9
कोल्हू के बैल 11/01/07
कोल्हू के बैल 11/01/07
कोल्हू के बैल अभी धुँधलका है पगडंडी पर बिछी ओस बिखराते चतुष्पद फ़िर चले एक वृत्त रचने- पुटठों पर लदा बोझ , आदत- वलक्ष काया पर लिखी कोड़े की फ़ितरत पगहे से रिसता जूट का स्वाद त्वचा में चुभतीं पसलियाँ फ़िर भी- अप्रतिहत, अनवरत चलते पाँव- सर्वविदित, तथ्य, कोल्हू ऐसे ही चलता है बूँद भर तेल बनाने को पाव भर खून जलता है लिप्सा का एक केन्द्र त्रिज्या में बँधे- अन्यथा कूष्माण्ड, परिधि पर लिखते रह्ते स्वेद का व्यक्तित्त्व- कोल्हू ऐसे ही तो चलता है!! दिनात्यय पर, गिनता है कोई परिधि बनाते बिंदुओं को ? मृत्तिका पर लिखी- डंडे की चोट पर भागती- पशु-प्रवृत्ति बेमानी है, असल बात तो यह है कि एक पसेरी तेल निकला। वृत्त फिर भी चलता है- और पास ही खड़ा डंडे मारता आदमी समझता है - वह नहीं बँधा कोल्हू में । -आलोक शंकर |
Thank you for Visiting!