मेरी आवाज ही पहचान है : पंचम दा पर विशेष, (दूसरा भाग) (हिंद युग्म : आवाज पर प्रकाशित )
पंचम बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे | उन्होंने एकाध बार ऐक्टिंग में भी हाथ आजमाए | महमूद की फ़िल्म "भूत बंगला" में उन्होंने पहली बार अदाकारी की और बाद में फ़िल्म "प्यार का मौसम" में पोपट लाल के चरित्र में भी सबको लुभाया | कई गानों में उन्होंने ख़ुद माउथ ओरगन बजाया,और एकाध बार लक्ष्मीकांत प्यारेलाल (याद कीजिये दोस्ती के गीत) और कल्यानजी -आनंदजी के लिए भी बजाया | और गायक के रूप में तो हम उनको उतना ही प्यार करते हैं जितना कि संगीतकार के रूप में |फ़िल्म शोले का गीत 'महबूबा महबूबा' हो या फ़िर 'पिया तू अब तो आजा';पंचम दा के सारे गाये गीत अनूठे हैं |मजरूह सुलतानपुरी के अनुसार "आर डी बर्मन एक युग था, अपने आप में एक स्कूल था,जो उसने ख़ुद शुरू किया,और उसने इसे जिस स्तर पर रखा, वह स्तर अपने साथ ही लेकर गया, और वह स्तर मेरे ख्याल में दुबारा आना आसान नहीं है" | पंचम की आवाज़ में सुनिए और डूब जाईये -"धन्नो की आँखों में..."- पंचम पर और बातें, अगली बार.... प्रस्तुति - अलोक शंकर इस मोड़ से जाते हैं, कुछ सुस्त कदम रस्ते,: पंचम दा पर विशेष ( हिंद युग्म: आवाज पर प्रकाशित )
संतगुरु रविदास [हिन्दी साहित्य का इतिहास] - आलोक शंकर
साहित्य शिल्पी पर प्रकाशित ज्ञानाश्रयी
शाखा में सन्त कबीर के बाद सन्त रविदास या रैदास का नाम उल्लेखनीय है|
कबीर के गुरु रामानन्द जी के बारह शिष्य थे, उनमें से एक थे रैदास या
रविदास (ये रामदास ,गुरु रविदास आदि नामों से भी प्रचलित थे)| इनका जन्म
1376 मे काशी में हुआ था| रैदास कबीर के बाद रामानंद जी के शिष्य हुए, ऐसा
उनकी इस रचना से जान पड़ता है, जिसमें उन्होंने कबीर का जिक्र किया है: |

हिन्दी
फ़िल्म संगीत के इतिहास में अगर किसी संगीत निर्देशक को सबसे ज्यादा प्यार
मिला, तो वह निस्संदेह आर डी वर्मन,या पंचम दा हैं |सचिन देव वर्मन जैसे
बड़े और महान निर्देशक के पुत्र होने के बावजूद पंचम दा ने अपनी अलग और
अमिट पहचान बनाई |कहते हैं न,पूत के पाँव पालने में ही दिख जाते हैं,जब
इनका जन्म हुआ था,तब अभिनेता स्व अशोक कुमार ने देखा कि नवजात आर डी बार
बार पाँचवा स्वर "पा" दुहरा रहे हैं,तभी उन्होने इनका नाम रख दिया "पंचम
"|आज भी वे बहुत सारे लोगों के लिये सिर्फ़ पंचम दा हैं| सिर्फ़ नौ बरस की
उम्र में उन्होंने अपना पहला गीत "ऐ मेरी टोपी पलट के" बना लिया था,जिसे
उनके पिता ने "फ़ंटूश" मे लिया भी था| काफ़ी कम उम्र में पंचम दा ने "सर
जो तेरा चकराये …" की धुन तैयार कर ली जिसे गुरुदत्त की फ़िल्म "प्यासा"
मे लिया गया | आगे जाकर जब आर डी संगीत बनाने लगे,तो उनकी शैली अपने पिता
से काफ़ी अलग थी, और इस बात को लेकर दोनों का नजरिया अलग था । आर डी
हिन्दुस्तानी के साथ पाश्चात्य संगीत का भी मिश्रण करते थे,जो सचिन देव
वर्मन साहब को रास नहीं आता था, इस बात पर एक बार मशहूर गीतकार मजरुह
सुल्तानपुरी साहब ने इन्हें समझाया तो पंचम बोले : "देखिये अंकल,बाबा बहुत
बड़े म्यूजिक डायरेक्टर हैं,उनसे मैने बहुत कुछ सीखा है और सीखूँगा,लेकिन
मैं उनकी राह पर नहीं चलूँगा । मैं अपना रास्ता कुछ अलग निकालूंगा ।" और
पंचम दा ने अपनी बात सच साबित कर दिखाई ।