हम सब कभी वहीं थे... अब भी नहीं भूले हैं अपना-अपना मोहल्ला...
स्टार न्यूज़ पर हमला और केसरिया बाना
यह अच्छी बात है कि वे लोग भी स्टार न्यूज़ के दफ्तर पर हमला करने वाले प्रतिक्रियावादियों का समर्थन नहीं कर रहे, जो आरएसएस और इससे प्राणतत्व लेने वाले संगठनों में विश्वास करते हैं। अचानक इन्हें लगने लगा कि कोई हिंदुत्व का मुखौटा पहन कर सड़कों पर उतर आया है, और वे डर गये कि कहीं हिंदुत्व की छवि पर कोई आंच न आये। इसलिए सबसे तेज़ तरीके से भर्त्सना चिट्ठा लेकर मैदान में उतर आये। हमलावरों के केसरिया रंग के इस्तेमाल से भी उबकाई महसूस होने लगी। लेकिन मज़ेदार बात ये है कि इंटरनेटीय पांचजन्य ने इस पर कलम चलाना भी मुनासिब नहीं समझा। बहरहाल, हम उन सामाजिक चिंतकों के लिंक्स दे रहे हैं जिन्होंने इस मुद्दे पर कलम चलायी।
तो अब ये निकले हैं हिन्दू धर्म को बचाने!
सृजन शिल्पी
अतिवादी नवोदित हिन्दू संगठन ने इस तरह की हिंसक वारदात करके इस बात पर आपत्ति जताने की कोशिश की है कि एक हिन्दू लड़की, जो नाबालिग भी है, की किसी मुस्लिम युवक से शादी के मामले में मीडिया अनुचित रूप से समर्थन कर रहा है। हालांकि इस संगठन के कार्यकर्ताओं की करतूतों से ही जाहिर है कि यह कार्रवाई उन्होंने प्रचार पाने और अचानक मशहूर होने के लिए की है। वे सोचते हैं कि मीडिया का नकारात्मक प्रचार भी शायद उन्हें फायदा ही पहुंचाएगा। क्योंकि वे इससे पहले इसी तरह के हथकंडों से कुछ उग्र राजनीतिक संगठनों को सफल होते देख चुके हैं। वे समझते हैं कि जनता बेवकूफ है और उनमें से हिन्दू तो खास तौर से बेवकूफ हैं जो अपने धर्म पर मंडरा रहे खतरे से बचाने का ठेका उनके ही बहादुर कंधों पर डाल देंगे! पूरा यहां पढ़ें
लोकतंत्र पर हमला
संजय बेंगाणी
हिन्दू राष्ट्र सेना का नाम सुना है कभी? नहीं ना। बस इसी लिए रातो रात नाम कमाने के लिए ही दिन दहाडे स्टार न्यूज के स्टूडियो में तोड़-फोड़ की गयी। अब हर तरफ इसी संगठन का चर्चा है। बदनाम हुए तो क्या, नाम तो हुआ। और यह हिन्दू शब्द क्यों लगाया है भई अपने गुंडई संगठन के नाम के आगे? क्या हिन्दू या मुस्लिम शब्द अभयदान के प्रयाय है? पूरा यहां पढ़ें
अब इसके बाद मोहल्ला में स्टार न्यूज़ से जुड़े भव्य श्रीवास्तव ने भावुक होते हुए जो कुछ भी लिखा, उसके इंट्रो में हमने हमलावरों की प्रेरणा का स्रोत बाल ठाकरे, बाबू बजरंगी और सिंघल-तोगड़िया को बताया। साथ ही ये भी बताया कि बाज़ारू मीडिया भी कई बार ऐसे लोगों को अपने हित में पालता-पोसता और उछालता-गिराता है। ज़ाहिर है, मोहल्ले के वाक्यों से जिनके माथे पर बल पड़ते हैं, पड़े। लेकिन उन्होंने मोहल्ले की गलियों में अपने अक्षत न डालने का प्रण किया हुआ है, इसलिए टहल तो जाते हैं, लेकिन चरण धूलि के कण तक गिरने नहीं देते। जाकर अपने ब्लॉग पर इशारों-इशारों में बात करते हैं। भव्य श्रीवास्तव की टिप्पणी के आलोक में संजय बेंगाणी की यह टिप्पणी कुछ ऐसी ही है।
हम में है दम मगर दिखा तो नहीं…
संजय बेंगाणी
इनमें है दम, मगर कोई विरोध करने सामने नहीं आया। अरे पुलिस को तो फोन करते या फोन लाइने काट कर गुण्डे अन्दर आये थे? दम इस बात में रहा होगा की घण्टो दिखाने का मसाला बैठे बिठाए मिल रहा था। समाज का मसीहा दिखने का मौका भी हाथ में आ गया था, तो चलने दी तोड़ फोड़। भला हो गुण्डो का जो केसरीया झण्डे लिये उधम मचायी। लगे हाथ संध-शाखा और हिन्दुत्व के हिमायतीयों पर जहर उगलने का अवसर भी मिल गया। क्या बात है! हर ऐरा-गैरा केसरीया झण्डा उठाएगा और उसका सम्बन्ध सीधे संघीयों से… शाबास। पूरा यहां पढ़ें
मोहल्ले में इस बात की चर्चा बार-बार होती रही है कि कुछ रंग ऐसे हैं, जिनकी चादर ओढ़ कर इस मुल्क के सारे अनैतिक कामों को अंजाम दिया जा सकता है। कुछ नारा-जनित नैतिकताएं ऐसी हैं, जिनकी दुहाई देकर किसी की हत्या भी कर दी जा सकती है- जैसा कि गुजरात दंगे में हमने देखा। स्टार न्यूज़ पर हमले के प्रकरण में हिंदूवादी कितना भी पल्ला झाड़ें, लेकिन उन्हें इस बात पर सोचना होगा कि किसी को केसरिया चादर ओढ़ लेने भर से ऐसे कारनामों के लिए साहस कहां से मिल जाता है!