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आत्मा के सौन्दर्य का शब्दरूप है काव्य मानव होना भाग्य है, कवि होना सौभाग्य -- 'नीरज'
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23-09-07_1606.mp3 विविध भारती रेडियो पर हिन्द युग्म की चर्चा और मेरी कविता की पंक्तियाँ
" ऐ खुदा सूरज़ छुपा ले अपने दामन के तले ,
आँख पर उसकी चमकने आज़ एक दीपक ज़ला है।"
"कौन कहता है हवा पर पाँव रख सकते नहीं,
आसमाँ छूने का ये शायद कोई अंदाज़ हो।"
"सपनों की छाती में लेती
हो अगर उड़ानें अँगड़ाई,
तो रोक नहीं सकती उसको ,
पर्वत की कोई ऊँचाई ।"
मेरी कविताओं से " शंका से तो मनुज़ सहमकर ही जीता है
कुछ जला दूध का छाछ फूँककर ही पीता है।
पंक्तियाँ चिंता नहीं हमारा कुछ भी ले पाती है,
अन्तर में पीड़ा दुस्सह तो दे जाती है;"
जब जीवनदायी रोता है,
संसार सुखी कब होता है?
जो भी ज्वाला में जलकर द्युति देता , उसकी जय हो
उसे नमन, जो खड्ग फ़ेंकता, धरा ताकि सुखमय हो ।
एक दीप के बुझ जाने से तारे नहीं खत्म होते हैं
थोड़ा पंखों के जलने से , सपने नहीं भस्म होते हैं
अन्य कवितायेंधरती और आसमानमैं तुम्हारा मृदु चितेरा !अपने अपने खण्डहरआँख है यदि नम हमारीबचपन औरजीवनमैं ,चाँद !तुम होते तो …कवि रे, कर अब निर्मम गानदोष बस मेरा नहीं है ।कश्मीरख्वाहिशनिठारी पर-एक कहानी
कोल्हू के बैल
बारिश
भीष्मआगाज़परछाइयाँशान्तनु की चिंताआत्म मंथनहाशिये पर ज़िन्दगीकर्मवीर |
रावण के बादबोझिल हवा,हाथ को हाथ न सूझता था साँस किरकिरी हो चली थी कोई अदृश्य राख खूब बरसी थी उस दिन, जहाँ भी वह राख गिरी उपजीं वहाँ वहाँ विषैली अमरबेल की जात ! जड़ें बोईं गयीं हर जगह चुपके से जमीन में कि उपजती रहे सदा यह कँटीली फ़सल युगांत तक । सकल धरा पर घातक विष का रक्त बहा था नये उदय के सूर्य तथा उसकी नव द्युति की सहज छाँव में । शांत ! अरे , खामोश !! डपटकर कहते हैं मुझसे अंगारों भरी दहकती आंखों वाले पन्ने वे जिनमें लिखा है सुबह हुई थी उस दिन कोई सच्चाई की जीत हुई थी और किसी रावण की शायद- मौत हुई थी । पापी था, आततायी, दुष्ट राक्षस ! प्रतीक एक बर्बर , आदिम और नृशंस जाति का !! राक्षस जिसने माँगी सहमति अपहृता एक वनिता से, अपने ही परिणय की मैं तो पन्ने घूम घूम कर हार चुका है मिलता नहीं एक राक्षस ऐसा कोई भी । उस दिन किसी विभीषण के हाथों कहीं चुपके से बोया गया था अनश्वर बीज कोई कि जिससे सारी धरा में जड़ें पैठ गयीं दूर तक , भीतर तक आत्मा तक जो अनश्वर, अकाट्य अशोष्य, अजर अलिप्त है उस अनश्वर की मौत हुई जड़ों के हाथों नहीं आश्चर्य कि अग्नि को सौंपी गयी उद्भिजा नारी कि जिसे उस 'राक्षस ' ने छुआ तक न था । उफ़!पन्नों के डर से मस्तिष्क सहमा हुआ है उन हब्शी पन्नों के डर से- कि पता नहीं कब फ़ाड़ दिया जाये उसका पन्ना डरता है उतारते हुए परतें उन पन्नों से हर शब्द में जिनके शायद परतें हैं कुरूप दर कुरूप उन्हीं किन्हीं परतों से निकलते राजमुकुट और सिंहासन जयघोष, नाद, कि जबतक रहेगा सत्य का पक्षधर कोई एक रावण तो बनना ही पड़ेगा किसी न किसी को। देना पड़ेगा रात्रि को जन्म कि सूर्य आराधना हो सके ! और मेरे ही कान खराब हैं कि हर जयघोष ,स्तुति में मुझे सुनाई देती है एक आदिवासी , आदिम महक जिसके फ़ूलों के बीज सदियों पहले सारी धरती में बोये गये । जिसके उद्भव का दिव्य भस्म बरसा था अधित्यका पर उस दिन शायद रावण मरा था कोई । उसी दिन पत्थर पर लिखे गये थे नायकत्व के उद्भव के सभी अभियान वे ! और आश्चर्य! कि खेतों में, जंगलों में लाल झंडे और बर्फ़ को बारूद से सोंधा करने वाले यत्न देख कर चौंक जाती है पन्ने पढ़ने वालों की मति - जैसे कोई घृणित त्याज्य और भयावह पशु देख लिया हो कि जैसे ये किसी और धरा की हो फ़सल !! कि जैसे इन शांतिप्रिय पुष्पों ने किसी अंधेरे, काले कोने में नहीं किये तेज नाखून अपने - और नहीं किटकिटाये नुकीले दाँत सभ्यता के । फ़िर डराते हैं मुझे अंगारे जैसी आँखों वाले पन्ने वे पार की मैंने किताबों वाली रेखा जब जब भी उठाया प्रश्न रेखा खींचने वाली कलम की विश्वसनीयता पर ! जब भी मारनी चाही छलाँग - कुतर डाले मेरे मानस पंख उन पन्नों में लिखी हुई बड़ी बड़ी कैंचियों ने अधिकार की सीमा का तब तब हुआ जन्म उसी आदिम चिल्ल-पों के बीच मेरे अंत के नायाब तरीके ईजाद हुए और आग के चारों तरफ़ झूमती नाचती डरावनी आवाज़ें निकालती अंधेरे की लिखावट में लील लिया उन पन्नों नें मुझे और उन पन्नों में लिखे मुझको पढ़ती हुई आवाजों नें कहा- एक और रावण का वध हुआ । किस भाँति तुम्हें पूजूँ प्रस्तर !किस भाँति तुम्हें पूजूँ प्रस्तर! कुछ प्राण धरा पर भी बरसेकब तक पीयूष रहे अम्बर में धरा बूँद भर को तरसे नयनों में पलते सुखद लोक , जीवन की कुत्सित नश्वरता यह हर्ष , प्रमाद , भावनाएँ ,मानव की लोलुप निर्भरता सबकी हिम्मत से दूर खड़े , तेरे घर के निस्पंद द्वार जिनतक न डूबती आँखों की पहुँची कोई कातर पुकार किस तरह करूँ आहूत किसे, तेरी करूणा थोड़ी बरसे किस भाँति तुम्हें पूजूँ प्रस्तर! कुछ प्राण धरा पर भी बरसे धरती की नित बढ़ रही प्यास , झरते निर्झर से आश्वासन देवत्त्व रिझाने हेतु त्याग , दुख के ये बेमन आलिंगन धरती के सारे स्वार्थ त्याज्य, अम्बर को पर है प्यास बड़ी दुख सह कर , बलि दे मिटे धरा ,ऊपर लहराती जीभ खड़ी धरती भी कब तक यज्ञ करे, जब झरे कृपणता ऊपर से किस भाँति तुम्हें पूजूँ प्रस्तर! कुछ प्राण धरा पर भी बरसे अक्षरछुटपन में एक स्लेट होती थी जिसपर उलटे सीधे , टेढ़े मेढ़े अक्षर उगाते थे हम जब पहली बार लिखते थे हम स्लेट पर तितली की शक्ल का 'क' सब खुश हो जाते थे वे अक्षर बड़े आजाद थे, कभी तितली कभी गौरैया कभी चींटी हुआ करते थे छोटी छोटी उंगलियाँ जैसा जी चाहा , वैसा ही 'क' लिख लेतीं थीं । फ़िर धीरे धीरे हाथ पकड़ कर सीखा हमने गौरैया, चीँटी और तितली को 'क' लिखना । उड़ते-भागते अक्षर स्लेट पर ऐसे चिपके कि फ़िर न हिल सके। फ़िर स्लेट बदल गयी, और कापियों में अक्षर बिछाने लगे हम पहले सादी और फ़िर रूल वाली कापियों में , ताकि दो रेखाओं के जमीन और आसमान की कैद से छूट न पायें ये शैतान अक्षर ! फ़िर शायद धीरे धीरे अक्षरों की भी उड़ने और भागने की इच्छा खत्म हो गयी , वे भी खुश हो लेते थे अपने सुडौल और सही रेखाओं के बीच फ़ँसे होने पर । फ़िर जब भी रूल वाली उस कापी में कोई अक्षर इधर उधर भटकता तो उसे लाल रंग से काट दिया जाता शायद अक्षरों का रक्त भी लाल ही था । फ़िर वे अक्षर घबराने लगे कि कहीं उन्हें भी इधर उधर भटकने पर काट न दिया जाय । इसके बाद सुडौल आकार में किताबों और कापियों में सही जगह पर छापे गये वे -
सबने उन्हें अपने-अपने तरीके से अलग अलग क्रम में सजाया, लिखा फ़िर छापा जिसने जितने अच्छे क्रम में सजाया उन्हें, बाजार में वे उतना ही बिके । लेकिन फ़िर कभी वे अक्षर तितली या गौरैया न हो सकेओ हंस !ओ हंस , तुम ज्वालामुखी क्यों हुए ? कि एकबारगी ही फ़ूट पड़े अपने श्वेत लावे के साथ – फ़िर सूख गये धरा तक पहुँचने से पहले ही ! क्षीर विवेकी ओ ! किस भाँति तय किये पृथकता के पैमाने तुमने कि आज भी मिलती है उजली गन्ध हर कुएँ के जल में ?
ओ श्वेतपंख ! क्यों तुम गरुड़ बने ? कि तुम्हारे धारदार पंखों के अग्निमय निशान क्षितिज पर टिक न सके अरुणिम ज्योति सदृश !
ओ हंस ! तुम नदी क्यों न हुये कि पत्थर की दरार से धीरे धीरे रिसकर फ़ैलते और बहते, बड़ी धार बनकर- दूर तक फ़िर उगता तुम्हारा रक्त सदियों तक फ़सलों में ।
यह गज़ल मेरी आवाज़ में सुनें : ghazal.mp3 गज़लमहफ़िलों की नीयतें बदल गयीं हैं आजकल Posted by आलोक शंकर at 1:33 PM 0 comments
स्वप्न का निमन्त्रण
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मेरी प्रकाशित कवितायें : Blogs: धरती में जिसने प्यास भरी, अम्बर में उसने नीर भरा ; तट - अधरों के नीचे रखा , है प्याला अंबुधि का गहरा । - हरिबंशराय बच्चन |
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Alok Shankar