Alok Shankar       



This page contains the hindi poems written by me 

    आत्मा के सौन्दर्य का शब्दरूप है काव्य                                                                                         मानव होना भाग्य है, कवि होना सौभाग्य                                                                                             -- 'नीरज'                         

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23-09-07_1606.mp3  विविध भारती रेडियो पर हिन्द युग्म की चर्चा और मेरी कविता की पंक्तियाँ

                         " ऐ खुदा सूरज़ छुपा ले अपने दामन के तले ,

                           आँख पर उसकी चमकने आज़ एक दीपक ज़ला है।"           

                      

                                                                                                                        "कौन कहता है हवा पर पाँव रख सकते नहीं,
                                                    आसमाँ छूने का ये शायद कोई अंदाज़ हो।"

"सपनों की छाती में लेती
हो अगर उड़ानें अँगड़ाई,
तो रोक नहीं सकती उसको ,
पर्वत की कोई ऊँचाई ।"

                                           मेरी कविताओं से                           " शंका से तो मनुज़ सहमकर ही जीता है

                                                कुछ                                      जला दूध का छाछ फूँककर ही पीता है।

                                               पंक्तियाँ                                    चिंता नहीं हमारा कुछ भी ले पाती है,

                                                                                          अन्तर में पीड़ा दुस्सह तो दे जाती है;"

 जब जीवनदायी रोता है,

संसार सुखी कब होता है?               

                                                                                 
                                                                            जो भी ज्वाला में जलकर द्युति देता , उसकी जय हो
                                                                            उसे नमन, जो खड्ग फ़ेंकता, धरा ताकि सुखमय हो ।
                    एक दीप के बुझ जाने से तारे नहीं खत्म होते हैं
                    थोड़ा पंखों के जलने से , सपने नहीं भस्म होते हैं

                                                                                


अन्य  कवितायें  

धरती और आसमान  

 मैं तुम्हारा मृदु चितेरा !

अपने अपने खण्डहर 

आँख है यदि नम हमारी 

बचपन और

 जीवन  

  मैं ,चाँद !

तुम होते तो …

कवि रे, कर अब निर्मम गान 

दोष बस मेरा नहीं है ।  

 कश्मीर

 ख्वाहिश 

 निठारी पर-

एक कहानी

कोल्हू के बैल

बारिश 

भीष्म 

आगाज़ 

परछाइयाँ 

शान्तनु की चिंता  

आत्म मंथन

हाशिये पर ज़िन्दगी 

कर्मवीर

 

रावण के बाद

बोझिल हवा,
हाथ को हाथ न सूझता था
साँस किरकिरी हो चली थी
कोई अदृश्य राख
खूब बरसी थी उस दिन,
जहाँ भी वह राख गिरी
उपजीं वहाँ वहाँ
विषैली अमरबेल की जात !
जड़ें बोईं गयीं हर जगह
चुपके से
जमीन में
कि उपजती रहे सदा यह कँटीली फ़सल
युगांत तक ।
सकल धरा पर
घातक
विष का रक्त बहा था
नये उदय के सूर्य
तथा उसकी नव
द्युति की सहज छाँव में ।

शांत ! अरे , खामोश !!
डपटकर कहते हैं
मुझसे
अंगारों भरी दहकती
आंखों वाले पन्ने वे
जिनमें लिखा है
सुबह हुई थी
उस दिन
कोई
सच्चाई की जीत हुई थी
और किसी रावण की
शायद-
मौत हुई थी ।

पापी था,
आततायी, दुष्ट राक्षस !
प्रतीक एक
बर्बर , आदिम और नृशंस जाति का !!
राक्षस
जिसने
माँगी सहमति
अपहृता एक वनिता से,
अपने ही परिणय की
मैं तो पन्ने घूम घूम कर
हार चुका
है मिलता नहीं एक राक्षस
ऐसा कोई भी ।

उस दिन
किसी विभीषण के हाथों
कहीं चुपके से बोया गया
था अनश्वर बीज कोई
कि जिससे सारी धरा
में
जड़ें पैठ गयीं
दूर तक ,
भीतर तक
आत्मा तक
जो अनश्वर, अकाट्य
अशोष्य, अजर
अलिप्त है
उस अनश्वर की मौत हुई
जड़ों के हाथों
नहीं आश्चर्य
कि अग्नि को सौंपी गयी
उद्भिजा नारी
कि जिसे उस
'राक्षस '
ने छुआ तक न था ।

उफ़!पन्नों के डर से
मस्तिष्क सहमा हुआ है
उन हब्शी पन्नों के डर से-
कि पता नहीं कब
फ़ाड़ दिया जाये उसका
पन्ना
डरता है
उतारते हुए परतें
उन पन्नों से
हर शब्द में जिनके शायद
परतें हैं
कुरूप दर कुरूप
उन्हीं किन्हीं परतों
से
निकलते राजमुकुट
और सिंहासन
जयघोष,
नाद,
कि जबतक रहेगा
सत्य का पक्षधर कोई
एक रावण तो
बनना ही पड़ेगा
किसी न किसी को।
देना पड़ेगा
रात्रि को जन्म
कि सूर्य आराधना हो सके !

और मेरे
ही कान खराब हैं
कि हर जयघोष ,स्तुति में
मुझे सुनाई देती है
एक आदिवासी , आदिम महक
जिसके फ़ूलों के बीज
सदियों पहले सारी धरती में
बोये गये ।
जिसके उद्भव का
दिव्य भस्म
बरसा था अधित्यका पर
उस दिन शायद
रावण मरा था कोई ।
उसी दिन
पत्थर पर लिखे गये थे
नायकत्व के उद्भव के
सभी अभियान वे !

और आश्चर्य!
कि खेतों में,
जंगलों में
लाल झंडे
और बर्फ़ को बारूद से
सोंधा करने वाले
यत्न देख कर
चौंक जाती है
पन्ने पढ़ने वालों
की मति -
जैसे कोई घृणित
त्याज्य और
भयावह पशु देख लिया हो
कि जैसे ये
किसी और
धरा की हो
फ़सल !!
कि जैसे इन
शांतिप्रिय पुष्पों ने
किसी
अंधेरे, काले कोने में
नहीं किये
तेज नाखून अपने -
और नहीं किटकिटाये
नुकीले दाँत
सभ्यता के ।

फ़िर डराते हैं मुझे
अंगारे जैसी आँखों वाले
पन्ने वे
पार की मैंने
किताबों वाली रेखा जब
जब भी
उठाया प्रश्न
रेखा खींचने वाली
कलम
की विश्वसनीयता पर !
जब भी मारनी चाही
छलाँग -
कुतर डाले मेरे
मानस पंख उन
पन्नों में लिखी हुई
बड़ी बड़ी कैंचियों ने
अधिकार की सीमा का
तब तब हुआ जन्म
उसी आदिम चिल्ल-पों के बीच
मेरे अंत के
नायाब तरीके ईजाद हुए
और आग के
चारों तरफ़
झूमती नाचती
डरावनी आवाज़ें निकालती
अंधेरे की लिखावट में
लील लिया
उन पन्नों नें मुझे
और उन
पन्नों में लिखे
मुझको पढ़ती हुई
आवाजों नें कहा-
एक और रावण का
वध हुआ ।

 

किस भाँति तुम्हें पूजूँ प्रस्तर !

किस भाँति तुम्हें पूजूँ प्रस्तर! कुछ प्राण धरा पर भी बरसे
कब तक पीयूष रहे अम्बर में धरा बूँद भर को तरसे

नयनों में पलते सुखद लोक , जीवन की कुत्सित नश्वरता
यह हर्ष , प्रमाद , भावनाएँ ,मानव की लोलुप निर्भरता
सबकी हिम्मत से दूर खड़े , तेरे घर के निस्पंद द्वार
जिनतक न डूबती आँखों की पहुँची कोई कातर पुकार
किस तरह करूँ आहूत किसे, तेरी करूणा थोड़ी बरसे
किस भाँति तुम्हें पूजूँ प्रस्तर! कुछ प्राण धरा पर भी बरसे

धरती की नित बढ़ रही प्यास , झरते निर्झर से आश्वासन
देवत्त्व रिझाने हेतु त्याग , दुख के ये बेमन आलिंगन
धरती के सारे स्वार्थ त्याज्य, अम्बर को पर है प्यास बड़ी
दुख सह कर , बलि दे मिटे धरा ,ऊपर लहराती जीभ खड़ी
धरती भी कब तक यज्ञ करे, जब झरे कृपणता ऊपर से
किस भाँति तुम्हें पूजूँ प्रस्तर! कुछ प्राण धरा पर भी बरसे

 

अक्षर

छुटपन में

एक स्लेट होती थी

जिसपर उलटे सीधे , टेढ़े मेढ़े

अक्षर उगाते थे हम

जब पहली बार

लिखते थे हम स्लेट पर

तितली की शक्ल का ''

सब खुश हो जाते थे

वे अक्षर बड़े आजाद थे,

कभी तितली

कभी गौरैया

कभी चींटी

हुआ करते थे

छोटी छोटी उंगलियाँ

जैसा जी चाहा , वैसा ही ''

लिख लेतीं थीं ।

फ़िर धीरे धीरे हाथ पकड़ कर

सीखा हमने

गौरैया, चीँटी और तितली को

'' लिखना ।

उड़ते-भागते अक्षर स्लेट पर

ऐसे चिपके

कि फ़िर न हिल सके।

फ़िर स्लेट बदल गयी, और

कापियों में अक्षर बिछाने लगे हम

पहले सादी और फ़िर

रूल वाली कापियों में ,

ताकि दो रेखाओं के

जमीन और आसमान की कैद से

छूट न पायें ये शैतान अक्षर !

फ़िर शायद

धीरे धीरे

अक्षरों की भी उड़ने और भागने की इच्छा

खत्म हो गयी ,

वे भी खुश हो लेते थे

अपने सुडौल और सही

रेखाओं के बीच फ़ँसे होने पर ।

फ़िर जब भी

रूल वाली उस कापी में

कोई अक्षर इधर उधर भटकता

तो उसे लाल रंग से काट दिया जाता

शायद अक्षरों का रक्त भी लाल ही था ।

फ़िर वे अक्षर घबराने लगे

कि कहीं उन्हें भी

इधर उधर भटकने पर

काट न दिया जाय ।

इसके बाद

सुडौल आकार में

किताबों और कापियों में

सही जगह पर

छापे गये वे -

सबने उन्हें अपने-अपने तरीके से

अलग अलग क्रम में

सजाया, लिखा

फ़िर छापा

जिसने जितने अच्छे क्रम में

सजाया उन्हें,

बाजार में वे उतना ही बिके ।

लेकिन

फ़िर कभी वे अक्षर

तितली या गौरैया न हो सके

 

ओ हंस !

ओ हंस ,

तुम ज्वालामुखी क्यों हुए ?

कि एकबारगी ही

फ़ूट पड़े

अपने श्वेत लावे के साथ

फ़िर

सूख गये धरा तक पहुँचने से पहले ही !

क्षीर विवेकी ओ !

किस भाँति तय किये

पृथकता के पैमाने तुमने

कि आज भी मिलती है

उजली गन्ध

हर कुएँ के जल में ?

ओ श्वेतपंख !

क्यों तुम गरुड़ बने ?

कि तुम्हारे धारदार पंखों के

अग्निमय निशान

क्षितिज पर टिक न सके

अरुणिम ज्योति सदृश !

ओ हंस !

तुम नदी क्यों न हुये

कि पत्थर की दरार से धीरे धीरे

रिसकर फ़ैलते और बहते,

बड़ी धार बनकर-

दूर तक

फ़िर उगता तुम्हारा रक्त

सदियों तक फ़सलों में ।

  

यह गज़ल मेरी आवाज़ में सुनें : ghazal.mp3

गज़ल

महफ़िलों की नीयतें बदल गयीं हैं आजकल
महमिलों से आजकल शराब निकलती नहीं

क़ातिलों के कायदे खुदा भी जानता नहीं
जान गई पर मुई हिज़ाब निकलती नहीं

जिन्दगी जवाब चाहती हरेक ख्वाब का
ख्वाब बह गये मगर अज़ाब निकलती नहीं

ख़्वाहिशों के अश्क हैं हज़ार मौत मर रहे
कब्रगाह से मगर चनाब निकलती नहीं

क़ौम कई लुट गये मोहब्बतों के खेल में
क्यों इबादतों से इन्कलाब निकलती नहीं

तेरे इन्तजार में बिगड़ गयी हैं आदतें
रह गयी है उम्र बेहिसाब निकलती नहीं ।

इस क़दर है ज़िन्दगी की लौ यहाँ बुझी-बुझी,
एक भी चराग़ से है आग निकलती नहीं

Posted by आलोक शंकर at 1:33 PM 0 comments

 

स्वप्न का निमन्त्रण 


राख के सूखे अधर पर आग रखकर
क्यों जलाया स्नेह का अंगार तुमने
वृक्ष काँटों का बना मैं सूखता था
फ़िर बरसकर क्यों पिलाया प्यार तुमने ।

प्रीत तेरी बह रही, है आज अविरल धार बनकर
औ' अधर अतृप्त मेरे जीर्णता का सार बनकर
ताकते थे प्यास चातक की लिये अपने हृदय में
एक भी पर बूँद बरसी क्या कभी मेरे निलय में
प्यार का व्रत तोड़ने को निज-नयन के बादलों से
आज क्यों बरसात कर पिघला दिया संसार तुमने

मैं फ़लक की सेज पर लिख-लिख सितारे थक चुका था
और मधु के पात्र में भी पीर भरकर चख चुका था
जब निराशा का वजन उम्मीद पर भारी पड़ा था
और अपनी चाहतों के सामने पर्वत खड़ा था
तब न जाने किस गली से कल्पना के पंख लेकर
क्यों कराया मुश्किलों का यह हिमालय पार तुमने

मैं न समझा था पराजय या कि जय का
अर्थ कोई भी हमारे प्यार में था
नाव तेरी जब किनारे चूमती थी
ढूँढ़ता तब मैं तुम्हें मँझधार में था
स्वप्न मेरे ! आज क्यों देकर निमन्त्रण
पत्थरों में साँस भरना चाहते हो
क्यों समय की पत्रिका पर प्यार लिखकर
तुम मुझे इतिहास करना चाह्ते हो ?

लोग कहते हैं ,मोहब्बत बावरी है
आदमी को यह नहीं पहचानती है
पर न समझा जग, मोहब्बत नूर वह है
आदमी को जो ख़ुदा कर डालती है ।
मीत मेरे , इस हृदय पर हाथ रखकर
क्यों दिखाया स्वर्ग का यह द्वार तुमने
वृक्ष काँटों का बना मैं सूखता था
फ़िर बरसकर क्यों पिलाया प्यार तुमने ।

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 टीस                                                   

 कमरे के बियाँबान में
काँटों को छूती हुई
अष्टावक्र सी दिखती हुई एक आकृति
लेटी है,
या बचना चाहती
काँटों से बदन पर लिख रहे
अँधेरों से--
शरीर के गँदले पर
चीरे की कालिख़ दुखती है
आह! यह पिंजर!! पिंजर !!
फड़फड़ाते हुए विखंडित पंख ,
मिरगी-से काँपते -उछलते
फड़-फड़ फड़-फड़, शांत ।
असंभव है , उल्लंघन -
फड़फड़ाने की सीमा-ऊर्जा का ;
दूसरा भाग-
कसमसाता है, फड़-फड़ होती थोड़ी
हाय! चुभते हैं काँटे,
छलनी-छलनी होती चमड़ी में
और बारीक छिद्र करते -
तीर सी चुभती है हवा, समाती है
भीतर- कँपा देती वहाँ के निर्वात को भी !
उग आते हैं वक्र के आठों चिन्ह
चेहरे पर भी !
विध्वंसक है टकराव,
बाहर-भीतर की कालिख का-
जाने कब फ़ट पड़े
विष की झील के नीचे
सोया ज्वालामुखी,
छनाक! तोड़कर पानी की परत को
चमड़ी की छेदों से निकलती
विषैली आग और धुआँ
बदल न दे हरी भरी दुनिया को
गैस चेम्बर में!

कोटिशः बार मृत बदन
के विषैले धुएँ से
मर न जाएँ हजारों जीवित लोग,
चीखते-चिल्लाते-भागते
एक-दूसरे और अपने आप से,
और मढ़ें इल्ज़ाम धुएँ पर-
उफ़! घुटन होती है,
फ़िर वही कसमसाहट!
चमड़ी में फ़िर छेद !
फ़िर चुभन!
धुआँ ! धुआँ !!
कमरे की टीस असह्य है ।

उठकर भागता है
लेकर कटे-फटे बदन को ले-
रिसते गंदे लिज़लिज़े रक्त को
तोड़कर दरवाज़ा
जंगल के उस अकेले कमरे का,
झील की तरफ़
नंगे पाँव ,
अपने हिस्से की लाल कीचड़ में
डुबोते हुए पाँव ,
अंगुलियों के बीच की फ़ाँक से
ठंढे कीचड़ को रास्ता देते हुए,
और रखते हुए कदम
हड्डियों के ढेर पर !
जंगल के अपने हिस्से की
छिदी, रिसती आत्माओं की हड्डियाँ
पाँवों के नीचे आकर टूटतीं
और
चुभतीं पाँवों में
चूसकर रक्त थोड़ा
मिलाती और लाल रंग
कीचड़ में !!
झींगुरों की टिर्र टिर्र ………
जंगल की टीस असह्य है !

तेजी से भागता है-
खिसकती-सिसकती खोपड़ियों पर
सरपट रखता पैर,
झील के पानी से
जल्दी जल्दी ,धोता है लाल खून,
सफ़ेद पानी में लाल रंग
घुलता है धीरे धीरे,
हो जाता है हल्का लाल
पनियाले रक्त से धुलता है
और रक्त , अजस्र स्रोत से निकलता हुआ,
और झील में भर जाता है -
लाल पानी;
लाल से धुलता लाल !!
झील की टीस असह्य है । 

Saturday, December 01, 2007

क्षणिकायें

क्षुब्ध हो तुम,
ये पौधे बोलते क्यों हैं ?
क्यों चलते, झगड़ते , खड़े हैं
तुम्हारे विरूद्ध ?
बीज तो तुमने ही बोया था ।

-------

लोग नाराज़ हैं
कि तुम्हें पूज़ता हूँ मैं
मैं तो कुछ नहीं कह्ता
ज़ब वे पत्थर पूजते हैं ।

-------

तुम सोचते हो
अच्छा नचाते हो
कठपुतलियों को-
अपने बदन के धागे
तुम्हें नहीं दीखते ?

-----

पत्थरों के दिल नहीं,
उनके चेहरे सपाट हैं
तुम्हारा तो दिल है ?

-----

कहते हैं , दीवारों के कान हैं
कभी तन्हा रहो
तो पता चले
उनका दिल भी है ।

  बचपन

छोटे छोटे कदमों से जो
दुनिया को नाप नहीं सकते
जो अंतरिक्ष की ऊँचाई-
गहराई भाँप नहीं सकते

जो कूड़े - करकट के ढेरों में
बचपन रोज़ खपाते हैं
जो रोज़ गली के कुत्तों में भी
अपना साथी पाते हैं

हलवाई की दूकानों में
मेज़ो पर साफ़े मार रहे
जिसका मतलब भी ग्यात नहीं
उस किस्मत को धिक्कार रहे

अपनी कमीज़ से रेलों में
जो झाड़ू रोज़ लगाते हैं
जिनको हम एक अठन्नी भी
देते देते कतराते हैं

जो कुत्तों से जूठन की खातिर
भिड़ते और रगड़ते हैं
दीवाली के बम , फ़ुलझड़ियों से
जो जल जल कर मरते हैं

जो अखबारों को सड़कों पर
बेच कर गुजारा करते हैं
जो रोज़ चाय के प्यालों को
दफ़्तर पहुँचाया करते हैं ।

उन आँखों को देखो जिनमें
जाने कैसी लाचारी है
यह ही भविष्य हैं भारत के
यह ही पहचान हमारी हैं


जिनको यह भी मालूम नहीं
क्या सपने हैं , क्या है आशा
जिनको बस तुतलाकर कहने
आती निर्धनता की भाषा

क्यों गैराज़ों में बचपन को
कालिख में पलना पड़ता है
क्यों फ़ुटपाथों की सुबहों में
उठ आँखें मलना पड़ता है

कोई बतलाये सड़कों पर
क्यों ढोता है कूड़ा बचपन
क्यों पाँच बरस के बच्चों में
हो जाता है बूढ़ा बचपन ?

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 क्षमा और वीरता

 इतिहासों के श्वेत पटल पर अंकित स्वर्णिम भाषा
मुखरित करती शूरवीर नर-रत्नों की परिभाषा
करती है जो अद्भुत तुलना वीरोचित कर्मों की
जहर बुझे तीरों से बिंधनेवाले सब धर्मों की ।
किसने विश्वविजय पाई थी, किसने किसे हराया
किसने अध्यायों में सबसे ज्यादा रक्त बहाया
शोणित-दृक्कलिमा लिखित नरता की अद्भुत गाथा
रक्त तिलक से दमक रहा है मनुष्यता का माथा
बहुत कठिन है इन पन्नों में अपना नाम लिखाना
बिना बहाये एक बूँद भी रक्त वीर कहलाना ।
स्वाभाविक व्यवहार छोड़ कुछ भी करना मुश्किल है
हंता हित तो क्षमा ,दया की बड़ी दूर मंजिल है ।
रोज मरुस्थल में गुलाब के फूल नहीं खिलते हैं
माँदों में सिंह की ,जीवित क्या हिरण कभी मिलते हैं ?
विस्मय ही है यदि रण में भी शांति पुष्प खिल जाये
शोणित - सरिता में यदि कोई श्वेत वसन मिल जाये ।
नहीं चाहता मनुज कभी वह गर्व त्याग कातर हो
अंतस्तल में बसी शौर्य की भित्ति कभी जर्जर हो ।
श्रेष्ठ कौन है ? खड्ग उठाकर शीश उड़ानेवाला
या कि क्षमा कर हँसते हँसते प्राण गँवानेवाला ?
बड़ा वीर तो वह है जो अरि को भी स्नेह, क्षमा दे
खड्ग उठाते हाथों को हँसकर निज शीश थमा दे ।
बड़ा वीर वह है जो आग्रह करे, सदैव विनत हो
किसी मूल्य के लिये नहीं पर हिंसा हित उद्धत हो ।
जो भी ज्वाला में जलकर द्युति देता , उसकी जय हो
उसे नमन, जो खड्ग फ़ेंकता, धरा ताकि सुखमय हो ।
उसे पूजती धरा प्रेम हित जो सूली चढ़ता है
तीन गोलियाँ खाकर मुख से 'हे राम' कहता है
रक्तरंजिता अधित्यका को श्वेत बनानेवाला
एक मनुज वसुधा का थोड़ा त्रास घटानेवाला
फ़िर से भू पर मची होड़ है रक्त बहा देने को
कितनी देर लगायेगा वह जन्म नया लेने को ?

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एक डाकू की मौत

उस अरण्य के
वीराने के
कोलाहल का दर्द पचाते
रावण के भीतर का रावण
थर-थर थर -थर
काँप रहा है ।
इस वीभत्स , भयावह
का भय
भीत -प्राण का घूँट आज़
अपनी गरदन से उतर रहा है।
हाथों में जो अस्त्र,
बड़ा जो विध्वंसक,
भयकारी है ;
आज़ विषैले , तेज दर्द का
मरहम बनता दीख रहा है ।
आँखों के दर्पण , जिनमें
है पड़ी परत जाने कैसी \
जो सदा विनत ,
बस दीन , क्रंदनों के विलाप
को देख - दिखा बस तुष्ट हुए हैं;
जाने क्यों उस दर्पण के
पीछे जो परछाईं बसती थी,
वह भी है
लो झुकी , प्रार्थना - मुद्रा में
निरीह बनकर !
पत्थर का बुत,
हृदय कोशिकायें जिसकी
कोमल हैं , नाज़ुक
हम -सीं हैं
प्रस्तर के जुड़ाव को पल पल
तोड़ रहीं हैं ।
हाथों की गठरी
उसमें जो स्वर्ण
रक्त से बुझा हुआ है
वह
हाथों से छूट-छाटकर
कहीं राह में फ़िसल गया है,
और पिघलता है थोड़ा
पत्थर,
बनकर वह चूर्ण
भरभराकर गिरता है
कीचड़ में-
मानो वह पत्थर का बुत
प्रार्थना-भाव में झुका हुआ
अपने पैरों से रौंदे
फ़ूलों पर रखकर
निज - मस्तक
फ़िर से कुछ जीवन माँग रहा हो ।

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बाढ़

एक शक्ल की दो आँखें
बूढी सी, कुछ पथराई सी
डूबते हुए,
मटियाले , गंदले से जल में,
इच्छुक , शायद कुछ कहने को
और पास ही
पक्की एक भित्ति के ऊपर
एक अधमरी लता बेल की
श्वास जोड़ती पल - पल
दो पल
और गुजर करने को जीवित ;
तभी, गिरी दीवार अधमरी
जल की गोद लिपट सोने को,
मरी लता बेमौत-
अगर आँखें होतीं उसकी भी
तो शायद दिखती
फ़िर वही डूबती
हुई चमक पथराई सी ।

वह एक प्रस्तरी चमक
बनी जो ऊर्जा या सपनों , भावों के अकस्मात
ही एक साथ
जी लेने के उस दुष्प्रयत्न से ।
शायद उसमें दिखता हो जलमग्न
अहिल्या का भी जीवन स्वप्न
देख रहा हो राह
किसी अनहोनी लगते से
नायक का ।

सिंधु समान दृश्य चतुर्दिक
मध्य सिंधु में
एक स्वर्ण नौका दिखती
है जिसपर रखी एक कुरसी
या राजसिंहासन
उसपर श्वेत वसन वाले
कुछ देवपुत्र, समग्र हितकारी
लड़ते , गिरते , खोजते हुए
डूबती हुई उन आँखों के दर्पण में
परछाई , पानी में बहते
जाते सोने के टुकड़ों की
जिसका फ़िर गढ़कर राजमुकुट
वे बैठ सकें
फ़िर सिंहासन पर !

बूढ़ी सरिता भी सोच रही
अबकी धो डालूँ
सारे टुकड़े सोने के
जिनसे शायद फ़िर कभी न बन पाये
कोई भी राजमुकुट
औ' स्वप्न कभी भी
बनने ना पाये पत्थर !

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पंख पसारो

जबतक अम्बर की ऊँचाई सिमट न आये इन पंखों में
तबतक मत बाँधो वितान अपनी उड़ान का , पंख पसारो

कोई सीमा नहीं बनी है ब्रह्मांडों के किसी भुवन में
सीमा तो निर्मित होती है विहगों के अपने ही मन में

सीमा होती यदि उड़ान की , तो फ़िर स्वर्ग बना क्यों बोलो
कुछ भी बाहर नहीं पहुँच के, जोर लगाओ, डैने खोलो

दीख रहा है जो आँखों को धुँधला सा , वह पास पड़ा है
जो सूरज चुँधियाता था आँखों को , देखो बुझा पड़ा है

एक दीप के बुझ जाने से तारे नहीं खत्म होते हैं
थोड़ा पंखों के जलने से , सपने नहीं भस्म होते हैं


यदि कल्पना पहुँच सकती है किसी लोक के किसी सुमन पर
तो निश्चय ही मिल सकता है एक पुष्प वह इसी भुवन पर

यदि सपनों की पहुँच कहीं है ,तो वह पहुँच तुम्हारी भी है
कभी जीत की चाह जीव की,बाधाओं से कहीं रुकी है?

जबतक तारों की उजियाली , सिमट न जाये इन कदमों में
तबतक उनको चुन चुनकर झोली भर डालो, पंख पसारो

जबतक अम्बर की ऊँचाई सिमट न आये इन पंखों में
तबतक मत बाँधो वितान अपनी उड़ान का , पंख पसारो

-आलोक शंकर

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प्रेम का पर्याय जीवन

किसी नरपति के तनय को बेर शबरी का खिलाना
या किसी हनुमान का पर्वत उठा औषधि पिलाना
रास से राधा किशन के झूमता मदमस्त मधुबन
प्रेम का पर्याय जीवन

धूप में तपती धरा को रोज थोड़ा नम बनाती
रेत की नीरस त्वचा पर ,हर घड़ी चुंबन लुटाती
आप मिटकर रस लुटाती लहर का अभिप्राय जीवन
प्रेम का पर्याय जीवन

निर्झरों का बह निकलना, दो किनारों को मिलाना
राह रोके पत्थरों को रोज सीने से लगाना
या लपेटे साँप तन पर सुरभि देना यथा चंदन
प्रेम का पर्याय जीवन


हरी पत्ती की सतह पर , रजकणों को धो मिटाती
ओस की इक बूँद और उस बूँद का अभिप्राय जीवन

प्रेम का पर्याय जीवन

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प्रतिध्वनि

किसी आश्वस्त घाटी में कभी आवाज यदि गूँजे
समझना यह तुम्हारी ही प्रतिध्वनि लौट कर आयी ।
यही आवाज जिसकी धार धड़कन तक पहुँचती है
उसी का वेग, पत्ते-सी हिली जो आज परछाईं ।

हमेशा याद के कोमल गलीचों पर धमकती है
किसी तलवार से है चीर देती रोज तनहाई
बड़े भारी कदम इसके, हृदय पर पड़ रहे हैं रे !
कि इसकी चोट से बह पीर आँखों से निकल आई ।

हमारी प्यास से क्यों होंठ धरती के फ़टे जाते
हमारी भूल की कैसे भला उसने सज़ा पाई ?
बड़ा निर्वात है रे आज भीतर के अहाते में !
बहा कर ले गये हो तुम न जाने कहाँ पुरवाई ।

बिछा कर नींद सोते थे हम अपनी आँख के नीचे
न जाने किरकिरी कैसी फ़िसलकर आँख में आई ,
तुम्हारे चैन के आगे कहीं पत्थर पड़ा होगा
तभी आवाज़ अपनी लौटकर वापस चली आई ।

 

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   कविता
 

प्रस्तर -तनुजा , तन्वि -स्नेहिल सरिता 

भाव  भर - भर भार  ढोती -    कल्पना ;

नीरसा  रसभरी  , शीतल   ऊष्णता

शशिकला , कमनीयता -कोमल  कली  की |


रेत पर  बह्ती सुशीतल  गीतिका -

सप्त  रव , रंगीन  रश्मि - विभा

काम तरु का  गरल  फल , निष्काम;

घटा  में  घट  भर  भरी  श्यामल  प्रभा

स्वस्ति  सुधा ,  विहग  व्रती    की |

 

भाव  भर  अभाव ,  नेत्र - धारा  सार

ह्रिदय  वीणा-  क्लेष  राग  रव,

श्रान्त  चरण चपल , विकल चक्षु 

तोष , त्रिप्ति  - मरीचिका -सैकत पथी की|


ताप ,तेज - नित नया भानु  रचती

सुप्त  बुत  -बेकल नयन में

सृष्टि- सारा, अश्रु  धारा - लोल लहरें 

प्रलयदा  हुंकार - दलित यती की  |

                                      -आलोक शंकर


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धरती में जिसने प्यास भरी,

अम्बर में उसने नीर भरा ;

तट - अधरों के नीचे रखा ,

है प्याला अंबुधि का गहरा ।

    - हरिबंशराय बच्चन