने वाली
योजना है। लेकिन ज़मीनी हकीकत इसके एकदम उलट है। पूर्वी उत्तर प्रदेश के एक
अतिपिछड़े इलाके मर्यादपुर में किये गये देहाती मज़दूर यूनियन और नौजवान
भारत सभा द्वारा हाल ही में किये गये एक सर्वेक्षण से यह बात साबित होती
है कि नरेगा के तहत कराये गये और दिखाये गये कामों में भ्रष्टाचार इतने
नंगे तरीके से और इतने बड़े पैमाने पर किया जा रहा है कि यह पूरी योजना
गाँव के सम्पन्न और प्रभुत्वशाली तबकों की जेब गर्म करने का एक और ज़रियाभर
बनकर रह गयी है। साथ ही यह बात भी ज्यादा साफ हो जाती है कि पूँजीवाद अपनी
मजबूरियों से गाँव के गरीबों को भरमाने के लिए थोड़ी राहत देकर उनके गुस्से
पर पानी के छींटे मारने की कोशिश जरूर करता है लेकिन आखिरकार उसकी इच्छा
से परे यह कोशिश भी गरीबों को गोलबंद होने से रोक नहीं पाती है। बल्कि इस
क्रम में आम लोग व्यवस्था के गरीब-विरोधी और अन्यायपूर्ण चेहरे को ज्यादा
नजदीक से समझने लगते हैं और इन कल्याणकारी योजनाओं के अधिकारों को पाने की
लड़ाई उनकी वर्गचेतना की पहली मंजिल बन जाती है। ........आगे पढ़ें
भगतसिंह के शहादत दिवस पर पोस्टर प्रदर्शनी -- क्रान्तिकारियों के अधूरे सपनों को पूरा करने का संकल्प
मंदी के विरोध में दुनियाभर में फैलता जनआक्रोश -- इतिहास फिर करवट बदल रहा है
अक्टूबर
2008 के पहले हफ्ते से विश्व पूँजीवाद के बुरे दिनों की नई शुरुआत हुई।
तभी से पूँजीवाद के भाग्य पर राहू-केतू मँडराने लगे। अब शनि देव भी रूठ
गये लगते हैं। बहुत यज्ञ हो लिये। सारे मंत्र पढ़े जा चुके हैं। लेकिन बुरे
ग्रहों से इसका पीछा छूट ही नहीं रहा है। भविष्य में क्या होने वाला है?
सही-सही कोई नहीं बता सकता। लेकिन जो हो रहा है वो पूँजीवाद के लिए अशुभ
है। पूँजीवाद के कलमघसीटों ने ‘इतिहास के अन्त’ का ऐलान किया था। फुकोयामा
जैसे पूंजीवादी बौद्धिक पहलवानों ने ठोंक-बजाकर कहा था कि पूँजीवादी
अर्थव्यवस्था और पूँजीवादी लोकतांत्रिक संसदीय प्रणाली सबसे बेहतर है। कहा
गया था कि इनका कोई विकल्प नहीं है। लेकिन अब वे थूककर चाट रहे हैं।
इतिहास के अन्त की बातें करने वाले फुकोयामा अब मान रहे हैं कि पूँजीवादी
व्यवस्था के अन्तरविरोध गंभीर हैं। ‘इतिहास के अन्त’ का अन्त हो चुका है।
इतिहास फिर से करवट बदल रहा है। इसके साथ ही अति-साम्राज्यवाद, उत्तर
संरचनावाद, नव-उदारीकरण जैसे राग अलापने वालों के गले खराब हैं।
विश्वव्यापी आर्थिक संकट के विस्फोट ने ही ऐसे सभी सिद्धांतों को धज्जियाँ
उड़ा दीं।........आगे पढ़ें जनवादी जनतन्त्र : पूँजीवाद के लिए सबसे अच्छा राजनीतिक खोल ध-दौलत
की सार्विक सत्ता जनवादी जनतन्त्र में ज़्यादा यकीनी इसलिए भी होती है कि
वह राजनीतिक मशीनरी की अलग-अलग कर्मियों, पूँजीवाद के निकम्मे राजनीतिक
खोल पर निर्भर नहीं होती। जनवादी जनतन्त्र पूँजीवाद के लिए श्रेष्ठतर
सम्भव राजनीतिक खोल है और इसलिए (पालचीन्स्की, चेर्नोव, त्सेरेतेली और
मण्डली की मदद से) इस श्रेष्ठतम खोल पर अधिकार करके पूँजी अपनी सत्ता को
इतने विश्वसनीय ढंग से, इतने यकीनी तौर से जमा लेती है कि बुर्जुआ-जनवादी
जनतन्त्र में व्यक्तियों, संस्थाओं या पार्टियों की कोई भी अदला-बदली उस
सत्ता को नहीं हिला सकती। हमें यह भी नोट करना चाहिए कि एंगेलस सार्विक
मताधिकार को भी पूर्ण स्पष्टता के साथ बुर्जुआ वर्ग के प्रभुत्व का अस्त्र
कहते है।........आगे पढ़ें
लेनिन के जन्मदिवस (22 अप्रैल) के अवसर पर
सुब्बोत्निक पर लेनिन 1
मई 1920 को रूसी कम्युनिस्ट पार्टी (बोल्शेविक) की केन्द्रीय समिति ने
राष्ट्रव्यापी सुब्बोत्निक संगठित किया। उस दिन सर्वत्र देश में लोगों ने
सुब्बोत्निक पर काम किया। फौजी रंगरूट और मैं भी -- यह क्रेमलिन में था --
क्रेमलिन चैक में कुछ काम करने के लिए गये। उस समय क्रेमलिन चैक अंशतः
तरह-तरह के कूड़े-करकट और निर्माण-सामग्रियों से भरा हुआ था तथा इससे
सामान्य फौजी ट्रेनिंग में बाधा पड़ती थी।कोर्स-कमिसार के रूप में मैं दायें बाजू था। तभी क्रेमलिन कमाण्डेण्ट मेरे पास आये और कहा :''साथी लेनिन सुब्बोत्निक में हिस्सा लेने के लिए आये हैं।''मैंने इल्यीच को देखा। वह पुराने सूट और जूतों में हमसे कुछ कदम दूर खडे़ आदेश की प्रतीक्षा कर रहे थे।मैंने
उन्हें सुझाव दिया कि वरिष्ठ साथी के रूप में उन्हें हमारे साथ मेरे दायें
खड़ा होना चाहिए। उन्होंने अपना स्थान बड़ी फुर्ती से जल्दी-जल्दी यह कहते
हुए ग्रहण कर लिया :''बस बता दीजिये कि मुझे क्या करना है।''सुब्बोत्निक के संचालक ने आदेश दिया :''दायें -- घूम!''हमें जो काम करना था, उसकी ओर बढ़े। हमें दो-दो की जोड़ियों में काम करना था और इस प्रकार व्लादीमिर इल्यीच और मैं लट्ठे ढोने लगे। ........आगे पढ़ें चीन के राजकीय उपक्रम भ्रष्ट, मजदूर त्रस्त और युवा बेरोज़गार एक राजकीय उपक्रम के मज़दूरों द्वारा चीन की कथित कम्युनिस्ट पार्टी को लिखा पत्र
चीन
में पूंजीवाद की पुनर्स्थापना के बाद मजदूरों-किसानों के अधिकार-सुविधएं
छीनने की जो प्रक्रिया शुरू हुई थी, वह अब चरम पर पहुंच चुकी है।
‘‘सुधरों'' से पहले के चीन का उजाला तबाही-बर्बादी के बादलों से ढँक गया
है और वहां दुखों और शोषण का अँधेरा व्याप्त है। 1980 के बाद शुरू हुए
सुधारों के बाद राज्य के स्वामित्व वाले अधिकांश उपक्रमों को या तो बेच
दिया गया है या उन्हें मुट्ठीभर धनिकों के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है।
इन उपक्रमों को अपने खून-पसीने से तैयार करने वाले मजदूरों की स्थिति
दयनीय है। उनमें से अधिकांश की छँटनी कर दी गई है और बाकी से ठेके पर काम
लिया जा रहा है, उन्हें किसी प्रकार की सुरक्षा की गारण्टी नहीं प्राप्त
है। यहाँ हम राज्य के स्वामित्व वाले एक उपक्रम के मजदूर प्रतिनिधि द्वारा कम्युनिस्ट नामधारी संशोधनवादी पार्टी को लिखे गए पत्र के
सम्पादित अंश प्रस्तुत कर रहे हैं। अनेक लेखकों के विवरणों से यह समझना
कठिन नहीं है कि पूरे चीन के राजकीय उपक्रमों की स्थिति कमोबेश इस पत्र
में बयान की गई स्थितियों जैसी ही है। साथ ही आर्थिक मंदी से प्रभावित
चीन की ‘‘चमत्कारी’’ अर्थव्यवस्था पर नज़र डालने से भी वहां वर्गों के तीखे
होते संघर्ष, मजदूरों-किसानों-नौजवानों की स्थितियां, बेरोजगारी की बढ़ती
दर और बढ़ते सामाजिक असंतोष का भी अंदाजा लगता है। -- सम्पादक चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव हू जिनताओ और पार्टी की 17वीं कांग्रेस के अध्यक्ष मंडल और उसकी कांग्रेस के सदस्यों के नाम ...चीन
की कम्युनिस्ट पार्टी की 17वीं कांग्रेस में चीन की जनता की समस्याओं को
सुलझाने के लिए लोकतांत्रिक, न्यायपूर्ण और समान तरीके अपनाने की बात की
गई। लेकिन हमारी फैक्ट्री में न तो लोकतंत्र है न समानता और न ही न्याय।
‘‘सुधारों’’ की शुरुआत के साथ ही हमारी फैक्ट्री के नेताओं ने जनता की
सामूहिक संपत्ति का दुरुपयोग किया है और मजदूरों के हितों को गंभीर क्षति
पहुंचाई है। हमने उनके खिलाफ कठोर संघर्ष किया लेकिन सरकार के उच्च
अधिकारियों से कोई समर्थन या मदद नहीं मिली। राजकीय विभाग में भ्रष्टाचार
के आरोपों को देखने वाला ब्यूरो भी हमारे मामले को लंबे समय तक टालता रहा,
और हाल ही में इस भ्रष्टाचार की जानकारी देने के लिए बीजिंग जाने वाले
हमारे प्रतिनिधियों पर हमले का सहारा लिया। अब मैं अपनी स्थिति का
विस्तारपूवर्क बयान करूंगा : ........आगे पढ़ें नताशा : एक महिला बोल्शेविक संगठनकर्ता एक संक्षिप्त जीवनी (चौथी किश्त)
रूस
की अक्टूबर क्रान्ति के लिए मज़दूरों को संगठित, शिक्षित और प्रशिक्षित
करने के लिए हज़ारों बोल्शेविक कार्यकर्ताओं ने बरसों तक बेहद कठिन हालात
में, ज़बरदस्त कुर्बानियों से भरा जीवन जीते हुए काम किया। उनमें बहुत
बड़ी संख्या में महिला बोल्शेविक कार्यकर्ता भी थीं। ऐसी ही एक बोल्शेविक
मज़दूर संगठनकर्ता थीं नताशा समोइलोवा जो आखि़री साँस तक मज़दूरों के बीच
काम करती रहीं। इस अंक से हम ‘बिगुल’ के पाठकों के लिए उनकी एक संक्षिप्त
जीवनी का धारावाहिक प्रकाशन कर रहे हैं। हमें विश्वास है कि आम मज़दूरों और
मज़दूर कार्यकर्ताओं को इससे बहुत कुछ सीखने को मिलेगा। -- सम्पादक
महिला मज़दूरों के बीच काम और अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस के आयोजन की तैयारीमहिला
मजदूरों के साथ विशेष रूप से नताशा ने संगठनकर्ता का उत्कृष्ट गुण
प्रदर्शित किया। उन्होंने रूस में पहले अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस समारोह
के आयोजन में अग्रणी भूमिका निभायी। यह रोचक तथ्य है कि नताशा के प्रावदा
से जुड़ने के बाद अखबार के दफ्तर में औरतों की आवाजाही बढ़ गयी थी। दफ्तर
के अपने छोटे-से कमरे में बैठ कर वह मेहनतकशों के आम आन्दोलन से औरतों को
जोड़ने की योजनाएँ बनाती रहती थीं।रूस
की कामकाजी औरतों को अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस की जानकारी 1913 में मिली
और उस दिन से कमोबेश नियमित रूप से इसका आयोजन शुरू हुआ। कामकाजी औरतों ने
दुनिया भर की अपनी जैसी दूसरी कामरेडों के साथ हमदर्दी महसूस की। उन्होंने
यह समझना शुरू किया कि गरीबी और किल्लत से औरतों को तभी छुटकारा मिल सकता
था जब मेहनतकश वर्ग पूँजीपति वर्ग के खिलाफ अपने संघर्ष को निर्णायक जीत
के मुकाम पर पहुँचाये। बहरहाल, हमें आन्दोलन पर हावी रहने के लिए
मेंशेविकों से लड़ना था क्योंकि वे उसे पूँजीवादी पार्टियों के वर्चस्व के
आधीन करने की कोशिश कर रहे थे। ........आगे पढ़ें राहुल सांकृत्यायन के जन्मतिथि (9 अप्रैल) और पुण्यतिथि (14 अप्रैल) के अवसर पर
ग़रीब किसानों और मज़दूरों के ‘राहुल बाबा’ राहुल
सांकृत्यायन, जिन्हें ग़रीब किसान और मज़दूर प्यार से राहुल बाबा बुलाते थे,
एक चोटी के विद्वान, कई भाषाओं और विषयों के अद्भुत जानकार थे, चाहते तो
आराम से रहते हुए बड़ी-बड़ी पोथियाँ लिखकर शोहरत और दौलत दोनों कमा सकते थे
परन्तु वे एक सच्चे कर्मयोद्धा थे। उन्होंने आम जन, ग़रीब किसान, मज़दूर की
दुर्दशा और उनके मुक्ति के विचार को समझा। उनके बीच रहते हुए उन्हें जागृत
करने का काम किया और संघर्षों में उनके साथ रहे। वे वास्तव में जनता के
अपने आदमी थे।उन
तमाम लेखकों व बुद्धिजीवियों से अलग जो अपने ए.सी. कमरे में बैठकर दुनिया और
उसमें घटनेवाली घटनाओं की तटस्थ व्याख्या करते हैं, जनता की दुर्दशा की और
सामाजिक बदलाव की बस बड़ी-बड़ी बातें करते हैं या पद-ओहदा-पुरस्कार की दौड़
में लगे रहते हैं, राहुल ने अपनी प्रतिभा का इस्तेमाल समाज को बदलने के लिए
जनता को जगाने में किया। इसके लिए उन्होंने सीधी-सरल भाषा में न केवल
अनेक छोटी-छोटी पुस्तकें और सैकड़ों लेखे लिखे, बल्कि लोगों के बीच
घूम-घूमकर ग़ुलामी और अन्याय के खि़लाफ संघर्ष के लिए उन्हें संगठित
भी किया। ........आगे पढ़ें स्लमडॉग मिलेनायर -- झुग्गीवालों की कहानी पर कोठीवाले मस्त! या इलाही ये माजरा क्या है? ‘स्लमडॉग
मिलेनायर’ फिल्म को दुनियाभर के पूँजीवादी मीडिया ने हाथोंहाथ लिया। जिस
फिल्म को कुछ महीने पहले किसी देश में कोई वितरक दिखाने को तैयार नहीं था
और केवल डीवीडी पर रिलीज़ करने की तैयारी थी, अचानक उस पर इनामों की बारिश
होने लगी। जो झुग्गियाँ खाते-पीते मध्यवर्ग और ऊँचे तबके के लोगों के शहर
पर बदनुमा दाग़ जैसी लगती हैं, जिन पर बुलडोज़र चलवाकर उनमें रहने वाले
मेहनतकश लोगों को शहरों के बाहरी सिरे पर धकेला जा रहा है, वे अचानक इतनी
प्रिय कैसे हो गयीं कि सारे टीवी चैनल और अखबार झुग्गीवालों की इस कहानी
पर फिदा हो गये?
अगर
इस
फिल्म के सन्देश को देखा जाये और दुनिया के हालात पर एक नज़र डाली
जाये, तो झुग्गीवालों पर उमड़ते पूँजीवादी दुनिया के इस प्यार को समझना
कठिन नहीं होगा। फिल्म
यह सन्देश देती है कि भयंकर बदहाली, अत्याचार, नारकीय हालात में रहते हुए
भी ग़रीबों को इस व्यवस्था के भीतर ही अमीर बन जाने का सपना देखना नहीं
छोड़ना चाहिए। रोज़-रोज़ शोषण, अभाव और अपमान की ज़िन्दगी जीते हुए भी उन्हें
यह उम्मीद पाले रखनी चाहिए कि एक न दिन इसी व्यवस्था के भीतर उनकी किस्मत
का ताला खुल जायेगा और उनके दुख-दर्द दूर हो जायेंगे। फिल्म दिखाती है कि
एक झुग्गी में रहने वाला बच्चा टीवी शो ‘कौन बनेगा करोड़पति’ में जीतकर
करोड़पति बन जाता है। ढेरों अतार्किक परिस्थितियों और ग़लत तथ्यों से भरी यह
फिल्म कला के नज़रिये से भी बेहद लचर है। झुग्गियों की ज़िन्दगी को इससे
बेहतर ढंग से तो कई बॉलीवुड की फिल्में दिखा चुकी हैं। ........आगे पढ़ें
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